गुलर पक गये हैं पक कर जमीन पर गिर गये हैं चिड़ियाँ खूब खा रहीं हैं और इनके फल नीचे गिर रहें हैं आप को कुछ नहीं करना इनके बीज इकठ्ठा कर आप किसी जहाँ जंगल कम दिखे उसमें फेंक दे ते जब बारिश होगी तो बीज जम जायेंगे इसे चिड़ियाँ बहुत पसंद करती हैं उनको रहने का घर मिल जायेगा और जहाँ जहाँ जायेंगी बीट करेंगी तो नयाँ पेड़ बन जायेगा ये विडियो इसलिये बनाया की आपके आस पास शहतूत गुलर का पेड़ हो तो उसका आप अगर पेड़ खरीद कर नहीं लगा पाते तो सबसे आसान तरीका है की उसका सीड बाॉल बनाकर अपने आस पास फेंक कर पेड़ बना सकते हैं आपका भी इस धरती को हरा भरा करने का योगदान हो सकता है जब तक आप सब मिलकर हर साल 100 करोड़ पेड़ नहीं लगाते तब तक मिशन चलता रहेगा आप भी सहयोग दें,हमारे ठअपनेट बच्चों को सिखायें पेड़ लगाना ताकि आने वाली पिढी इसका महत्व समझें और इस धरती को हरा करें आइये जानते हैं गूलर खाने के फायदे के बारे में :-
*गूलर*
प्राय: सभी स्थानों पर पाया जाने वाला गुलर का वृक्ष 20 से 40 फुट ऊँचा होता है।तना मोटा, लम्बा, अकसर टेढ़ापन लिए होता हैं। छाल लाल व मटमैली होती है।पत्ते 3 से 5 इंच लम्बे डेढ़ से तीन इंच चौड़े, नोकीले, चिकने और चमकीले होते है। पुष्प गुप्तरूप से होने के कारण अलग से दीखते नहीं। फल ग्रीष्म काल में 1 से 2 इंच व्यास के गोलाकार, मांसल, अंजीर के सामान, प्राय: गुच्छों में लगते है।
कच्चे फल हरे रंग के और पके फल लाल रंग के होते है। फल थोड़ा दबाते ही फुट जाता है।और इसमे सूक्ष्म कीटाणु भी पाए जाते हैं।वृक्ष के सभी अंगो में दूध भरा होने के कारण किसी भी धारदार चीज से कटे स्थान पर दूध निकलने लगता है।दूध की विशेषता यह होती है की ताज़ा निकलते समय तो यह सफेद होता है, लेकिन हवा के संपर्क में आते ही कुछ ही देर में पिला हो जाता है।यही दूध औषधियों के रूप में काफी गुणकारी होता है।
गूलर और औषधीय गुण
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आयुर्वेदिक मतानुसार गुलर मधुर, कषाय, गुरु, शीतल, पित्त, कफ, रक्त विकार नाशक, विपाक में कटु, शरीर के वर्ण मे निखार लाने वाला, शुक्र स्तम्भक, शुलहर, गर्भ रक्षक, रक्तप्रदर, मधुमेह, रंग रोग, नेत्र रोग नाशक, बलवर्धक अस्थि जोड़ने वाला, अतिसार, सुखा रोग, प्रमेह, मूत्र रोग नाशक होता है।
यूनानी चिकित्सकों के मतानुसार गुलर दुसरे दर्जे का गर्म और पहले दर्जे का तर होता हैं। यह आँखों के रोग, सीने के दर्द, सुखी खांसी, गुर्दे और तिल्ली के दर्द, सुजन, बवासीर मे खून जाना, खून की खराबी, त्क्तातिसार, कमर दर्द एवं फोड़े-फुंसियो में लाभप्रद है।
वैज्ञानिक मतानुसार गुलर का रासायनिक विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है की इसके फल में कार्बोहाइडेृड 49 प्रतिशत, अलब्युमिनायड 7.4 प्रतिशत, वसा 5.6 प्रतिशत, रंजक द्रव्य 8.5 प्रतिशत, भस्म 6.5 प्रतिशत, आद्रता 13.6 प्रतिशत तथा अल्प मात्रा में फास्फोरस व सिलिका होता है। इसकी छाल में 14 प्रतिशत टैनिन और दूध में 4 से 7.4 प्रतिशत तक रबड़ होता हैं। गुलर का पका फल खाने में मीठा होता हैं। मीठा होने के कारण इसमें कीड़े आसानी से लग जाते हैं, अत: उपयोग में लेने से पूर्व इसे काटकर अवश्य देख लेना चाहिए।यदि लगे हों, तो उन्हें निकालकर अच्छे भाग को सुखाकर उपयोग में लें।कहा जाता है कि गुलर के पकने के दिनों में इसका एक-दो फल नियमित रूप से दो सफ्ताह तक खाया जाए, तो पुरे वर्ष नेत्र संबंधी रोग नहीं होते हैं।
आइयेे विलुप्त होते गूलर का पौधा अवश्य लगायें।इसका पौधा आसानी से जहां तहां उगे मिल जाते हैं।
अजय कर्मयोगी

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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद