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भारत का ईसाईकरण करने की शुरुआत-

24 जून 1813 को लन्दन की संसद हाउस आफ कोमन्स में  सांसदों के बीच चर्चा होती है, उसमें सांसद विलियम विलवर फोर्स एक प्रस्ताव रखता है कि हमें भारत को एक ईसाई देश बनाना है।
# इस प्रस्ताव का 89 सांसद समर्थन करते हैं व 36 सांसद विरोध करते हैं।
# प्रस्ताव पास हो जाता है। उसके बाद सांसद पूछते हैं कि इतने बड़े देश को ईसाई कैसे बनायेंगें ?
# उस समय विलियम कहता है कि पहले हमें भारत को तीन प्रकार से नष्ट करना होगा
-पहला राजनैतिक रूप से
-दूसरा आर्थिक रूप से
-तीसरा महत्त्वपूर्ण है सांस्कृतिक रूप से।

राजनैतिक रूप से गुलाम बनाने के लिए हमें हर प्रकार के उपाय करके वहां की सत्ता पर अधिकार करना होगा।

आर्थिक रूप से गुलाम बनाने के लिए वहां की अर्थ व्यवस्था को बर्बाद करना होगा।

क्योंकि उस समय भारत की अर्थव्यवस्था सुदृढ थी। यहाँ के कपड़े, मसाले आदि दुनिया में जाते थे, यहाँ के ईमानदार व्यापारी जहाजों से पूरी दुनिया में व्यापार करते थे। यहाँ की ग्रामीण अर्थ व्यवस्था बहुत मजबूत थी सब कुछ गांव में पैदा होता था।
जैसे-
कपड़े बनाने के लिए जुलाहा व दर्जी थे।
लोहे का काम लौहार करते थे।
आभूषण बनाने के लिए सुनार थे।
अनाज, सब्जी किसान पैदा करते थे।
लकड़ी का काम खाती करते थे।
शिक्षा ब्राह्मण दिया  करते थे।
रक्षा का काम क्षत्रिय करते थे।
तेल की पूर्ति तेली करते थे।
जूते बनाने का काम चर्मकार करते थे।

ये सभी व्यवसाय परम्परा से चलते थे इनको ज्ञाति कहा जाता था, ज्ञाति यानी अपने व्यवसाय का विशेषज्ञ जिसका बिगडा रूप  जाति हो गया, ये सभी व्यवसाय एक दूसरे पर निर्भर थे, किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था।
क्योंकि सबकी शिक्षा व्यवस्था समान थी शिक्षा गुरुकुल में होती थी जिसका सम्पूर्ण खर्च समाज उठाता था।

विलियम ने कहा कि हमें भारत की इसी व्यवस्था को समाप्त करना है, जिससे ये गरीब होगें व इनका ईसाईकरण आसान होगा।
तीसरा है सांस्कृतिक रूप से बर्बाद करना जिसके लिए उन्होने लार्ड मैकाले को  भारत भेजा।
अंग्रेजों ने टैक्स लगाकर, कानून बनाकर, अपनी कम्पनी को खड़ा करके, विदेशी कंपनियों को लाकर भारत के लोगों को बेरोजगार बनाया आज गांव के तेली, दर्जी, जुलाहे, चर्मकार, आदि ने अपना पुस्तेनी काम छोड़ दिया है और बेरोजगारी बढ़ गई।
मैकाले ने भारत में आकर यहाँ की शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन किया, कानून बनाकर सारे गुरुकुल बन्द करवायें गये, सहयोग करने वालों को सजा दी गई। अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था की शुरुआत हुई।
मैकाले ने शिक्षा व्यवस्था में परिवर्तन करने के बाद अपने पिता को पत्र लिखा उसने लिखा पिताजी मैंने भारत में ऐसी शिक्षा व्यवस्था बनाई है कि आगामी कुछ वर्ष बाद भारत के लोग बाहर से तो काले भारतीय नजर आयेंगे लेकिन अन्दर से पूरी तरह ईसाई अंग्रेज होंगें जो अपने ही देश व संस्कृति, धर्म ग्रन्थ से नफरत करेेंगें।
तो यह थी हमारे देश की बर्बादी की शुरूआत। परिणाम आपके सामने है । किसी भी देश की शिक्षा, संस्कृति वहां की जड होती हैं मुगलों ने हमारी गर्दन काटी तो भी हम जिन्दा रहे लेकिन अंग्रेजों ने हमारी जड़ को काटा परिणाम आज हम संस्कृत से नफरत करते हैं अंग्रेजी से प्यार, हर विदेशी वस्तु हमें अच्छी लगती है।
विदेशी कुत्ता, विदेशी  पहनावा, विदेशी फिल्म, विदेशी गाय, विदेशी रहन सहन, विदेशी जन्मदिन, विदेशी भोजन, विदेशी चिकित्सा, विदेशी लेखक, विदेशी कालेज आदि ये हमारा ईसाईकरण नहीं तो और क्या है।
अन्त में याद रखें पश्चिम की ओर जाकर सूर्य भी अस्त हो जाता है यदि हम भी पश्चिम का अनुसरण करेंगें तो  नहीं बचेगें।

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