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#बलात्कार ... !!
भाषा, भूषा, संस्कृति , पर्व -त्योहार ,
दैनिक नित्य कर्म ,
सबका बलात्कार हुआ है ।

मैने बहुत सोच समझ कर शब्द “ बलात्कार “ के प्रयोग से यह पोस्ट प्रारम्भ करी है और
पुन: जगाने का प्रयास कर रहा हूँ ।

आप किसी भी वालीवुड की फ़िल्म देख लीजिए या अपने 95% आसपास के लोगों से बात करके देखिए और आत्मचिंतन करना हो तो अपनी भाषा को भी खंगालिए ।

आप पाएँगे अधिकतर Positive शब्द , उर्दू या अंग्रेज़ी के हैं और अधिकतर Negative शब्द संस्कृतनिष्ठ हिंदी के हैं । आप स्वंयम यह प्रयोग करके देख सकते हैं ।

मैं यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की मैं किसी एक भाषा को महान या दूसरी भाषा की बुराई नहीं कर रहा हूँ और न हीं भाषा के जीवंत प्रवाह में बाधा डालने के लिए कह रहा हूँ । भाषा , समाज और भूगोल और समय के साथ बदलती रहती है , परन्तु यहाँ आपकी मूल भाषा को बलात् , दूषित किया जा रहा है ।

जैसा की आप लोग अब मानते ही हैं की उर्दू भाषा में शब्द मुख्यत: उन स्थानो से लिए गए हैं जहाँ दूत मजहब प्रभावी है । यहाँ तक की आप तुर्की के कोठों पर जाकर कोठे पर बोले जानी वाली भाषा सुने जिसे वह “ ओर्दू” बोलते हैं आप का मन विचलित हो जाएगा ।

भाषा का प्रभाव , हर समय मनुष्य के मन पर पड़ता है , विचारों पर पड़ता है और क्रियाकलापों पर पड़ता है । और अक्षर को तो हम ब्रह्म मानते हैं , श्रुति कहती है नक्षरति अर्थात न क्षरति इति अक्षर: । अर्थात जिसका क्षर न हो वह अक्षर है ।

और हम शब्द का प्रयोग बहुत सोच समझ कर करते थे । जैसे , यह बैल है । यह कुत्ता है , यहाँ पर शब्द जाति बता रहा है ।यह कुत्ता काला है यहाँ पर काला रंग बताना, शब्द के द्वारा गुण बतलाना है ।

क्रिया बताना , ड्राइवर है , खलासी है । शब्द के द्वारा संबंध बताना पिता पुत्र , मित्र इत्यादि ।और हम यह मानते हैं की शब्द द्वारा परमात्मा का बोध नहीं हो सकता । वह अनिर्वचनीय है ।क्षर और अक्षर का प्रयोजन विशेष था ।

परन्तु , 1950 के बाद चारो दिशाओं से आप पर चहुँ ओर हमला हुआ और आज भी हो रहा है ।

01. औरतों के 2018 के कपड़े या तो फटी जिंस या अरबी दिखने वाला सलवार कुर्ता ( जालंधर , लुधियाना , लाहौरी, अफ़ग़ानी सूट होते होते वह अरबी हो चुका है ) जिस पर बुर्क़ा पड़ने की देर है ।

02. चिल्ली चिकेन या पनीर चिल्ली भारत का मुख्य भोजन बन चुका है , बन रहा है , नॉन के साथ । और फटी जीन्स वाले पीत्सा और नूडल्स पर ।यह रहा आपका अन्नमय कोष ।

03. पर्व त्योहार ,दीवाली होली या दही हांडी की ऊँचाई पर और क्या लिखना ?

04. संस्कृति , कितनी बच पा रही है वह सबरीमाला का कोठे द्वारा अशुद्धिकरण आपके सामने है ।

अब आता हूँ , मूल पोस्ट पर । 1950 के बाद बहुत से नए वैज्ञानिक अविष्कार हुए और बहुत से नए शब्दों की आवश्यकता भी थी । अंग्रेज भी “गुरू” “ पंडित “ जैसे सहस्त्रो शब्द अपने भाषाकोश में डालते है और यही भाषा का विकाश कहलाता है ।

पर भारत में वामपंथियों ने जो शिक्षा के नियामक बने हुए थे उन्होंने पहले आपके अंदर हीन भावना भरना प्रारम्भ किया । ट्रेन को हिंदी में कह दिया गया “ लौहपथगामिनि” और आपके भाषा की खिल्ली उड़ाई गई । कुछ लोगो के मन में बैठ गया की संस्कृत भाषा और उसकी बेटियाँ समर्थ ही नहीं है ।

फिर संस्कृत के बहुत से शब्दो का वह अनुवाद कर दिया गया जिसका वास्तव में उससे कोई अधिक संबंध ही नहीं था ।

तीसरा, सभी अच्छे कामों के लिए उर्दू शब्द जैसे इमानदार , सही , ग़लत इत्यादि प्रयोग में किया जाने लगा ।

जैसे आपमें से 99.9% लोगो को “ असत्” शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है वही पता नहीं है ।

और चौथा सबके भयानक प्रहार किया गया , सारे बुरे कामों के लिए चुन चुन कर हिन्दी संस्कृत शब्दों का प्रयोग । जैसे की “ बलात्कार “।

वह क्रिया या आचरण जो अरब और तुर्की का सामान्य आचरण है उसके लिए वह आपके शब्द प्रयोग कर रहे हैं ।

बलात्कार का समानार्थी शब्द कदाचित उर्दू में “ ज़बरदस्ती “ होता है । पर ज़बरदस्त का प्रयोग तो ज़बरदस्त मकान है , ज़बरदस्त लड़की है, ज़बरदस्त कमाई है के लिए हो रहा है । अर्थात उनके गंदे शब्द भी Positive बन गए और आपके अच्छे शब्द विलुप्त कर दिए गए और आपके वह शब्द जिनका प्रयोजन कुछ और था , को Negative बना दिया गया ।
आप की भाषा , संस्कृति सभी कुछ
वैभवशाली है,
अपने मूल पर लौटिए ।
दूसरों की घर वापसी दूर की बात है,
आपको स्वंयम घर वापसी पहले करनी है ।

हर हर महादेव

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