आओ मनाते हैं #नवरात्रि
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शक्ति उपासना के लिये नवरात्रि का त्यौहार भारत ही नहीं अपितु पूरे विश्व मे जहाँ भी हमारे #हिन्दू भाई-बहन हैं... उन सब जगहों पर वो अपनी अपनी व्यवस्था के अनुसार मनाते हैं...
शक्ति उपासना का सर्वश्रेष्ठ समय है नवरात्रि... का काल...जो आश्विन और चैत्र के समय पड़ता है
इस समय का #वातावरण बहुत अनुकूल होता है...
ना सर्दी का प्रभाव अधिक होता है...और गर्मी तो लगभग समाप्त सी हो जाती है..
सुरम्य वातावरण #ध्यान साधना और शक्ति उपासना के लिये सर्वोत्तम है...
यदि आप शारीरिक शक्ति की बात करें तो यह काल व्यायाम आदि के लिये भी सर्वश्रेष्ठ काल है..
शरीर मे #ऊर्जा और उत्साह खूब होता है...
यह जो आश्विन और चैत्र का काल होता है इस समय सूर्य अपने दक्षिणी गोलार्ध से उत्तरी गोलार्ध मे #प्रवेश करता है...
इन दोनों सन्धियों के बीच रोग के आक्रमण की सम्भावना भी अधिक होती है...
इसीलिए #कार्तिक के अन्तिम आठ दिन वह #अगहन के प्रथम आठ दिनो को आचार्यों ने यमदंष्ट्रा .. यमराज की दाढ़ कहा है इन दिनो पित्त,ज्वर के रोग प्रकुपित न हो...
उससे बचाव के लिए यह दिनचर्या आहार आदि का #परिवर्तन भी विशेष महत्व रखता है।
अतः पूर्ण रूप से #वैज्ञानिक तरीके से हमारे यहाँ नवरात्रि के समय यज्ञ आदि के द्वारा जहाँ वातावरण शुद्ध किया जाता था...
वहीं #उपवास और सात्विक आहार से अपने आप को स्वस्थ रखकर शक्ति साधना की जाती थी...
प्राचीन काल मे #क्षत्रियों मे इस महीने का विशेष महत्व होता था...
क्योंकि बरसात के मौसम मे युद्ध विराम कर दिये जाते थे....
और युद्ध की तैयारी के लिये #शस्त्रों को तैयार करना और #शारीरिक रूप से अभ्यास आदि के द्वारा स्वयं को तैयार करना होता था
और दिग्विजय करने के लिये भी इसी महीने से युद्ध #प्रारम्भ होते थे...
मर्यादा पुरुषोत्तम #श्रीराम ने भी लंका पर आश्विन माह मे ही चढ़ाई की थी...
राजा लोग जब युद्ध मे जाते थे... तो जाने से पहले वो #शक्ति उपासना के पश्चात ही जाते थे...
शक्लृ शक्तौ धातु से शक्ति शब्द बना है जिसका अर्थ है... "य: सर्व्ं जगत् कर्तुं शक्नोति स शक्ति:
अर्थात् - जो सम्पूर्ण जगत को बनाने मे समर्थ है वो #शक्ति है.....
नवरात्रि पूजा उपासना और ध्यान के विषय मे विदेशी विद्वान प्रो. #गोराल्ड ने लिखा है...
"इस समय पूरी प्रकृति रंग बदलती है...
उन्होंने लिखा.. इस समय ये उपासना का चक्र जिन्होंने आरम्भ किया वो वास्तव मे #आइंस्टीन और #न्यूटन से भी अधिक बौद्धिक क्षमता वाले लोग रहे हैं...."
तो नवरात्रि सम्पूर्ण रूप से शक्ति साधना #यज्ञानुष्ठान, उपवास से स्वयं की आत्मिक शारीरिक शुद्धि, आगे की तैयारी और #बुराईयों को समाप्त करने का पर्व है...
हम इसे बहुत #अच्छे से मनाएं....
और जैसे हम नवरात्रि के समय #पवित्रता पूर्वक रहते हैं, मनाते हैं ...ऐसा अभ्यास हम वर्ष भर करें...
इससे जगज्जननी #जगदम्बा भी खुश होंगी और...
चारों ओर एक हर्ष और #उल्लास का वातावरण रहेगा....
आप सभी को नवरात्रि की बहुत बहुत #बधाइयां
️ *दस महाविद्या* ️
धर्म की रक्षा करनी हो तो शक्ति की पूजा आवश्यक है। बिना शक्ति के धर्म को बचा पाना मुश्किल है।
भगवान राम ने भी धर्म की रक्षा के लिए रावण वध के पूर्व नवरात्रि का व्रत रखकर माँ दुर्गा की 9 स्वरूपों की विधिवत पूजन अर्चन की थी, जिससे माँ आदिशक्ति ने प्रसन्न होकर भगवान श्री राम जो को आदि पराशक्ति अस्त्र प्रदान किया था, और भगवान श्री राम ने दशमी के दिन इसी इसी शस्त्र से रावण का संहार किया था।
भगवान श्री राम का प्रकटोत्सव चैत्र नवरात्रि में आता है, इसके पूर्व चैत्र नवरात्रि में माँ आदि शक्ति की पूजा की जाती है। जब कुम्भकरण का पुत्र भीमा को बड़े होने पर ज्ञात हुआ कि भगवान श्री राम जी उसके पिता को मारकर लंका का राज्य विभीषण को दे दिया, तब उसने प्रतिशोध के लिए श्री राम जी से युद्ध किया।
श्री राम जी भी उसे परास्त नहीं कर पाये, अंत में माता सीता जी के हाथों भीमा का वध हुआ।
महाभारत काल में भी भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के पास दिव्यास्त्र होने के बाद भी माँ दुर्गा का कवच धारण कराया था। बर्बरीक के पास भी तीन अमोघ वाण ऐसे थे जिनसे महाभारत का युद्ध एक दिन में समाप्त हो जाता।
प्रद्युम्न की माता भानमती भी माँ भगवती की कृपा से ही प्रद्युम्न को समरासुर पर विजय दिला सकीं। यदि शक्ति के रूप में देखा जाए तो वह समस्त प्राणियों की चैतन्य शक्ति के रूप में विद्यमान है।
भगवान श्री कृष्ण श्री गीता जी के चतुर्थ अध्याय के छठे श्लोक में कहते हैं ....
*अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।*
*प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥*
अर्थात - मैं अजन्मा (जिसका जन्म नहीं होता) और अविनाशीस्वरूप (जिसका विनाश नहीं होता) होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर (नियंता) होते हुए भी अपनी प्रकृति (दुर्गा) को अधीन करके अपनी योगमाया (भगवती जो विष्णु जी की शक्ति है, जो मां यशोदा से गर्भ से उत्तपन्न हुयी और जिसे कंस ने मारना चाहा था) से प्रकट होता हूँ॥6॥
यानि शक्ति रूप में मां भगवती प्रकृति के कण - कण में व्याप्त है। योग, भोग, वासना, सृजन, संहार, पोषण इन्ही के संकल्प मात्र से पूर्ण होते है। माँ आदिशक्ति का बीज मंत्र *"क्लीं"* है।
*ॐ को प्रणव मन्त्र कहते है, जिंसमें त्रि शक्ति समाहित है
यह शक्ति तीन रूपों में विभक्त है, जो अनन्त ब्रह्मांड (जो कल्पना से परे हो) में यह शक्तियांँ श्री ब्रह्माजी, श्री विष्णु जी और श्री महेश जी के रूप में कार्य करती है। यदि इन समस्त ब्रह्माण्डो की तीनों शक्तियों को समाहित कर दिया जाए तब परा शक्ति रह शेष रह जाती है।
वर्तमान समय में यह शक्ति का प्रतीक रूप राजा है। बिना शक्ति के राजा श्री हीन, शक्ति हीन होता है, उसके लिए शाशन करना संभव नही।
छत्रपति शिवाजी अपनी माता जीजाबाई की प्रेरणा से उस पारा शक्ति से पराभूत होकर मुगलों का सर्वनाश कर पाए
आज की नारी अपनी परा शक्ति को भूल गयी, उसने कभी सती अनुसुइया, शैव्या, सीता, सावित्री, दमयंती, मदालसा की शक्तियों का अनुभव नहीं किया।
वह सिर्फ सौंदर्य की प्रतिमूर्ति बनकर र्च गयी है। इसीलिए उनका सबसे अधिक शोषण मुगलों व ईसाइयों द्वारा हो रहा है।
*माँ भगवती के कवच में ऐसी दिव्य शक्तियां निहित है कि कोई भी नकारात्मक शक्ति कवच धारण करने वाले स्त्री या पुरुष के पास बिना उसकी इच्छा के उसे स्पर्श करने की हिम्मत नहीं कर सकती है।
माता सीता से लेकर महाराज विक्रमादित्य की पत्नी इसका प्रमाण है। युद्धों में अदृश्य कवच के रूप में शूरवीर इसे धारण करते है।
मैंने पूर्व में लिखा था, हमारे शरीर के हर मर्म में इन्ही आदि शक्ति के विभिन्न स्वरूपों का निवास है, हम मर्म का उत्प्रेरण करके उन सुशप्त शक्तियों को जगाकर स्वस्थ्य लाभ पाते है।
नवरात्रि में दस महाशक्तियों के रूप में माँ दुर्गा जी के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है, जिससे नकारात्मक शक्तिओ का प्रभाव नष्ट होता है।
लौकिक व अलौकिक की कामनाओं की पूर्ति के लिए साधक माँ के विभिन्न स्वरूपों।की पूजा करके माँ से आशीर्वाद प्राप्त करते है।
प्रवृति के अनुसार इन दस महाविद्याओं को तीन समूहों में विभाजित किया गया है।
१. *सौम्य कोटि ( इनकी प्रवृति सौम्य व कोमल होती है। यह सरल, उदार स्वभाव देवियाँ है।)* - माँ त्रिपुरसुंदरी, माँ भुवनेश्वरी, माँ मातंगी, माँ कमला है।
२. *उग्र कोटि (इनकी प्रवृति उग्र व क्रोध युक्त होती है)* - महाकाली, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बंगलामुखी।
३. *सौम्य उग्र कोटि ( इनकी प्रवृति उग्र होते हुए भी कोमल होती है)*- माँ तारा, त्रिपुर भैरवी देवी सौम्य उग्र कोटि में आती है।
*पहली महाविद्या महाकाली-* यह परमब्रह्म का परम स्वरूप है।
इनका उल्लेख अर्थवेद में महाकाल को वश करने मिलता है। कथिग्राय सूत्र, मुंडका उपनिषद के दूसरे अध्याय में माँ काली के इस स्वरूप का प्रमाण मिलता है।
इन्ही महाकाली की कुरुक्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण की प्ररेणा से अर्जुन ने उपासना कर माता से आशीर्वाद स्वरूप कवच प्राप्त किया था। इन्हें काल रात्रि, विन्ध्वासिनी भी कहा गया है।
महाभारत में तथा पांडव सैनिकों के सपनो में आकर माता काली दर्शन देती थी।
माँ काली का रूप अत्यंत काला होने से इनकी तुलना अमावस्या की रात्रि से की गयी है। माता की तीन आँखे वर्तमान व भूत का प्रतिनिधत्व करती है।
उनके सफेद नुकीले दाँत धर्म का प्रतिनिधित्व करती है, तथा उनकी लपलपाती जीभ अधर्म के विनाश का संकेत देती है।
माता के खुले लम्बे केश काल की प्रचंडता को दर्शाते है। माता के चारो हाथों में खड्ग, कटा हुआ मुंड, तीसरे में खप्पर होता है।
उनके आभूषण गले में मुंडो की माला, तथा कमर पर कटे हुये हाथ यह दर्शाता है कि अधर्मी का कटा सिर व हाथ काल के हाथों में है।
महाकाल पराशक्ति के रूप में माँ काली के इस स्वरूप का किसी भी रूप में अपमान करने का तात्पर्य खुद का सर्वनाश करना है।
माता ने यह रूप अधर्म का नाश करने के लिए धारण किया था। उनका यह स्वरूप पूर्ण रूप से *"आदि परा शक्ति"* का स्वरूप है।
देवी पुराण के अनुसार माँ शरणागत भक्तों को अभयदान देने वाली, दुष्टों का संहार करने वाली, काल गति को नियंत्रित करने वाली है। माता का शक्तिपीठ कोलकत्ता में कालीघाट है। मध्यप्रदेश में उज्जैन में स्थित गढ़ भैरव में माँ काली, गुजरात के पावागढ़ में स्थति माँ काली का सिद्धपीठ है।
जहाँ अनेक तपस्वियों ने सिद्धियां पायी।
माँ के चार रूप काली, शमशान काली, दक्षिणा काली, मातृ काली है।
*माँ का बीज मंत्र -* ॐ ह्रींग श्रीं क्रीं परमेश्वरी कालिके स्वाहा।
सामान्यतः महाकाली का पूजन अमावस्या के दिन किया जाता है।
इस प्रकार दस महाविद्या स्वरूप में माँ काली, माँ तारा, माँ त्रिपुरसुंदरी, माँ भुवनेश्वरी, माँ छिन्नमाता, माँ त्रिपुर भैरवी आदि देवी की पूजा करने से समस्त विपदाओं का नाश होकर सुकृति प्राप्त होती है। माता के विभिन्न स्वरूपों के अलग - अलग बीज सनार भ
धर्म की रक्षा करनी हो तो शक्ति की पूजा आवश्यक है। बिना शक्ति के धर्म को बचा पाना मुश्किल है।
भगवान राम ने भी धर्म की रक्षा के लिए रावण वध के पूर्व नवरात्रि का व्रत रखकर माँ दुर्गा की 9 स्वरूपों की विधिवत पूजन अर्चन की थी, जिससे माँ आदिशक्ति ने प्रसन्न होकर भगवान श्री राम जो को आदि पराशक्ति अस्त्र प्रदान किया था, और भगवान श्री राम ने दशमी के दिन इसी इसी शस्त्र से रावण का संहार किया था।
भगवान श्री राम का प्रकटोत्सव चैत्र नवरात्रि में आता है, इसके पूर्व चैत्र नवरात्रि में माँ आदि शक्ति की पूजा की जाती है। जब कुम्भकरण का पुत्र भीमा को बड़े होने पर ज्ञात हुआ कि भगवान श्री राम जी उसके पिता को मारकर लंका का राज्य विभीषण को दे दिया, तब उसने प्रतिशोध के लिए श्री राम जी से युद्ध किया।
श्री राम जी भी उसे परास्त नहीं कर पाये, अंत में माता सीता जी के हाथों भीमा का वध हुआ।
महाभारत काल में भी भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन के पास दिव्यास्त्र होने के बाद भी माँ दुर्गा का कवच धारण कराया था। बर्बरीक के पास भी तीन अमोघ वाण ऐसे थे जिनसे महाभारत का युद्ध एक दिन में समाप्त हो जाता।
प्रद्युम्न की माता भानमती भी माँ भगवती की कृपा से ही प्रद्युम्न को समरासुर पर विजय दिला सकीं। यदि शक्ति के रूप में देखा जाए तो वह समस्त प्राणियों की चैतन्य शक्ति के रूप में विद्यमान है।
भगवान श्री कृष्ण श्री गीता जी के चतुर्थ अध्याय के छठे श्लोक में कहते हैं ....
*अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।*
*प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥*
अर्थात - मैं अजन्मा (जिसका जन्म नहीं होता) और अविनाशीस्वरूप (जिसका विनाश नहीं होता) होते हुए भी तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर (नियंता) होते हुए भी अपनी प्रकृति (दुर्गा) को अधीन करके अपनी योगमाया (भगवती जो विष्णु जी की शक्ति है, जो मां यशोदा से गर्भ से उत्तपन्न हुयी और जिसे कंस ने मारना चाहा था) से प्रकट होता हूँ॥6॥
यानि शक्ति रूप में मां भगवती प्रकृति के कण - कण में व्याप्त है। योग, भोग, वासना, सृजन, संहार, पोषण इन्ही के संकल्प मात्र से पूर्ण होते है। माँ आदिशक्ति का बीज मंत्र *"क्लीं"* है।
*ॐ को प्रणव मन्त्र कहते है, जिंसमें त्रि शक्ति समाहित है
यह शक्ति तीन रूपों में विभक्त है, जो अनन्त ब्रह्मांड (जो कल्पना से परे हो) में यह शक्तियांँ श्री ब्रह्माजी, श्री विष्णु जी और श्री महेश जी के रूप में कार्य करती है। यदि इन समस्त ब्रह्माण्डो की तीनों शक्तियों को समाहित कर दिया जाए तब परा शक्ति रह शेष रह जाती है।
वर्तमान समय में यह शक्ति का प्रतीक रूप राजा है। बिना शक्ति के राजा श्री हीन, शक्ति हीन होता है, उसके लिए शाशन करना संभव नही।
छत्रपति शिवाजी अपनी माता जीजाबाई की प्रेरणा से उस पारा शक्ति से पराभूत होकर मुगलों का सर्वनाश कर पाए
आज की नारी अपनी परा शक्ति को भूल गयी, उसने कभी सती अनुसुइया, शैव्या, सीता, सावित्री, दमयंती, मदालसा की शक्तियों का अनुभव नहीं किया।
वह सिर्फ सौंदर्य की प्रतिमूर्ति बनकर र्च गयी है। इसीलिए उनका सबसे अधिक शोषण मुगलों व ईसाइयों द्वारा हो रहा है।
*माँ भगवती के कवच में ऐसी दिव्य शक्तियां निहित है कि कोई भी नकारात्मक शक्ति कवच धारण करने वाले स्त्री या पुरुष के पास बिना उसकी इच्छा के उसे स्पर्श करने की हिम्मत नहीं कर सकती है।
माता सीता से लेकर महाराज विक्रमादित्य की पत्नी इसका प्रमाण है। युद्धों में अदृश्य कवच के रूप में शूरवीर इसे धारण करते है।
मैंने पूर्व में लिखा था, हमारे शरीर के हर मर्म में इन्ही आदि शक्ति के विभिन्न स्वरूपों का निवास है, हम मर्म का उत्प्रेरण करके उन सुशप्त शक्तियों को जगाकर स्वस्थ्य लाभ पाते है।
नवरात्रि में दस महाशक्तियों के रूप में माँ दुर्गा जी के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है, जिससे नकारात्मक शक्तिओ का प्रभाव नष्ट होता है।
लौकिक व अलौकिक की कामनाओं की पूर्ति के लिए साधक माँ के विभिन्न स्वरूपों।की पूजा करके माँ से आशीर्वाद प्राप्त करते है।
प्रवृति के अनुसार इन दस महाविद्याओं को तीन समूहों में विभाजित किया गया है।
१. *सौम्य कोटि ( इनकी प्रवृति सौम्य व कोमल होती है। यह सरल, उदार स्वभाव देवियाँ है।)* - माँ त्रिपुरसुंदरी, माँ भुवनेश्वरी, माँ मातंगी, माँ कमला है।
२. *उग्र कोटि (इनकी प्रवृति उग्र व क्रोध युक्त होती है)* - महाकाली, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बंगलामुखी।
३. *सौम्य उग्र कोटि ( इनकी प्रवृति उग्र होते हुए भी कोमल होती है)*- माँ तारा, त्रिपुर भैरवी देवी सौम्य उग्र कोटि में आती है।
*पहली महाविद्या महाकाली-* यह परमब्रह्म का परम स्वरूप है।
इनका उल्लेख अर्थवेद में महाकाल को वश करने मिलता है। कथिग्राय सूत्र, मुंडका उपनिषद के दूसरे अध्याय में माँ काली के इस स्वरूप का प्रमाण मिलता है।
इन्ही महाकाली की कुरुक्षेत्र में भगवान श्री कृष्ण की प्ररेणा से अर्जुन ने उपासना कर माता से आशीर्वाद स्वरूप कवच प्राप्त किया था। इन्हें काल रात्रि, विन्ध्वासिनी भी कहा गया है।
महाभारत में तथा पांडव सैनिकों के सपनो में आकर माता काली दर्शन देती थी।
माँ काली का रूप अत्यंत काला होने से इनकी तुलना अमावस्या की रात्रि से की गयी है। माता की तीन आँखे वर्तमान व भूत का प्रतिनिधत्व करती है।
उनके सफेद नुकीले दाँत धर्म का प्रतिनिधित्व करती है, तथा उनकी लपलपाती जीभ अधर्म के विनाश का संकेत देती है।
माता के खुले लम्बे केश काल की प्रचंडता को दर्शाते है। माता के चारो हाथों में खड्ग, कटा हुआ मुंड, तीसरे में खप्पर होता है।
उनके आभूषण गले में मुंडो की माला, तथा कमर पर कटे हुये हाथ यह दर्शाता है कि अधर्मी का कटा सिर व हाथ काल के हाथों में है।
महाकाल पराशक्ति के रूप में माँ काली के इस स्वरूप का किसी भी रूप में अपमान करने का तात्पर्य खुद का सर्वनाश करना है।
माता ने यह रूप अधर्म का नाश करने के लिए धारण किया था। उनका यह स्वरूप पूर्ण रूप से *"आदि परा शक्ति"* का स्वरूप है।
देवी पुराण के अनुसार माँ शरणागत भक्तों को अभयदान देने वाली, दुष्टों का संहार करने वाली, काल गति को नियंत्रित करने वाली है। माता का शक्तिपीठ कोलकत्ता में कालीघाट है। मध्यप्रदेश में उज्जैन में स्थित गढ़ भैरव में माँ काली, गुजरात के पावागढ़ में स्थति माँ काली का सिद्धपीठ है।
जहाँ अनेक तपस्वियों ने सिद्धियां पायी।
माँ के चार रूप काली, शमशान काली, दक्षिणा काली, मातृ काली है।
*माँ का बीज मंत्र -* ॐ ह्रींग श्रीं क्रीं परमेश्वरी कालिके स्वाहा।
सामान्यतः महाकाली का पूजन अमावस्या के दिन किया जाता है।
इस प्रकार दस महाविद्या स्वरूप में माँ काली, माँ तारा, माँ त्रिपुरसुंदरी, माँ भुवनेश्वरी, माँ छिन्नमाता, माँ त्रिपुर भैरवी आदि देवी की पूजा करने से समस्त विपदाओं का नाश होकर सुकृति प्राप्त होती है। माता के विभिन्न स्वरूपों के अलग - अलग बीज सनार भ
