मुद्रा की यह खेल अंग्रेजों के बाद से काले अंग्रेजो के द्वारा बड़े तरीके से खेला जा रहा है इसका रहस्योद्घाटन आज से करीब 16 साल पहले इनकम टैक्स के कमिश्नर श्री विश्व बंधु गुप्ता जी ने उस समय ही कर दिया था पर यह रहस्योद्घाटन पिछले 12 साल तक दवा रहा अब जाकर के उजागर होने के करीब है अभी पता नहीं यह हो पाएगा या नहीं पर आपको इस मुद्रा के खेल में मुद्रा का इतिहास और सारे तमाम अन्य पहलुओं की जानकारी के हेतु एक पूरा रिसर्च तैयार हो चुका है इसे जल्द ही प्रकाशित कराने की योजना है नीचे दिए गए लेख में कुछ पार्टी का भी उल्लेख किया गया है पर इसमें आपको विवेक से पढ़ कर आवश्यक चीजों को व अंतर्निहित श्रेष्ठ विचारों को अपने अंदर समाहित करना है आप सब का सानिध्य और सहयोग की अपेक्षा है अजय कर्मयोगी 9336919081
https://youtu.be/AzsQoOsDt1Y
दुनिया का सबसे बड़ा घोटाला खुलेगा 2019 के बाद जो शायद दुनिया मे कही नही हुआ होगा और इस महाघोटाले का मुख्य अभियुक्त है चिदंबरम इसको पढ़िए की क्यों किया गया अचानक नोटबन्दी का फैसला?
पीएम मोदी ने नोटबंदी करके इस घोटाले को रोक तो दिया, मगर उसके बाद ये बात निकल कर सामने आयी कि देश में बिलकुल असली जैसे दिखने वाले एक ही नंबर के कई नोट चल रहे थे. ये ऐसे नोट थे, जिन्हे पहचानना लगभग नामुमकिन था क्योकि ये उसी कागज़ पर छपे थे जिसपर भारत सरकार नोट छापती थी।
कैसा खेला गया घोटाले का खेल?
कहा जा रहा है कि घोटाले का प्रारम्भ 2005 में तब हुई जब वित्त मंत्रालय में अरविन्द मायाराम वित्त सचिव के पद पर थे और अशोक चावला एडिशनल सचिव के पद पर थे. कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद 2006 में सिक्योरिटी प्रिंटिंग एंड मींटिंग कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड एक कंपनी बनाई गयी, जिसके मैनेजिंग डायरेक्टर अरविंद मायाराम थे और चेयरमैन अशोक चावला थे, यानी दो सरकारी अधिकारी पद पर रहते हुए इस कंपनी को चला रहे ।
इस प्रकार नियुक्तियों के लिए अपॉइंटमेंट्स कमिटी ऑफ़ कैबिनेट (ACC) के सामने विषय को रखकर उसके अनुमोदन की आवश्यकता होती है, किन्तु चिदंबरम ने भला कब नियम-कायदों की परवाह की, जो अब करते,अर्थात् ACC के सामने इन नियुक्तियों का विषय लाया ही नहीं गया और ऐसे ही इनकी नियुक्ति कर दी गयी.
इसके बाद असली खेल शुरू हुआ. इस घोटाले में चिदंबरम के दाएं व बाएं हाथ बताये जाने वाले अशोक चावला व् अरविंद मायाराम ने भारतीय रिज़र्व बैंक नोट मुद्रण प्राइवेट लिमिटेड (BRBNMPL), जोकि नोटों की छपाई का काम देखती है, उससे कहा कि उनकी कंपनी के साथ मिलकर सिक्योरिटी पेपर प्रिंटिंग के सप्लायर को ढूंढो. जिसके बाद पहले से ब्लैकलिस्टेड की जा चुकी डे ला रू कंपनी से नोटों की छपाई में इस्तमाल होने वाले सिक्योरिटी पेपर को लेना जारी रखा गयाक्या इसके लिए चिदंबरम को घूस दी गयी थी? इस ब्रिटिश कंपनी द्वारा या पाकिस्तान के आईएसआई द्वारा चिदंबरम को पैसा दिया जा रहा था? ये जांच का विषय है. बहरहाल पहले जानते हैं कि डे ला रू को क्यों बैन किया गया था और पाक आईएसआई का इस घोटाले में क्या भूमिका है?
डे ला रू कंपनी का खेल। वित्त वर्ष 2009-10 के दौरान नकली मुद्रा रैकेट का पता लगाने के लिए सीबीआई ने भारत नेपाल सीमा पर विभिन्न बैंकों के करीब 70 शाखाओ पर छापेमारी की, तो बैंकों से ही नकली करेंसी पकड़ी गयी. जब पूछताछ के गयी तो उन बैंक शाखाओं के अधिकारियों ने सीबीआई से कहा कि जो नोट सीबीआई ने छापें में बरामद किये हैं वो तो स्वयं रिजर्व बैंक से ही उन्हें मिले हैं.
ये एक बेहद गंभीर खुलासा था क्योंकि इसके अनुसार आरबीआई भी नकली नोटों के खेल में संलिप्त लग रहा था! हांलाकि इतनी अहम् खबर को इस देश की मीडिया ने दिखाना आवश्यक नहीं समझा क्योकि उस समय कांग्रेस सत्ता में थी.
इस खुलासे के बाद सीबीआई ने भारतीय रिजर्व बैंक के तहखानो में भी छापेमारी की और आश्चर्यजनक तरीके से भारी मात्रा में 500 और 1000 रुपये के जाली नोट पकडे गए. आश्चर्य की बात ये थी कि लगभग वैसे ही समान जाली मुद्रा पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई द्वारा भारत में तस्करी से पहुँचाया जाता था.
अब प्रश्न उठा कि यह जाली नोट आखिर भारतीय रिजर्व बैंक के तहखानो में कैसे पहुंच गए? आखिर ये सब देश में चल क्या रहा था?
जांच के लिए शैलभद्र कमिटी का गठन हुआ और 2010 में कमिटी उस वक़्त चौंक गयी जब उसे ज्ञात हुआ कि भारत सरकार द्वारा ही समूचे राष्ट्रकी आर्थिक संप्रभुता को दांव पर रख कर कैसे अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी को 1 लाख करोड़ की छपाई का ठेका दिया गया था!
जाँच हुई तो ज्ञात हुआ कि डे ला रू कंपनी में ही घोटाला चल रहा था. एक षड्यंत्र के तहत भारतीय करेंसी छापने में उपयोग होने वाले सिक्योरिटी पेपर की सिक्योरिटी को घटाया जा रहा था ताकि पाकिस्तान सरलता से नकली भारतीय करेंसी छाप सके और इसका उपयोग भारत में आतंकवाद फैलाने में किया जा सके!
इस समाचार के सामने आते ही भारत सरकार द्वारा डे ला रू कंपनी पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया. मगर अरविन्द मायाराम ने इस ब्लैकलिस्टेड कंपनी से सिक्योरिटी पेपर लेना जारी रखा. इसे लेने के लिए उसने गृह मंत्रालय से अनुमति ली।
क्या है पाक आईएसआई की भूमिका?
समाचार के अनुसार डे ला रू कंपनी से भारत को दिए जाने वाले सिक्योरिटी पेपर के सिक्योरिटी फीचर को कम किया जा रहा था।यहाँ पाक आईएसआई का नाम सामने आया कि आईएसआई की ओर से कंपनी के कर्मचारियों को घूस दी जाती थी. मगर इस खेल में अरविंद मायाराम क्यों शामिल थे? क्यों वो ब्लैकलिस्टेड कंपनी से पेपर लेते रहे?
मोदी सरकार ने लिया एक्शन
जब 2014 में मोदी सरकार सत्ता में आयी, तब गृहमंत्री राजनाथ सिंह को ये बात पता चली की इतना बड़ा गोलमाल चल रहा था. इसके बाद उन्होंने सिक्योरिटी पेपर डे ला रू कंपनी से लेना बंद करवाया. ये भी सामने आया कि इस कंपनी से सिक्योरिटी पेपर काफी महंगे दाम पर खरीदा जा रहा था, यानी ये कंपनी देश को लूट रही थी और देश का वित्तमंत्रालय इस काम में विदेशी कंपनी की मदद कर रहा था!
मायाराम के इस कालेकारनामे की खबर पीएमओ को हुई तो पीएमओ ने गंभीरता पूर्वक इस मामले को उठाया और मुख्य सतर्कता आयुक्त द्वारा इसकी जांच करवाई. मुख्य सतर्कता आयुक्त द्वारा वित्तमंत्रालय से इससे जुडी फाइल मांगी गयी. इस वक़्त वित्तमंत्री अरुण जेटली बन चुके थे।
इसके बाद ये मामला पीएमओ से होता हुआ सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संज्ञान में आया और फिर मोदी ने खुद एक्शन लिया तब जाकर मुख्य सतर्कता आयुक्त के पास फाइल पहुंची. क्या जेटली ने फाइलें देने में देर करवाई या फिर कोंग्रेसी चाटुकारों ने जो वित्तमंत्रालय तक में बैठे हैं? ये बात साफ़ नहीं हो पायी.
नोटबंदी ना करते मोदी तो नकली करेंसी का ये खेल चलता ही रहता. डे ला रू से सिक्योरिटी पेपर लेना बंद किया गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने और पीएम मोदी ने की नोटबंदी, जिसके कारण पाकिस्तान द्वारा नकली करेंसी की छपाई बेहद कम हुई और यही कारण है कि कांग्रेस के दस वर्षों में आतंकवादी घटनाएं जो आम हो गयी थी, वो मोदी सरकार के काल में ना के बराबर हुई.
कश्मीर के अलावा देश के किसी भी राज्य में बम ब्लास्ट नहीं हो पाए. आतंकियों तक पैसा पहुंचना जो बंद हो गया था. पीएम मोदी ने जांच करवाई और मायाराम के खिलाफ मुख्य सतर्कता आयुक्त और सीबीआई द्वारा आरोप तय किये गए.
आपको यहाँ ये भी बता दें कि जिस मायाराम के खिलाफ चार्ज फ्रेम किये गए हैं, उसी को राजस्थान में कांग्रेस सरकार बनते ही मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अपने आर्थिक सलाहकार के पद पर नियुक्त कर लिया. यानी एक घपलेबाज को अपना आर्थिक सलाहकार बना लिया.
वहीँ अशोक चावला का नाम चिदंबरम के एयरसेल-मैक्सिस घोटाले में भी सामने आया. जिसके बाद ने नेशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया लिमिटेड के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के चेयरमैन व पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर पद से अशोक चावला को इस्तीफा देना पड़ा.
जुलाई 2018 में सीबीआई ने चिदंबरम को एयरसेल-मैक्सिस मामले में आरोपी बनाया था। सीबीआई ने चिदंबरम, उनके बेटे कार्ति और 16 अन्य के खिलाफ चार्जशीट दायर की थी, जिसमें आर्थिक मामलों के पूर्व केंद्रीय सचिव अशोक कुमार झा, तत्कालीन अतिरिक्त सचिव अशोक चावला, संयुक्त सचिव कुमार संजय कृष्णा और डायरेक्टर दीपक कुमार सिंह, अंडर सेक्रेटरी राम शरण शामिल हैं।
इस पूरे मामले से ये बात तो साफ़ हो जाती है कि चिदंबरम ने देश में केवल एक या दो नहीं बल्कि जहाँ-जहाँ से हो सका, वहां-वहां से देश को लूटा. चदम्बरम व् उसके बेटे कार्ति चिदंबरम ने मिलकर खूब लूटा और इस खेल में ना केवल नौकरशाह शामिल रहे बल्कि न्यायपालिका में भी कई चिदंबरम भक्त बैठे हैं, जो आज भी उसे जेल जाने से बचाते आ रहे हैं.
कहा जा रहा है कि सभी में लूट का माल मिलकर बंटता था और यदि चिदंबरम जेल गए तो सीबीआई व् ईडी की कम्बल कुटाई उनसे एक दिन भी नहीं झेली जायेगी और वो सब उगल देंगे. यदि ऐसा हुआ तो सभी जेल जाएंगे. यही कारण है कि चिदंबरम को हर बार अग्रिम जमानत दे दी जाती है.
मगर ये भी तय माना जा रहा है कि यदि मोदी इस बार भी चुनाव जीतकर पीएम बन गए तो चिदंबरम का जेल जाना तय है और फिर कई अन्य गड़े मुर्दे भी बाहर आएंगे. देश को कैसे-कैसे और किस-किस ने लूटा, सबको एक-एक करके सजा होगी. कोंग्रेसी चाटुकार नौकरशाहों समेत माँ-बेटे व् कई कोंग्रेसी नेता सलाखों के पीछे पहुंचेंगे.


Comments
Post a Comment
अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद