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इंदिरा गांधी की हत्या का राज व भारत में वैश्विक सडयंत्र के काले अध्याय

   


चर्च, ओपस दाई और एनटोइनो
असल सवाल ये है कि कितने जानते हैं कि एंटोइनो अलबिना मैनो कौन हैं, क्या बैकग्राउंड है और राजीव गांधी से इनका अफेयर कितना मासूम था। तीन साल तक चले अफेयर के बाद एंटोइनो का राजीव गांधी से विवाह हुआ। अब आम आदमी के घर में भी कोई प्रेम विवाह होता है तो भी लड़के वाले लड़की के परिवार की और लड़की वाले लड़के के परिवार की थोड़ी बहुत जानकारी तो इकट्ठा कर लेते हैं। और राजीव गांधी तो तत्कालीन प्रधानमंत्री के बेटे थे। एंटोइनो के बारे में जानकारी भारतीय खुफिया एजंसियों ने जुटाई। ऐसी दो फाइलें हैं। एक विवाह के समय की और दूसरी उनके हत्या के बाद की। दोनों में ही कुछ नाम, चेहरे और खिलाड़ी बार आते हैं। विवाह फिर भी हुआ।
फिलहाल शुरुआत करते हैं। पढ़िए।

प्रथम विश्व युद्ध के बाद से तूरिन राजनीतिक गतिविधियों का अड्डा था। यूरोप में उन दिनों कम्युनिज्म रवानी पर था और बहुत से कैथोलिकों को यह लगता था कि फासिस्ट ही उनसे मुठभेड़ कर सकते हैं।  तूरिन भी इसका अपवाद नहीं था। अपने तट पर कम्युनिस्टों के आगमन की आशंका से घबराया हुया तूरिन का नजदीकी कैथोलिक गांव ओर्बास्सानो फासिस्टों के साथ हो लिया। पाउलो मैनो भी इसमें शामिल थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद फासिस्टों का चुन-चुन कर सफाया हुआ। लेकिन पाउलो मैनो के सिर पर चर्च का हाथ था। वेटिकन ने मामले में सीधे हस्तक्षेप किया और पाउलो से जुड़े सारे दस्तावेज अपने पास मंगा लिए। आगे चलकर यह सत्य भी स्थापित हुआ कि पाउलो के एक रहस्यमय चाचा वेटिकन की अति गोपनीय खुफिया एजेंसी ओपस दाई के एजेंट थे। पाउलो मैनो एक कंस्ट्रक्शन इंजीनियर थे और उनकी जमा पूंजी मामूली थी। बच्चों को पालना मुश्किल हो रहा था उनके लिए, उन्हें विदेश भेजना तो दूर की कौड़ी थी। लेकिन वो रहस्यमय चाचा जिनका नाम वेटिकन की सभी फाइलों से डिलीट किया जा चुका है, फिर सांता क्लॉज बने और 1960 के दशक में कैंब्रिज में एंटोइनो की पढ़ाई का खर्चा उठाया।
कैंब्रिज पहुंचते ही सोनिया भारतीयों और भारतवंशी छात्रों की गतिविधियों में अत्यधिक रुचि दिखाने लगीं (कारण नहीं पता)। राजीव से मुलाकात भी ऐसे ही एक कार्यक्रम में हुई, किसी कैफे में नहीं जैसा कि बताया जाता है। लेकिन इस दौरान भी वे चर्च और वेटिकन के कुछ तत्वों, खासतौर से जिनका फासिस्ट अतीत था, के संपर्क में लगातार बनी रहीं। एक खुफिया एजेंट ने जब सुश्री एंटोइनो के एक सहपाठी से चर्च और वेटिकन से उनके संबंधों के बारे में पूछा तो उसने बताया कि ये तो नाभिनाल जैसे संबंध थे। दोनों को अलग नहीं किया जा सकता।

1968 में विवाह हुआ। क्या यह प्रेम संबंध पूरी तरह मासूम था या प्रेम उपजाया गया था। इस परिणय के बाद परिवार तीन और निर्णायक घटनाएं घटीं। इन तीनों में गहरे अंतरसंबंध हैं। जैसे लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए पहला कदम, दूसरा कदम, तीसरा कदम जैसे। ये क्या हैं अगली पोस्टों से स्पष्ट होगा। यह ज्यादा विस्फोटक भी होगा।

एक अनुरोध : मामूली सा आदमी हूं, काम का अत्यधिक बोझ है, इसलिए आपकी टिप्पणियों और प्रशंसा का भी उत्तर नहीं दे पाता। यह सिर्फ समयाभाव है। कदापि इसे अहंकार न समझें।

वेटिकन, ओपस दाई और परिवार
पार्ट-2

पहला घटनाक्रम था विवाह। कई संदिग्ध चीजों की अनदेखी की गई जबकि कई इंटेलीजेंस इनपुट थे। दूसरी अहम घटना 23 जून, 1080 को घटी। विमान दुर्घटना में संजय गांधी मारे गए। सारे परिस्थितिजन्य साक्ष्य इसमें किसी साजिश का इशारा करते हैं। लेकिन इसकी जांच के लिए एम, एल, जैन की अध्यक्षता में बने एक सदस्यीय आयोग की रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं हुई।

संजय गांधी 1970 के दशक में सत्ता के असली केंद्र थे। उन दिनों दिल्ली में सत्ता के गलियारे केजीबी और सीआईए की जंग के अखाड़े थे। बड़े नेताओं और नाकरशाहों के इनसे रिश्तों के किस्से उड़ते रहते थे। संजय गांधी उनमें अकेले थे जिन्होंने इन दोनों को पास नहीं फटकने दिया। लेकिन भारतीय खुफिया एजंसियों में उनका हस्तक्षेप कुछ ज्यादा ही था। देश में 1975 एक महत्त्वपूर्ण साल साबित हुआ जब आपात काल लगाया गया। उन दिनों "सोवियत हाइपोथीसिस " की चर्चाएं गर्म थीं। कहा जाता था कि रूस को आपात काल लगने की जानकारी पहले से थी। यह निराधार नहीं थी। अब स्थापित तथ्य है कि आपातकाल लगाने से पहले इंदिरा गांधी ने सोवियत संघ से मंत्रणा की थी। " सोवियत हाइपोथीसिस" को साबित करने के लिए अकाट्य प्रमाण यह है कि सोवियत संघ की बेहद खतरनाक काउंटर इंटेलीजेंस विंग वीकेआर ( Voennaya Kontra Razvedka) की एक अति गोपनीय बैठक दिल्ली में हुई। यह चौंकाने वाली बात थी। लेकिन केजीबी की पहुंच उन दिनों भारत में सर्वव्यापी थी। तमाम कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी, नेता और लेफ्ट लिबरल सेक्यूलर खुल्लमखुल्ला उनका साथ देते थे और उनका कुछ नहीं बिगड़ता था। सारे इंटेलीजेंस इनपुट से लैस वीकेआर के विश्लेषकों ने इस बैठक में खासतौर से संजय गांधी पर चर्चा की। लेकिन वीकेआर के ही एक विश्लेषक ने 1979 में रॉ के एजेंट को कुछ दस्तावेज लीक कर दिए। इन लीक दस्तावेजों के अनुसार संजय गांधी पश्चिमी झुकाव वाले पूंजीवादी थे और अंतत: सीआईए के पाले में जाएंगे।

स्पष्ट था कि संजय गांधी निशाने पर थे। सोवियत इसे बर्दाश्त नहीं कर सकते थे। लेकिन एक बार किसी नतीजे पर पहुंच जाने के बाद केजीबी और खासतौर से वीकेआर कुछ दिनों या महीनों के भीतर एक्शन न ले, यह अविश्वसनीय है। यहां फिर ओपस दाई तस्वीर में आती है। ओपस दाई और केजीबी अक्सर आपसी तालमेल से काम करते थे। अविश्वसनीय भले ही लगे। वीकेआर के चीफ (नास्तिक) जोसेफ स्टाविनोहा पूरी तरह से वेटिकन के प्रभाव में थे। आखिरकार मार्च, 1980 में ओपस दाई ने वीकेआर की सोवियत हाइपोथीसिस पर खुद कार्रवाई का फैसला किया। 23 जून 1980 को संजय गांधी मारे गए।
संजय गांधी की मौत के बाद राजीव गांधी परिवार सहित इंदिरा गांधी के साथ रहने लगे। कुछ ही महीनों में मेनका गांधी को आधी रात को घऱ से बाहर कर दिया।

वेटिकन ओपस दाई और परिवार
पार्ट-3

तीसरा घटनाक्रम

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या हुई। सीधा नतीजा यह निकला कि सहानुभूति लहर पर सवार राजीव गांधी 400 से ज्यादा सीटें जीतकर प्रधानमंत्री बने। इंदिरा गांधी की हत्या सीधे तौर पर  सीधेतौर पर ऑपरेशन ब्लूस्टार का नतीजा थी।
खुला रहस्य यह है कि सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं कनाडा सहित कई और पश्चिमी देश खुलेआम खालिस्तानी आतंकवादियों का समर्थन कर रहे थे।  गुपचुप तरीके से ब्रिटेन व अमेरिका भी इनका समर्थन कर रहे थे। लेकिन एक अंजान तथ्य यह है कि वेटिकन और ओपस दाई भी जमकर खालिस्तानियों के समर्थन में थे। 1980-81 में वेटिकन उन कथित बुद्धिजीवियों के लगातार संपर्क में था जो खालिस्तानी आंदोलन की हिमायत करते थे। वेटिकन का कहना था कि धार्मिक संगठनों में दिलचस्पी रखने का उसका अधिकार है। पुख्ता खुफिया जानकारियां थीं कि ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद वेटिकन हरसंभव तरीके से खालिस्तान समर्थकों की मदद कर रहा था।

उधर, केजीबी लगातार आगाह कर रही थी कि इंदिरा गांधी कई पश्चिमी खुफिया एजेंसियों के निशाने पर हैं और उनकी हत्या की जा सकती है। इसे रोकने के लिए इंदिरा गांधी के सुरक्षा तंत्र मे आमूल बदलाव की जरूरत है। भारतीय खुफिया एजेंसियों ने एक बार उन्हें इस खतरे के बारे में औपचारिक रूप से ब्रीफ किया और दो बार दो अन्य मौकों पर उन्हें स्थिति की गंभीरता समझाई गई। खास बात यह कि उन दिनों इंदिरा गांधी की किचेन कैबिनेट के एक सदस्य और उनके सबसे खासमखास रहे व्यक्ति ने खुफिया एजेंसियों के हर सुझाव का तीखा विरोध किया। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उन पर शक के छींटे तो पड़े लेकिन कुछ ही दिन बाद वे राजीव गांधी के किचेन कैबिनेट में शामिल हो गए और उनके सबसे खासमखास हो गए (उनका नाम स्वयं ही समझ गए होंगे)। हालांकि बाद में खुफिया एजेंसियों को पता चला कि इस बार किचेन कैबिनेट में उनकी भर्ती सोनिया गांधी ने कराई थी।
साभार आदर्श सिंह जी की वॉल से

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