इदमिद् वा उ भेषजमिदं रुद्रस्य भेषजम् । येनेषुमेकतज¬नां शतशल्यामपब्रवत् ॥ अथर्व 6-57-1
निश्चय ही (भेषजम्) (व्रण - घाव, दर्द, अल्सर, फोड़ा, ट्यूमर, कैंसर, उबाल, निशान, cicatrix, दरारें रोग को दूर करने की ) दवाई है | (इदम् रुद्रस्य भेषजम्) यह रुद्र सम्बंधी औषध है| (येन)जिस औषध की सहायता से महादेव ने त्रिपुर संहार के समय ((एकते जनां)एक वेणु दण्ड वाले (शतशल्यां)सौ नोकदार कीलों वाले(इषुस्) वाण को (अप्रबत् लक्ष्य के समीप पहुंचाया था |*अथर्व 6.57.1
• (हरिवंश पुराणांतर्गत भविष्य पर्व |रुद्र: रोदयतिं सर्वं अन्तकाले इति रुद्र: |एकतेजनाम् -- एकस्तेजनो वेणुकाण्डो यस्या: सा ताम् | )
• Bacteriophages is a virus which infects bacteria and can be used as an alternative to antibiotic treatment.
• Modern researches have confirmed that Cow has the largest and biggest ‘Bacteriophages’.
जालाषेणाभि षिञ्चत जलाषेणोप सिञ्चत। जालाषमुग्रं भेषजं ते¬न ¬नो मृड जीवसे ॥ अथर्व 6-57-2
हे परिचारको, (जालाषेण) जल से- गोमूत्र फे¬नामिश्रित जल से (अभिषिञ्चत) व्रण को अच्छी तरह धोओ । (जालाषेण) उसी जलोषध से (उप सिंञ्चत) उस के समीपस्थ भाग को प्रक्षाल¬न करो । क्योंकि (जलाषम् उग्र भेषजम्) गोमूत्र फे¬न मिश्रित जल रोगि¬निवृत्ति की उग्र दवाई है। हे रुद्र (ते¬न) उस औषधि से (जीवसे ¬न मृड) जीव¬न प्रदा¬न कर¬ने के लिए हम पर कृपा करो। अथर्व6.57.2
शं च ¬नो मयश्च ¬नो मा च ¬नः कि च¬नाममत् । क्षमा रपो विश्वं ¬नो अस्तु भेषजं सर्वं ¬नो अस्तु भेषजम् ॥ अथर्व 6-57-3
हे देव हमें आरोग्य और सुख मिले। हमारी प्रजा पशु आदि कोई भी रोग ग्रस्त ¬न हो। पाप की शान्ति हो। स्थावर जंगम यह समस्त विश्व हमारे लिए औषधिरूप हों । सब कुछ औषधि रूप हो।अथर्व 6.57.3
ये 3 वेद मंत्र गाय के मूत्र का वर्णन ऐसे जीवों जैसे unicellular ameba(वेद उन्हें मुंह के बिना जीव कहते हैं) के खिलाफ अंतिम उपचार के रूप में करते हैं । गाय मूत्र का उपयोग जोरदार हलचल के साथ मिश्रण के रूप में सुझाव दिया जाता है - होम्योपैथिक और बायोडायनामिक तैयारी के समान ही पानी को सक्रिय करने वाला पानी। पानी के इलाज के लिए आधुनिक तकनीकें इस तरह के पानी को 'सक्रिय पानी, क्षारित पानी, संरचित जल आदि के रूप में वर्णित करती हैं। रूसी वैज्ञानिकों ने इस तरह के पानी पर काफी अनुसंधान कार्य किया है। इस तरह के पानी की जीवाणुनाशक गुणों के अलावा, मिट्टी में सूक्ष्मजीवों में सुधार करके मृदा में सूक्ष्माणुओं की प्रजनन क्षमता में बड़े सुधार इस तरह के पानी से सिंचित होने पर कृषि फसल उत्पादन में वृद्धि हुई है। वेदों के उपर्युक्त संदर्भों को देखते हुए गंगा जल के जीवाणुनाशक कार्यों के अध्ययन के अलावा, यह हमारे कृषि वैज्ञानिकों के लिए भी यह महत्वपूर्ण है कि गंगा जल जैसे चेतन्य जल से सिंचाई व्यवस्था से कृषि में अधिक उत्पाद सम्भव है । साभार श्री सुबोध जी संकलन अजय कर्मयोगी
