अगर आप यह समझते हैं कि हमारे देश में 'तलाक' पर बहस पहली बार हो रही है तो आप गलत हैं। हमारे देश में यह बहस तब से हो रही है जब सोशल मीडिया पर सक्रिय 95% लोग इस भूमि पर अवतरित भी नहीं हुए थे। आजकी और तब की बहस में अंतर केवल इतना है कि तब यह बहस 'संसद' में न होकर केन्द्रीय असेंबली में हुई थी।
जी हाँ ! आज से 80 वर्ष पहले सन् 1939 में तत्कालीन केन्द्रीय असेम्बली में डॉ.देशमुख के 'हिन्दू स्त्री तलाक बिल' पर यह बहस हुई थी। जिसमें अ०भा०वर्णाश्रम स्वराज्य संघ के प्रधान सेठ बैजनाथ जी बाजोरिया ने बिल के विरोध में चार सौ से अधिक प्रार्थना पत्रों का बंडल प्रस्तुत कर अपने तर्कों को सही प्रमाणित करने का प्रयास किया था।
मैं यह सब इसलिए कह रहा हूँ इस बहस में भाग लेते हुए मुसलमान सदस्यों ने हुए तब कहा था कि हम "कुरान की किसी भी आज्ञा का अंश मात्र में भी विरोध नहीं होने देने देंगे। हिन्दू चाहें तो अपने शास्त्रों में परिवर्तन कर सकते है।"
दूसरी बात यह भी कि उस समय भी हमारा तत्कालीन 'भेलसा ' एक जागृत क्षेत्र था। उन दिनों पं. केशव शास्त्री जी के आह्वान पर अनेक व्यक्तियों ने सार्वजनिक पदों से स्तीफे दे दिये थे।
और यह भी कि तब पाकिस्तान का आविर्भाव नहीं हुआ थ। लाहौर-कराची से लेकर ढाका-चटगाँव तक के समाचार हमें ऐसे मिलते थे जैसे आज दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, भोपाल के मिलते हैं।
(यह चित्र मेरे पिताजी द्वारा संग्रहीत मेरठ से प्रकाशित साप्ताहिक समाचार पत्र 'आदेश' का है।)
साभार विजय जी संकलन अजय कर्मयोगी
