Skip to main content


गेहूं भी बन रहा मुसीबत 
.
गेहूं की रोटी खाने से मना करने की वजह है गेहूं में पाया जाने वाला एक प्रोटीन जो गेहूं के अलावा जौ, राई व टिट्रिकेल (गेहूं और राई के संयोग से तैयार एक प्रजाति) में भी पाया जाता है. इस प्रोटीन को ग्लूटेन कहते हैं. यही वह प्रोटीन है, जो गेहूं के आटे को गूंधने पर उसे बांध देता है।

पहले लोग गेहूं के साथ मोटा अनाज ((जौ, चना, बाजरा)) भी खाते थे, इसलिए मोटे अनाज से उन्हें पौष्टिक तत्व मिलते थे और वो तंदुरूस्त रहते थे।

आजकल लोगों ने मोटा अनाज खाना छोड़कर केवल गेहूं का उपयोग करना शुरू कर दिया है। इससे उन्हें पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक तत्व नहीं मिल पाते हैं।

ज्वार, बाजरा, रागी तथा अन्य मोटे अनाज उदाहरण के लिए मक्का, जौ, जई आदि पोषण स्तर के मामले में वे गेहूं और चावल से बीस ही साबित होते हैं।

पिछले दिनों बातचीत में एक डॉक्टर साहब ने बताया ‘मैंने अपने यहां इलाज करवाने आए करीबन 500 बच्चों में गेहूं से एलर्जी के मामलों का दस्तावेजी अध्ययन किया है’।  मैंने पूछा ‘गेहूं से एलर्जी …भी इस गेंहू-भोजी इलाके में’?  उन्होंने बताया ‘दरअसल यह ‘व्हीट-एलर्जी’ गेहूं में पाए जाने वाले ग्लूटन के प्रति एलर्जी पैदा होने से हो जाती है, लेकिन यह पदार्थ मोटे अनाज जैसे कि बाजरा आदि में नहीं होता। मानवीय शरीर की क्षमता एक हद से ज्यादा ग्लूटन की मात्रा को जज्ब करने के लिए नहीं बनी है’। वैसे भी बाजरा गेहूं से ज्यादा पौष्टिक है क्योंकि इसमें रेशा और लौह की मात्रा उससे अधिक है। पूरी तरह से गेंहू-आधारित खुराक की तरफ चले जाना एक मुसीबत मोल लेने जैसा है।

बड़े बूढ़ों से सुना था कि उनके बचपन में बाजरे की रोटी और खिचड़ी ज्यादातर रोजाना की आम खुराक थी। गेहूं की रोटी एक तरह की विलासिता थी जो कभी-कभार ही मय्यसर होती थी वह भी तब जब कोई मेहमान घर आया हो। जाहिर है चावल तो हमारे लिए और भी ज्यादा अनजाना था सिवाए उत्सवों पर या विशेष तौर कभी-कभी बनने वाली खीर या घी-बूरा के रूप में दिए जाने वाले मिष्ठान के तौर पर। जहां तक मुझे अपने बचपन की याद है तो सफेद मक्खन और गुड़ के साथ खाए जाने वाली बाजरे की रोटी हमें सर्दियों में कभी-कभार ही मिला करती थी। हां इतना जरूर है कि जो गेहूं की रोटी हम खाया करते थे वह दरअसल यह गेहूं के आटे में चने और जौ का सम्मिश्रण हुआ करती थी। आज मिलने वाला पॉलिश किया गया चावल उस वक्त तक भी हमारी खुराक का हिस्सा नहीं बन पाया था।

फिलवक्त मैदे से बने नान-रोटी, दाल-मक्खनी,छोला भटूरा और मटर-पनीर ने उत्तर भारतीयों की थालियों पर ‘धावा’ बोल रखा है। यह एक पौष्टिकताहीन-त्रासदी है क्योंकि हम रेशे युक्त भोजन की बजाए लगातार निम्न स्तर के भोज्य पदार्थों की ओर खिंचे चले जा रहे हैं।

इस मुसीबत की जड़ हमारी खाद्यान्न नीति और राजनीति में है। जिस घटनाक्रम को ‘हरित-क्रांति’ के नाम से जाना जाता है उसे व्यावहारिक तौर पर गेहूं-क्रांति कहना ज्यादा उचित होगा। वर्ष 1965 और 67 के बीच देश में अकाल पड़ा था। तत्कालीन सरकार ने अपनी प्रतिक्रिया को देश के छोटे से हिस्से में बड़े पैमाने पर विभिन्न स्रोतों को झोंककर गेहूं की पैदावर को उन्नत करने और विकसित करने पर जोर देकर व्यक्त किया था। यही कारण है कि पहले पहल गेहूं की ज्यादातर पैदावार पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुआ करती थी, जिसे देशभर में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से बांटा जाता था। एकाएक कम कीमतों पर उपलब्ध हुए इस गेहूं की वजह से अन्य रिवायती मोटे खाद्यान्न जैसे कि बाजरा, ज्वार, जौ, रागी और कोड़ू की ओर रूझान कम होने लगा। आगे चलकर आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में कम दरों पर उपलब्ध करवाए जाने वाले चावल ने इस प्रकिया में और ज्यादा तेजी ला दी थी और मोटा अनाज भोजन की थाली में वहां भी लगातार छिटकता गया।

इसका समाधान राजनीति में है जो केवल चुनावी राजनीति पर आधारित न हो, इसके लिए सरकारी नीति, राजनीतिक पहल और जनजागरण के सम्मिश्रण की जरूरत है। सरकार को गेहूं और चावल के प्रति लाड़लापन छोड़कर मोटे अनाज को प्रोत्साहित करने पर ध्यान देना होगा। सरकारी वितरण प्रणाली और मिड-डे मील में बाजरे की आपूर्ति को बढ़ाना होगा।

खेती और प्राथमिक शिक्षा को बचाना हो तो दो रू. चावल और गेहूं वाला पी डी एस और मिड डे मील बन्द करो।

Popular posts from this blog

उच्च प्रतिभा के धनी और गणित के विद्वानों के लिए ही यह पोस्ट भारत की गौरवशाली अतीत का

      गणित के विभिन्न क्षेत्रों में भारत का योगदान प्राचीनकाल तथा मध्यकाल के भारतीय गणितज्ञों द्वारा गणित के क्षेत्र में किये गये कुछ प्रमुख योगदान नीचे दिये गये हैं- आंकगणित : दाशमिक प्रणाली (Decimal system), ऋण संख्याएँ (Negative numbers) (ब्रह्मगुप्त देखें), शून्य (हिन्दू अंक प्रणाली देखें), द्विक संख्या प्रणाली (Binary numeral system), स्थानीय मान पर आधारित संख्या आधुनिक संख्या निरूपण, फ्लोटिंग पॉइंट संख्याएँ (केरलीय गणित सम्प्रदाय देखें), संख्या सिद्धान्त , अनन्त (Infinity) (यजुर्वेद देखें), टांसफाइनाइट संख्याएँ (Transfinite numbers), अपरिमेय संख्याएँ (शुल्बसूत्र देखें) भूमिति अर्थात भूमि मापन का शास्त्र : वर्गमूल (see Bakhshali approximation), Cube roots (see Mahavira), Pythagorean triples (see Sulba Sutras; Baudhayana and Apastamba state the Pythagorean theorem without proof), Transformation (see Panini), Pascal's triangle (see Pingala) बीजगणित: Quadratic equations (see Sulba Sutras, Aryabhata, and Brahmagupta), Cubic equations and Quartic equations (b...

bhu के संस्थापक मदन मोहन मालवीय की आत्मा क्यों कराह रही है

    प्रश्न यह है कि फिरोज कोई, ऐसे थोड़े झोला उठाकर बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में प्रवेश कर दिया है उसके लिए बकायदा नियम कानून और यहां के बुद्धिजीवियों के और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के सारे मापदंडों को पूर्ण करते हुए वह यहां तक पहुंचा है। प्रश्न यह है कि यह ऐसा नियम कानून और मापदंड स्थापित करने वाले कौन हैं जो भारत की अस्मिता को समाप्त करना चाह रहे हैं जो भारत की सनातन परंपरा को नष्ट करना चाह रहे हैं हालांकि गलती तो उसी समय हो गई थी जब अपनी गुरुकुल व्यवस्था का त्याग करके और अंग्रेजों की आधुनिक शिक्षा के माध्यम से एक बड़ा संस्थान बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी बनाई गई है उसी समय इस सनातन परंपरा के नष्ट होने का बीज डाल दिया गया था यह तो अब उसके फलअश्रुति हैं हम लोग केवल परिणाम पर छाती कूटते हैं कारण और निवारण पर कोई ध्यान नहीं रहता है  बोय पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय कहीं यही हालत राम मंदिर निर्माण का भी ना हो इसलिए सजगता आज से ही जरूरी है और श्रेष्ठ परंपरा के वाहक तेजस्वी पुरुष चयन अगर हो पाता है तू ही विश्व गुरु भारत के संकल्पना साकार हो सकती है नहीं तो अपने अपने पा...

Newziland,Britain apply Sanskrit teaching for smartness

   जब हमारे श्रेष्ठ भारत का नाम कहीं बदनाम होता है।क्या बतायें जब शिक्षित वेश्यावृत्ति करता है बस ह्रदय दुखता है।क्योंकि कुछ ही दसक पहले हमारे यहां7लाख 32हजार गुरूकुल हुआ करते थे।समस्त संसार की मानव जाति हमसे ही सीखती थी कि शिक्षा क्या होती है।और अब हम अपनी मानसिकता से इतना विकृत हो चुके हैं कि क्या बतायें कुछ कहते नहीं बनता।पर इतना जरूर कहूंगा हमारे भारत की मूल गुरुकुल शिक्षा ही सभी समस्याओं  से   मुक्त करती है व मानव को महामानव बनाती थी। एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान     विश्व हिन्दी दिवस प्रति वर्ष 10 जनवरी को मनाया जाता है. इसका उद्देश्य विश्व में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए जागरूकता उत्पन्न करना तथा हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करना है. अजय कर्मयोगी: https://m.youtube.com/watch?v=JixMEQ2kehU   , https://m.youtube.com/watch?v=JseQIWhJ7xk  , https://m.youtube.com/watch?v=JixMEQ2kehU  ,  https://m.youtube.com/watch?v=IFmv2YFApQk                 ...