क्या आप जानते हैं ईसाई काल गणना के इतिहास में 15 अक्टूबर 1482 से पहले का दिनांक 14 अक्टूबर नहीं 5ऑक्टोबर था
Christmas
versus
मकर संक्रांति
उपर्युक्त दोनों पर्वों में एक साम्य है कि जब वे प्रवर्तित हुए तब सूर्य का दक्षिणायनान्त हुआ था।
अनेक प्रकार के वर्ष होते हैं। दक्षिणायनान्त पर्व ऋतुवर्ष अथवा सांपातिक वर्ष का घटक है किन्तु उक्त दोनों पर्व ऋतुवर्ष के घटक नहीं हैं प्रत्युत किसी अन्य वर्ष के सन्दर्भ में ऋतुवर्ष की स्मृति हैं।
Christmas के दिन Christ का जन्म हुआ था अथवा नहीं यह पृथक् विषय है और इस पोस्ट का कथ्य नहीं है।
दकषिणायनान्त के साथ ही ऋतुवर्ष के सहस्य नामक दशम मास का अन्त होता है जिसके पश्चात् उत्तरी गोलार्द्ध में दिनमान में वृद्धि होने लगती है। ऋतुवर्ष के मासों के नाम हैं – मधु माधव शुक्र शुचि नभस् नभस्य इष ऊर्ज सहस् सहस्य तपस् व तपस्य। इनकी तुलना क्रमश: मार्च एप्रिल मे ज्यून जुलाइ ऑगस्ट सेप्टेम्बर ऑक्टोबर नोवेम्बर डिसेम्बर जेन्युअरि व फेब्रुअरि से की जा सकती है।
पृथ्वी की अक्षीय नति (लगभग २२°·५) के कारण भूमध्य रेखा (०° अक्षांश) पर मध्याह्न सूर्य की स्थिति प्रतिदिन लम्बवत् नहीं होती प्रत्युत २२°·५ उत्तर अक्षांश (उत्तरायणान्त रेखा) से २२°·५ दक्षिण अक्षांश (दक्षिणायनान्त रेखा) के मध्य सतत दोलायमान होती है। इन्हीं अक्षांशों के मध्य मध्याह्न सूर्य की लम्बवत् स्थिति का एक पूर्ण दोलन एक ऋतुवर्ष है।
ग्रेगरिअन कैलेण्डर के २१-२२ डिसेम्बर को सूर्य का दक्षिणायनान्त होता है। इस दिन मध्याह्न सूर्य की स्थिति २२°·५ दक्षिण अक्षांश पर लम्बवत् होती है। सम्प्रति प्रचलित ग्रेगरिअन कैलेण्डर ऋतुवर्ष का ही कैलेण्डर है जो पूर्वप्रचलित जूलिअन कैलेण्डर का संशोधन कर बनाया गया है और जूलिअन कैलेण्डर भी किसी अन्य पूर्वप्रचलित कैलेण्डर के संशोधन से बना था।
Christmas वस्तुत: जूलिअन कैलेण्डर (जो ऋतुवर्ष ही नहीं अपितु नाक्षत्र वर्ष का भी अशुद्ध कैलेण्डर है) के २५ डिसेम्बर को मनाया जाता है किन्तु प्रोटेस्टेण्ट क्रिश्चिअन मिथ्यानुकरण से ग्रेगरिअन कैलेण्डर के २५ डिसेम्बर को इसे मनाने लगे।
Christmas के प्रवर्तन के समय जूलिअन अथवा उसके पूर्ववर्ती कैलेण्डर के २५ डिसेम्बर को सूर्य का दक्षिणायनान्त हुआ था। Christmas को X-mas भी कहते हैं। १० की संख्या के लिए रोमन प्रतीक X है।
अर्थात् X-mas का अर्थ हुआ – दशम मास
जिसके अन्त का सूचक है – Christmas पर्व।
सम्प्रति ग्रेगरिअन कैलेण्डर के २२ डिसेम्बर को सूर्य का दक्षिणायनान्त होता है जो जूलिअन कैलेण्डर का ९ डिसेम्बर है क्योंकि ग्रेगरिअन कैलेण्डर का कोई दिनांक जूलिअन कैलेण्डर से सम्प्रति १३ दिन पहले आता है। ९ डिसेम्बर व २५ डिसेम्बर के मध्य १६ दिनों का अन्तर है।
प्रति ४०० वर्ष में ग्रेगरिअन कैलेण्डर का दिनांक जूलिअन कैलेण्डर की तुलना में ३ दिन पहले आने लगता है क्योंकि
जूलिअन कैलेण्डर में प्रत्येक चतुर्थ वर्ष की फेब्रुअरि में २९ दिन होते हैं जबकि ग्रेगरिअन कैलेण्डर के शताब्दी वर्ष की फेब्रुअरि में तभी २९ दिन होते हैं जब वह ४०० से विभाज्य हो अन्यथा २८ दिन ही होते हैं।
अत: १६ दिनों के अन्तर हेतु (१६×४०० वर्ष)/३) २१३३ वर्ष लगेंगे। अत: २१३३ वर्ष पूर्व जूलिअन कैलेण्डर में २५ डिसेम्बर को दक्षिणायनान्त होता था।
सरल शब्दों में
१३३·३३ वर्षों में ग्रेगरिअन कैलेण्डर का दिनांक
जूलिअन कैलेण्डर के दिनांक से १ दिन पहले आने लगता है।
१६ दिनों के अन्तर के लिए (१६×१३३·३३ वर्ष) २१३३ वर्ष लगेंगे।
अर्थात् Christmas का दिनांक २५ डिसेम्बर मानना
लगभग २१३३ वर्ष पुरानी बात है।
मकर संक्रमण पर्व के प्रवर्तन के समय मकर संक्रमण (जो नाक्षत्र वर्ष का घटक है) में दक्षिणायनान्त था। मकर संक्रमण पर्व १४-१५ जेन्युअरि को पड़ता है जो दक्षिणायनान्त के २४-२५ दिन पश्चात् आता है।
ऋतुवर्ष की कोई घटना लगभग ७२ वर्ष में १ दिन पूर्व पड़ने लगती है। अत: २४ दिनों के अन्तर के लिए (२४×७२ वर्ष) १७२८ वर्ष लगेंगे।
अर्थात् मकर संक्रमण पर दक्षिणायनान्त मानना
लगभग १७२८ वर्ष पुरानी बात है।
https://youtu.be/JOA1500vZDU
आप सभी को मकर संक्रांति पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ !
मकर संक्रांति कुछ रोचक तथ्य - -
राजा हर्षवर्द्धन के समय में यह पर्व 24 दिसम्बर
को पड़ा था। मुग़ल बादशाह अकबर के शासन काल में
10 जनवरी को मकर संक्रांति थी। शिवाजी के जीवन
काल में यह त्योहार 11 जनवरी को पड़ा था।
दरअसल हर साल सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में
प्रवेश 20 मिनट की देरी से होता है। इस तरह हर
तीन साल के बाद सूर्य एक घंटे बाद और हर 72
साल में एक दिन की देरी से मकर राशि में प्रवेश
करता है। मतलब 1728 (72×24) साल में फिर
सूर्य का मकर राशि में प्रवेश एक दिन की देरी से
होगा और इस तरह 2080 के बाद ‘मकर संक्रांति’
15 जनवरी को पड़ेगी। ज्योतिषीय आकलन के अनुसार
सूर्य की गति प्रतिवर्ष 20 सेकेंड बढ़ रही है।
माना जाता है कि आज से 1000 साल पहले मकर
संक्रांति 31 दिसंबर को मनाई जाती थी। पिछले एक
हज़ार साल में इसके दो हफ्ते आगे खिसक जाने
की वजह से 14 जनवरी को मनाई जाने लगी। अब
सूर्य की चाल के आधार पर यह अनुमान
लगाया जा रहा है कि 5000 साल बाद मकर
संक्रांति फ़रवरी महीने के अंत में मनाई जाएगी।
ज्योतिष गणनाओं और नक्षत्रों को आधार बनाने
के बाद इस वर्ष मकर संक्रांति का पर्वं 14 एवं 15
जनवरी को मनाया जाएगा। परंपरा व गणनाओं के
आधार पर संक्रांति पर्व पूर्व में 14
जनवरी को मनाया जाता था। वर्ष 2014 में इसे
पर्व को लेकर दो दिन तक नक्षत्र रहेंगे और मुख्य
पर्व 15 जनवरी को मनाया जाएगा। वर्ष 2014 में
ग्रहों की स्थिति मकर संक्रांति का योग दो दिन तक
बना रही है। ज्योतिषियों के अनुसार, 14
जनवरी की शाम 7.25 बजे से संक्रांति शुरू
हो जाएगी। पर्व की अवधि अगले दिन 15
जनवरी को प्रात:काल 11.25 बजे तक रहेगी।
संक्रांति काल सूर्योदय तक रहने के कारण यह पर्व
15 जनवरी को पूण्यलाभ की दृष्टि से मनाया जाएगा
। इसी दिन दान और स्नान का महत्व
भी बताया जा रहा है। गणनाकारों ने
बताया कि नक्षत्रों के आधार पर होने
वाली कालगणना के आधार पर अगले 50 बरसों तक
मकर संक्रांति की अवधि दो दिनों तक रहेगी।
मुहुर्त चिंतामणी’ ग्रंथ के अनुसार दिन के करण के
आधार पर मकर संक्रांति की सवारी, वर्ण, स्वरूप
इत्यादि का निर्धारण किया जाता है. मत्स्यपुराण ने संक्रान्ति व्रत का वर्णन किया है।
एक दिन पूर्व व्यक्ति (नारी या पुरुष) को केवल एक
बार मध्याह्न में भोजन करना चाहिए और संक्रान्ति के
दिन दाँतों को स्वच्छ करके तिल युक्त जल से स्नान
करना चाहिए। व्यक्ति को चाहिए कि वह
किसी संयमी ब्राह्मण गृहस्थ को भोजन सामग्रियों से
युक्त तीन पात्र तथा एक गाय यम, रुद्र एवं धर्म के
नाम पर दे और चार श्लोकों को पढ़े, जिनमें से एक यह
है- ‘यथा भेदं’ न पश्यामि शिवविष्ण्वर्कपद्मजान्। त
था ममास्तु विश्वात्मा शंकर:शंकर: सदा।।’, अर्थात्
‘मैं शिव एवं विष्णु तथा सूर्य एवं ब्रह्मा में अन्तर
नहीं करता, वह शंकर, जो विश्वात्मा है, सदा कल्याण
करने वाला है।
जय सत्य सनातन वैदिक धर्म
!! जय श्री राम !!
