Skip to main content

जिस जंगल मे tribal जीवन व्यतीत कर हमारे पूर्वज धर्मग्रंथों की रचना करते हैं ; अब यही tribal ईसाई बनाए जा रहे हैं ,

जिस जंगल मैं हमारे ऋषि मनीषी श्रेष्ठ शास्त्रों की रचना कर रहे थे अब वही जंगल के बनवासी भाई ईसाई बनाए जा रहे हैं
जिस देश की संस्कृति अरण्य संस्कृति रही है वहीं आज इन्हें पिछड़ा और एसटी वर्ग का बनाकर हीनता के पराकाष्ठा को वैचारिक स्तर पर डालकर इन्हें ईसाइयत की तरफ मोड़ने का काम ये तथाकथित आज के दलित चिंतक इस काम में लगे हुए हैं

संवैधानिक व्यवस्था में सबसे नीचे अनुसूचित जाति / जनजाति में आती है यह #रिसले महात्मा के पैदा होने से पहले एक प्रतिष्ठित इज़्ज़तदार समुदाय या वंश होता था जो तालाब जलाशय खोदने और रखरखाव की विद्या में माहिर था

आपने इतिहास में रानी #दुर्गावती का नाम सुना होगा वह इसी समुदाय से आती थी उन्होंने बहुत कम समय के सत्ता काल में ही पूरे क्षेत्र को अनेक जलाशय और तालाबों से भर दिया था

यह साक्ष्य एक पुस्तक से परस्तुत कर रहा हूँ मुग़लों के आक्रमण से बचे खुछे सामर्थ्य को भी जब गोरंग प्रभुओ ने सारे कारोबार चौपट करने के उपरांत राजाओं की स्थिति दयनीय हो गयी उसके बाद शौच और सुचिता से वंचित होकर यही गोंड समुदाय अछूत हो गया जबकि यह जलदाता हुआ करता था राजघराने से अनुसूचित जाति और जनजाति के सफ़र के किए किसको दोष दिया जाय ?

जिसने काम धंधा छीन कर बेरोज़गार बनाकर आपको दरिद्र और अछूत बनाया या जिन्होंने शौच और सुचित्रा से विमुक्त होने के कारण आपके हाथ का जल ग्रहण नहीं किया , और बाद में उन्ही बर्बर ईसाईयो को भगवान की तरह प्रस्तुत कर कुछकपटी कुटिल वामपंथियों और संविधान निर्माता ने आजीवन दलित होने के लिए क़ानून बनाया

जिसके परिणाम स्वरूप यह समाज से आज भी कटे हैं और ख़ुद को नीच समझने को मजबूर भी

मेरा सवाल यह की इनको यह इतिहास क्यूँ नहीं पढ़ाया जाना चाहिए की उनके पूर्वज नीच दलित ना होकर जलदाता थे बल्कि राजघराने के मालिक भी

#रानी_दुर्गावती का संक्षिप्य इतिहास प्रस्तुत कर रहा हूँ सायद समझने में मदद मिले (१५५०-१५६४)

रानी दुर्गावती गोंडवाना के राजघराने चंदेल वंश की थी (वर्तमान गोंडा उत्तर प्रदेश )यह पूरा गोंड समुदाय क्षत्रिय हुआ करता था गोंडवाना के लोग गोंड कहलाते थे जैसे पालीवाल के लोग पल्ली या पालीवाल मात्र १० वर्षों से कम का सत्ता काल रहा है रानी दुर्गावती का जब तक की महमूद गजनी  का आक्रमण नहीं हुआ था

उस युद्ध में लड़ते हुए जब उनकी चोटी सी सेना परास्त होने लगी तो उनके महावत ने सुझाव दिया की आप रणभूमि छोड़कर अपने प्राणो की रक्षा करे परंतु रानी ने अपनी छोटी तलवार (छोटी तलवार या चाकु ) निकालकर ख़ुद को बलिदान कर दिया ताकि वह मुग़लों के हाथ ना लगे ऐसे महान योद्धा और महान समुदाय को दलित महादलित शब्द का सम्बोधन देने के बजाय उनके गौरवान्वित इतिहास से परिचय करवाने की आवयकता है

इस दस वर्ष के छोटे से साशन काल में उत्तर प्रदेश की चोटी सी विरासत की मल्लिका और उनके गोंड समुदाय ने भारत भर में और विशेष कर राजस्थान के मरुथल भूमि से गुजरात के मरुथल तक जलाशय बनाने का कार्य सम्पन्न किया

राजघराना मुग़लों के अधीन जाने के बाद भी उन्होंने इस्लाम ना स्वीकार कर उनके मैले ढोये और भंगी /नीच कहलाए परंतु धर्म ना बदला बचे लोगों ने जलाशय निर्माण और रखरखाव का कार्य गोरंग ईसाइयों के आने तक यह कार्य जरी रखा

परंतु अंग्रेज़ आक्रांताओं के आने के बाद जलाशय बनवाने वाले मिटते गए और जितना दूषित जलाशय हुआ उससे ज़्यादा दूषित समाज हमारे बीच में हैं

क्या वह गोंड समुदाय दलित और नीच या अनुसूचित जाती या जन जाति कहलाने के लायक है इस विषय पर शोधरत डॉक्टर Tribhuwan Singh सर कहते हैं की अभी तक अनुसूचित जाति / जनजाति परिभाषित नहीं है या तो आप हमारा कहा मान लीजिए और साथ में आयिए या फिर विरोध का साक्ष्य और इन जातियों की संवैधानिक व्याख्या कीजिए

#जात या #जाति

शूद्र हमारे हैं दलित किसके #भाग_४ :

भाग तीन तक यही निष्कर्ष निकल है की जात माने सामान्य जन्म जैसे की सबका होता सारे मनुष्य योनि के लोगों का सामान्य जन्म है अब किसी का असामान्य है तो उसका कुछ नहीं कर सकटे हैं

फिर जब सबका सामान्य जन्म है तो सब समान ही होने चाहिए तो सवर्ण अवर्ण कहाँ से आए कौन से ग्रंथ से किस पण्डि जी की पैदाइस है यह या पण्डि जी लोगों के अलावा भी ज्ञान हनता लोग धरती पर प्रकट हुए जिन्होंने यह टर्मिनॉलॉजी गाढ़ी ।

इन सब में सबसे बड़ी बात सवर्ण की व्याख्या .............

क्या आधार रहा जो तीन वर्णों को सवर्ण की श्रेणी में और चौथे सबसे महत्वपूर्ण अर्थ के जनक वर्ण को अवर्ण ( दलित , पिछड़ा , अनुसूचित जाति जन जाति ) में रखा गया !

डॉक्टर Tribhuwan Singh जी अनेक किताब और ग्रंथ का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं

राम श्याम वर्ण के थे और लक्ष्मण गौर वर्ण के ।

ईसाई विद्वानों वामपंथी कपटी मुनियों और दिव्यांग दलित चिन्तको के मत से राम असवर्ण थे, लक्ष्मण सवर्ण :

------------------------ ----------------------------------------------

सवर्ण अवर्ण और असवर्ण की खोज

वर्ण का अर्थ चमड़ी का रंग होता है , ये ईसाई संस्कृतज्ञों ने हमे पढ़ाया था / लेकिन आज एक नई जानकारी कि caste का अर्थ भी चमड़ी का रंग होता है , एक ईसाई संस्कृतज्ञ के मुह से सुनें /

1776 के अमेरिका के स्वतंत्रता संग्राम के बाद ब्रिटेन का अमेरिका में लूटी जा रही धनसम्पत्ति से हिस्सा मिलना बंद हो गया ।उसके बाद अमेरिका में बसने वाले ईसाई यूरोप के गोरे ईसाई थे । उनको अपने सफ़ेद रंग पर इतना घमंड था कि भारत के 1947 में आजादी के 13 साल बाद  1960 तक,  #काले और #गोरों को स्कूल और बसों में,  अलग अलग ग्रुप में रहने को बाध्य किया जाता था । जिसको हम अखबारों के जरिये #रंगभेद या Apartheid के नाम से जानते थे / इसका सबसे वीभत्स रूप डच और ब्रिटिश शासन मे अफ्रीका मे देखने को मिला /

जबकि भारत में चमड़े के रंग और रूप का कोई महत्व नहीं रहा कभी भी वरना #अष्टवक्र राजा #जनक के गुरु न हुए होते और #वेद_व्यास कुरु राज्य के गुरु न रहे होते ।भारत के  पूज्य  आदर्श  राम और  कृष्ण   #श्याम  वर्ण  के   ही   थे/

लेकिन जब यूरोप ने पूरे विश्व को गुलाम बना लिया तो चमड़े के रंग और वाह्य शारीरिक संरचना के आधार पर,  बाइबिल के थेओलॉजी के अनुसार दुनिया के लोगो को विभिन्न समूहों और नश्लों में बांटा , जिसका परिणाम भारत आज भी भुगत रहा है ।।।

र्जॉन मुइर जो एक ईसाई विद्वान था , जो 19 साल की उम्र में भारत आता है इंडियन सिविल सर्विसेज में , और जो इलाहाबाद  और फ़तेहपुर  में अंग्रेजी सरकार मे एक ऑफिसर  था ,वही  जॉन मुइर 29  साल की उम्र में मत्परीक्षा नामक एक पुस्तक लिखता है, और ईसाइयत को हिंदूइस्म से श्रेष्ठ साबित करता है / सरकारी नौकरी में रहते हुए वो संस्कृत का इतना बड़ा विद्वान बन जाता है कि " ओरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट्स " नामक एक किताब लिखता है , जिसका डॉ आंबेडकर ने अपनी पुस्तक "शूद्र कौन थे " , में बहुतायत रूप से उद्धृत किया है /

उसी पुस्तक के पार्ट -२ सी कुछ ओरिजिनल टेक्स्ट्स पेश करा रहा हूँ , अंग्रेजी में जिसको कहते है - " Right From Horses mouth "---

"ये नॉन आर्यन नश्ल के लोग अमेरिका के रेड इंडियन कि तरह कमजोर नश्ल के थे / दूसरी तरफ Arians ज्यादा organisesed enterprising और creative लोग थे, धरती पर अर्वाचीन जन्म लेने वाले ज्यादा सुदृढ़ पौधे और जानवरों कि तरह वे ज्यादा सुदृढ़ लोग / अंततः दो विपरीत राजनैतिक लोगों की तरह ही अलग दिखने वाले / तीन ऊपरी वर्गों को जिनको द्विज या आर्य के नाम से भी जाना जाता है , एक अलग विशेष क्लास के लोग / Arian इस तरह से एक सुपीरियर और विजेता नश्ल साबित हुई / इसको सिद्ध करने के लिए complexion को एक और सबूत के तौर पर जोड़ा जा सकता है / ( यही 3 तथाकथित वर्णो को सवर्ण मान लिया गया/ जाति के क्रम मे भी इन्हे ऊंची जाति के नाम से जाना जाता है आज / बाकियों को शूद्र मानकर उनको OBC SC और ST मे विभाजित कर दिया गया )

संस्कृत में Caste को मूलतः रंग (कलर ) के नाम से जाना जाता है / इसलिए caste उनके रंग (चमड़ी के रंग ) से निर्धारित हुई / लेकिन ये सर्विदित हैं कि ब्राम्हणों का रंग शूद्र और चाण्डालों से ज्यादा फेयर था / इसी तरह क्षत्रियों और वैश्यों के भी इसी तरह फेयर complexion रहा होगा /

इस तरह हम इस निर्णय पर पहुंचते हैं कि कि एरियन -इंडियन मूलतः काले मूल निवासियों से भिन्न थे; और इस अनुमान को बल मिलता है कि वे किसी उत्तरी देश से आये थे /

अतः एरियन भारत के मूल निवासी नहीं थे बल्कि किसी दूसरे देश से उत्तर (भारत) में आये , और यही मत प्रोफेसर मैक्समूलर का भी है / "

From- Original Sanskrit Texts Part Second P. 308-309 ; by John Muir

जो संस्कृत विद्वान वर्ण और caste के भेद को भी नहीं समझ सकते /वो चमड़ी के रंग के आधार पर सवर्ण अवर्ण  और असवर्ण जैसे शब्दों से समाज को विभाजित करते है , उन्होंने किस संस्कृत ग्रन्थ को पढ़कर ये वाग्जाल फैलाया है ??

आप स्वयं देख सकते हैं कि रंगभेद के चश्मे से दुनिया को बांटने वाले और गुलाम बनाने वाले , 1500 से 1800 के बीच अमेरिका के 200 million मूल निवासी रेड इंडियन का क़त्ल करने वाले ईसाई विद्वान कितने शाश्त्रों का अध्यन कर इस निर्णय पर पहुंचे है ?

आजकल ईसाइयत फैलाने के लिए एक नयी शाजिश ये ईसाई फिर रच रहे है - AFRO_DALIT प्रोजेक्ट के नाम से , जिसके भारत के न जाने कितने क्षद्म ईसाई , दलित के वेश मे इस कार्य को आगे बढ़ा र्हए हैं / इन्ही संस्कृतज्ञ ईसाई विद्वानो के गढे  हुए कुतर्कों के अनुवादों के अनुवादों के अनुवाद को  आधार बना कर जब डॉ आंबेडकर "शूद्र कौन थे " की  खोज में वेदों कि सैर पर निकल जाते हैं , तो उनकी मंशा पर उंगली उठे न उठे लेकिन उनके सूचना के श्रोतों की विश्वसनीयता पर प्रश्चिन्ह अवस्य लग जाएगा /

जिस देश के भगवान राम कृष्ण और शंकर श्याम वर्ण के हों वहां डार्क complexion के आधार पर सिर्फ ईसाई संस्कृत विद ही बाँट सकते है।शंकर जी अर्जुन को एक किरात के वेश मे दर्शन देते हैं जब वह वनवास के समय आयुध की खोज मे जाते हैं / हमारे ऋषि मुनि यहाँ तक कि मनुस्मृति के रचनाकार जंगल मे tribal जीवन व्यतीत कर धर्मग्रंथों की रचना करते हैं ; अब यही tribal ईसाई बनाए जा रहे हैं , अंग्रेजों की कार्यपद्धति को अपनाकर /

संस्कृत ग्रंथों में तो इसका कहीं जिक्र मिलता नहीं / ??

अनुमानों पर आधारित बायस्ड उनपढ़ कुतर्की और कट्टर  ईसाई संसकृतविदो  को आधार बनाकर लिखा गया भारत का इतिहास हम ढो रहें हैं न जाने कितने वर्षों से।

गलती उसकी नहीं थी जिसने इस कपोल कल्पना से भरी पुस्तक को #ओरिजिनल_संस्कृत_टेक्स्ट लिख के पेश किया।

गलती उनकी है जो इसको ओरिजिनल मान बैठे और उन  Bigot ईसाइयों  के फैलाये जाल में भहरा के गिर पड़े।

जब गीता कहती है

चातुस्वर्ण मया शृष्टि  गुण कर्म विभागसह : अर्थात गुण और कर्म के अनुसार जो मनुस्य जो कार्य करेगा उसी वर्ण मे उसको वर्गीकृत किया जाएगा / आज उसको एप्टिट्यूड टेस्ट के नाम से जाना जाता है , कि कौन सा बच्चा किस प्रॉफ़ेशन के लिए फिट है ?

देश का आज तक का सबसे विद्वान ब्रम्हाण और अर्थशास्त्री कौटिल्य उसको कहता है - शुश्रूषा वार्ता कारकुशीलम शूद्रस्य कर्मम / वार्ता विद्या का एक अंग है : अंवीछकी त्रयी वार्ता दंडनीति इति विद्या / ये विद्या की कौटिल्य की परिभाषा है /

तो डॉ आंबेडकर और दलित साहित्य में शूद्रों को menial जॉब अलॉट करने का काम मुइर जैसे Bigot ईसाई की ओरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट से पढ़कर लिखा होगा।

आंबेडकर साहित्य में वर्णित सवर्ण अवर्ण और असवर्ण की खोज इन्ही ईसाई bigot विद्वानों की रंगभेद और रंग से जुड़े उनके पूर्वाग्रह से उपजे शब्द है / क्योंकि कुछ शब्द तो संस्कृत में हैं भी नहीं जैसे अवर्ण / सवर्ण और असवर्ण शब्द जरूर हैं लेकिन वो उन अर्थों में प्रयुक्त नहीं होते जिन अर्थों में इन संस्कृत विदों ने प्रयोग किया हैं , और जहाँ से डॉ आंबेडकर ने कॉपी पेस्ट किया है /

वर्ण और कास्ट को चमड़ी के रंग से परिभाषित करने वाले लोग बाइबल के Genesis मे नोह द्वारा Ham को दिये श्राप से उद्धृत है जिसको ईसाई थेओलोगीस्ट ऑर्गन ने तीसरी शताब्दी मे प्रतिपादित किया

Popular posts from this blog

उच्च प्रतिभा के धनी और गणित के विद्वानों के लिए ही यह पोस्ट भारत की गौरवशाली अतीत का

      गणित के विभिन्न क्षेत्रों में भारत का योगदान प्राचीनकाल तथा मध्यकाल के भारतीय गणितज्ञों द्वारा गणित के क्षेत्र में किये गये कुछ प्रमुख योगदान नीचे दिये गये हैं- आंकगणित : दाशमिक प्रणाली (Decimal system), ऋण संख्याएँ (Negative numbers) (ब्रह्मगुप्त देखें), शून्य (हिन्दू अंक प्रणाली देखें), द्विक संख्या प्रणाली (Binary numeral system), स्थानीय मान पर आधारित संख्या आधुनिक संख्या निरूपण, फ्लोटिंग पॉइंट संख्याएँ (केरलीय गणित सम्प्रदाय देखें), संख्या सिद्धान्त , अनन्त (Infinity) (यजुर्वेद देखें), टांसफाइनाइट संख्याएँ (Transfinite numbers), अपरिमेय संख्याएँ (शुल्बसूत्र देखें) भूमिति अर्थात भूमि मापन का शास्त्र : वर्गमूल (see Bakhshali approximation), Cube roots (see Mahavira), Pythagorean triples (see Sulba Sutras; Baudhayana and Apastamba state the Pythagorean theorem without proof), Transformation (see Panini), Pascal's triangle (see Pingala) बीजगणित: Quadratic equations (see Sulba Sutras, Aryabhata, and Brahmagupta), Cubic equations and Quartic equations (b...

bhu के संस्थापक मदन मोहन मालवीय की आत्मा क्यों कराह रही है

    प्रश्न यह है कि फिरोज कोई, ऐसे थोड़े झोला उठाकर बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में प्रवेश कर दिया है उसके लिए बकायदा नियम कानून और यहां के बुद्धिजीवियों के और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के सारे मापदंडों को पूर्ण करते हुए वह यहां तक पहुंचा है। प्रश्न यह है कि यह ऐसा नियम कानून और मापदंड स्थापित करने वाले कौन हैं जो भारत की अस्मिता को समाप्त करना चाह रहे हैं जो भारत की सनातन परंपरा को नष्ट करना चाह रहे हैं हालांकि गलती तो उसी समय हो गई थी जब अपनी गुरुकुल व्यवस्था का त्याग करके और अंग्रेजों की आधुनिक शिक्षा के माध्यम से एक बड़ा संस्थान बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी बनाई गई है उसी समय इस सनातन परंपरा के नष्ट होने का बीज डाल दिया गया था यह तो अब उसके फलअश्रुति हैं हम लोग केवल परिणाम पर छाती कूटते हैं कारण और निवारण पर कोई ध्यान नहीं रहता है  बोय पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय कहीं यही हालत राम मंदिर निर्माण का भी ना हो इसलिए सजगता आज से ही जरूरी है और श्रेष्ठ परंपरा के वाहक तेजस्वी पुरुष चयन अगर हो पाता है तू ही विश्व गुरु भारत के संकल्पना साकार हो सकती है नहीं तो अपने अपने पा...

Newziland,Britain apply Sanskrit teaching for smartness

   जब हमारे श्रेष्ठ भारत का नाम कहीं बदनाम होता है।क्या बतायें जब शिक्षित वेश्यावृत्ति करता है बस ह्रदय दुखता है।क्योंकि कुछ ही दसक पहले हमारे यहां7लाख 32हजार गुरूकुल हुआ करते थे।समस्त संसार की मानव जाति हमसे ही सीखती थी कि शिक्षा क्या होती है।और अब हम अपनी मानसिकता से इतना विकृत हो चुके हैं कि क्या बतायें कुछ कहते नहीं बनता।पर इतना जरूर कहूंगा हमारे भारत की मूल गुरुकुल शिक्षा ही सभी समस्याओं  से   मुक्त करती है व मानव को महामानव बनाती थी। एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान     विश्व हिन्दी दिवस प्रति वर्ष 10 जनवरी को मनाया जाता है. इसका उद्देश्य विश्व में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए जागरूकता उत्पन्न करना तथा हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करना है. अजय कर्मयोगी: https://m.youtube.com/watch?v=JixMEQ2kehU   , https://m.youtube.com/watch?v=JseQIWhJ7xk  , https://m.youtube.com/watch?v=JixMEQ2kehU  ,  https://m.youtube.com/watch?v=IFmv2YFApQk                 ...