जहां घर त्याग कर वन में जाने की एक व्यवस्था रही है उसे वानप्रस्थ आश्रम कहते हैं उसी बन में कई सारे ज्ञानी ऋषि रहे हैं जो पूरे दुनिया को ज्ञान से आलोकित किया है जिसे भारत की अरण्य संस्कृति कही जाती है आज आधुनिक और सभ्य समाज में हम उसे जंगली कहते हैं जो हीनता का परिचायक माना जा रहा है और वही शहरों में रहना एक कुलीन और श्रेष्ठ माना जा रहा है आज उसी शहर में जीवन का संकट पैदा हो गया है और सांस गायब हो गई है पर इस आधुनिक के चक्रव्यूह से अपना जीवन लीला समाप्त करके भी नहीं निकल पा रहे हैं
भारतीय ऋषि चिंतन ने सृष्टि के प्राणीमात्र के लिए तीन आवश्यताएं स्वीकार कर उनको महत्वत: रेखांकित किया। ये हैं : वृष्टि, वायु और वन।
यही नहीं, इन तीनों पर केंद्रित चिंतन को निरंतरता देते हुए समय-समय पर विचारों का प्रवर्तन किया। परीक्षित, वैज्ञानिक, व्यावहारिक मत दिए। पश्चिम में जबकि इस संबंध में जागरण ही न था, भारत में अग्निहौत्र, अगर-धूपादि से पर्यावरण के संरक्षण के विचार को देवरूप स्वीकार कर उपासित किया जा रहा था।
संहिताओं में एेसे विचार संगृहीत और संपादित हुए और उनके प्रवर्तक ऋषियों का स्मरण किया गया। इसी आधार पर कुछ ग्रंथों की तलाश की गई और उनके पाठ संपादन सहित अनुवाद का संकल्प किया। इन कृतियों की शोधपूर्ण भूमिकायें ऋषिमतों की पगडंडियां बनी हैं।
कतिपय ग्रन्थों का नाम देखिये-
विश्ववल्लभ,
बृक्षायुर्वेद
काश्यपीयकृषिपद्धति
सस्यवेद,
मयूरचित्रकम
वृष्टिविज्ञानं.......
यदि भारतीय पर्यावरण के ऋषि चिंतन पर कभी अध्ययन-अध्यापन का विचार बने, तो इस प्रारंभिक प्रयास पर भी नज़र डालियेगा और प्रेम के पर्यावरण का उपहार दीजियेगा... जय-जय ।
पर्यावरण पर भारतीय वैश्विक चिंतन
पर्यावरण पर भारतीय ऋषि चिंतन बहुत गंभीर रहा है। आवास से लेकर प्रवास और मनुष्यालय से लेकर देवालय तक पर्यावरण के संरक्षण अौर संवर्धन पर जोर दिया गया है। पर्यावरण के लिए 'वन', 'वायु' और 'वृष्िट' की निरंतरता पर जोर दिया गया है- इसका जीता जागता उदाहरण 'वृक्षायुर्वेद' की धारणा है। वृक्षायुर्वेद शब्द का प्रयोग सबसे पहले अर्थशास्त्र में 'गुल्म वृक्षायुर्वेद' के नाम से मिलता है और यह वह विद्या थी जो सुकाल की साधना के रूप में राजाश्रय में प्रतिफलित थी। इसके लिए सुयोग्य अधिकृत पदाधिकारी नियुक्त रहते थे।
इसी पर बाद में सारस्वत मुनि ने "दकार्गल" नाम से ग्रंथ लिखा जो जीवनोपयोगी और भूमितल में उपलब्ध जल विद्या पर आधारित था। वराहमिहिर के काल तक यह ग्रंथ मौजूद था। उसने इसके कई श्लोकों को आर्याच्छंद के रूप में बदलकर लिखा और उन्हीं मूल श्लोकों को भटोत्पल ने 9वीं सदी में अपनी विवृति में उृद़धृत किया। यही ग्रंथ विष्णु धर्मोत्तर पुराण में एक अध्याय के रूप में संपादित किया गया।
दसवीं-ग्यारहवीं सदी में सूरपाल ने 'वृक्षायुर्वेद' का संपादन किया और फिर, इस ग्रंथ की विषय वस्तु को आधार बनाकर अग्निपुराणादि ने दो-दो अध्याय लिखे। वृद्ध गर्गादि संहिताओं में इस विषय को संपादित किया गया। यही नहीं, ज्योतिर्निबंध और बृहद्दैवज्ञ रंजनं में भी इसकी धारणा मिलती है ।
वृक्षायुर्वेद का संपादन, अनुवाद करते समय, 2004 में भूमिका में मैंने इस सभी विषयों का खुलासा किया और माना कि भारतीयों ने पर्यावरण अध्ययन व संरक्षण पर बड़ा जोर दिया है। राजाश्रय में पर्यावरण के सर्वांग संरक्षण के लिए प्रयास किया गया। महाराणा प्रताप के काल में लिखित #'विश्ववल्लभ-वृक्षायुर्वेद' इसका जीवंत उदाहरण है। इसमें पर्यावरण के मूलाधार वृक्ष, वृष्टि और वायु पर पर्याप्त और वैज्ञानिक विचार प्राप्त होता है। यह विचार इस काल में वैश्विक महत्व का होकर सामने आता है और यह कई अर्थों में रोचक भी है।*
पर्यावरण क्षरण अकाल का सेतु है और इसके लिए संसाधनाें के न्यूनतम दोहन पर जोर दिया गया। हमारी जरूरतें सीमित हों और प्रकृति का विकास भरपूर हो, हम प्रकृति के संरक्षण के लिए क्या कुछ कर सकते हैं, यह चिंतन इन ग्रंथों में दिया गया है। हमें पर्यावरण चिंतन के लिए किसी भी बाहरी विचार को ग्रहण करने की जरूरत नहीं, हमारे अपने ग्रंथों का चिंतन ही पर्याप्त है। ये ग्रंथ ही अंतर्राष्ट्रीय विचारधारा देते है।
-------- *विश्ववल्लभ : महाराणा प्रताप आश्रित पं. चक्रपाणि मिश्र कृत, उपलब्ध : Parimal Publications, Sakti Nagar, Delhi
एक व्यक्ति जो एक पीपल, एक नीम, एक बरगद, दस फूलवाले पौधो अथवा लताएं, दो अनार, दो नारंगी और पांच आम के वृक्ष लगाता है, वह नर्क में नहीं जाएगा
अश्वत्थमेकं पिचुमन्दमेकं न्यग्रोधमेकं दश पुष्पजातीः।
द्वे द्वे तथा दाडिममातुलिंगे पंचाम्ररोपी नरकं न याति।।
#वराहपुराण (172.39)
दस कुओं के बराबर एक बावड़ी होती है, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र है और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष होता है-
दशकूपसमावापी दशवापी समो ह्रदः।
दशह्रदसमः पुत्रो दशपुत्रसमो द्रुमः।।
#मत्स्यपुराण (154.511-512)
किसी दूसरे के द्वारा रोपित वृक्ष का सिंचन करने से भी महान् फलों की प्राप्ति होती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नही है—
सेचनादपि वृक्षस्य रोपितस्य परेण तु।
महत्फलमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा।। #
#विष्णुधर्मोत्तरपुराण (3.296.17)
पर्यावरण की दृष्टि से वृक्ष हमारा परम रक्षक और मित्र है। यह हमें अमृत प्रदान करता है। हमारी दूषित वायु को स्वयं ग्रहण करके हमें प्राणवायु देता है। वृक्ष हर प्रकार से पृथ्वी के रक्षक हैं, जो मरुस्थल पर नियंत्रण करते हैं, नदियों की बाढ़ों की रोकथाम करते हैं व जलवायु को स्वच्छ रखते हैं। ये समय पर वर्षा लाने में सहायक हैं, धरती की उपजाऊ शक्ति को बढ़ाते हैं। वृक्ष ऐसे दाता हैं, जो हमें निरंतर सुख देते हैं।
हमारे ऋषि-मुनि जानते थे कि प्रकृति जीवन का स्रोत है और पर्यावरण के समृद्ध और स्वस्थ होने से ही हमारा जीवन भी समृद्ध और सुखी होता है। वे प्रकृति की देवशक्ति के रूप में उपासना करते थे और उसे परमेश्वरी भी कहते थे। उन्होंने जीवन के आध्यात्मिक पक्ष पर गहरा चिंतन किया, पर पर्यावरण पर भी उतना ही ध्यान दिया। जो कुछ पर्यावरण के लिए हानिकारक था, उसे आसुरी प्रवृत्ति कहा और जो हितकर है, उसे दैवीय प्रवृत्ति माना।
आज मनुष्य यह समझता है कि समस्त प्राकृतिक संपदा पर सिर्फ उसी का आधिपत्य है। हम जैसा चाहें, इसका उपभोग करें। इसी भोगवादी प्रवृति के कारण हमने इसका इस हद तक शोषण कर लिया है कि अब हमारा अपना अस्तित्व ही संकट में पड़ने लगा है। वैज्ञानिक बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि प्रकृति, पर्यावरण और परिस्थिति की रक्षा करो, अन्यथा हम भी नहीं बच सकेंगे।
सम्राट अशोक, हर्षवर्धन और शेरशाह सूरी ने जो राजमार्ग बनवाए थे, उनके लिए कितने ही वृक्षों की बलि चढ़ानी पड़ी थी। परंतु उन्होंने उन सड़कों के दोनों तरफ सैकड़ों नए वृक्ष भी लगवाए थे, ताकि पर्यावरण में कोई दोष न आ जाए। आज भी आप पाएंगे कि ग्रामीण समाज अपने घरों व खेतों के आसपास वृक्ष लगाते हैं। यहां वृक्षों के थाल बनाना, उनकी जड़ों पर मिट्टी चढ़ाना, सींचना, वृक्षों को पूजना अथवा आदर प्रकट करना आज भी पुण्यदायक कार्य मानते हैं। ये सारी प्रथाएं इसीलिए शुरू हुईं ताकि वृक्षों-वनस्पतियों की रक्षा होती रहे और मनुष्य इनसे मिलनेवाले लाभ का आनंद उठाता रहे।
हमारे शास्त्रों में पर्यावरणीय घटकों की शुद्धता के लिए हमें एक अमोघ उपाय प्रदान किया गया है। वह उपाय हैं यज्ञ। यज्ञ आध्यात्मिक उपासना का साधन होने के साथ, पर्यावरण को शुद्ध करने, उसे रोग और कीटाणुरहित रखने तथा प्रदूषणरहित रखने का भी साधन है। भारतीय संस्कृति की यह शैली रही है कि इसमें जीवन के जिन कर्त्तव्यों अथवा मूल्यों को श्रेष्ठ और आवश्यक माना गया है, उन्हें धार्मिकता और पुण्य के साथ जोड़ दिया गया है, ताकि लोग उनका पालन अनिवार्य रूप से करें। जैसे कि तुलसी, पीपल की रक्षा आदि।
✍भारतीय धरोहर
ऋग्वेद 2.11.3 के अनुसार राष्ट्: निर्माण में. तृतीय प्राथमिकता
पर्यावरण संरक्षण वन सम्पदा सात्विकजीवन शैली का ओज़ोन परत के संरक्षण के लिए महत्व महत्व
अध्वर्यवो यो दृभीकं जघान यो गा उदाजदप हि वलं व: ।
तस्मा एतमन्तरिक्षे न वातमिन्द्रं सोमैरोर्णत जूर्ण वस्त्रै: ।। 2.14.3
हमारी पृथ्वी पर एक पुराने वस्त्र का आवरण है,( यह आवरण घने बादलों जैसा होता है. इस मे छिद्र नहीं होने चाहियें , यह नीचे दिए चित्र से स्पष्ट हो जाएगा ) इस आवरण के द्वारा हि पृथ्वी पर ओषधि वनस्पति अन्न इत्यादि उत्पन्न हो पाते हैं । परंतु इस आवरण के छिद्रो के कारण अंतरिक्ष मे पवन और मेघों द्वारा ऐसे विनाशकारी बलशाली उत्पात होते है जो गौओं और सब नगरीय व्यवस्थाओं को बार बार उठा उठा कर पटक देते हैं इस आवरण के छिद्रों को यज्ञादि कार्यों से ढको. ( वेदो का स्पष्ट संकेत सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं की ओर है, जो पर्यावरण के संरक्षण पर ध्यान न देने के कारण विश्वस्तर पर जलवायु का तपमान बढने से उत्पन्न हो रहा है ।)
मांसाहार का पर्यावरण पर घातक प्रभाव
Meat Eating causes Global warming and desertification
72. अग्निरेनं क्रव्यात्पृथिव्या नुदतां उदोषतु वायुरन्तरिक्षान्महतो वरिम्णः । ।
AV12.5.72
मांसाहार पृथ्वी को जला डालता है | पर्यावरण में वायुमन्डल और वर्षा का जल भयंकर रूप धारण कर लेते हैं |
73. सूर्य एनं दिवः प्र णुदतां न्योषतु । ।AV12.5.73
सूर्य का ताप मान प्रचंड हो जाता है जो निश्चय ही पृथ्वी को जला देता है |
आलेख सुबोध संकलन अजय कर्मयोगी



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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद