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पृथ्वी का पौराणिक वर्गीकरण

    



    पृथ्वी नकशे पर मुख्य नगर-वैवस्वत मनु (१३९०२ ईपू) से पहले पृथ्वी के ४ मुख्य नगर एक दूसरे से ९०° की दूरी पर थे। इन्द्र की अमरावती शुण्डा द्वीप (यवद्वीप के साथ ७ द्वीप-इण्डोनेशिया) के पूर्व भाग में थी। उससे ९०° पश्चिम यम की संयमनी (यमन, अम्मान, सना, मृत सागर) थी। संयमनी से ९०° पश्चिम सोम की विभावरी थी। अमरावती से ९०° पूर्व वरुण की सुखा नगरी थी। आज भी मिथिला क्षेत्र में नदी जल के निकट के गांवों का नाम सुखासन है।
वैवस्वत मनु के बाद से शून्य अक्षांश पर विषुव रेखा पर लंका थी (लक्कादीव तथा मालदीव के बीच)। यहां का समय विश्व षमय था, अतः यहाँ के राजा को कुबेर कहते थे (कु = पृथ्वी, बेर = समय)। लंका समुद्र में डूब जाने पर उसी अक्षांश पर उस समय की कर्क रेखा पर उज्जैन को सन्दर्भ माना गया। उज्जैन की रेखा थानेश्वर, कुरुक्षेत्र आदि के निकट से गुजरती है अतः इसके सबसे उत्तर के नगर को उत्तर कुरु कहते थे। अभी यह साइबेरिया (शिविर) का ओम्स्क है जिसे शून्य देशान्तर रेखा पर होने के कारण ओम कहते थे। उज्जैन से ९०° पूर्व में यम कोटिपत्तन था। यम का अर्थ जोड़ा है तथा यम दक्षिण दिशा का स्वामी है। पृथ्वी पर सबसे दक्षिण अण्टार्कटिक है जो जोड़ा भूखण्ड है। अतः इसे अनन्त (समतल नक्शा पर अनन्त माप) या यम द्वीप कहते थे। इसके निकट का मुख्य द्वीप न्यूजीलैण्ड भी जोड़ा है जो यमकोटि द्वीप हुआ। इस द्वीप का दक्षिण पश्चिम कोना यमकोटिपत्तन उज्जैन से ९०° पूर्व है। यमकोटिपत्तन से ९०° पूर्व सिद्धपुर कुरुवर्ष (मेक्सिको) में था। उज्जैन से ९०° पश्चिम रोमकपत्तन था जो मोरक्को के पश्चिम था।
पुराने विश्व में ६-६ अंश के अन्तर पर ६० समय क्षेत्र थे। उज्जैन से ६ अंश पूर्व कालहस्ती, १२° पूर्व कोणार्क था। अतः कोणार्क सूर्य क्षेत्र है। सूर्य का आकाश में स्थान सिंह राशि है। अतः इस क्षेत्र की दक्षिणी सीमा जगन्नाथ मन्दिर का सिंह द्वार है। मोरक्को के पश्चिम भी कोनाक्री तथा सियेरा लियोन (सूर्य द्वार) है।

भारत की पूर्व दिशा के स्थान-                                                        वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धा काण्ड अध्याय ४०-
ब्रह्ममालाविदेहांश्च मालवान् काशिकोसलान्। मागधांश्च महाग्रामान् पुण्ड्रान् वङ्गास्तथैव च॥२२॥
ब्रह्म-माल = ब्रह्मदेश (माल = पर्वतीय भाग, यथा मेघदूत १५-क्षेत्रमारुह्य मालं = कन्धमाल या कन्ध पर्वत) अन्य-मालव (वायु पुराण के महामलय पर्वत आदि), विदेह (मिथिला) काशी, कोसल, मगध। महाग्राम (?), पुण्ड्र (पूर्णिया), वंग-बंगाल (सुनर-वन के निवासी = सोनार बंगला)
पत्तनं कोषकाराणां भूमिं च रजताकराम्। सर्वमेतद् विचेतव्यं मार्ग यद्भिस्ततस्ततः॥२३॥
पत्तनं = बन्दरगाह (वन-निधि = समुद्र, उसमें चलने वाले वानर, वन के पशु बन्दर भी। जहाज रुकने के स्थान = बन्दर, जैसे बोर्निओ में बन्दर श्री भगवान्), कोषकार भूमि = रेशम के कीड़े पालने वाले (दक्षिण चीन, अभिज्ञान शाकुन्तलम् १/३४ में रेशम = चीनांशुक) रजताकराम् (मलाया =जहां रजत और टिन की खानें हैं)
रामस्य दयितां भार्यां सीतां दशरथस्नुषाम्। समुद्रमवगाढाश्च पर्वतान् पत्तनानि च॥२४॥
समुद्री टापू (अवगाढ), पर्वत और पत्तनों में खोज।
मन्दरस्य च ये कोटिं संश्रिताः केचिदायताम्। कर्णप्रावरणश्चैव तथा चाप्योष्ठ कर्णकाः॥२५॥
घोरलोहमुखाश्चैव जवनाश्चैकपादकाः। अक्षय बलवन्तश्च पुरुषाः पुरुषादकाः॥२६॥
किराताः कर्णचूडाश्च हेमाङ्गाः प्रियदर्शनाः। आममीनाशनास्तत्र किराता द्वीपवासिनः॥२७॥
अन्तर्जलचरा घोरा नरव्याघ्रा इति श्रुताः। एतेषामालयाः सर्वे विचेयाः काननौकसः॥२८॥
मन्दराचल पर्वत की तल भूमि (झारखण्ड में भागलपुर से सिंहभूमि तक मन्दार पर्वत में सभी खनिज हैं, केवल रजत नहीं है। रजत या चान्दी मलय के द्वितीय मन्दार पर ही है, जहां चन्दन आदि भी हैं तथा अगस्त्य भवन है और देवर्षियों की पूजा होती है। वायु पुराण ४८/२०-२४-तथैव मलयद्वीपमेवमेव सुसंवृतम्। मणिरत्नाकरं स्फीतमाकरं कनकस्य च॥२०॥ आकरं चन्दनानां च समुद्राणां तथाऽऽकरम्। नाना म्लेच्छगणाकीर्णं नदीपर्वतमण्डितम्॥२१॥ तत्र श्रीमांस्तु मलयः पर्वतो रजताकरः। महामलय इत्येवं विख्यातो वरपर्वतः॥२२॥ द्वितीयं मन्दरं नाम प्रथितं च तथा क्षितौ। नाना पुष्पफलोपेतं रम्यं देवर्षि सेवितम्॥ अगस्त्य भवनं तत्र देवासुर नमस्कृतम्॥२३॥ तथा काञ्चनपादस्य मलयस्यापरस्य हि। निकुञ्जैस्तृणसोमाङ्गैराश्रमं पुण्यसेवितम्॥२४॥) यहां के निवासी सर्वभक्षी कहे गये हैं तथा उनके विचित्र चेहरे हैं (मंगोल जैसे)।
गिरिभिर्ये च गम्यन्ते प्लवनेन प्लवेन च। रत्नवन्तं यवद्वीपं सप्तराज्योपशोभितम्॥२९॥
जहां प्लव = नाव से या प्लवन = उड़ कर जा सकें ऐसे स्थानों पर जाओ। ७ राज्यों से उप-शोभित (निकट स्थित) रत्नवान् यवद्वीप में भी जाना। (यव द्वीप राजधानी थी जिसके अधीन ७ मुख्य द्वीप थे)
सुवर्ण रूप्यकं चैव सुवर्णाकरमण्डितम्। यवद्वीपमतिक्रम्य शिशिरो नाम पर्वतः॥३०॥
इस द्वीप (सप्तद्वीप) में सोने की खान होने से इसे सोने-चान्दी का द्वीप कहते हैं। यवद्वीप के बाद (पूर्व में) शिशिर नामक पर्वत है।
दिवं स्पृशति शृङ्गेण देवदानवसेवितः। एतेषां गिरिदुर्गेषु प्रपातेषु वनेषु च॥३१॥
मार्गध्वं सहिताः सर्वे रामपत्नीं यशस्विनीम्। ततो रक्तजलं शोणमगाधं शीघ्रवाहिनम्॥३२॥
यहां शिशिर पर्वत पर देव-दानव रहते हैं। यहां भी लाल जल और तेज धार वाला शोण नद है। (अमरकण्टक से पटना के निकट गंगा से मिलने वाला सोन भी पुल्लिंग होता है)
गत्वा पारं समुद्रस्य सिद्धचारणसेवितम्। तस्य तीर्थेषु रम्येषु विचित्रेषु वनेषु च॥३॥
रावणः सह वैदेह्या मार्गितव्यस्ततस्ततः। पर्वतप्रभवा नद्यः सुरम्या बहुनिष्कुटाः॥३४॥
मार्गितव्या दरीमन्तः पर्वताश्च वनानि च। ततः समुद्रद्वीपांश्च सुभीमान् द्रष्टुमर्हथ॥३५॥
(समुद्र पार के द्वीपों में भी रावण का अधिकार था, अतः वहां खोजने को कहा है)
अभिगम्य महानादं तीर्थेनैव महोदधिम्। ततो रक्तजलं भीमं लोहितं नाम सागरम्॥३८॥
गता द्रक्ष्यथ तां चैव बृहतीं कूटशाल्मलीम्। गृहं च वैनतेयस्य नानारत्नविभूषितम्॥३९॥
महानाद (शुण्डा समुद्र) के पूर्व लोहित सागर है जहां शाल्मली पर्वत पर गरुड़ (वैनतेय) का रत्नों से विभूषित भवन है।
तत्र कैलाससङ्काशं विहितं विश्वकर्मणा। तत्र शैलनिभा भीमा मन्देहा नाम राक्षसाः॥४०॥
शैलशृङ्गेषु लम्बन्ते नानारूपा भयावहाः। ते पतन्ति जले नित्यं सूर्यस्योदयनं  प्रति॥४१॥
निहता ब्रह्मतेजोभिरहन्यहनि राक्षसाः। अभितप्ताश्च सूर्येण लम्बन्ते स्म पुनः पुनः॥४२॥
सौर मण्डल की सीमा को मन्देह राक्षस कहा गया है (भागवत, स्कन्ध ५, विष्णु पुराण २/७ आदि)। यहां भारत की पूर्व सीमा को मन्देह स्थान कहा है। उनकी छाया से सूर्य की स्थिति जानी जाती है (कोई वेधशाला)।
ततः पाण्डुरमेघाभं क्षीरोदं नाम सागरम्। गता द्रक्ष्यथ दुर्धर्षा मुक्ताहारमिवोर्मिभिः॥४३॥
तस्य मध्ये महाश्वेत ऋषभो नाम पर्वतः। दिव्यगन्धैः कुसुमितै रजतैश्च नगैर्वृतः॥४४॥
सरश्च राजतैः पद्मैर्ज्वलितैर्हेमकेसरैः। नाम्ना सुदर्शनं नाम राजहंसैः समाकुलम्॥४५॥
क्षीरोद सागर (प्रशान्त ?) उसके बाद है। उसके चारो तरफ के द्वीप मोती के हार की तरह हैं।
क्षीरोद समुद्र के बीच में ऋषभ पर्वत (हवाई?) सुदर्शन तालाव है। रजत पर्वत (मेक्सिको? माक्षिकः = चान्दी)
स्वादूदस्योत्तरे देशे योजनानि त्रयोदश। जातरूपशिलो नाम महान कनक पर्वतः॥५०॥
स्वाद समुद्र के उत्तर तट पर १३ योजन (२०८ कि.मी.) का कनक-पर्वत है, जिसका नाम जातरूपशिला भी है।
तत्र चन्द्र प्रतीकाशं पन्नगं धरणीधरम्। पद्मपत्र विशालाक्षं ततो द्रक्ष्यथ वानराः॥५१॥
वहां चन्द्र पर्वत है। भागवत पुराण (५/८/२२) में इसे चन्द्रशुक्ल द्वीप कहा गया है (फिलिपीन)।
आसीनं पर्वतस्याग्रे सर्वभूतनमस्कृतम्। सहस्रशिरसं देवमनन्तं नीलवाससम्॥५२॥
यहां सहस्र सिर वाले अनन्त का स्थान है।
त्रिशिराः काञ्चनः केतुस्तालस्तस्य महात्मनः। स्थापितः पर्वतस्याग्रे विराजति सवेदिकः॥५३॥
पूर्वस्यां दिशि निर्माणं कृतं तत्त्रिदशेश्वरैः। ततः परं हेममयः श्रीमानुदयपर्वतः॥५४॥
(जम्बू द्वीप = एसिया) की पूर्व दिशा के लिये वहां उदय पर्वत (पूर्व दिशा में पहले सूर्योदय) पर ३ सिर का ताल (स्तम्भ) इन्द्र का बनाया है। (सम्भवतः ४ त्रिभुजों से घिरा पिरामिड, या त्रिकोणाकार स्तम्भ)
तत्र योजन विस्तारमुच्छ्रितं दशयोजनम्। शृङ्गं सौमनसं नाम जातरूपमयं ध्रुवम्॥५७॥
तत्र पूर्वपदं कृत्वा पुरा विष्णुस्त्रिविक्रमे। द्वितीयं शिखरे मेरोश्चकार पुरुषोत्तमः॥५८॥
उत्तरेण परिक्रम्य जम्बूद्वीपं दिवाकरः। दृश्यो भवति भूयिष्ठं शिखरं तन्महोच्छ्रयम्॥५९॥
सौमनस पर्वत १० योजन ऊंचा और १ योजन चौड़ा है। (पर्वत की माप के लिये अलग योजन है)। जम्बूद्वीप में यही पहले सूर्योदय होता है। विष्णु ने अपना प्रथम पद यहीं रखा था। (विषुव वृत्त पर, इण्डोनेसिया का पूर्वी छोर)।
यह जम्बू द्वीप का पूर्व छोर है। पृथ्वी की पूर्व दिशा का अन्त उज्जैन से १८० अंश पूर्व (मेक्सिको में) होगा जहां ब्रह्मा ने द्वार बनाया था (त्रिशिरा द्वार = पिरामिड)-
पूर्वमेतत् कृतं द्वारं पृथिव्या भुवनस्य च। सूर्यस्योदयनं चैव पूर्वा ह्येषा दिगुच्यते॥६४॥
महाभारत, शान्ति पर्व, अध्याय १४-
जम्बूद्वीपेन सदृशः क्रौञ्चद्वीपो नराधिप। अधरेण महामेरोर्दण्डेन मृदितस्त्वया॥२२॥
क्रौञ्चद्वीपेन सदृशः शाकद्वीपो नराधिप। पूर्वेण तु महामेरोर्दण्डेन मृदितस्त्वया॥२३॥
उत्तरेण महामेरोः शाकद्वीपेन सम्मितः। भद्राश्वः पुरुषव्याघ्र दण्डेन मृदितस्त्वया॥२४॥
पूर्वी तीर्थ-पूर्व भाग दक्षिण पूर्व एसिया के सभी स्थान और परम्परा भारत का अनुकरण नहीं हैं। कुछ स्वतन्त्र स्थान हैं-
(१) ब्रह्मा के स्थान- महाभारत, शान्ति पर्व अध्याय ३४८ में मनुष्य रूप में ७ ब्रह्मा का वर्णन है-(१) मुख्य (नारायण के मुंह से)-वैखानस को उपदेश, (२) नेत्र से-सोम को उपदेश पाकर रुद्र, बालखिल्यों को (इण्डोनेसिया के पूर्व तट पर), (३) वाणी से (इनको शान्ति पर्व ३४९/३९ में वाणी का पुत्र अपान्तरतमा कहा है। त्रिसुपर्ण ऋषि, (४) आदि कृत युग में (३४८/३४) कर्ण से-आरण्यक, रहस्य और संग्रह सहित वेद का क्रम से स्वारोचिष मनु, शंखपाल, दिक्पाल, सुवर्णाभ को उपदेश, (५) आदि कृतयुग में ही (३४८/४१) नासिका द्वारा ब्रह्मा-क्रम से वीरण, रैभ्य मुनि, दिक्पाल कुक्षि को उपदेश, (६) अण्डज ब्रह्मा (३४९/१७ में भी)  से बर्हिषद् मुनि, ज्येष्ठ सामव्रती हरि, राजा अविकम्पन को उपदेश। (७) पद्मनाभ ब्रह्मा से दक्ष, विवस्वान्, वैवस्वत मनु, इक्ष्वाकु को उपदेश|
एक अन्य वर्णन है कि ब्रह्मा पुष्कर में थे जो उज्जैन से १२० (१ मुहूर्त्त) पश्चिम है। वेदांग ज्योतिष के अनुसार यहां १६ घण्टे तक का दिन होता था, अतः प्रायः ३५० उत्तर अक्षांश होगा। इस पुष्कर को अभी बुखारा कहते हैं। इस पुष्कर के ठीक विपरीत में पुष्कर द्वीप (दक्षिण अमेरिक है। पद्मनाभ ब्रह्मा मणिपुर (भारत का प्राचीन नाम अजनाभ = विष्णु की नाभि, नाभि क्षेत्र को मणिपूर कहते हैं, उससे ब्रह्मा की उत्पत्ति हुयी थी अतः मणिपुर के बाद ब्रह्मा का स्थान है। स्वायम्भुव मनु (२९१०२ ई.पू.) को भी ब्रह्मा कहा गया है। यह अयोध्या में थे। अपान्तरतमा गौतमी (गोदावरी) के तट पर थे और तपस्या के लिये हरिण द्वीप (मृगव्याध = मृगतस्कर, मगाडास्कर, आकाश का मृगव्याध नक्षत्र इतने ही दक्षिण अक्षांश पर है)
(२) विष्णु के स्थान-जगन्नाथ पुरी में जगन्नाथ हैं जिनका सुप्त रूप विष्णु हैं (दुर्गा सप्तशती, अध्याय १)। तिरुपति, तिरु-अनन्तपुरम भी हैं, किन्तु वैकुण्ठ नामक कोई स्थान नहीं है जहां देवता विष्णु से मिलने जाते थे। यह पद्मनाभ ब्रह्मा (मणिपुर) के निकट होगा जहां से ब्रह्मा के साथ विष्णु तक जा सकते हैं। वैकुण्ठ का अर्थ है बड़ा खूंटा। आकाश में पृथ्वी कक्षा का उत्तर ध्रुव नाक या वैकुण्ठ कहला ता है जिसके चारों तरफ पृथ्वी का अक्ष २४० की त्रिज्या में २६,००० वर्ष में चक्कर लगाता है। इसके परिक्रमा पथ के ताराओं की आकृति शिशुमार नामक कीड़े जैसी दीखती है, अतः इसे शिशुमार चक्र कहा गया है (विष्णु पुराण २/९, अल बरूनि ने विष्णु धर्मोत्तर पुराण के अनुसार वर्णन किया है)। अभी तक केवल बर्मा में ही वैकुण्ठ मिला है तथा बर्मा की परम्परा में उसे विष्णु का देश ही कहा गया है। वह भी नकशे के लिये एक खूंट (केन्द्र चिह्न) होगा। यह उज्जैन से ठीक २०० पूर्व और प्रायः उसी अक्षांश पर है।
(३) गरुड़ का स्थान-भारत में कोई स्थान गरुड़ के नाम का नहीं है। दक्षिण भारत में एक पक्षी तीर्थ है, जहां प्रतिवर्ष एक बार गरुड़ आते हैं। गरुड़ के महल का स्पष्ट रूप से इण्डोनेसिया में वर्णन है। आज भी वहां की विमान सेवा को गरुड़ कहते हैं। कुछ लोगों ने किर्गिज (कश्मीर के उत्तर) को गरुड़ का स्थान माना है, पर केवल नाम की समानता है (कीर = तोता, कीराः = कश्मीर या उसके लोग)।  
(४) शृङ्गवेरपुर- अयोध्या के निकट के शृङ्गवेरपुर का रावण से युद्ध में कोई महत्त्व नहीं है। यहां निषादों का कभी राज्य भी नहीं था। उनका महत्त्व समुद्र तट पर ही है। इण्डोनेसिया के द्वीप रावण के अधिकार में थे, क्योंकि वहां भी विस्तार से रावण द्वारा अपहृत सीता को खोजने के लिये कहा है। पश्चिम में भी उत्तर अफ्रीका में मोरक्को तक खोजने के लिये कहा है, वहां के २ स्थानों के नाम रावण के नाना (माली-सुमाली) के नाम पर हैं। लंका से इण्डोनेसिया तक रावण पर आक्रमण करने के लिये सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान सिंगापुर है जो पुराना शृङ्गवेरपुर हो सकता है। निषादराज वहां से जाकर राम से मिला होगा। इस नाम के २ अर्थ हैं-(१) यह नकशे में शृङ्ग (सींग) जैसा है, (२) यह वेर = समय जानने का स्थान है। उज्जैन से ६-६ अंश (२४ मिनट) के अन्तर पर विश्व में ६० काल-क्षेत्र थे। आजकल ४८ काल क्षेत्र हैं। यह उज्जैन से २४० अर्थात् ४ क्षेत्र पूर्व (९६ मिनट पूर्व) है।
✍साभार अरुण उपाध्याय संकलन अजय कर्मयोगी

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