मेरे परम मित्र पूर्ण सहयोगी एवं राष्ट्रीय क्रांतिकारी युवा संत श्री अध्वरेशानंद जी महाराज की हत्या संघ कार्यालय सिरोही में चाकू घोप कर किया गया है
प्रस्तुत लेख हरीश गुप्ता जी के सौजन्य से..........
अपने बच्चे को तो चूमना है भले ही बीच मे बहती नाक क्यों न आती हो?
स्वामी अध्वरेशानंद जी की हत्या यदि किसी मुस्लिम या ईसाई ने की होती तो पूरे देश के समाचार पत्रों में सुर्खियां बनी होतीं।
परन्तु यदि हत्या कोई संघ का प्रचारक कर दे तो उसे दिल्ली के किसी समाचार पत्र में भी स्थान नही मिलेगा, और स्थानीय अखबारों में भी तथ्यो को घुमाकर दिखाया जाएगा।
संघ जिला प्रचारक द्वारा हिन्दू महासभा के स्वामी अध्वरेशानन्द सरस्वती जी की नृशंस हत्या पर ऐसा ही हो रहा है।
जिसकी हत्या हुई उसकी गर्दन में छुरा घोंप कर गर्दन काट दी गई उसके बाद शासन और प्रशासन मिलकर यह दिखा रहे हैं कि जिसकी गर्दन कटी उसके हाथ मे छुरा था... क्या यह संभव है?
जिसकी गर्दन कट रही हो वह अपनी पीड़ा कर कारण गर्दन को पकड़ेगा त्वरित गति से... उसके हाथ मे जो भी होगा वह हाथ से छूट जाएगा।
परन्तु जैसा कि पहली line में कहा गया है यहां वही बात हो रही है।
सबसे बुरा यह अनुभव यह सामने आया कि संघ के आदेश और दबाव के बाद कोई भी भगवाधारी सन्त सन्यासी सामने नही आ रहा इस नृशंस हत्या का विरोध करने हेतु।
स्वयं जिस गुरु से दीक्षा ली वह भी संघ के दबाव में अब सामने नही आ रहा।
अतः यह निष्कर्ष भी स्पष्ट है कि भगवाधारियों को किसी भी राजनैतिक पार्टी का सदस्य नही होना चाहिए क्योंकि उसके बाद, यदि उनकी समर्थक पार्टी सत्ता में आ जाए तो वह...
धर्म प्रदत्त मर्यादाओं के अतिक्रमण का,
मन्दिरो के विध्वंस का,
गौहत्या का,
काला धन वापिस लाने,
मन्दिरों के अधिग्रहण,
सनातन धर्म के संरक्षण,
आदि का विरोध और समर्थन विषयानुसार, परिस्थितिनुसार नही कर पाते।
शासन प्रशासन सबको चुप करवा देगा।
उत्तम गिरी नामक लम्पट धूर्त गंवार आज संघ का नायक बन चुका है...
और स्वामी अध्वरेशानंद हमे छोड़कर जा चुके हैं... अकेले हैं... उन्होंने सनातन धर्म के संरक्षण हेतु जो जोखिम लिए वह किसके हेतु थे?
आज उनका साथ कौन देगा?
कृपया अधिक से अधिक कॉपी पेस्ट करके इस विषय को आगे बढ़ाएं।
अगला नम्बर आपका है...
मौन धारण कर चुके संघी भगवा धारियों को दिनकर पंक्तियां अवश्य स्मरण रखनी चाहियें...
"जो तटस्थ हैं... समय लिखेगा उनके भी अपराध"
पुत्र वियोग का शोक अभी पूर्ण नहीं हुआ था एक और अग्नि परीक्षा लिया जा रहा है मेरे परम मित्र और मेरे दाएं बाजू श्री अवधेशानंद जी महाराज जिन्होंने हमारे साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का निर्णय किया था और एक समर्थ गुरुकुल का भूमि पूजन और आधार सिला भी रखी थी 732000 गुरुकुलों के निर्माण के प्रति बड़े सजग ढंग से और दृढ़ता के साथ आगे आकर हमें कंधा से कंधा मिलाकर सहयोग प्रदान कर रहे थे उनका अंतरराष्ट्रीय खड़यंत्रों के प्रति एक गहरी जानकारी और रुचि थी जो आने वाले समय के लिए भारत की दिशा बदलने में एक निर्णायक भूमिका साबित हो सकती थी की अचानक उनकी हत्या संघ कार्यालय सिरोही राजस्थान में हो गई अब मेरी बांह कट गई और मैं अत्यंत व्यथित हो चुका हूं पर हार नहीं मानी है पग पग पर कठिन परीक्षा हो रही है पता नहीं क्या ईश्वर करवाना चाह रहे हैं
नीचे लिखा लेख यह मेरा नहीं है ना तो इससे विचलित होना है ना तो प्रतिशोध और और नाही आवेग में इसे ले और इसका मतलब यह भी ना निकालें की यह आर एस एस के सभी श्रेष्ठ जनों का कोई विरोध है या भाजपा का कोई विरोध है यह विचार करने का एक अन्य पहलू भी है इसलिए हर पहलू से आपको अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है
प्रस्तुत लेख हरीश गुप्ता जी के सौजन्य से..........
अपने बच्चे को तो चूमना है भले ही बीच मे बहती नाक क्यों न आती हो?
स्वामी अध्वरेशानंद जी की हत्या यदि किसी मुस्लिम या ईसाई ने की होती तो पूरे देश के समाचार पत्रों में सुर्खियां बनी होतीं।
परन्तु यदि हत्या कोई संघ का प्रचारक कर दे तो उसे दिल्ली के किसी समाचार पत्र में भी स्थान नही मिलेगा, और स्थानीय अखबारों में भी तथ्यो को घुमाकर दिखाया जाएगा।
संघ जिला प्रचारक द्वारा हिन्दू महासभा के स्वामी अध्वरेशानन्द सरस्वती जी की नृशंस हत्या पर ऐसा ही हो रहा है।
जिसकी हत्या हुई उसकी गर्दन में छुरा घोंप कर गर्दन काट दी गई उसके बाद शासन और प्रशासन मिलकर यह दिखा रहे हैं कि जिसकी गर्दन कटी उसके हाथ मे छुरा था... क्या यह संभव है?
जिसकी गर्दन कट रही हो वह अपनी पीड़ा कर कारण गर्दन को पकड़ेगा त्वरित गति से... उसके हाथ मे जो भी होगा वह हाथ से छूट जाएगा।
परन्तु जैसा कि पहली line में कहा गया है यहां वही बात हो रही है।
सबसे बुरा यह अनुभव यह सामने आया कि संघ के आदेश और दबाव के बाद कोई भी भगवाधारी सन्त सन्यासी सामने नही आ रहा इस नृशंस हत्या का विरोध करने हेतु।
स्वयं जिस गुरु से दीक्षा ली वह भी संघ के दबाव में अब सामने नही आ रहा।
अतः यह निष्कर्ष भी स्पष्ट है कि भगवाधारियों को किसी भी राजनैतिक पार्टी का सदस्य नही होना चाहिए क्योंकि उसके बाद, यदि उनकी समर्थक पार्टी सत्ता में आ जाए तो वह...
धर्म प्रदत्त मर्यादाओं के अतिक्रमण का,
मन्दिरो के विध्वंस का,
गौहत्या का,
काला धन वापिस लाने,
मन्दिरों के अधिग्रहण,
सनातन धर्म के संरक्षण,
आदि का विरोध और समर्थन विषयानुसार, परिस्थितिनुसार नही कर पाते।
शासन प्रशासन सबको चुप करवा देगा।
उत्तम गिरी नामक लम्पट धूर्त गंवार आज संघ का नायक बन चुका है...
और स्वामी अध्वरेशानंद हमे छोड़कर जा चुके हैं... अकेले हैं... उन्होंने सनातन धर्म के संरक्षण हेतु जो जोखिम लिए वह किसके हेतु थे?
आज उनका साथ कौन देगा?
कृपया अधिक से अधिक कॉपी पेस्ट करके इस विषय को आगे बढ़ाएं।
अगला नम्बर आपका है...
मौन धारण कर चुके संघी भगवा धारियों को दिनकर पंक्तियां अवश्य स्मरण रखनी चाहियें...
"जो तटस्थ हैं... समय लिखेगा उनके भी अपराध"
पुत्र वियोग का शोक अभी पूर्ण नहीं हुआ था एक और अग्नि परीक्षा लिया जा रहा है मेरे परम मित्र और मेरे दाएं बाजू श्री अवधेशानंद जी महाराज जिन्होंने हमारे साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का निर्णय किया था और एक समर्थ गुरुकुल का भूमि पूजन और आधार सिला भी रखी थी 732000 गुरुकुलों के निर्माण के प्रति बड़े सजग ढंग से और दृढ़ता के साथ आगे आकर हमें कंधा से कंधा मिलाकर सहयोग प्रदान कर रहे थे उनका अंतरराष्ट्रीय खड़यंत्रों के प्रति एक गहरी जानकारी और रुचि थी जो आने वाले समय के लिए भारत की दिशा बदलने में एक निर्णायक भूमिका साबित हो सकती थी की अचानक उनकी हत्या संघ कार्यालय सिरोही राजस्थान में हो गई अब मेरी बांह कट गई और मैं अत्यंत व्यथित हो चुका हूं पर हार नहीं मानी है पग पग पर कठिन परीक्षा हो रही है पता नहीं क्या ईश्वर करवाना चाह रहे हैं
नीचे लिखा लेख यह मेरा नहीं है ना तो इससे विचलित होना है ना तो प्रतिशोध और और नाही आवेग में इसे ले और इसका मतलब यह भी ना निकालें की यह आर एस एस के सभी श्रेष्ठ जनों का कोई विरोध है या भाजपा का कोई विरोध है यह विचार करने का एक अन्य पहलू भी है इसलिए हर पहलू से आपको अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है
