क्रिसमस का वास्तविक इतिहास.
ईसाई देशों में इस समय क्रिसमस डे की धूम है, भारत में भी कुछ नासमझ कुछ मुर्ख हिन्दू क्रिसमस की बधाई देते हैं, उनके साथ क्रिसमस मनाते हैं पर उनको पता नहीं है कि क्रिसमस क्यों मनाई जाती है.
लोगों का भ्रम है कि इस दिन यीशु मसीह का जन्मदिन होता है पर सच्चाई यह है कि 25 दिसम्बर का ईसा मसीह के जन्मदिन से कोई सम्बन्ध नहीं है, एन्नो डोमिनी काल प्रणाली के आधार पर यीशु का जन्म 7 ई.पू. से 2 ई.पू. के बीच हुआ था. वास्तव में पूर्व समय में 25 दिसम्बर को मकर संक्रांति पर्व आता था और यूरोप अमेरिका आदि देश धूमधाम से इस दिन सूर्य उपासना करते थे. सूर्य और पृथ्वी की गति के कारण मकर संक्रांति लगभग 80 वर्षों में एक दिन आगे खिसक जाती है. सायन गणना के अनुसार 22 दिसंबर को सूर्य उत्तरायण की ओर व 22 जून को दक्षिणायन की ओर गति करता है. सायन गणना ही प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती है, जिसके अनुसार 22 दिसंबर को सूर्य क्षितिज वृत्त में अपने दक्षिण जाने की सीमा समाप्त करके उत्तर की ओर बढ़ना आरंभ करता है, इसलिए 25 को मकर संक्रांति मनाते थे. विश्वकोष में दी गई जानकारी के अनुसार सूर्यपूजा को समाप्त करने के उद्देश्य से क्रिसमस डे का प्रारम्भ किया गया. ईस्वी सन् 325 में निकेया अब इजनिक तुर्की नाम के स्थान पर सम्राट कांस्टेन्टाइन ने प्रमुख पादरियों का एक सम्मेलन किया और उसमें ईसाईयत को प्रभावी करने की योजना बनाई गई. पूरे यूरोप के 318 पादरी उसमें सम्मिलित हुए, उसी में निर्णय हुआ कि 25 दिसम्बर मकर संक्रान्ति को सूर्यपूजा के स्थान पर ईसा पूजा की परम्परा डाली जाये. यीशु का क्रिसमस से कोई लेना देना है और न ही संता क्लॉज से, फिर भी भारत में पढ़े लिखे लोग बिना कारण पर्व मनाते हैं ये सब सनातन पुरातन भारतीय संस्कृति खत्म करके ईसाईकरण के लिए भारत में क्रिसमस डे मनाया जाता है.
हिन्दुओं का नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरु होता है,
हिन्दू भारतीय संस्कृति के महान ऋषि मुनियों की संतानें हैं इसलिये शराब पीने वाला, मांस खाने वाला अंग्रेजो का नववर्ष मनाना भारत वासियों को शोभा नहीं देता है. भारत में जितने सरकारी कार्य है वो 31 मार्च को बन्द होकर 2 अप्रैल से नये तरीके से शुरू होते हैं क्योंकि भारतीय नववर्ष उसी समय आता है. हिन्दू संतों ने हमें सदा भारत की दिव्य संस्कृति से परिचित कराया है और आज भी हिन्दू संत हिन्दू संस्कृति का परिचय चारों दिशाओं में फैला रहे हैं, इसी कारण उन्हें विधर्मियों द्वारा न जाने कितना कुछ सहन भी करना पड़ा है.
देश में सुख, सौहार्द, स्वास्थ्य व् शांति से जन मानस का जीवन मंगलमय हो इस लोकहितकारी उद्देश्य से हिंदू संतो ने 25 दिसम्बर तुलसी पूजन दिवस के रूप में शुरू करवाया, आप भी 25 दिसम्बर तुलसी पूजन करके मनाये. तुलसी के पूजन से मनोबल, चारित्र्यबल व् आरोग्य बल बढ़ता है, मानसिक अवसाद व आत्महत्या आदि से रक्षा होती है. मरने के बाद भी मोक्ष देनेवाली तुलसी पूजन की महत्ता बताकर जन-मानस को भारतीय संस्कृति के इस सूक्ष्म ऋषि विज्ञान से परिचित कराया हिन्दू संतों ने. 25 दिसम्बर को प्लास्टिक के पेड़ पर बल्ब जलाने की बजाय 24 घण्टे ऑक्सीजन देने वाली माता तुलसी का पूजन करें.
क्रिसमस ट्री के नीचे बल्ब जलाकर बेबकूफ कहलाने के बजाये तुलसी के नीचे दीपक जलाकर वैज्ञानिक सोच वाला बनिये.
___________________ जब ईसा मसीह को यहूदी धर्मगुरुओं ने पिलातुस के सामने उपस्थित किया था इसी दौरान उस रोमन गवर्नर को अपनी पत्नी का संदेश मिला जिसमें उसने कहा कि 'तुम इस धर्मी के मामले में हाथ मत डालना क्योंकि आज मैंने स्वप्न में उसके कारण बहुत दुःख उठाये हैं। इस कारण से पिलातुस ईसा को सजा देने के पक्ष में नहीं था और हर संभव कोशिश कर रहा था कि किसी तरह उसे ईसा को सजा सुनाने का पाप न करना पड़े परंतु यहूदी धर्मगुरुओं के आगे वह हार हो गया और ईसा को सलीब पर चढ़ाने का आदेश जारी करते हुए उसने पानी लेकर अपने हाथ धोये और कहा कि मैं इस धर्मी के लहू से पाक हूँ, आगे तुम समझो।
इसके बाद ईसा मसीह को शुक्रवार दोपहर में सूली पर चढ़ा दिया गया और तीसरे पहर में रोमन सैनिकों को लगा कि ईसा का निधन हो गया है। इसी दौरान ईसा के एक छुपे हुये शिष्य युसूफ जो अरिमितियाह का रहना वाले था रोमन गवर्नर के पास गया और उससे ईसा के शरीर को सूली से उतार लेने की आज्ञा माँगी और आज्ञा प्राप्त कर उसने ईसा के शरीर को सलीब से उतारा और छिपाकर अपने एक निहायत व्यक्तिगत बाग़ में ले गया और वहां एक बड़े से हवादार गुफा में ईसा के शरीर को रखकर उसके मुंह पर एक बड़ा सा पत्थर रख दिया.
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कहतें हैं कि ईसा को लेकर रोमन गवर्नर पिलातुस, मरियम मगदलीनी, अरिमितियाह के युसूफ और ईसा के कुछ दूसरे शिष्यों ने एक शानदार योजना बनाई थी। योजना ये थी कि शुक्रवार का दिन ईसा के मुक़दमे की सुनवाई के लिये रखा जाये ताकि अगर उन्हें सलीब दिया जाने का फैसला सुनाना पड़े तो उसी दिन सूर्यास्त से पहले-पहले उन्हें सलीब से उतार लिया जायेगा क्योंकि शनिवार का दिन यहूदियों के लिये विश्राम दिवस होता है इसलिये शुक्रवार के दिन वो सूर्यास्त के बाद किसी अपराधी को सलीब पर नहीं रहने देते. ईसा दोपहर में सलीब पर चढ़ाये गये फिर तीन घंटे बाद पीड़ा के कारण बेहोश हो गये और उनके बेहोश होते ही उनके शुभचिंतकों ने यह शोर बरपा कर दिया कि ये तो मर गया। उधर पिलातुस ने ये जानते हुए भी कि तीन घंटे में किसी की भी सलीब पर मौत नहीं होती युसूफ को ये आज्ञा दे दी कि वो ईसा के शरीर को उतार कर अपने व्यक्तिगत बाग़ में ले जाये। युसूफ को पता था कि ईसा मरे नहीं हैं बल्कि पीड़ा की अधिकता से वो सिर्फ बेहोश हैं, उसने ईसा को मिट्टी के अंदर दफन नहीं किया बल्कि उनको एक बड़े से हवादार गुफा में रख दिया। मरियम मगदलीनी और ईसा की माँ रविवार सुबह-सुबह मुंह अँधेरे ही कुछ औषधियों के साथ इस ख्याल से उस गुफा के पास आई कि घायल ईसा की चिकित्सा की जाये पर जब वो वहां आई तब तक प्राथमिक उपचार के बाद ईसा होश में आ चुके थे और यहूदियों के भय से वहां माली के भेष में छुपे हुए थे।
मरियम मगदलीनी के लाये औषधियों से उनके ज़ख्मों का इलाज किया गया और फिर वो चुपके से अपनी माँ और मरियम मगदलीनी के साथ वहां से निकल कर भारत आ गए और अपनी जिन्दगी के शेष दन उन्होंने यहीं गुजारा।
ऊपर इतनी भूमिका लिखने की आवश्यकता इसलिये थी क्योंकि अरिमितियाह के युसूफ के जिस बाग़ में ईसा सलीब से उतारे जाने के बाद लाये गये थे वो तुलसी का बाग़ था। यानि अरिमितियाह के युसूफ ने जानबुझकर ईसा के लिये उस बाग़ को चुना था जिसमें 'औषधीय गुणों की खान' तुलसी के पौधे बहुतायत से थे। आपने कभी गौर किया है कि तुलसी को पश्चिमी जगत Holy Basil या Sacred Basil क्यों कहता है, उसका कारण यही है कि घायल ईसा की चिकित्सा इसी पवित्र पौधे के जरिये हुई थी। आज भी ग्रीक ऑर्थोडॉक्स चर्च "पवित्र जीवन जल" में तुलसी मिलाते हैं और सलीब पर झूलते ईसा की मूर्ति के नीचे तुलसी वाले गमले रखतें हैं।
हिन्दू धर्म में तो खैर तुलसी की महत्ता पर लिखना वक़्त ज़ाया करना है क्योंकि यहाँ तो उसे कहा ही गया है "बिष्णुप्रिया" यही उसकी महत्ता बता देता है, बाकी इस पवित्र पौधे की महत्ता इस्लाम मत में भी तस्लीम की गई है (विस्तार भय से यहाँ लिखना संभव नहीं)
क्रिसमस के अवसर पर किसी महत्वहीन से पौधे क्रिसमस ट्री के सामने बल्ब जलाकर मूर्ख बनने से बेहतर है कि पवित्र तुलसी के नीचे दीपक जलाकर और उसके गुणों की महत्ता स्वीकार कर वैज्ञानिक सोच वाला बना जाये। तुलसी की धार्मिक महत्ता तो ईसाई धर्म में भी कम नहीं है।
आप इस बार से ही क्यों न की जाये?
#मेरी_क्रिसमस_और_संता_क्लाज;
वैसे तो इस महीने की दस पोस्ट में काफ़ी कुछ लिखा लेकिन बीच में ही सीरीज़ रोकना पड़ा छलावे का यह आधुनिक हथियार बच गया था तो सोचा आज क्रिसमस की पूर्व संध्या पर कुछ गिफ़्ट हमारी तरफ़ से भी दे दिया जाए
वैसे तो संता का उदय इशू मशीह के काफ़ी बाद का है कुछ जानकार इसे २८० वर्ष बाद और कुछ लगभग ४०० वर्ष बाद बताते हैं जिसमें से २८० वर्ष बाद का आँकड़ा ज़्यादा सटीक है
ईशॉ के जन्म के २८० वर्ष पश्चात सेंट नीकोलॉस का जन्म तुर्कीस्तान के मायरा शहर में हुआ मशिही शिक्षा में रुचि होने के कारण जल्द ही १७ वर्ष की उम्र में पादरी बन गए और आगे चलकर एशिया माईनर के विशप बने
यहाँ से मशिही पंथ प्रचार और मत परिवर्तन में प्रलोभन का पहला अध्याय सुरु हुआ जो की ज़्यादा कारगर नहीं हुआ कालांतर में बस इतना ही हो सका की संता की स्थापना हुई और वह क्रिसमस की पूर्व संध्या पर ग़रीब बच्चों में उपहार देने जाते थे ताकि वह लोग अपना त्योहार मना सके
बहुत सारी भ्रांतियाँ हैं जिनमें कुछ प्रमुख हैं जैसे की संता आज भी अंटार्कटिक में रहते हैं और उड़ने वाले रंडियर्स की सवारी करते हैं जैसा की चित्र में दिखाया गया है नीचे यह सब कोरी बकवास है
#आधुनिक संता का अस्तित्व सन १९३० में आया क्यूँ की मतांतरण की स्पीड स्लो हो गई थी इसलिए संता को कमर्शियल तरीक़े से लॉंच किया गया Coca-Cola कम्पनी द्वारा जो की लगातार ३०-३५ साल तक लगातार चला विज्ञापनो में जब तक की सबको याद नहीं हो गया उसके परिणाम स्वरूप सारे बच्चों को संता याद हो गया
तो भाइयों यह जो नया लाल पोशाक धारी दढ़ियल संता है न यह वही Coca cola का कॉन्सेप्ट है
ईसाई देशों में इस समय क्रिसमस डे की धूम है, भारत में भी कुछ नासमझ कुछ मुर्ख हिन्दू क्रिसमस की बधाई देते हैं, उनके साथ क्रिसमस मनाते हैं पर उनको पता नहीं है कि क्रिसमस क्यों मनाई जाती है.
लोगों का भ्रम है कि इस दिन यीशु मसीह का जन्मदिन होता है पर सच्चाई यह है कि 25 दिसम्बर का ईसा मसीह के जन्मदिन से कोई सम्बन्ध नहीं है, एन्नो डोमिनी काल प्रणाली के आधार पर यीशु का जन्म 7 ई.पू. से 2 ई.पू. के बीच हुआ था. वास्तव में पूर्व समय में 25 दिसम्बर को मकर संक्रांति पर्व आता था और यूरोप अमेरिका आदि देश धूमधाम से इस दिन सूर्य उपासना करते थे. सूर्य और पृथ्वी की गति के कारण मकर संक्रांति लगभग 80 वर्षों में एक दिन आगे खिसक जाती है. सायन गणना के अनुसार 22 दिसंबर को सूर्य उत्तरायण की ओर व 22 जून को दक्षिणायन की ओर गति करता है. सायन गणना ही प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती है, जिसके अनुसार 22 दिसंबर को सूर्य क्षितिज वृत्त में अपने दक्षिण जाने की सीमा समाप्त करके उत्तर की ओर बढ़ना आरंभ करता है, इसलिए 25 को मकर संक्रांति मनाते थे. विश्वकोष में दी गई जानकारी के अनुसार सूर्यपूजा को समाप्त करने के उद्देश्य से क्रिसमस डे का प्रारम्भ किया गया. ईस्वी सन् 325 में निकेया अब इजनिक तुर्की नाम के स्थान पर सम्राट कांस्टेन्टाइन ने प्रमुख पादरियों का एक सम्मेलन किया और उसमें ईसाईयत को प्रभावी करने की योजना बनाई गई. पूरे यूरोप के 318 पादरी उसमें सम्मिलित हुए, उसी में निर्णय हुआ कि 25 दिसम्बर मकर संक्रान्ति को सूर्यपूजा के स्थान पर ईसा पूजा की परम्परा डाली जाये. यीशु का क्रिसमस से कोई लेना देना है और न ही संता क्लॉज से, फिर भी भारत में पढ़े लिखे लोग बिना कारण पर्व मनाते हैं ये सब सनातन पुरातन भारतीय संस्कृति खत्म करके ईसाईकरण के लिए भारत में क्रिसमस डे मनाया जाता है.
हिन्दुओं का नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरु होता है,
हिन्दू भारतीय संस्कृति के महान ऋषि मुनियों की संतानें हैं इसलिये शराब पीने वाला, मांस खाने वाला अंग्रेजो का नववर्ष मनाना भारत वासियों को शोभा नहीं देता है. भारत में जितने सरकारी कार्य है वो 31 मार्च को बन्द होकर 2 अप्रैल से नये तरीके से शुरू होते हैं क्योंकि भारतीय नववर्ष उसी समय आता है. हिन्दू संतों ने हमें सदा भारत की दिव्य संस्कृति से परिचित कराया है और आज भी हिन्दू संत हिन्दू संस्कृति का परिचय चारों दिशाओं में फैला रहे हैं, इसी कारण उन्हें विधर्मियों द्वारा न जाने कितना कुछ सहन भी करना पड़ा है.
देश में सुख, सौहार्द, स्वास्थ्य व् शांति से जन मानस का जीवन मंगलमय हो इस लोकहितकारी उद्देश्य से हिंदू संतो ने 25 दिसम्बर तुलसी पूजन दिवस के रूप में शुरू करवाया, आप भी 25 दिसम्बर तुलसी पूजन करके मनाये. तुलसी के पूजन से मनोबल, चारित्र्यबल व् आरोग्य बल बढ़ता है, मानसिक अवसाद व आत्महत्या आदि से रक्षा होती है. मरने के बाद भी मोक्ष देनेवाली तुलसी पूजन की महत्ता बताकर जन-मानस को भारतीय संस्कृति के इस सूक्ष्म ऋषि विज्ञान से परिचित कराया हिन्दू संतों ने. 25 दिसम्बर को प्लास्टिक के पेड़ पर बल्ब जलाने की बजाय 24 घण्टे ऑक्सीजन देने वाली माता तुलसी का पूजन करें.
क्रिसमस ट्री के नीचे बल्ब जलाकर बेबकूफ कहलाने के बजाये तुलसी के नीचे दीपक जलाकर वैज्ञानिक सोच वाला बनिये.
___________________ जब ईसा मसीह को यहूदी धर्मगुरुओं ने पिलातुस के सामने उपस्थित किया था इसी दौरान उस रोमन गवर्नर को अपनी पत्नी का संदेश मिला जिसमें उसने कहा कि 'तुम इस धर्मी के मामले में हाथ मत डालना क्योंकि आज मैंने स्वप्न में उसके कारण बहुत दुःख उठाये हैं। इस कारण से पिलातुस ईसा को सजा देने के पक्ष में नहीं था और हर संभव कोशिश कर रहा था कि किसी तरह उसे ईसा को सजा सुनाने का पाप न करना पड़े परंतु यहूदी धर्मगुरुओं के आगे वह हार हो गया और ईसा को सलीब पर चढ़ाने का आदेश जारी करते हुए उसने पानी लेकर अपने हाथ धोये और कहा कि मैं इस धर्मी के लहू से पाक हूँ, आगे तुम समझो।
इसके बाद ईसा मसीह को शुक्रवार दोपहर में सूली पर चढ़ा दिया गया और तीसरे पहर में रोमन सैनिकों को लगा कि ईसा का निधन हो गया है। इसी दौरान ईसा के एक छुपे हुये शिष्य युसूफ जो अरिमितियाह का रहना वाले था रोमन गवर्नर के पास गया और उससे ईसा के शरीर को सूली से उतार लेने की आज्ञा माँगी और आज्ञा प्राप्त कर उसने ईसा के शरीर को सलीब से उतारा और छिपाकर अपने एक निहायत व्यक्तिगत बाग़ में ले गया और वहां एक बड़े से हवादार गुफा में ईसा के शरीर को रखकर उसके मुंह पर एक बड़ा सा पत्थर रख दिया.
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कहतें हैं कि ईसा को लेकर रोमन गवर्नर पिलातुस, मरियम मगदलीनी, अरिमितियाह के युसूफ और ईसा के कुछ दूसरे शिष्यों ने एक शानदार योजना बनाई थी। योजना ये थी कि शुक्रवार का दिन ईसा के मुक़दमे की सुनवाई के लिये रखा जाये ताकि अगर उन्हें सलीब दिया जाने का फैसला सुनाना पड़े तो उसी दिन सूर्यास्त से पहले-पहले उन्हें सलीब से उतार लिया जायेगा क्योंकि शनिवार का दिन यहूदियों के लिये विश्राम दिवस होता है इसलिये शुक्रवार के दिन वो सूर्यास्त के बाद किसी अपराधी को सलीब पर नहीं रहने देते. ईसा दोपहर में सलीब पर चढ़ाये गये फिर तीन घंटे बाद पीड़ा के कारण बेहोश हो गये और उनके बेहोश होते ही उनके शुभचिंतकों ने यह शोर बरपा कर दिया कि ये तो मर गया। उधर पिलातुस ने ये जानते हुए भी कि तीन घंटे में किसी की भी सलीब पर मौत नहीं होती युसूफ को ये आज्ञा दे दी कि वो ईसा के शरीर को उतार कर अपने व्यक्तिगत बाग़ में ले जाये। युसूफ को पता था कि ईसा मरे नहीं हैं बल्कि पीड़ा की अधिकता से वो सिर्फ बेहोश हैं, उसने ईसा को मिट्टी के अंदर दफन नहीं किया बल्कि उनको एक बड़े से हवादार गुफा में रख दिया। मरियम मगदलीनी और ईसा की माँ रविवार सुबह-सुबह मुंह अँधेरे ही कुछ औषधियों के साथ इस ख्याल से उस गुफा के पास आई कि घायल ईसा की चिकित्सा की जाये पर जब वो वहां आई तब तक प्राथमिक उपचार के बाद ईसा होश में आ चुके थे और यहूदियों के भय से वहां माली के भेष में छुपे हुए थे।
मरियम मगदलीनी के लाये औषधियों से उनके ज़ख्मों का इलाज किया गया और फिर वो चुपके से अपनी माँ और मरियम मगदलीनी के साथ वहां से निकल कर भारत आ गए और अपनी जिन्दगी के शेष दन उन्होंने यहीं गुजारा।
ऊपर इतनी भूमिका लिखने की आवश्यकता इसलिये थी क्योंकि अरिमितियाह के युसूफ के जिस बाग़ में ईसा सलीब से उतारे जाने के बाद लाये गये थे वो तुलसी का बाग़ था। यानि अरिमितियाह के युसूफ ने जानबुझकर ईसा के लिये उस बाग़ को चुना था जिसमें 'औषधीय गुणों की खान' तुलसी के पौधे बहुतायत से थे। आपने कभी गौर किया है कि तुलसी को पश्चिमी जगत Holy Basil या Sacred Basil क्यों कहता है, उसका कारण यही है कि घायल ईसा की चिकित्सा इसी पवित्र पौधे के जरिये हुई थी। आज भी ग्रीक ऑर्थोडॉक्स चर्च "पवित्र जीवन जल" में तुलसी मिलाते हैं और सलीब पर झूलते ईसा की मूर्ति के नीचे तुलसी वाले गमले रखतें हैं।
हिन्दू धर्म में तो खैर तुलसी की महत्ता पर लिखना वक़्त ज़ाया करना है क्योंकि यहाँ तो उसे कहा ही गया है "बिष्णुप्रिया" यही उसकी महत्ता बता देता है, बाकी इस पवित्र पौधे की महत्ता इस्लाम मत में भी तस्लीम की गई है (विस्तार भय से यहाँ लिखना संभव नहीं)
क्रिसमस के अवसर पर किसी महत्वहीन से पौधे क्रिसमस ट्री के सामने बल्ब जलाकर मूर्ख बनने से बेहतर है कि पवित्र तुलसी के नीचे दीपक जलाकर और उसके गुणों की महत्ता स्वीकार कर वैज्ञानिक सोच वाला बना जाये। तुलसी की धार्मिक महत्ता तो ईसाई धर्म में भी कम नहीं है।
आप इस बार से ही क्यों न की जाये?
#मेरी_क्रिसमस_और_संता_क्लाज;
वैसे तो इस महीने की दस पोस्ट में काफ़ी कुछ लिखा लेकिन बीच में ही सीरीज़ रोकना पड़ा छलावे का यह आधुनिक हथियार बच गया था तो सोचा आज क्रिसमस की पूर्व संध्या पर कुछ गिफ़्ट हमारी तरफ़ से भी दे दिया जाए
वैसे तो संता का उदय इशू मशीह के काफ़ी बाद का है कुछ जानकार इसे २८० वर्ष बाद और कुछ लगभग ४०० वर्ष बाद बताते हैं जिसमें से २८० वर्ष बाद का आँकड़ा ज़्यादा सटीक है
ईशॉ के जन्म के २८० वर्ष पश्चात सेंट नीकोलॉस का जन्म तुर्कीस्तान के मायरा शहर में हुआ मशिही शिक्षा में रुचि होने के कारण जल्द ही १७ वर्ष की उम्र में पादरी बन गए और आगे चलकर एशिया माईनर के विशप बने
यहाँ से मशिही पंथ प्रचार और मत परिवर्तन में प्रलोभन का पहला अध्याय सुरु हुआ जो की ज़्यादा कारगर नहीं हुआ कालांतर में बस इतना ही हो सका की संता की स्थापना हुई और वह क्रिसमस की पूर्व संध्या पर ग़रीब बच्चों में उपहार देने जाते थे ताकि वह लोग अपना त्योहार मना सके
बहुत सारी भ्रांतियाँ हैं जिनमें कुछ प्रमुख हैं जैसे की संता आज भी अंटार्कटिक में रहते हैं और उड़ने वाले रंडियर्स की सवारी करते हैं जैसा की चित्र में दिखाया गया है नीचे यह सब कोरी बकवास है
#आधुनिक संता का अस्तित्व सन १९३० में आया क्यूँ की मतांतरण की स्पीड स्लो हो गई थी इसलिए संता को कमर्शियल तरीक़े से लॉंच किया गया Coca-Cola कम्पनी द्वारा जो की लगातार ३०-३५ साल तक लगातार चला विज्ञापनो में जब तक की सबको याद नहीं हो गया उसके परिणाम स्वरूप सारे बच्चों को संता याद हो गया
तो भाइयों यह जो नया लाल पोशाक धारी दढ़ियल संता है न यह वही Coca cola का कॉन्सेप्ट है

