आज #गंगा_दशहरा है अर्थात #गंगावतरण_दिवस ।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल दशमी को स्वर्ग से गंगाजी का आगमन हुआ था। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की यह दशमी एक प्रकार से गंगाजी का जन्मदिन ही है। इसी को गंगा दशहरा कहा जाता है। स्कन्दपुराण, वाल्मीकि रामायण आदि ग्रंथों में गंगा अवतरण की कथा वर्णित है। आज ही के दिन महाराज भागीरथ के कठोर तप से प्रसन्न होकर स्वर्ग से पृथ्वी पर गंगाजी आई थीं।
गंगा दशहरा #पर्यावरण संरक्षण का एक बड़ा संदेश है । आज का दिन हमे वर्षा पूर्व वर्षाजल के संग्रहण की प्रेरणा देता है । श्रीराम के पूर्वजों राजा इक्ष्वाकु से लेकर राजा भगीरथ तक की अनेक पीढ़ियों ने गंगा जी को पृथ्वी पर लाने में अपना सर्वस्व न्यौछावर किया । कई राजाओं ने हिमालय पर झीलों सरोवरों का निर्माण कराया । राजा सगर और सगर पुत्रों ने #वृक्षारोपण किया । राजा दिलीप ने गायें पाली । तब जाकर हिमालय पर वर्षा जल ठहरने लगा और फिर राजा भगीरथ ने अपने कठोर परिश्रम से जल की भिन्न-भिन्न धाराओं को मिलाकर उसे नदी (गंगा) का स्वरूप दिया ।
-स्वर्ग से गंगा का उतरना अर्थात आसमान से पानी गिरना ।
-शिव की जटा में गंगा रमना अर्थात पेड़ों की जड़ों में पानी का ठहरना ।
- उसी पानी को हिमालय से नीचे उतारकर मैदानों में लाना अर्थात भगीरथ प्रयत्न करना ।
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आईये हम भी इस दिशा में प्रयत्न प्रारम्भ करें । अपने-अपने क्षेत्र में वर्षा जल को ठहराने के लिए कुछ #भगीरथ प्रयत्न करें । यही गंगा दशहरा का सामयिक सन्देश है ।
हमारी सनातन संस्कृति ही ऐसी एकमात्र संस्कृति है जिसमें नदी, पहाड़, वृक्ष आदि को देवस्वरूप माना जाता रहा है। आगे एक थोड़ा लम्बा सा आलेख है जो आपको हमारी इस महान परम्परा से अवगत कराएगा। अगर आप पूरा न पढ़ सके तो जितना सम्भव हो उतना ही पढ़ियेगा ।
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भारतीय संस्कृति में नदी विज्ञान व व्यवहार
श्रीमद्भागवत महापुराण के बारहवें स्कन्ध के चौथे अध्याय के पृष्ठ खोलते ही प्रलयकाल के आगमन के लाक्षणिक विज्ञान से परिचय होता है। यह विज्ञान शुकदेव और राजा परीक्षित के संवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उसके अनुसार, एक बार मेघों ने 100 वर्षों तक वर्षा नहीं की। प्रजा व्याकुल हो गई; इतनी व्याकुल कि एक-दूसरे को खाने लगी। (एक-दूसरे को खाने का एक तात्पर्य एक-दूसरे के संसाधनों को हड़प लेना भी है।) धीरे-धीरे प्रजा क्षीण हो गई। सूर्य ने पृथ्वी का सारा रस सोख लिया। सूर्य ने पृथ्वी के विशेष रस-गंध को ग्रस लिया। अग्नि प्रकट हुई। वायु का वेग तीव्र हो गया। इस कारण नीचे के सातों लोक नष्ट हो गए। प्रचण्ड वायु सैकड़ों वर्षों तक चलती रही। एक ओर आकाश धुएं और धूल से भरा रहने लगा, तो दूसरी ओर आकाश में रंग-बिरंगे बादल दिखाई देने लगे। इसके बाद सैकड़ों वर्षों तक वर्षा हुई। सब कुछ जल में लय हो गया यानी प्रलय आ गई।
प्रलयकाल का संदर्भ मैने इसलिए प्रस्तुत किया; ताकि सांस्कृतिक इतिहास में दर्ज लक्षणों को सामने रखकर हम वर्तमान स्थितियों का आकलन कर सकें और स्वयं से यह पूछ सकें कि क्या प्रलय आगमन के प्रारम्भिक लक्षण दिखने शुरु हो गए हैं? वैश्विक तापमान में होती वृद्धि, समुद्र का बढ़ता जलस्तर, भूजल का गिरता स्तर, अनिश्चित होती वर्षा, बदलता ऋतु चक्र और खासकर नवंबर के महीने में दिल्ली के वायुमण्डल को लेकर पिछले कुछ वर्षों से मच रही हायतौबा को सामने रखें, तो किसी का उत्तर हां में ही होगा। आर्थिक उदारीकरण के नाम पर दुनिया के विकसित देशों द्वारा आर्थिक तौर पर गरीब माने जाने वाले देशों के प्राकृतिक संसाधनों को हड़पने के वर्तमान दौर को सामने रखें, तो भी उत्तर हां में ही होगा।
ध्यान देने की बात है कि संस्कृति एक तरह का निर्देश है और सभ्यता कालखण्ड विशेष में सांस्कृतिक निर्देशों के अनुकूल किया जाने वाला व्यवहार। पुरातन संस्कृति में नदियों को मां मानने का निर्देश था। आज इस 21वीं सदी में हम नदियों को मां कहते ज़रूर हैं, लेकिन नदियों को मां मानने का हमारा व्यवहार सिर्फ नदियों की पूजा मात्र तक सीमित है। असल व्यवहार में हमने नदियों को कचरा और मल ढोने वाली मालगाड़ी मान लिया है।
यदि यह असभ्यता है, तो ऐेसे में क्या स्वयं को सभ्य कहने वाली सज्जन शक्तियों का यह दायित्व नहीं कि वे खुद समझें और अन्य को समझायें कि वे क्या निर्देश थे, जिन्हें व्यवहार में उतारकर भारत अब तक अपनी प्रकृति और पर्यावरण को समृद्ध रख सका? हमारे व्यवहार में आये वे कौन से परिवर्तन हैं, जिन्हें सुधारकर ही हम अपने से रूठते पर्यावरण को मनाने की वैज्ञानिक पहल कर सकते हैं?
भारतीय संस्कृति मूल रूप से वैदिक संस्कृति है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद – वैदिक संस्कृति के चार मूल ग्रंथ हैं। ये ग्रंथ ईश्वर के सर्वव्यापी निराकार रूप को मानते हैं। इन ग्रंथों से स्पष्ट है कि वैदिक संस्कृति भ से भूमि, ग से गगन, व से वायु, अ से अग्नि और न से नीर (भगवान) यानी पंचतत्वों में ईशतत्वों की उपस्थिति मानते हुए तद्नुसार व्यवहार करने का निर्देश देती है। कालांतर में भारत के भीतर ही कई मतों और संप्रदायों का उदय हुआ। मंगोलिया, यवन, ईसाई और पारसी जैसी विदेशी संस्कृतियां भी भारतीय संस्कृति के संसर्ग में आईं।
हजारों सालों के सांस्कृतिक इतिहास वाले भारत की खासियत यह रही कि यहां के मत, संप्रदाय व जातियां अपनी विविधता को बनाये रहते हुए भी साथ-साथ रहे। किसी एक ने दूसरे को पूरी तरह खत्म करने का प्रयास नहीं किया। भारत के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि किसी जाति, मत अथवा संप्रदाय का पूरे भारत पर एकाधिकार रहा हो। हां, ऐसा अनेक बार अवश्य हुआ कि भिन्न वर्ग एक-दूसरे के विचारों और संस्कारों से प्रभावित हुए। मंगोलियाई शासकों पर असम की अहोम संस्कृति का प्रभाव तथा हिंदू संप्रदायों पर यवन व ईसाई संस्कृति के प्रभाव इसके स्पष्ट प्रमाण हैं। तकनीकी के आधुनिकीकरण द्वारा संस्कृतियों को प्रभावित करने प्रमाण स्वयंमेव स्पष्ट हैं ही। ये प्रमाण, इस बात के भी प्रमाण हैं कि संस्कृति कोई जड़ वस्तु नहीं है; संस्कृतियों का भी विकास होता है। भारतीय संस्कृति, स्वयं की विविधता को बनाये रखते हुए अन्य से ग्रहण करने की संस्कृति है।
अथर्ववेद के तीसरे काण्ड के तेरहवें सूक्त के प्रथम मंत्र में कहा है – हे सरिताओं, आप भली प्रकार से सदैव गतिशील रहने वाली हो। मेघों से ताडि़त होने, बरसने के बाद, आप जो कल-कल ध्वनि नाद कर रही हैं; इसीलिए आपका नाम नदी पड़ा। यह नाम आपके अनुरूप ही है। सनातनी हिंदू संदर्भ इसकी पुष्टि करता है। तद्नुसार, नाद स्वर की उत्पत्ति, शिव के डमरू से हुई। इसी नाद स्वर से संगीत की उत्पत्ति मानी गई है और इसी नाद स्वर की भांति ध्वनि उत्पन्न करने के कारण जलधाराओं को नदी का संबोधन प्रदान किया गया। लोक संस्कृतियों ने जलधाराओं को स्थानीयता और लोक बोली के अनुरूप संबोधन दिया। नदी शब्द की उत्पत्ति के उक्त सांस्कृतिक संदर्भ से नदी के दो गुण स्पष्ट हैं: पहला – सदैव गतिशील रहना और दूसरा – गतिशील रहते हुए नाद ध्वनि उत्पन्न करना। स्पष्ट है कि ऐसे गुण वाले प्रवाहों को ही हम नदी कहकर संबोधित कर सकते हैं। गौर करें कि जो गुण किसी नदी को नहर से भिन्न श्रेणी में रखते हैं, उनमें से प्रमुख दो गुण यही हैं। इन गुणों के नाते आप नदी को दुनिया की ऐसी प्रथम संगीतमयी यात्री कह सकते हैं, जो सिर्फ समुद्र से मिलने पर ही विश्राम करना चाहती है।
वैज्ञानिक दृष्टि से गौर करने लायक तथ्य यह है कि यदि नदी का पानी अपनी गति खो बैठे, तो उसका पानी सडऩे लगता है। यह गतिशीलता ही है, जो नदी को अपना पानी स्वयं स्वच्छ करने की क्षमता प्रदान करती है। ऐसे में सावधानी बरतने की बात यह है कि हम किसी भी नदी प्रवाह के प्रवाह मार्ग और किनारों पर कोई अवरोध न खड़ा न करें। क्या आज हम ऐसी सावधानी बरत रहे हैं? विचार कीजिए।
ध्यान दें कि कोई भी जल प्रवाह तभी कल-कल नाद ध्वनि उत्पन्न कर सकता है, जब उसमें पर्याप्त जल हो; उसका तल ढालू हो; उसके तल में कटाव हों। जल की मात्रा से उत्पन्न दबाव, तल के ढाल से प्राप्त वेग तथा कटाव के कारण होने वाला घर्षण – इन तीन क्रियाओं के कारण ही नदी कल-कल नाद ध्वनि उत्पन्न करती है। इन तीनों क्रियाओं के जरिए नदी में ऑक्सीकरण की प्रक्रिया निरन्तर बनी रही है। ऑक्सीकरण की यह सतत् प्रक्रिया ही जल को एक स्थान पर टिके हुए जल की तुलना में अधिक गुणकारी बनाती है। पहाड़ी नदियों में बहकर आये पत्थर ऑक्सीकरण की इस प्रक्रिया को तेज करने में सहायक होते हैं। पत्थरों के इस योगदान को देखते हुए ही कंकर-कंकर में शंकर की अवधारणा प्रस्तुत की गई।
स्पष्ट है कि यदि नदी जल में कमी आ जाये, तल समतल हो जाये अथवा तल में मौजूद कटाव मिट जायें, पहाड़ी नदियों में से पत्थरों का चुगान कर लिया जाये तो नदियां अपने नामकरण का आधार खो बैठेंगी और इसके साथ ही अपने कई गुण भी। विचार कीजिए कि नदी के मध्य तक जाकर किए जा रहे रेत खनन, पत्थर चुगान और गाद निकासी करके हम नदी को उसके शब्दिक गुण से क्षीण कर रहे हैं अथवा सशक्त?
आइये, आगे बढ़ें। अन्य संदर्भ देखें तो हिमालयी प्रवाहों को अप्सरा तथा पार्वती का संबोधन मिलता है। श्री काका कालेलकर द्वारा लिखित पुस्तक जीवन लीला में नदी नामकरण के ऐसे कई अन्य संदर्भों का जिक्र है।
अथर्ववेद के तृतीय काण्ड के चौबीसवें सूक्त के तीसरे मंत्र में जलधाराओं को समुद्रपत्नी का नाम दिया गया है। वहां नदियों को संबोधित करते हुए कहा गया है – आप समुद्र की पत्नियां हैं। समुद्र आपका सम्राट हैं। हे निरन्तर बहती हुई जलधाराओं, आप हमें पीड़ा से मुक्त होने वाले रोग का निदान दें, जिससे हम स्वजन निरोग होकर अन्नादि बल देने वाली वस्तुओं का उपभोग कर सकें।
गीता के दूसरे अध्याय के सत्तरवें श्लोक में श्रीकृष्ण ने नदी-समुद्र संबंध की तुलना आत्मा और परमात्मा संबंध से करते हुए कहा है कि जैसे नाना नदियों का जल सब ओर परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में विचलित न करते हुए समा जाते हैं, वैसे ही जो सब भोग स्थितप्रज्ञ पुरुष में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए बिना ही समा जाते हैं, वही पुरुष परम शान्ति को प्राप्त होता है; भोग चाहने वाला नहीं।
हम सभी जानते हैं कि प्रत्येक नदी अंतत: जाकर समुद्र में ही मिलती है। नदी अपने उद्गम पर नन्ही बालिका-सी चंचल और ससुराल के नजदीक पहुंचने पर गहन-गंभीर-शांत दुल्हन की गति व रूप धारण कर लेती है। जाहिर है कि अपने इसी गहन गंभीर रूप के कारण वह समुद्र को विचलित नहीं करती। इसी कारण नदियों को सिन्धुपत्नी कहा गया है। यहां विचारणीय तथ्य यह है कि यदि नदी सिन्धुपत्नी है तो नदियों का जल बहकर समुद्र तक जाने को व्यर्थ बताकर नदी जोड़ परियोजना की वकालत करने वालों तथा बांध बनाने वालों से क्या यह प्रश्न नहीं पूछा जाना चाहिए कि पति समान समुद्र के मिलन मार्ग में क्यों उत्पन्न कर रहे हैं? यह प्रश्न पूछते हुए हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि नदी व्यर्थ ही समुद्र तक नहीं जाती। समुद्र मिलन से पूर्व नदियां कई दायित्वपूर्ण कार्य संपन्न करती हैं। इस दौरान नदियों को अपनी ससुराल यात्रा मार्ग में मैदानों का निर्माण करना होता है; निर्मित मैदानों को सतत् ऊंचा करना होता है; डेल्टा बनाने होते हैं; मिट्टी तथा भूजल का शोधन करना होता है; भूजल का पुनर्भरण करना होता है; समुद्री जल के खारेपन को नियंत्रित करना होता है। नदी-समुद्र मिलन में बाधा उत्पन्न करना, नदी के दायित्वपूर्ण कार्यों में बाधा उत्पन्न करना है। क्या इसे आत्मा-परमात्मा मिलन में बाधक पापकर्म के स्तर का पापकर्म नहीं मानना चाहिए?
साभार अरुण तिवारी संकलन अजय कर्मयोगी





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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद