वर्ष 1956 में स्टालिन द्वारा हंगरी में भीषण नरसंहार किया गया था, जिसके कारण दुनिया भर में साम्यवाद बदनाम हुआ।
यूरोप में उनके आंदोलन को हानि न हो, इस आशय से कुछ नए साम्यवादी विचारक आगे आए और बड़ी सफाई से, उनके द्वारा भूतकाल में किये नरसंहारों से खुद को अलग कर, एक नई थियोरी दी गई -
#न्यू_लेफ्ट_या_नव_साम्यवाद
क्लासिकल मार्क्सवाद के नाम पर भेष बदल कर, आर्थिक चिंतन के बहाने ये राजनीति करने के नए षड्यंत्र रचकर प्रासंगिक बने रहे।
इन नव चिंतकों में कुछ नाम
1.हर्बर्ट मारक्यूज
2.मिशेल फुको
3.रेमंड विलियम्स
4.स्टुअर्ट हॉल
प्रमुख हैं, जिन्होंने संघर्ष का एक प्रच्छन्न पथ विकसित किया, जिसे वे कल्चरल स्टडीज कहते हैं।
इस कल्चरल स्टडीज का आधार दुनिया भर में मानविकी विषयों पर हुए लगभग 1500 सामाजिक अनुसंधान हैं जो प्रायः इन्हीं के प्रभाव में लिखे गए हैं।
भारत के विद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली 1.अर्थशास्त्र, 2.समाजशास्त्र, 3.मानववंश शास्त्र, 4.राजनीति शास्त्र और 5.इतिहास में इन्हें शामिल किया गया है।
क्लासिकल मार्कसिज्म को कल्चरल स्टडीज के नाम पर पढ़ाकर, एक तो इन सब विषयों को बोझिल बना दिया गया, दूसरे शिक्षा और बौध्दिक क्षेत्र में वामपंथियों का दबदबा बना हुआ है, तीसरा बहुत कम छात्र इन विषयों की तह तक जा पाते हैं, बाकी सब ऊपर ऊपर तैरते रहते हैं, और चौथा सभी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में ज्यादातर इनके वैचारिक पुत्र ही निकलते हैं।
वर्तमान में भारत के जिन विश्वविद्यालय में स्टुअर्ट हॉल की कल्चरल स्टडीज पढ़ाई जा रही है, उनमें जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली यूनिवर्सिटी, जोधपुर यूनिवर्सिटी, आसाम यूनिवर्सिटी, तेजपुर यूनिवर्सिटी असम, nehu शिलोंग, सिंदरी राजस्थान, CU झारखंड, टाटा इंस्टीट्यूट मुम्बई, सावित्री बाई फुले, पुणे, द E&F लेंग्वेज हैदराबाद, पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़, डीम्ड यूनिवर्सिटी थ्रिसुर केरला शामिल है।
नव साम्यवाद भाग 2
पिछली पोस्ट में जिन 4 नव साम्यवादी चिंतकों का नाम लिया था उनके विचारों का सार
1.हर्बर्ट मारक्यूज- यह न्यू लेफ्ट का जनक था। जर्मन था। फ्रैंकफर्ट स्कूल ऑफ क्रिटिकल थियोरी से सम्बंधित।
इसके अनुसार संस्कृति, आधुनिक विज्ञान और मनोरंजन सामाजिक नियंत्रण के माध्यम है। वामपंथी छात्र अस्त व्यस्त रहते हैं, विद्रोह की भाषा और घिनौनी हरकत करने के पीछे इसी के विचारों का प्रभाव है। ऐसा करने से आसानी से सामाजिक विक्टिम बना जा सकता है और लोग सोचते हैं यह अपने पर ही अत्याचार कर रहा है, तो एक सहानुभूति बनी रहती है, दूसरे इनसे समाज को प्रत्यक्ष कोई खतरा नहीं दिखता।
2.मिशेल फुको- यह फ्रेंच विचारक है। विश्व भर के साम्यवादी छात्रों का प्रिय लेखक और विचारक है। सत्ता और ज्ञान के विषय में इसके सैद्धांतिक लेखों की बड़ी धूम है।
इसका सारा लेखन अराजकतावादी है।सशस्त्र क्रांति का पोषक है।
धर्म, कुटुंब, विवाह, का प्रबल विरोधी। शिक्षा और राजकीय संस्थाओं में नैतिक मूल्यों का विध्वंसक आलोचक है।
इसके अनुसार सभी समस्याओं और अनीतियों का केंद्र बहुसंख्यक समाज ही होता है, अतः उसकी परम्परा, संस्कृति और मान्यताओं पर निर्मम चोट करो।
इसका दर्शन कैथोलिक चर्च के एकेश्वरवाद की प्रतिक्रिया से जन्मा है। फुको वर्तमान यूरो अमेरिकी कल्चर की प्रतिक्रिया है, अतः आकर्षण स्वाभाविक है। भारत की बहुलवादी संस्कृति में यह अर्थहीन है फिर भी भारत के कम्युनिस्ट जब तब, इसी तर्क के सहारे, आरएसएस, विहिप इत्यादि को झूठे नरेटिव की व्याख्या में बांधकर भ्रम फैलाते रहते हैं।
भारत के कथित बुद्धिजीवी हमेशा उलझन में रहते हैं, उसका कारण फुको का चिंतन है।
यहाँ एकेश्वरवाद के अनुयायी मुसलमान हैं, किंतु अल्पसंख्यकों के विरुद्ध वे बोल नहीं सकते और हिन्दू बहुलतावादी हैं अतः उन्हें ठोस भूमि मिल नहीं रही।
3.रेमंड विलियम्स- इस ब्रिटिश विचारक की पुस्तक कल्चर एंड सोसायटी का सार है "संस्कृति जीवन का सम्पूर्ण मार्ग है।" culture is a whole way of life
उसके अनुसार संस्कृति से मानव को नियंत्रित करना गलत है। इसलिए यह धर्म का घोर विरोधी है। अनेक भारतीय बुद्धिजीवी उसके लेखन का भारतीय सन्दर्भ खोजते रहते हैं किंतु उसका लेखन तो पैगम्बर और मजहब की धज्जियां उड़ाने वाला है, हिन्दू धर्म के #संस्थागत_मजहब न होने से उनका वैचारिक दिवालियापन जब तब दिखाई देता रहता है।
रेमंड ने बुद्धिजीवियों को एक ट्रिक सिखा दी है कि ये लोग बौद्धिकता का बुरका ओढ़ कर प्रत्यक्ष राजनीति कर सकते हैं। कम होती अपनी राजकीय उपयोगिता को शैक्षिक और सांस्कृतिक आधार देकर सत्ता की राजनीति में सहभागी हो सकते हैं। ज्यादातर बुद्धिजीवी यही कर रहे हैं।
4.स्टुअर्ट हॉल- भारत के उल्लिखित सभी यूनिवर्सिटी और आईटी केंद्र, जहां ह्यूमेनिटीज विषय है, इस जमेकन मूल के ब्रिटिश लेखक को अवश्य पढ़ाया जाता है।
इसकी शास्त्रीय मार्क्सवाद थियोरी जो दुनिया की सभी संस्कृतियों को नकार कर #सब_कल्चर की वकालत करती है, जिसे ये #यूथ_कल्चर भी कहते हैं।
इसके अनुसार विद्रोही बनना, परम्परा ध्वंस, युवाओं, अल्पसंख्यकों, महिलाओं, दलितों, शोषितों, .... इत्यादि की बात करना प्रगतिशीलता है।
ये नव युवाओं और टीनएजर्स में उन्मुक्त विद्रोही चिंतन के पक्षधर हैं। हिप्पी आंदोलन उसी का परिणाम था। जनरेशन गैप को हथियार बनाते हैं और सैक्स के मामले में उन्हें खुलकर व्यवहार करने को प्रोत्साहित करते हैं।
आगामी लेखन में, इसी विद्या शाखा के बारे में विचार करेंगे।
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मैं ऐसे 4 लेख लिखने जा रहा हूँ। यह दूसरा है। उम्मीद है इन्हें पढ़कर आपको भारतीय शिक्षा व्यवस्था की समस्या के असली दर्शन होंगे।
समस्या कहाँ हैं?
समस्या भारत के विश्वविद्यालयों में है।
गत कार्यकाल में इस #बर्र_के_छत्ते को हाथ नहीं लगाया था।
अब इसमें पेट्रोल छिड़क कर आग लगाई जाने वाली है।
एक साथ खूब सारा कोलाहल होगा।
मेरे मित्र इसे समझ कर उस स्थिति से निपटने को सिद्ध रहें, यही हेतु है। विषय थोड़ा कठिन अवश्य है पर समझना तो पड़ेगा।
पढ़ने के लिए सबको बहुत बहुत धन्यवाद।
नव साम्यवाद 3
आइए समझते हैं कुछ खतरनाक विचार, जो वास्तव में खतरनाक दिखते नहीं है मगर आपके अपनों को आपसे काट देते हैं।
1.स्टुअर्ट हॉल के अनुसार "सभी शास्वत मूल्य प्रस्थापित की श्रेणी में आते हैं।"
इसमें से बात निकली कि समकालीन संस्कृति, परम्परागत संस्कृति की जगह लेती है।
समकालीन संस्कृति अर्थात यूथ कल्चर, यह मुख्यतः किशोरवयीन लड़के लड़कियों के माध्यम से प्रकट होती है।
युवाओं की संस्कृति मूल्यविहीन होती है।
इस प्रकार, युवाओं को सिखाया जाता है कि सौहार्द, प्रेम, रचनात्मकता, आदरभाव, त्याग, कुटुंब के सदस्य, इत्यादि सभी हेय और त्याज्य है।
उनमें सत्ता संघर्ष के बीज डाले जाते हैं।
2."एक मनुष्य की राष्ट्र की संकल्पना का अर्थ है, दूसरे मनुष्य का दोजख." .... इस आशय की शिक्षा पिछले40 वर्षों से भारतीय विश्वविद्यालयों में दी जा रही है।
हरेक विद्यार्थी, उपरोक्त वामपंथी साहित्य, और प्रोफेसरों के बीच लगभग 5 वर्ष तक, औसत 5 घण्टे प्रतिदिन इनके सहवास में बिताता है।
जो लोग 12वी से पहले ही पढ़ाई छोड़ कुछ अन्य करने लगे, वे आपको ज्यादा मौलिक और तत्वज्ञ दिखाई देते हैं, जबकि यूनिवर्सिटी के मानविकी विषयों के विद्यार्थी कोई अन्य लोक के प्राणी समान नजर आते हैं।
इनकी शैली ऐसी है कि प्रत्येक विद्या के गुण और दोष दोनों सिखाने के बहाने, आलोचना करनी सिखाई जाती है।
जो विषय और तथ्य बिल्कुल सर्वस्वीकृत हैं, उनमें भी द्वंद्व खड़ा किया जाता है। अतः ये मनुष्य को साधक सत्य से बाधक अवस्था में धकेलते हैं।
4.मार्कसिज्म जैसे अत्यंत संकुचित व्यवहार को इन्होंने उदारवाद का जामा पहनाया है।
इस उदारवाद की आड़ में, इनका मूल चिंतन बिल्कुल नहीं खिसकता, जबकि इनसे इतर, शेष सभी विचारों, संस्कृतियों और मत पंथों को बड़ी आसानी से काल बाह्य अथवा बुर्जुआ बताकर उन पर निर्मम प्रहार किया जाता है।
5.प्रत्येक देश में कल्चरल स्टडीज की विद्याशाखा में वहाँ के विश्वविद्यालयों में "राष्ट्रवाद" को सिर से पांव तक छेद कर, साम्यवाद को स्थापित किया जाता है और उसे बुद्धिप्रामाण्यवादी, वैज्ञानिक और तर्कशुद्ध बताया जाता है।
6.राजकीय और सामाजिक संघर्ष का क्षेत्र आर्थिकता न होकर संस्कृति है। 1910 से 1930 तक इटली की कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष #एंटोनियो_ग्रामची के अनुसार पूंजीवादी नियंत्रण का माध्यम राजकीय, या आर्थिक नहीं अपितु संस्कृति है। अतः सांस्कृतिक व्यवस्था के अनुसार क्रांति करने से ही साम्यवादी लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। कल्चरल स्टडीज का सम्पूर्ण लेखन इसी प्रतिकारवादी तर्क पर आधारित है।
7.1957 में शुरू हुई कल्चरल स्टडीज विद्याशाखा, वर्तमान में विश्व के 32 देशों के सभी प्रमुख विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जा रही है। उसमें कार्यरत वर्तमान बुद्धिवादियों की सूची बहुत लम्बी है। ये प्राध्यापक हमेशा परस्पर संपर्क में रहते हैं। इनका नेटवर्क बहुत सक्रिय है। ये ट्रेंडिंग का अनुसरण करते हैं। भारत के मेधावी विद्यार्थियों को खींचकर अपने पाले में लाते हैं और कई तरह के अनुसंधान का दावा करते हैं।
नव साम्यवाद भाग 4 (अंतिम)
सामाजिक वर्ग संघर्ष के तर्क पर सशस्त्र आंदोलन की पक्षधर "कल्चरल स्टडीज" विद्याशाखा भारत में पढ़ाई जा रही है, यह वास्तव में दुर्भाग्य की बात है।
भारत पहले ही सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रह कर, जैसे तैसे अपनी अस्मिता बचाने में लगा है। ऐसे आघातों के कारण दुर्बल मानसिकता प्राप्त देश में ऐसा विषय पढ़ाये जाने का अर्थ है, राष्ट्रीय एकता के स्थान पर देश विघातक विचारों की सहायता से युवाओं की ऊर्जा और उत्साह को नष्ट करना।
सामाजिक सौहार्द को नष्ट करना।प्रत्येक समुदाय को एक दूसरे के विरुद्ध, व्यक्ति को व्यक्ति के विरुद्ध, युवाओं को अपनी पूर्व पीढ़ी के विरुद्ध, स्त्रियों को पुरुषों के विरुद्ध, व्यक्ति को अपने परिवार तथा समाज के विरुद्ध, कर्मचारियों को नियोक्ता के विरुद्ध, देश के लोगों को अपने ही देश के विरुद्ध निरन्तर संघर्षरत रखने का प्रशिक्षण देने वाली शिक्षा व्यवस्था है यह।
इस शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य भारत के वैशिष्टयपूर्ण विविधता युक्त समाज को एकत्व के संस्कारों द्वारा संगठित कर देश की शक्ति बढ़ाने के कार्य मे #बाधा_उत्पन्न_करना है।
इसके परिणाम स्वरूप, विभाजित और कुंठित युवा, महिला, दलित, शोषित, पीड़ित इत्यादि विभिन्न संज्ञाओं की पहचान में बदलकर, सम्पूर्ण देश को आत्मविस्मृति के गर्त में धकेल रहा है।
यूरोपीय देशों में इस विषय के बहाने, इनके विकल्प तलाशे जाते हैं और उनका अध्ययन कर चीन पर निगरानी या नियंत्रण की राह तलाशी जाती है, मगर भारत में यह माओवादी सांस्कृतिक क्रांति के मार्ग को अपनाने का माध्यम भर है।
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बहुत बड़ा और जटिल विषय है, तथापि भारतीय विश्वविद्यालयों में पल रहे इन परजीवियों पर कीटनाशक छिड़कने का समय आ गया है। जब यह विद्याशाखा बन्द होगी या इस पर चोट होगी तब इसके वैकल्पिक पाठ्यक्रम और प्राध्यापकों की समस्या आएगी। अब तक शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की बात नीचे नीचे ही हो रही थी, वास्तव में तो सबसे पहले देश की यूनिवर्सिटीज को ठीक करने की जरूरत है, और यदि सरकार ने इस बर्र के छत्ते को छेड दिया तो एक साथ भयानक कोलाहल होगा, जिसमें बिना पूरी समस्या जाने, आप हम भी सरकार के विरुद्ध हो सकते हैं, सरकार को इसी बात का डर है।
रोहित वेमुला मामले में सरकार की जल्दबाजी से उसके भय को और नव साम्यवाद की जड़ो की भयंकरता को समझा जा सकता है।
पूरी लेखमाला पढने के लिए आभार।
साभार kss संकलन अजय कर्मयोगी



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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद