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क्या अब पृथ्वी रहने लायक नहीं रह गई है कि चांद पर बसने का सपना देख रहे हैं

   

6000 करोड़ की लागत से बने चंद्रयान को भेजने की तैयारी हो रही है। एक प्रश्न मुझे परेशान करता है जब अमेरिकी वैज्ञानिक नील आर्मस्ट्रॉन्ग चाँद से होकर आ चुके हैं और उन्हें वहां कुछ नहीं मिला तो भारत को चंद्रयान भेजकर क्या हासिल होगा ? क्या सिर्फ वाहवाही लूटने और दुनिया को ये दिखाने के लिए कि हमने अंतरिक्ष विज्ञान में अमेरिका की बराबरी कर ली है ? ये इतना खर्चीला मिशन है कि डोंनाल्ड ट्रम्प को भी नासा को इसकी परमिशन देने के लिए कई बार सोचना पड़ा था पर भारत को तो सोचने की आदत बिल्कुल नहीं है। अगर ये कोई सैटेलाइट होता जिससे कृषि, रक्षा, मौसम या जासूसी जैसे कॉर्यों में मदद मिलती तो मैं इसका सहर्ष स्वागत करता। पर सबको मालूम है इसका क्या रिजल्ट निकलना है यानि खोदा पहाड़ निकली चुहिया। हमे चाँद पर पहुंचने की जल्दी है पर बाढ़ से बचने के बचने के उपायों के बारे में हम बिल्कुल नहीं सोचते। गाँव देहात तो छोडो दिल्ली, मुंबई और कोलकाता तक मात्र 10 सेमी की बारिश में बदहाल हो जाते हैं। क्या मास्को, शंघाई और शिकागो बारिश में कभी ऐसी बदहाल अवस्था में मिले हैं ? रक्षा के क्षेत्र में हमारी दशा बिल्कुल ही दयनीय है। तोप का गोला तक तो बनाने की तकनीक विकसित नहीं कर पाये, तोप का निर्माण तो दूर की चीज़ है। महंगे दामो पर राफेल, सुखोई, मिग, मिराज, अपाचे हेलीकाप्टर, बोफोर्स तोप और न जाने क्या क्या यूरोपीय देशों से खरीदते रहते हैं और सीना चौड़ा कर गणतंत् दिवस की परेड में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। चाँद पर पहुंचने का दम भरने वाला भारत देश इन आयुधों के निर्माण में इतना बेबस है कि पूछो मत ? कल्पना कीजिये युद्धकाल में हमे तोप के गोले न मिलें या विमान में तकनीकी खराबी आ जाने पर उसके पुर्जे न मिलें तो अथवा निर्माता कम्पनी इसे देने में टालमटोल करने लगे तो हम सवा सौ करोड़ भारतीयों का क्या हाल होगा ? हम घातक हथियार बनाएंगे नहीं क्योंकि इससे अहिंसा के पुजारी गांधी जी की आत्मा को कष्ट होगा पर महंगे दामों पर घातक हथियार विदेश से खरीदने पर गांधी जी की आत्मा को कोई कष्ट नहीं होता। कैसे कैसे सिद्धान्त हमने गढ़ रखे हैं।

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