जलियांवाला बाग में हमने कुछ गलत नही किया तो माफ़ी क्यों मांगे। माफ़ी मांगने से हमारे देश का क्रेडिट घटेगा और हमें वित्तीय हानि झेलनी पड़ेगी मार्क फील्ड (विदेश मंत्री , ब्रिटेन) | 11 अप्रैल 2019
आज से 95 साल पहले, 13 अप्रैल
1919 , बैशाखी का दिन , पूरे
पंजाब में उत्सव का माहोल था !
इसी दिन अमृतसर के
जलियांवाला बाग में एक
सभा रखी गई, जिसमें कुछ नेता भाषण
देने वाले थे। इसमें सैंकड़ों लोग ऐसे
भी थे, जो बैसाखी के मौके पर
परिवार के साथ मेला देखने और शहर
घूमने आए थे और सभा की खबर सुन कर
वहां जा पहुंचे थे। करीब 10000 से
20000 लोग वहा पर थे ! आने वाले
वक्त से बेखबर आजादी के ये दीवाने बड़े
ही शांतीपूर्ण तरीके से 'रोवॉल्ट
एक्ट' के
प्रावधानों का जलियावाला बाग
मैदान में विरोध प्रदर्शन कर रहे थे।
विरोध प्रदर्शन के मात्र एक घंटे बाद
ही ब्रिगेडियर जनरल डायर अपने
50 गुरखा और 25 बलूची हथियार
बंद सैनिको के साथ बाग़ में घुस आया|
इस बाग़ में केवल एक
बड़ा दरवाजा था जहाँ पर “डायर”
अपनी सेना के साथ खड़ा था| जनरल
डायर ने देश की आजादी के लिए
शांति से सभा कर रहे निहत्थे
हजारो लोगो पर अंधाधुंध
गोलिया चलाने का आदेश दे दिया। उस
वक़्त 15 मिनट में लगभग 1650
गोलियां दागी गयीं | बाग़ से बाहर
जाने वाले एक मात्र चालू रास्ते पर
खड़े सैनिक गोलियां बरसा रहे थे और
मौके पर में मौजूद आदमी, औरतें और
बच्चे जलियावाला बाग
की ऊँची दीवारें पर चढ़कर बाहर
निकलने की नाकाम कोशिश में
गोलियों का शिकार हो रहे थे। इस
बीच कई आदमियों ने औरतों और
बच्चों की सलामती के लिए अपने सीने
पर भी गोली खाई तो बहुत से
लोगो ने बाग़ के अन्दर ही बने पुराने
कुए में कूद कर अपनी जान बचाने के
प्रयास में अपनी जान दे दी|
अंग्रेजी सेना की कार्रवाई के बाद
दो दिनों तक इन शहीदों के शव
घटना स्थल पर ही पड़े रहे| जिसके
बाद बाग़ से 1200 से 1500
लोगों के शव बरामद किये गए,
जबकि बाग़ के कुँए से कम से कम 120
लाशें निकाली गई| जलियावाला बाग़
में मरने वालों में माँओं के सीने से चिपके
दुधमुँहे बच्चे, जीवन की संध्या बेला में
देश की आज़ादी का सपना देख रहे बूढ़े
और देश के लिए सर्वस्व लुटाने
को तैयार युवा सभी मौजूद थे। इस
घटना में कितने लोग जख्मी हुए और
इलाज के दौरान कितनों ने अपना दम
तोड़ दिया, इसका कोई रिकॉर्ड
नहीं है|
13 अप्रैल 1919 को हुई इस
दर्दनाक घटना ने देश के हर जवान
को झकझोर कर रख दिया था|
इस काण्ड में अपने जीवन न्योछावर
करने वाले शहीदों को ''जनमत''
अश्रुपूर्ण श्रद्दांजिली देता है !
....प्यारे देश के भाइयों .!! ..ये दृश्य " जलियांवाला बाग़ " का है ...अप्रेल का पूरा माह क्रांति की विरासत को समेटे हुए है ..मंगल पाण्डेय की शहादत 8 अप्रेल इसका प्रस्थान बिंदु है ..इसी महान तारीख को भगत सिंह और बटुकेश्वर के धमाको से ' ब्रितानी और उनके पालतू ' बहरों को सुनाने के लिए प्रबल धमाका ' असेम्बली ' को हिला देता है ..वहीं 13 अप्रेल वैशाखी के दिन ब्रिटिश बर्बरता खूंखार भेडियो को मात करती दिखती है ..ये अलग बात की इसका हिसाब उधम सिंह ने बखूबी लिया ..इतिहास का चक्र चल रहा है ..बंगाल के शेरो ने लगभग उसी काल खंड में जब भगत सिंह ,बटुकेश्वर दत्त , सुखदेव , राजगुरु ,सुप्रीम कमांडर आजाद उत्तर भारत में अपने शौर्य और बलिदान से भारत -भूमि को रक्त का तर्पण दे रहे थे ...बंगाली युवाओं ने ब्रिटिश हुक्मरानों को जबरदस्त ठोकरें मारी ..' अग्नि युग ' नाम ही पड गया उस काल खंड का ..' मास्टर दा ' की क्रांति चेष्टा और ' जलालाबाद के युद्द ' भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ हैं ..लेकिन सब कुछ एक ' साजिश ' के तहत छुपाया गया ....ताकि देशभक्तों का इतिहास हमें ' प्रेरित ' न कर दे ..जाती -धर्म - भाषा और क्षेत्र के नाम पर घिनौनी राजनीती कथित ' आजाद ' भारत को एकजुट ना कर दे .." सर्वाधिक महत्वपूर्ण कुंवर सिंह " जिन्होंने आजीवन मुक्त रहते हुए ब्रिटिश कुत्तों के नामी जनरलों को ठोकरों पर रखा ..सभी कुछ इसी " महान अप्रेल " की जीवंत घटनाएँ हैं ..क्रमशः ..पूरी कोशिश होगी की हम अपनी महानता की अनमोल विरासत को संजोये और आगे बढाए .... हमें अपने आदर्शों को पुनर्जीवित करना है ,,, सहमत हैं ??? ..जयहिंद .!!!


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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद