#हिन्दुस्तान का मतलब सिर्फ ताजमहल नहीं है ।
दुनिया का सबसे प्राचीन और आधुनिक #बांध (डैम)
भारत मे आज भी सुचारू रूप से काम कर रहा
ये सिविल इंजीनियरिंग कहां पढ़ाई होती थी? किस इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ाई जाती थी?तब तो यूरोपियन लुटेरे फ्रांस, पुर्तगाली,ब्रिटिश भी नहीं आये थे भारत,ना इस्लामिक बलात्कारी लुटेरे तुर्क मंगोल...आये थे,कौन पढ़ाता था ये शिल्प कला वाणिज्य का ज्ञान??आज भी कुछ ब्रिटिश गुलाम बोलते हैं अगर ब्रिटिश ना आते तो हम पढ़ना लिखना रहना ना सीख पाते,l
तमिलनाडु के #तिरुचिरापल्ली में #चोल_राजवंश द्वारा
बनाया गया कल्लनई बांध कुछ सौ वर्ष नहीबल्कि
पूरे दो हजार साल पहले बना हुआ है और आज
भी करीब 10 लाख हेक्टर जमीन की सिंचाई करता है ।
भारत के इस गौरवशाली इतिहास को पहले अंग्रेज
और बाद में फ़रजीपंथी इतिहासकारों ने जानबूझकर
लोगों से इस तथ्य को छुपाया ।
ताकि गुरूकुल के महत्व को कोई समझ ना पाए ,आज के
सिविल इंजीनियरिंग 30साल भी चल जाए वही बहुत है।
दुनिया का सबसे प्राचीन और आधुनिक #बांध (डैम)
भारत मे आज भी सुचारू रूप से काम कर रहा
ये सिविल इंजीनियरिंग कहां पढ़ाई होती थी? किस इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ाई जाती थी?तब तो यूरोपियन लुटेरे फ्रांस, पुर्तगाली,ब्रिटिश भी नहीं आये थे भारत,ना इस्लामिक बलात्कारी लुटेरे तुर्क मंगोल...आये थे,कौन पढ़ाता था ये शिल्प कला वाणिज्य का ज्ञान??आज भी कुछ ब्रिटिश गुलाम बोलते हैं अगर ब्रिटिश ना आते तो हम पढ़ना लिखना रहना ना सीख पाते,l
तमिलनाडु के #तिरुचिरापल्ली में #चोल_राजवंश द्वारा
बनाया गया कल्लनई बांध कुछ सौ वर्ष नहीबल्कि
पूरे दो हजार साल पहले बना हुआ है और आज
भी करीब 10 लाख हेक्टर जमीन की सिंचाई करता है ।
भारत के इस गौरवशाली इतिहास को पहले अंग्रेज
और बाद में फ़रजीपंथी इतिहासकारों ने जानबूझकर
लोगों से इस तथ्य को छुपाया ।
ताकि गुरूकुल के महत्व को कोई समझ ना पाए ,आज के
सिविल इंजीनियरिंग 30साल भी चल जाए वही बहुत है।
राजनैतिक व्यवस्था जब सामाजिक व्यवस्था से छेड़-छाड़ करने लगती है तो क्या होता है? इसका एक अच्छा सा उदाहरण दक्षिण बिहार की अहर-पैन व्यवस्था में नजर आ जाता है। परंपरागत रूप से ये एक ऐसी व्यवस्था थी, जिसके जरिये बाढ़ के पानी को इकठ्ठा कर लिया जाता और बाद में वो सिंचाई जैसी जरूरतों के लिए इस्तेमाल होती थी। जमींदारी व्यवस्था के खात्मे के साथ ही इस व्यवस्था को भी नष्ट कर दिया गया। जी नहीं, ग़लतफ़हमी मत पालिए! जमींदारी व्यवस्था का खात्मा आजाद भारत में नहीं हुआ था।
काफी पहले जब अंग्रेजों ने नहरें बनवानी शुरू कीं तो उन्हें दिखा की जब तक अहर-पैन की सी व्यवस्थाओं से किसान अपने लिए पानी खुद ही इकठ्ठा कर सकता है, तबतक भला उनकी नहरों से पानी की खरीद कैसे होगी? भारतीय लोगों का खून चूसने की इसी प्यास का नतीजा था की इस व्यवस्था को ख़त्म किया जाने लगा। उनकी मान्यताओं के हिसाब से कोई दूसरा जन्म तो होता नहीं था, जो अपने किये कुकर्मों का फल भोगने की चिंता होती। उनकी अगली पीढ़ियों को भी यहाँ रहना जरूरी नहीं था, इसलिए १०-२० या पचास साल बाद क्या होगा, इसकी चिंता भला वो क्यों करते?
फिरंगियों के जाने के बाद जो भूरे साहब आये, वो रूप-रंग और शरीर से तो मैकले के हिसाब से हिन्दुस्तानी रहे, मगर उनकी आत्मा फिरंगी हो चुकी थी। सिंधिया के चुनावों के फ़ौरन बाद ही अपने बेटे को डिग्री मिलने पर विदेश जाना, या कश्मीरी अलगाववादी नेताओं के बच्चों का विदेशों में होना अब हमें चकित भी नहीं करता। पन्त की 2004 में आई रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण बिहार में 1930 में जहाँ 0.94 (एमएचए) जमीन इस तरीके से सींची जाती थी, वहीँ 1971 में ये घटकर 0.64 (एमएचए) पर आई और 1976 में ये और घटकर 0.55 (एमएचए) ही रह गयी। यकीनन पिछले पचास वर्षों में ये और कम ही हुई होगी।
ऐसी परियोजनाओं के खो जाने से एक तो हमारे परंपरागत ज्ञान का नुकसान हुआ। आज शायद ही कोई यकीन कर पाए कि रुड़की का इंजीनियरिंग कॉलेज एक ऐसी नहर के रखरखाव करने वाले लोग तैयार करने के लिए बना था, जिस नहर को ग्रामीण, तथाकथित अनपढ़ लोगों ने बिना पढ़े-लिखे अभियंताओं की मदद के ही बनाया था। इस परंपरागत ज्ञान को कॉपी करके विदेश ले जाया जा सके इसलिए कॉलेज बनाया गया। भारत के आजाद होने के बाद भी पानी की जरूरत पर ध्यान देना उतना जरूरी नहीं माना गया। तालाब जैसे परंपरागत पानी के स्रोत जिनके बारे में धार्मिक मान्यता थी कि इन्हें बनाने से पुण्य मिलता है, उनसे लाभ लेने की सरकार बहादुर को कोई जरूरत नहीं लगी।
बिहार का हाल देखें तो पटना शहर में आज जहाँ एक तारामंडल दिखता है, वहां कभी एक तालाब हुआ करता था। उसे विरोध के बाद भी भरकर उसपर तारामंडल बना दिया गया था। सचिवालय के पीछे बने इको-पार्क का तो नाम ही एक विडंबना है। यहाँ भी कभी एक बड़ा तालाब हुआ करता था जिसे भरकर उसका नाम इकोलॉजी से आधा शब्द लेकर इको-पार्क रख दिया है। अगर बिहार में किसी क्षेत्र में तालाबों की गिनती, उनका आकार, या उसमें कैसे जीव मिलते हैं, इससे सम्बंधित जानकारी लेनी हो तो कोई ऐसा विभाग नहीं जहाँ ये जानकारी इकठ्ठा होती हो। आज बिहार में पानी की कमी हो रही हो तो चौंकने जैसी कोई बात नहीं।
ये तस्वीर पटना के करीब बीच में स्थित अदालतगंज के तालाब की है, जो सामाजिक और प्रशासनिक अनदेखी से सूख चुका है। प्रधानमंत्री के महत्वाकांक्षी स्मार्ट सिटी योजना के तहत इसपर काम चल रहा है। ठेकेदारों ने बताया की तली के बचे खुचे कीचड़ को पहले साधारण रेत से ढका जायेगा। फिर उसपर ग्रेवल और फिर रेड सैंड की परत डाली जाएगी। मानसून आने से पहले ये काम पूरा होगा या नहीं ये हमें मालूम नहीं।
इस राजनैतिक व्यवस्था के सामाजिक व्यवस्था में घुसने का नतीजा उत्तर बिहार में भी अच्छा नजर आता है। यहाँ नदियों के किनारे कुछ तटबंध ऐसे हैं जो जमींदारों ने बनवाए थे। अब जब बाढ़ में उनके टूटने की हालत होती है तो सरकारी विभाग उनकी मरम्मत नहीं करवाते। उनका कहना होता है कि जो जमींदारों ने बनवाया, वो उनकी जिम्मेदारी है हमारी नहीं। अधिकार सारे चाहिए मगर कर्तव्य एक भी नहीं, इसका भी ये एक अच्छा नमूना है। “साड्डा हक़ एत्थे रख” वाले कूल डूड के अब्बू की पीढ़ी ने जमीन-जायदाद के हक़ तो लिए मगर जमींदारों की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर रखा है।
बाकी आँखें खोलिए और देखिये कि आपके आस पास कोई तालाब बन भी रहा है या नहीं? क्योंकि आँखें बंद रखने पर भी ये पता तो चल ही जाता है कि अब पानी के लिए ढाई सौ फीट से ज्यादा बोरिंग करनी पड़ती है। सोचियेगा, फ़िलहाल सोचने पर जीएसटी नहीं लगता।
✍🏻आनन्द कुमार
कूपवेदी और जलोत्थान के लिए भ्रमणी
जलस्रोतों के रूप में कुओं का महत्व दुनियाभर में रहा है। सिंधुघाटी से लेकर अनेक सभ्यताओं में कूप मिले हैं। उस दौर में गृहोपयोगी कूप की मान्यता विकसित थी। कृषि या सिंचाई के लिए संभवत: कुओं का प्रयोग होता नहीं था। पानी गहरा होने पर अंधेरा लगता था एेसे में संसार को अंधकूप की संज्ञा बहुत समय से दी जाती रही है।
मुझे पतंजलि के 'महाभाष्य' की वह उक्ति याद आ रही है जिसमें वह परिश्रम से मिली सफलता पर थकान भूल जाने की बात कूप खोदने वाले के उदाहरण से समझाते हैं। यानी शुंगकाल में कूप की उपयोगिता थी और उनके खोदने वाले बहुत अधिक मिलते थे। ये कूप खनका कहे जाते, लेकिन खुदाई से पहले पानी वाले स्थान की पहचान भूमिस्थ जल परीक्षण और दकार्गल जैसी विद्या का प्रयोग भी होता। सारस्वत मुनि को इस शास्त्र के प्रवर्तन का श्रेय है और यह निश्चित ही कृषि के लिए कूप के जल के उपयोग की ओर संकेत है क्योंकि "शारदा तिलक" की टीका में सारस्वत के रचे जवांकुरण व जलादि के प्रयोग संबंधी श्लोक मिलते है।
कूप उथले, मध्यम और गहराई वाले होते और जल खींचने के लिए उस पर पक्की "वेदी" बनाई जाती थी। इसे कहीं कहीं माड, मांडा या ढाणा और कहीं "दाबड़ा" भी कहा जाता है। हर्षचरित और मंदसौर अभिलेख में इसका महत्वपूर्ण संदर्भ मिल जाता है। कई रूप में इसकी रचना होती है। राजवल्लभ, अपराजित पृच्छा आदि में चौबीस और 7×7= 49 पद वास्तु से मंडान का निर्देश मिलता है। इसमें से एक भाग कूप पर व छह भाग बाहर समानांतर रखे जाते।
इसी दाबड़े पर कई प्रशस्तियां सुरक्षित मिली है जिन्होंने इतिहास के पन्नों को समृद्ध किया है। ये यात्रियों, संतों व पुण्य अर्जित करने वालों के संबंध में कई जानकारियां देती है। घाघसा गांव के कुएं की महारावल तेजसिंह कालीन 13वीं सदी की प्रशस्ति मैंने पढ़ी है। आकोला गांव के सांडेश्वर के दाबड़े को नंदगांव के महात्मा ने बनाया। लिखा है :
श्री यह दाबड़ा महात्मा पितांबर दासजी ने बनवाया, सं. 1993 पौष बुदी 11 स्थान नंदगांव जिला मथुरा। द. आपके दास का।।( देखिये : राजस्थान की एेतिहासिक प्रशस्तियां और ताम्रपत्र, पृष्ठ 271)
जलोत्थान के लिए इन पर रस्सी के लिये भ्रमणिका (भमण) चक्र (गिरगड़ी) ताकलिया और कोशवाह या चमड़े का चरस के ढांणे होते
अथवा अरहट का विधान होता है, वह जिक्र फिर कभी...
जय जय।
सोलंकी युग और जलालय
#जलस्थापत्य
गुजरात में सोलंकी युग का उत्कर्ष काल भारत की आत्मिक कला में एक योधेय युग के रूप में भी जाना जाता है। मेरा मानना है कि अंतर बाह्य व्यापार की वृद्धि, धर्म नीति और शिल्प में नवीन प्रवृत्तियों का संचार और लोकरुचि का आकर्षण - ये वे विशेषताएं हैं जिन्होंने सोलंकी युग की स्मृतियों को आज तक पवित्र बनाए रखा है।
सोलंकियों ने तलवार को अपनी तरह से थामा और मूठ अपने पास रखकर फलक की चलक छलकती रही मेवाड़, मालवा और कोंकण तक। बरसो बाद भी सिद्धराज, कुमारपाल के किस्से स्मृतियों के हिस्से बने हैं। सूत तक भूल बैठे कि यह युग पौराणिक नहीं था, स्कन्द पुराण ने सोलंकी काल को सजाया तो सरस्वती पुराण तो इस युग का दस्तावेज हो गया।
जल स्थापत्य इस काल की एक उत्तम विशेषता है। यह अकाल के सीने पर सोलंकी युग के छैनी हथौड़ी वाले दस्तखत है। कूप, कुई, कूटो वाली वापियां और सरोवर के साथ द्रोनियां- सबमें कुछ अनोखापन मिलता है। सांची वगैरह में जो तोरण अस्थि निखात, स्तूपों पर बनाए जाते थे, उस परंपरा को सोलंकियों ने सजीव, जनोपयोगी वास्तु से संबद्ध की। देव, जल और जन स्थापत्य को तोरणदार किया। भारतीय कला में तोरण कीर्ति की कलंगी और यश की छाप छवि के रूप में जाने जाते है। सोलंकी काल ने इसे ऊंचाई दी...।
अपराजित पृच्छा, दीपार्णव, क्षीरार्णव जैसे ग्रंथ इस काल के शिल्प प्रयोगों, भारतीय सिविल इंजीनियरिंग में प्रचलन में आए शब्दों को समेटे हुए हैं और इनकी परम्परा सैद्धांतिक से अधिक प्रायोगिक रही। जब इन ग्रंथों पर मैंने काम किया तब रह रहकर हर प्रयोग को देखने की इच्छा रहती थी, सोशल मीडिया ने इसे सुगम कर दिया। ये ही वे ग्रंथ हैं जिनके धारक और नियामक विप्रों ने यज्ञोपवीत को बदन पर धारा तो हाथ में वास्तु के लिए सूत्र को साधे रखा। वे सूत्रधार कहे गए...। ( मेरी संपादित : अपराजित पृच्छा की भूमिका आदि से)
सोलंकियों ने व्यापार के केंद्र, जन जुड़ाव के स्थलों और मार्गों समेत अपने विजित क्षेत्रों में देवालय और जलालय के निर्माण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उनकी सेना के साथ शिल्पियों का बड़ा समूह होता। रक्तपात के साथ ही जन संतोष के लिए जनोपयोगी निर्माण कार्य आरम्भ कर दिए जाते थे। आहत को राहत के इस सिलसिले ने सोलंकियों को संवेदनशील शासक सिद्ध किया।
महाराष्ट्र में जलस्रोतों की रीति और व्हीर
जलस्रोतों के रूप में वापी या बावड़ी अथवा बावली की परंपरा उतनी पुरानी जरूर स्वीकारनी चाहिए जबकि आदमी ने यह जान लिया हो कि गहराई पर पानी के लिए उसके स्तर तक पहुंचना जरूरी है। यों तो सीढ़ीदार जलस्रोत गुजरात के धोलावीरा आदि की खुदाई में मिले हैं, इसी कारण जो लोग शकों के आगमन के साथ वापी के प्रचलन की बात कहते थे और कर्केंदु और शकेंदु शब्दों से वापी की पहचान करते थे, उनके सामने इस जलस्रोत के भारतीय अवदान का प्रमाण नवीन खोज ही सही किंतु, पुराने काल का है।
महाराष्ट्र और कर्णाटक से लगे इलाकों में भी वापियों की सुदीर्घ परंपरा रही है। इसको वहां 'व्हीर' या 'व्यीर' कहा जाता है। पिछले दिनों जब मैं सातारा जिले के कराड़ में था, प्रियवर श्री सचिन पुरूषोत्तम वहेरे, श्री नरेन उमरीकर, श्री ढुंढीराज पाठक, संध्या, सारिका आदि मुझे वहां के एक प्राचीन व्हीर के पास लेकर गए। मैं चकित था कि श्याम पाषाणों को इतने सुंदर ढंग से संयोजित कर इस वापी को बनाया गया था कि देखते ही चित्त चकित और मन मुग्ध हो जाए। जलस्तर तक पहुंचने के लिए सीढि़यों की चमत्कृत करने वाली शृंखला और बीच में माड (जिसका उल्लेख अपराजितपृच्छा जैसे पूर्वमध्यकालीन ग्रंथों में आना शुरू होता है), यही नहीं, उस तक अलग से पहुचने के लिए दीवार के सहारे-सहारे रचे भिट्ट और उसमें द्वारीयता...।
मुख्य कूप का विधान कुछ अलग ही था। उस पर जलराशि को सहेजने के लिए कभी लकड़ी के पटियों को लगाया जाता था। उनके अवशेष आज तक दिखाई देते हैं। यह वापी कृष्णा नदी के पास बनी है और उसी के छने-छने जल से यह भरी-पूरी रहती होगी। यों भी जल का शुद्धीकरण और जल को पीने के योग्य बनाए रखने की परंपरा बुवाई वाली खेती से कम नहीं। वापी नाम संस्कृत के 'वपन्' से हुआ है, तो क्या यह जल की खेती नहीं हैं, सोचने योग्य है न। जलाेत्थान के लिए इस वापी पर कभी अरहट रहा होगा और उस रहट या जलोत्थान यंत्र के लिए अलग से कूप पर माडा बना गया है।
महाराष्ट्र से लगे कर्णाटक तक इस प्रकार के पत्थरों के संयोजन से ही जलस्रोतों का निर्माण होता रहा। कुंडों की रचना भी इसी तरह की गई। जलस्थापत्य की ये रचनाएं निश्चित ही रोचक है। इनको पुष्करिणी कहा गया। दीर्घिका भी नाम दिया गया। हौद या हौज नाम भी आए, मगर लोक ने शब्दों को अपने कंठकोश पर जीवंत रखा है। मैंने कराड़ में शोधार्थी संध्या से कहा था कि क्यों न संस्कृत में जलस्थापत्य पर ही शोध कर डालें। हमारी हैंडपंप सुविधा ने इस परंपरा पर परदा डालने का पूरा प्रयास किया है और हमारी परंपराओं की प्रासंगिकता पर लिखा ही जाना चाहिए, जैसा कि कुछ समय पहले Kusum Solanki भारतीय बावडि़यों पर शोध कार्य किया ही था और मुझे अपने ग्रंथ की भूमिका लिखने का अवसर दिया था।श्रीकृष्ण जुगनू
संकलन अजय कर्मयोगी



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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद