400 वर्ष पूर्व जब ईस्ट इंडिया कंपनी के तथाकथित व्यापारी भारत आये तो वे भारत से सूती वस्त्र, छींटज़ के कपड़े, सिल्क के कपड़े आयातित करके ब्रिटेन के रईसों और आम नागरिकों को बेंचकर भारी मुनाफा कमाना शुरू किया।
ये वस्त्र इस कदर लोकप्रिय हुवे कि 1680 आते आते ब्रिटेन की एक मात्र वस्त्र निर्माण - ऊन के वस्त्र बनाने वाले उद्योग को भारी धक्का लगा और उस देश में रोजगार का संकट उतपन्न हो गया।
इस कारण ब्रिटेन में लोगो ने भारत से आयातित वस्त्रों का भारी विरोध किया और उनकी फैक्टरियों में आग लगा दी।
अंततः 1700 और 1720 में ब्रिटेन की संसद ने कैलिको एक्ट -1 और 2 नामक कानून बनाकर ब्रिटेन के लोगो को भारत से आयातित वस्त्रों को पहनना गैर कानूनी बना दिया।
1757 में यूरोपीय ईसाईयों ने बंगाल में सत्ता अपने हाँथ में लिया, तो उन्होंने मात्र जमीं पर टैक्स वसूलने की जिम्मेदारी ली, शासन व्यवस्था की नहीं। क्योंकि शासन में व्यवस्था बनाने में एक्सपेंडिचर भी आता है, और वे भूखे नँगे लुटेरे यहाँ खर्चने नही, लूटने आये थे। इसलिए टैक्स वसूलने के साथ साथ हर ब्रिटिश सर्वेन्ट व्यापार भी करता था, जिसको उन्होंने #प्राइवेट_बिज़नेस का सुन्दर सा नाम दिया। यानि हर ब्रिटिश सर्वेंट को ईस्ट इंडिया कंपनी से सीमित समय काल के लिये एक कॉन्ट्रैक्ट के तहत एक बंधी आय मिलती थी, लेकिन प्राइवेट बिज़नेस की खुली छूट थी ।
परिणाम स्वरुप उनका ध्यान प्राइवेट बिज़नस पर ज्यादा था, जिसमे कमाई ओहदे के अनुक्रम में नहीं , बल्कि आपके कमीनापन, चालाकी, हृदयहीनता, क्रूर चरित्र, और धोखा-धड़ी पर निर्भर करता था । परिणाम स्वरुप उनमें से अधिकतर धनी हो गए, उनसे कुछ कम संख्या में धनाढ्य हो गए, और कुछ तो धन से गंधाने लगे ( stinking rich हो गए) । और ये बने प्राइवेट बिज़नस से - हत्या बलात्कार डकैती, लूट, भारतीय उद्योग निर्माताओं से जबरन उनके उत्पाद आधे तीहे दाम पर छीनकर । कॉन्ट्रैक्ट करते थे कि एक साल में इतने का सूती वस्त्र और सिल्क के वस्त्र चाहिए, और बीच में ही कॉन्ट्रैक्ट तोड़कर उनसे उनका माल बिना मोल चुकाए कब्जा कर लेते थे।
अंततः भारतीय घरेलू उद्योग चरमरा कर बैठ गया, ये वही उद्योग था जिसके उत्पादों की लालच में वे सात समुन्दर पार से जान की बाजी लगाकर आते थे।क्योंकि वहां से आने वाले 20% सभ्य ईसाई रास्ते में ही जीसस को प्यारे हो जाते थे।
ईसाई मिशनरियों का धर्म परिवर्तन का एजेंडा अलग से साथ साथ चलता था।
इन अत्याचारों के खिलाफ 90 साल बाद 1857 की क्रांति होती है, और भारत की धरती गोरे ईसाईयों के खून से रक्त रंजित हो जाती है ।
हिन्दू मुस्लमान दोनों लड़े ।
मुस्लमान दीन के नाम, और हिन्दू देश के नाम ।
तब योजना बनी कि इनको बांटा कैसे जाय। मुसलमानों से वे पूर्व में भी निपट चुके थे, इसलिए जानते थे कि इनको मजहब की चटनी चटाकर , इनसे निबटा जा सकता है।
लेकिन हिंदुओं से निबटने की तरकीब खोजनी थी।
1857 के 30 साल बाद मैट्रिक पास जर्मन ईसाई मैक्समुलर को प्लांट करते है ब्रिटिश इस काम के लिए, जिसने अपनी पुस्तक लिखने के बाद अपने नाम के आगे MA की डिग्री स्वतः लगा लिया ( सोनिया गांधी ने भी कोई MA इन इंग्लिश लिटरेचर की डिग्री पहले अपने चुनावी एफिडेविट में लगाया था)। 1900 में उसके मरने के बाद उसकी आत्मकथा को 1902 में पुनर्प्रकाशित करवाते समय मैक्समुलर की बीबी ने उसके नाम के आगे MA के साथ पीएचडी जोड़ दी।
अब वे फ़्रेडरिक मष्मील्लीण (Maxmillian) की जगह डॉ मैक्समुलर हो गए। और भारत के विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर लोग आज भी उनको संदर्भित करते हुए डॉ मैक्समुलर बोलते हैं।
इसी विद्वान पीएचडी संस्कृतज्ञ मैक्समुलर ने हल्ला मचाया किभारत में #आर्यन बाहर से आये - Nomads। आर्यन यानि तीन वर्ण - ब्राम्हण , क्षत्रिय , वैश्य, जिनको बाइबिल के सिद्धांतों को अमल में लाते हुए #सवर्ण कहा गया।
जाते जाते ये गिरे ईसाई लुटेरे तीन वर्ण को भारतीय संविधान में तीन उच्च (? Caste) में बदलकर संविधान सम्मत करवा गए।
आज तक किसी भी भारतीय विद्वान ने ये प्रश्न नही उठाया कि मैक्समुलर कभी भारत आया नहीं, तो उसने किस स्कूल से, किस गुरु से समस्कृत में इतनी महारत हासिल कर ली कि वेदों का अनुवाद करने की योग्यता हसिल कर ली।
हमारे यहाँ तो बड़े बड़े संस्कृतज्ञ भी वेदों का भाष्य और टीका लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।
भारत में बरसों तक प्रचलित रहे मिथकों में से एक था “आर्यन इन्वेशन थ्योरी”। पहले तो जिसने ये थ्योरी दी उसी ने रिजेक्ट कर दी। उसके बाद इसके लिए कोई साक्ष्य भी नहीं मिले, इसलिए भी इसे बनाए रखना मुश्किल हुआ। इस थ्योरी को अम्बेडकर ने भी सिरे से ख़ारिज कर दिया था। इसके साथ साथ अम्बेडकर नाक की माप के आधार पर बनाई जातियों वाली “नेसल इंडेक्स थ्योरी” को भी ख़ारिज करते थे। अजीब सी बात है कि आज खुद को अम्बेडकरवादी बताने वाले कई लोग इस “आर्यन इन्वेशन थ्योरी” के मिथक में यकीन करते हैं।
उनमें से कुछ तो ऐसे हैं कि सीधा संसद में ऐसे “मिथक” का प्रचार करते हैं। अब बहस संसद में थी इसलिए उसपर कोई कार्यवाही नहीं हो सकती। यही दूसरे “मिथक” की याद दिला देता है। इस दूसरे “मिथक” में कहा जाता है कि कानून की नजर में सभी भारतीय नागरिक बराबर है! अगर ये “मिथक” सच होता तो जिस बात के लिए मेरे ऊपर एक असंवैधानिक काले कानून के जरिये मुकदमा हो सकता है, वैसे ही सांसद पर भी लागु होते। ऐसे ही मिथकों में से एक ये भी है कि अमीर व्यापारियों पर टैक्स लगाकर गरीबों तक पैसा पहुँचाया जायेगा!
टैक्स के नियम एक वेतनभोगी और एक व्यापारी के लिए ठीक उल्टे होते हैं। एक नौकरीपेशा आदमी के लिए उसकी तनख्वाह वो रकम है जो टैक्स काट कर मिलती है। उसपर टीडीएस यानि टैक्स डिडकटेड एट सोर्स लगता है। व्यापारी पूरे साल खर्च करने के बाद दिखाता है कि उसके पास मुनाफा बचा, वो उस मुनाफे पर टैक्स देता है। जैसे ही उसे लगेगा कि उसे ज्यादा मुनाफा हो गया है, वो उस मुनाफे के पैसे को पहले ही अपने ऑफिस के लिए कंप्यूटर/एसी लेकर या कंपनी के डायरेक्टर (खुद) के लिए कार लेकर खर्च कर दे तो कौन सा बढ़ा हुआ टैक्स उसपर लागू होगा? जीएसटी में लगातार टैक्स भरते रहने के कारण मुनाफे को रोककर उसे बाद में खर्च दिखा देना मुश्किल होता है। इसलिए भी जीएसटी से दिक्कत है।
कल पटना लिटरेचर फेस्टिवल में श्री नरेन्द्र कोहली जी की चर्चा का विषय “आधुनिकता” और “मिथक” पर बातचीत था। उन्होंने शुरुआत एक प्रचलित “मिथक” से की जिसके मुताबिक कहा जाता है कि हिन्दी के पाठक घटते जा रहे हैं। उन्होंने पूछा कि इसकी जांच के लिए कौन से सर्वेक्षण करवाए गए? कैसे पता चला कि हिन्दी के पाठक पहले ज्यादा थे और अब कम? प्रकाशकों की गिनती हर साल बढ़ती ही है, उनके बंगले ऊँचे होते जाते हैं, उनकी अगली पीढ़ियाँ इसी व्यवसाय में आ रही हैं। जाहिर है कि सच्चाई, पाठकों के कम होने वाले “मिथक” से कहीं कोसों दूर खड़ी है।
बाकि उन्होंने इससे आगे भी काफी कुछ कहा था, जिसका जिक्र हम जाने दे रहे हैं। आनन्द कुमार यदि आप यह पुस्तक पढ़ेंगे तो आपको अनेक आश्चर्यजनक तथ्य मिलेंगे।
कोलम्बस जब भारत को खोजते हुए अमेरिका पहुंचा तो वहां की आबादी 100 मिलियन थी।
आज वहां के मूलनिवासियों की संख्या एक मिलियन बची है।
विश्व को यह पूंछने का अधिकार नही है कि तुम्हारे पूर्वजों ने उन इंडियंस के साथ क्या किय्या ?
ह्यूमन राइट का झंडा उठाये इन पशुवों से भी बदतर मानव भेड़ियों ने जीसस के नाम पर मनुष्यता की क्रूरता पूर्वक हत्या की।
क्या भारतीय बुद्धिवीरों को #प्रिंट_इट_टू_इंप्रिंट_इट की नीति का व्यवहारिक प्रयोग कर इनके धर्मपुस्तकों के हिंसक और घृणा फैलाने तथा दूसरों की धन संपत्ति और भूमि पर कब्जा करने के दिये गए निर्देशों और उसके अनुपालन में वेस्टर्न ऑफशूट देशों - अमेरिका न्यूजीलैंड,कनाडा आदि पर कब्जा किये जाने की सच्चाई का नैरेटिव नहीं लिखना चाहिए ।
मैं अब समझ सकता हूँ कि #Vine_deloria , जब एक प्रसिद्ध dakota ( अमेरिकन मूल प्रजाति) शिक्षक, दार्शनिक और अधिवक्ता कहता है -" क्रिस्चियन देशों का और क्रिश्चियन लोगों का व्यक्तिगत ट्रैक रिकॉर्ड इतना सुंदर नहीं है कि कोई गम्भीरता से क्रिश्चियन बनने की सोचे। पोप से लेकर दरिद्र ईसाई तक, प्रोटेस्टेन्ट से कैथोलिक्स तक, कांस्टेण्टीनेपोल से लेकर यूनाइटेड स्टेट्स तक, इनका इतिहास यातनाओं, झूंठ, persecution , नरसंहार और अत्याचारों की घटनाओं से इस तरह पटा पड़ा है जो नॉन क्रिस्चियन के दिलो दिमाग में सिहरन पैदा करता है"।
लेखक : #Deloria 1992: 189
नोट: गूगल करके या अन्य पुसतकों से अन्य संदर्भ प्रस्तुत कर पोस्ट को समृद्ध कीजिये।
Deloria का लिंक
https://en.m.wikipedia.org/wiki/Vine_Deloria_Jr.
#रेपोस्ट:
आर्य कौन हैं ?
आर्य की परिभाषा क्या है ?
क्या आर्य एक रेस है ?
इस पर समाजविज्ञानी जो कुतर्क गढ़ते रहते हैं , मैक्समूलर जैसे झोलाछाप संस्कृतज्ञ और bigot इसाई द्वारा फैलाये गए भ्रम जाल को पूरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने संस्कृत ग्रंथों से किस तरह मिथ्या प्रमाणित किया है , उसे देखें ।
----------------------------------------------------------
" कर्तव्यम् आचरन् कार्यम् अकर्तव्यम् अनाचारन् तिष्ठति प्रकृत आचारे स वा आर्यम् इति स्मृतः " ।
"न यो ररे आर्यम् नाम दस्यवे" ।
(ऋक् शा. संहिता 10.49.3)
अर्थात :
शाश्त्र निन्दित अकर्तव्य का अनाचरण करने वाले , और कर्तव्य का पालन करने वाले , अर्थात विवेक का सर्वथा समादर करते हुए ही व्योहार करने वाले #आर्य कहे जाते हैं ।
सनातन शाश्त्र में आर्य पद श्रेष्ठ कर्म वाले व्यक्तियों के लिए प्रयोग किया जाता है , न कि संस्कारविहीन दस्युओं के लिए ।
आर्यता नाम भूतानाम यः करोति प्रयत्नतः ।
शुभम् कर्मं निराकारो वीत रागः तथैव च ।।
(महाभारत शांतिपर्व 162.18)
अर्थात :
जो मनुष्य अपने को प्रकट न करके प्रयत्नपूर्वक प्राणियों की भलाई का काम करता रहता है , उसके उस श्रेष्ठ भाव और आचरण का नाम #आर्यता है ।यह आसक्ति के त्याग (वीत राग) से प्राप्त होती है ।
( आज भी इसी का अनुकरण करते हुए लोग गुप्त दान को श्रेष्ठ दान मानते हैं ।
" यस्यो अदकम् मधुपर्कम् गाम् च
न मंत्रि वित् प्रतिग्रहाणाति गेहे ।
लोभाद भयाद अथ कार्पन्यतो वा
तस्य अनर्थम् जीवितमाहुरार्यह् ।।"
( महाभारत उद्योगपर्व 28.3)
अर्थात :
मंत्रवेत्ता जिसके घर दाता के लोभ , भय या कृपणता के कारण जल मधुपर्क और गौ को स्वीकार नही करता , आर्य पुरुषों ने उस गृहस्थ का जीवन व्यर्थ बताया है ।
" मानं त्यत्वा यो नरो वृद्धसेवी
विद्वान क्लीवः पश्यति प्रीतियोगात्।
दाक्षेणहीनो धर्मयुक्तो नदांतो
लोकेअस्मिन् वै पूज्यते सिद्धिः आर्य ।।
(महाभारत शांति पर्व 292.23)
अर्थात :
जो विद्वान अभिमान का त्याग करके वृद्ध पुरुषों की सेवा करता, विषयभोग में अनासक्त होकर सबको प्रेमभाव से देखता, मन में चतुराई न रखकर धर्म में संलग्न रहता, दूसरे का दमन नहीं करता , वह मनुष्य इस लोक में आर्य (श्रेष्ठ) है तथा सत्पुरुष भी उसका समादर करते हैं ।
" सदा अहमार्यन्निभृतोअप्युपासे
न में विधित्सोत्सहते न रोषह् ।
न वाप्यहं लिप्समानः परेमि
न चैव किंचद विषयेण यामि।।
(महाभारत शान्तिपर्व 299.19)
अर्थात्:
यद्यपि मैं सब प्रकार से परिपूर्ण हूँ , मेरा कुछ जानना ,पाना तथा करना शेष नहीं है , तथापि मैं आर्य ( श्रेष्ठ ) पुरुषो की उपासना करता रहता हूँ । मुझ पर न तृष्णा का वश चलता है और न रोष का ही ।मैं कुछ पाने के लोभ से धर्म का उल्लंघन नहीं करता और न विषयों की प्राप्ति के लिए ही कहीं आता - जाता हूँ ।।
" अल्पाश्रयानल्पफलान् वदन्ति
धर्मान्यान् धर्मविदो मनुष्याः।
महाश्रयं बहुकल्याणरूपम्
क्षात्रं धर्मं नेतरं प्राहुर्याः ।।
(महाभारत शान्तिपर्व 63.26)
अर्थात्:
धर्म के ज्ञाता आर्य पुरुषों का कथन है कि समस्त धर्मों का आश्रय तो अल्प ही है , उनका फल भी अल्प ही है। जबकि क्षात्र धर्म का आश्रय महान है और उसके फल भी बहुसंख्यक
एवं परम कल्याण
संकलन अजय कर्मयोगी
ये वस्त्र इस कदर लोकप्रिय हुवे कि 1680 आते आते ब्रिटेन की एक मात्र वस्त्र निर्माण - ऊन के वस्त्र बनाने वाले उद्योग को भारी धक्का लगा और उस देश में रोजगार का संकट उतपन्न हो गया।
इस कारण ब्रिटेन में लोगो ने भारत से आयातित वस्त्रों का भारी विरोध किया और उनकी फैक्टरियों में आग लगा दी।
अंततः 1700 और 1720 में ब्रिटेन की संसद ने कैलिको एक्ट -1 और 2 नामक कानून बनाकर ब्रिटेन के लोगो को भारत से आयातित वस्त्रों को पहनना गैर कानूनी बना दिया।
1757 में यूरोपीय ईसाईयों ने बंगाल में सत्ता अपने हाँथ में लिया, तो उन्होंने मात्र जमीं पर टैक्स वसूलने की जिम्मेदारी ली, शासन व्यवस्था की नहीं। क्योंकि शासन में व्यवस्था बनाने में एक्सपेंडिचर भी आता है, और वे भूखे नँगे लुटेरे यहाँ खर्चने नही, लूटने आये थे। इसलिए टैक्स वसूलने के साथ साथ हर ब्रिटिश सर्वेन्ट व्यापार भी करता था, जिसको उन्होंने #प्राइवेट_बिज़नेस का सुन्दर सा नाम दिया। यानि हर ब्रिटिश सर्वेंट को ईस्ट इंडिया कंपनी से सीमित समय काल के लिये एक कॉन्ट्रैक्ट के तहत एक बंधी आय मिलती थी, लेकिन प्राइवेट बिज़नेस की खुली छूट थी ।
परिणाम स्वरुप उनका ध्यान प्राइवेट बिज़नस पर ज्यादा था, जिसमे कमाई ओहदे के अनुक्रम में नहीं , बल्कि आपके कमीनापन, चालाकी, हृदयहीनता, क्रूर चरित्र, और धोखा-धड़ी पर निर्भर करता था । परिणाम स्वरुप उनमें से अधिकतर धनी हो गए, उनसे कुछ कम संख्या में धनाढ्य हो गए, और कुछ तो धन से गंधाने लगे ( stinking rich हो गए) । और ये बने प्राइवेट बिज़नस से - हत्या बलात्कार डकैती, लूट, भारतीय उद्योग निर्माताओं से जबरन उनके उत्पाद आधे तीहे दाम पर छीनकर । कॉन्ट्रैक्ट करते थे कि एक साल में इतने का सूती वस्त्र और सिल्क के वस्त्र चाहिए, और बीच में ही कॉन्ट्रैक्ट तोड़कर उनसे उनका माल बिना मोल चुकाए कब्जा कर लेते थे।
अंततः भारतीय घरेलू उद्योग चरमरा कर बैठ गया, ये वही उद्योग था जिसके उत्पादों की लालच में वे सात समुन्दर पार से जान की बाजी लगाकर आते थे।क्योंकि वहां से आने वाले 20% सभ्य ईसाई रास्ते में ही जीसस को प्यारे हो जाते थे।
ईसाई मिशनरियों का धर्म परिवर्तन का एजेंडा अलग से साथ साथ चलता था।
इन अत्याचारों के खिलाफ 90 साल बाद 1857 की क्रांति होती है, और भारत की धरती गोरे ईसाईयों के खून से रक्त रंजित हो जाती है ।
हिन्दू मुस्लमान दोनों लड़े ।
मुस्लमान दीन के नाम, और हिन्दू देश के नाम ।
तब योजना बनी कि इनको बांटा कैसे जाय। मुसलमानों से वे पूर्व में भी निपट चुके थे, इसलिए जानते थे कि इनको मजहब की चटनी चटाकर , इनसे निबटा जा सकता है।
लेकिन हिंदुओं से निबटने की तरकीब खोजनी थी।
1857 के 30 साल बाद मैट्रिक पास जर्मन ईसाई मैक्समुलर को प्लांट करते है ब्रिटिश इस काम के लिए, जिसने अपनी पुस्तक लिखने के बाद अपने नाम के आगे MA की डिग्री स्वतः लगा लिया ( सोनिया गांधी ने भी कोई MA इन इंग्लिश लिटरेचर की डिग्री पहले अपने चुनावी एफिडेविट में लगाया था)। 1900 में उसके मरने के बाद उसकी आत्मकथा को 1902 में पुनर्प्रकाशित करवाते समय मैक्समुलर की बीबी ने उसके नाम के आगे MA के साथ पीएचडी जोड़ दी।
अब वे फ़्रेडरिक मष्मील्लीण (Maxmillian) की जगह डॉ मैक्समुलर हो गए। और भारत के विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर लोग आज भी उनको संदर्भित करते हुए डॉ मैक्समुलर बोलते हैं।
इसी विद्वान पीएचडी संस्कृतज्ञ मैक्समुलर ने हल्ला मचाया किभारत में #आर्यन बाहर से आये - Nomads। आर्यन यानि तीन वर्ण - ब्राम्हण , क्षत्रिय , वैश्य, जिनको बाइबिल के सिद्धांतों को अमल में लाते हुए #सवर्ण कहा गया।
जाते जाते ये गिरे ईसाई लुटेरे तीन वर्ण को भारतीय संविधान में तीन उच्च (? Caste) में बदलकर संविधान सम्मत करवा गए।
आज तक किसी भी भारतीय विद्वान ने ये प्रश्न नही उठाया कि मैक्समुलर कभी भारत आया नहीं, तो उसने किस स्कूल से, किस गुरु से समस्कृत में इतनी महारत हासिल कर ली कि वेदों का अनुवाद करने की योग्यता हसिल कर ली।
हमारे यहाँ तो बड़े बड़े संस्कृतज्ञ भी वेदों का भाष्य और टीका लिखने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।
भारत में बरसों तक प्रचलित रहे मिथकों में से एक था “आर्यन इन्वेशन थ्योरी”। पहले तो जिसने ये थ्योरी दी उसी ने रिजेक्ट कर दी। उसके बाद इसके लिए कोई साक्ष्य भी नहीं मिले, इसलिए भी इसे बनाए रखना मुश्किल हुआ। इस थ्योरी को अम्बेडकर ने भी सिरे से ख़ारिज कर दिया था। इसके साथ साथ अम्बेडकर नाक की माप के आधार पर बनाई जातियों वाली “नेसल इंडेक्स थ्योरी” को भी ख़ारिज करते थे। अजीब सी बात है कि आज खुद को अम्बेडकरवादी बताने वाले कई लोग इस “आर्यन इन्वेशन थ्योरी” के मिथक में यकीन करते हैं।
उनमें से कुछ तो ऐसे हैं कि सीधा संसद में ऐसे “मिथक” का प्रचार करते हैं। अब बहस संसद में थी इसलिए उसपर कोई कार्यवाही नहीं हो सकती। यही दूसरे “मिथक” की याद दिला देता है। इस दूसरे “मिथक” में कहा जाता है कि कानून की नजर में सभी भारतीय नागरिक बराबर है! अगर ये “मिथक” सच होता तो जिस बात के लिए मेरे ऊपर एक असंवैधानिक काले कानून के जरिये मुकदमा हो सकता है, वैसे ही सांसद पर भी लागु होते। ऐसे ही मिथकों में से एक ये भी है कि अमीर व्यापारियों पर टैक्स लगाकर गरीबों तक पैसा पहुँचाया जायेगा!
टैक्स के नियम एक वेतनभोगी और एक व्यापारी के लिए ठीक उल्टे होते हैं। एक नौकरीपेशा आदमी के लिए उसकी तनख्वाह वो रकम है जो टैक्स काट कर मिलती है। उसपर टीडीएस यानि टैक्स डिडकटेड एट सोर्स लगता है। व्यापारी पूरे साल खर्च करने के बाद दिखाता है कि उसके पास मुनाफा बचा, वो उस मुनाफे पर टैक्स देता है। जैसे ही उसे लगेगा कि उसे ज्यादा मुनाफा हो गया है, वो उस मुनाफे के पैसे को पहले ही अपने ऑफिस के लिए कंप्यूटर/एसी लेकर या कंपनी के डायरेक्टर (खुद) के लिए कार लेकर खर्च कर दे तो कौन सा बढ़ा हुआ टैक्स उसपर लागू होगा? जीएसटी में लगातार टैक्स भरते रहने के कारण मुनाफे को रोककर उसे बाद में खर्च दिखा देना मुश्किल होता है। इसलिए भी जीएसटी से दिक्कत है।
कल पटना लिटरेचर फेस्टिवल में श्री नरेन्द्र कोहली जी की चर्चा का विषय “आधुनिकता” और “मिथक” पर बातचीत था। उन्होंने शुरुआत एक प्रचलित “मिथक” से की जिसके मुताबिक कहा जाता है कि हिन्दी के पाठक घटते जा रहे हैं। उन्होंने पूछा कि इसकी जांच के लिए कौन से सर्वेक्षण करवाए गए? कैसे पता चला कि हिन्दी के पाठक पहले ज्यादा थे और अब कम? प्रकाशकों की गिनती हर साल बढ़ती ही है, उनके बंगले ऊँचे होते जाते हैं, उनकी अगली पीढ़ियाँ इसी व्यवसाय में आ रही हैं। जाहिर है कि सच्चाई, पाठकों के कम होने वाले “मिथक” से कहीं कोसों दूर खड़ी है।
बाकि उन्होंने इससे आगे भी काफी कुछ कहा था, जिसका जिक्र हम जाने दे रहे हैं। आनन्द कुमार यदि आप यह पुस्तक पढ़ेंगे तो आपको अनेक आश्चर्यजनक तथ्य मिलेंगे।
कोलम्बस जब भारत को खोजते हुए अमेरिका पहुंचा तो वहां की आबादी 100 मिलियन थी।
आज वहां के मूलनिवासियों की संख्या एक मिलियन बची है।
विश्व को यह पूंछने का अधिकार नही है कि तुम्हारे पूर्वजों ने उन इंडियंस के साथ क्या किय्या ?
ह्यूमन राइट का झंडा उठाये इन पशुवों से भी बदतर मानव भेड़ियों ने जीसस के नाम पर मनुष्यता की क्रूरता पूर्वक हत्या की।
क्या भारतीय बुद्धिवीरों को #प्रिंट_इट_टू_इंप्रिंट_इट की नीति का व्यवहारिक प्रयोग कर इनके धर्मपुस्तकों के हिंसक और घृणा फैलाने तथा दूसरों की धन संपत्ति और भूमि पर कब्जा करने के दिये गए निर्देशों और उसके अनुपालन में वेस्टर्न ऑफशूट देशों - अमेरिका न्यूजीलैंड,कनाडा आदि पर कब्जा किये जाने की सच्चाई का नैरेटिव नहीं लिखना चाहिए ।
मैं अब समझ सकता हूँ कि #Vine_deloria , जब एक प्रसिद्ध dakota ( अमेरिकन मूल प्रजाति) शिक्षक, दार्शनिक और अधिवक्ता कहता है -" क्रिस्चियन देशों का और क्रिश्चियन लोगों का व्यक्तिगत ट्रैक रिकॉर्ड इतना सुंदर नहीं है कि कोई गम्भीरता से क्रिश्चियन बनने की सोचे। पोप से लेकर दरिद्र ईसाई तक, प्रोटेस्टेन्ट से कैथोलिक्स तक, कांस्टेण्टीनेपोल से लेकर यूनाइटेड स्टेट्स तक, इनका इतिहास यातनाओं, झूंठ, persecution , नरसंहार और अत्याचारों की घटनाओं से इस तरह पटा पड़ा है जो नॉन क्रिस्चियन के दिलो दिमाग में सिहरन पैदा करता है"।
लेखक : #Deloria 1992: 189
नोट: गूगल करके या अन्य पुसतकों से अन्य संदर्भ प्रस्तुत कर पोस्ट को समृद्ध कीजिये।
Deloria का लिंक
https://en.m.wikipedia.org/wiki/Vine_Deloria_Jr.
#रेपोस्ट:
आर्य कौन हैं ?
आर्य की परिभाषा क्या है ?
क्या आर्य एक रेस है ?
इस पर समाजविज्ञानी जो कुतर्क गढ़ते रहते हैं , मैक्समूलर जैसे झोलाछाप संस्कृतज्ञ और bigot इसाई द्वारा फैलाये गए भ्रम जाल को पूरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने संस्कृत ग्रंथों से किस तरह मिथ्या प्रमाणित किया है , उसे देखें ।
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" कर्तव्यम् आचरन् कार्यम् अकर्तव्यम् अनाचारन् तिष्ठति प्रकृत आचारे स वा आर्यम् इति स्मृतः " ।
"न यो ररे आर्यम् नाम दस्यवे" ।
(ऋक् शा. संहिता 10.49.3)
अर्थात :
शाश्त्र निन्दित अकर्तव्य का अनाचरण करने वाले , और कर्तव्य का पालन करने वाले , अर्थात विवेक का सर्वथा समादर करते हुए ही व्योहार करने वाले #आर्य कहे जाते हैं ।
सनातन शाश्त्र में आर्य पद श्रेष्ठ कर्म वाले व्यक्तियों के लिए प्रयोग किया जाता है , न कि संस्कारविहीन दस्युओं के लिए ।
आर्यता नाम भूतानाम यः करोति प्रयत्नतः ।
शुभम् कर्मं निराकारो वीत रागः तथैव च ।।
(महाभारत शांतिपर्व 162.18)
अर्थात :
जो मनुष्य अपने को प्रकट न करके प्रयत्नपूर्वक प्राणियों की भलाई का काम करता रहता है , उसके उस श्रेष्ठ भाव और आचरण का नाम #आर्यता है ।यह आसक्ति के त्याग (वीत राग) से प्राप्त होती है ।
( आज भी इसी का अनुकरण करते हुए लोग गुप्त दान को श्रेष्ठ दान मानते हैं ।
" यस्यो अदकम् मधुपर्कम् गाम् च
न मंत्रि वित् प्रतिग्रहाणाति गेहे ।
लोभाद भयाद अथ कार्पन्यतो वा
तस्य अनर्थम् जीवितमाहुरार्यह् ।।"
( महाभारत उद्योगपर्व 28.3)
अर्थात :
मंत्रवेत्ता जिसके घर दाता के लोभ , भय या कृपणता के कारण जल मधुपर्क और गौ को स्वीकार नही करता , आर्य पुरुषों ने उस गृहस्थ का जीवन व्यर्थ बताया है ।
" मानं त्यत्वा यो नरो वृद्धसेवी
विद्वान क्लीवः पश्यति प्रीतियोगात्।
दाक्षेणहीनो धर्मयुक्तो नदांतो
लोकेअस्मिन् वै पूज्यते सिद्धिः आर्य ।।
(महाभारत शांति पर्व 292.23)
अर्थात :
जो विद्वान अभिमान का त्याग करके वृद्ध पुरुषों की सेवा करता, विषयभोग में अनासक्त होकर सबको प्रेमभाव से देखता, मन में चतुराई न रखकर धर्म में संलग्न रहता, दूसरे का दमन नहीं करता , वह मनुष्य इस लोक में आर्य (श्रेष्ठ) है तथा सत्पुरुष भी उसका समादर करते हैं ।
" सदा अहमार्यन्निभृतोअप्युपासे
न में विधित्सोत्सहते न रोषह् ।
न वाप्यहं लिप्समानः परेमि
न चैव किंचद विषयेण यामि।।
(महाभारत शान्तिपर्व 299.19)
अर्थात्:
यद्यपि मैं सब प्रकार से परिपूर्ण हूँ , मेरा कुछ जानना ,पाना तथा करना शेष नहीं है , तथापि मैं आर्य ( श्रेष्ठ ) पुरुषो की उपासना करता रहता हूँ । मुझ पर न तृष्णा का वश चलता है और न रोष का ही ।मैं कुछ पाने के लोभ से धर्म का उल्लंघन नहीं करता और न विषयों की प्राप्ति के लिए ही कहीं आता - जाता हूँ ।।
" अल्पाश्रयानल्पफलान् वदन्ति
धर्मान्यान् धर्मविदो मनुष्याः।
महाश्रयं बहुकल्याणरूपम्
क्षात्रं धर्मं नेतरं प्राहुर्याः ।।
(महाभारत शान्तिपर्व 63.26)
अर्थात्:
धर्म के ज्ञाता आर्य पुरुषों का कथन है कि समस्त धर्मों का आश्रय तो अल्प ही है , उनका फल भी अल्प ही है। जबकि क्षात्र धर्म का आश्रय महान है और उसके फल भी बहुसंख्यक
एवं परम कल्याण
संकलन अजय कर्मयोगी