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SC ( श्ड्यूल्ड कास्ट) का अर्थ अछूत जातियों से है ये निहायत भ्रम है।
अंग्रेजो ने 429 जातियो को SC बनाया था और आज 1235 जातिया SC लिस्ट में है। मतलब इतनी सारी जातियों के अछूत होने का पता क्या आजादी के बाद लगा है ?  कौन सी स्टडी, आकडे और क्राइटेरिया से इतनी सारी जातियां अब आकर SC लिस्ट मे शामिल की गयी।

और अंग्रेजो की बनाई SC लिस्ट का भी न तो अछूतपने से कोई लेना देना था और न ही जाति वर्ण से लेना देना था और ना ही हिन्दु धर्म मे सुधार नासुधार से लेना देना था। एसा साइमन कमीशन ने अम्बेडकर साहब से कहा था जब वे अपनी जाति महार को SC लिस्ट मे डलवाने की साइमन कमीशन से गुजारिश कर रहे थे।

डिर्क एच काॅफ्फ ने अपनी पुस्तक 'नौकरी, सिपाही एंड राजपूत' मे लिखा है कि 1857 के करीबी समय मे नीची माने जाने वाली जातियों के लोग भी आखाडो मे ठाकुरो के साथ कुश्ती और लडाई के तरीको की प्रेक्टिस किया करते थे। इससे जमीदारो, लोकल राजाओ और ब्रिटिश आर्मी तक मे उन्हे नौकरी मिलती थी।

1630 के आसपास एक यूरोपियन यात्री पीटर मुंड ने अपनी आगरा से पटना तक की यात्रा मे एसे कई आखाडो का जिक्र किया है।  उसने बताया है कि सैनिको के कैम्पो के नजदीक इस तरह के अखाडे होते थे। इनमे नीची जाति, मझली जाथि और ऊची जाति सभी तबके के लोग थे। और इस तरह से जमीदारो, लोकल राजाओ और दिल्ली सलतनत मे सैनिक की नौकरी पाते थे।

1814 मे अंग्रेजो की फौज मे भी इस तरह के अखाडे वाले सैनिक थे जोकि पहलवान साहब कहलाते थे।

अंग्रेजो के लिखे रिकार्ड बताते है 1857 के गदर के मुख्य नायको मे एक तात्य टोपे और राव बहादुर की सैन्य बटालियन धुनिया, जुलाहा, तेली, तमोली, चमार आदि सभी जातियों के लोगो की थी।

इसके अलावा नाना साहब पेशवा का सबसे बहादुर और फेमस कमान्डर गंगू मेहतर था। जिसकी फोटो ( जोकि डाक्टर जान निकोलस ने फासी से पहले ली थी) को आजकल 1857 के sc नायको के रूप मे दिखाई जाती है।

गंगू मेहतर अका गंगू पहलवान, नाना साहब के बाॅडीगार्ड और उनकी सेना मे नगाडा बजाने वाले थे जोकि उनकी सेना मे सैन्यकमान्डर तक प्रमोट हुये। गंगू मेहतर का110 एकड मे बना हुआ निजि गार्डन और अखाडा था।


आज से मात्र 350 वर्ष टेवेरनिर और वेरनिर जैसे यात्रियों को अछूत न दिखे, जो तीन दशक से ज्यादा भारत के संपर्क में थे।
तो मात्र तीन शतकों में 1936 में 429 अछूत जातियाँ कैसे पैदा हुई?
क्या यह खोज का विषय नही है ?
-----------------------------------------------------------------------#रेपोस्ट_टेवेरनिर :

Tavernier ने बताया कि शूद्र पदाति योद्धा होते थे , डॉ आंबेडकर का शूद्र मेनिअल जॉब वाला , लेकिन एक महत्वपूर्ण तबका PAUZCOUR कहाँ गायब हो गया इतिहास के पन्नों से ?
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आश्चर्य होता है जब भारत के इतिहासकार और अछूतोद्धार के योद्धा डॉ अंबेडकर और उनके #वैध वंशज , जो अपने आप को दलित चिंतक कहते हैं , जो भारत मे अछूतो को 3000 साल से सवरणों का गुलाम मानते आयें हैं । ब्रमहनिस्म  के नाम पर आज तक मलाई खाते आए इन मूढ़मतियों को फिर से नए अध्ययन की आवश्यकता है।

आज मैंने Tavernier नाम के एक फ़्रांसिसी की 17वी शताब्दी के यात्रा वृत्तांत से कुछ पृष्ठों को उद्धृत किया है । Tavernier इतिहासकारों का एक महत्वपूर्रन और विश्वस्त सूत्र रहा है भारत के इतिहास लेखन में। लेकिन न जाने कैसे उसी सूत्र के इन मत्वपूर्ण पन्नों को जाने अनजाने इन इतिहासकारो ने अपठनीय समझकर छोड़ दिया ।आप इस लेख को पढ़ेंगे तो पाएंगे कि इतिहासकारों ने भारत के इतिहास को किस तरह उपहासजनक तरीके से लिखा है उसकी मिशाल आपको कहीं अन्यत्र नहीं मिलेगी ।

इतिहास और उपन्यास दो अलग विधाए हैं । भारतीय इतिहासकारो ने भारत के इतिहास को उपन्यास विधि से प्रस्तुत किया है ।

ये मात्र 338 वर्ष पूर्व पहले ट्वेर्निएर ने भारत के हिन्दू समाज का वर्णन किया है।अचम्भे की बात ये है कि उसने लिखा कि शुद्र क्षत्रियों की तरह ही योद्धा हुवा करते थे ।

डॉ आंबेडकर ने भी यही सिद्ध करने की कोशिश की थी अपने थीसिस - "शुद्र कौन थे" में ।
लेकिन उनके तर्कों में दम तो है लेकिन तथ्य नहीं है ।आप तेवेर्निएर के इस लेख को पढ़िए ,आप को प्रमाणिक साक्ष्य दिख जाएगा कि डॉ आंबेडकर का लेखन औपन्यासिक विधा में पस्तुत किया गया बेहद तार्किक परंतु तथ्यहीन इतिहास भर है ।
Jean-Baptiste Tavernier (1605 – 1689) was a 17th-century French gem merchant and traveler.[1] Tavernier, a private individual and merchant traveling at his own expense, covered by his own account, 60,000 leagues, 120,000 miles making six voyages to Persia and India between the years 1630-1668. In 1675, Tavernier, at the behest of his patron, Louis XIV, published Les Six Voyages de Jean-Baptiste Tavernier (Six Voyages, 1676).[2]
Of the Religion of gentiles and Idolaters of India --- ..Jean-Baptiste Tavernier (1605 – 1689)

" भारत में मूर्तिपूजकों की संख्या इतनी ज्यादा है की एक मोहम्डन की तुलना में 5-6   मूर्तिपूजक होंगे।  ये अत्यंत आश्चर्य जनक है की संख्या में इतना ज्यादा होने के बावजूद ये मोहम्डन प्रिंसेस के गुलाम बने हुए है । लेकिन आपका आस्चर्य समाप्त हो जाता है जब आप पाते हैं की इन मूर्तिपूजकों के अंदर कोई एकता नहीं है , अन्धविश्वास (जो शास्त्र बाइबिल में न फिट बैठे वो superistition ) ने इनके अंदर ईतनी वैचारिक और रीति रिवाज की भिन्नता पैदा कर दी है कि इनमे एका संभव ही नहीं है । एक caste के लोग दूसरी caste के घर खाना नहीं खा सकता है और न ही पानी पी सकता है सिर्फ अपने से उच्च सामजिक वर्ग को छोड़कर ।

अतः सारे लोग ब्राम्हण के घर खाना खा सकते हैं या पानी पी सकता है , और उनके घर समस्त संसार के लिए खुले हुए हैं।

  इन मूर्तिपूजकों में caste शब्द का प्रयोग उसी तरह से है जैसे पहले यहूदियों में एक ट्राइब होती थी । यद्यपि सामान्यतया ये विस्वास किया जाता है कि यह 72 caste हैं परन्तु मैंने ज्ञानी पंडितों से पता किया तो पता चला कि ये मुख्यतः 4 caste ही हैं , और उन्ही चारों caste से सभी कि उत्पत्ति हुई है ।
इसमें प्रथम caste को ब्राम्हण के नाम से जाना जाता है जो उन प्राचीन ब्राम्हणो और दार्शनिकों के वंशज हैं जो खगोल शास्त्र पढ़ा करते थे । ये आज भी उन्ही प्राचीन पुस्तकों के अध्यन मनन में संलिप्त रहते है । ये इस विद्या में इतने निपुण हैं कि सूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण कि सटीक भविष्यवाणी में एक मिनट की चूक नहीं करते । इनकी इस विद्या को सुरक्षित रखने के लिए बनारस नाम का एक कसबे में विश्वविद्यालय हैं जहाँ ये मुख्यतः खगोलशास्त्र का अध्ययन करते हैं, और जहाँ और विद्वान लोग भी है जो अन्य शास्त्रों को पढ़ते हैं । ये caste सबसे योग्य (नोबेल) इसलिए मानी जाती है क्योंकि इन्हीं विद्वानों के बीच से पुजारी और शास्त्रो को पढने वाले शास्त्री चुने जाते है ।

दूसरी caste राजपूत या khetris (क्षत्रिय) के नाम से जानी जाती है अर्थात योद्धा और सैनिक ।  ये अकेले ऐसे मूर्तिपूजक हैं जो बहादुर हैं और शस्त्रविद्या में निपुण हैं। ज्यादातर राजा जिनसे मैंने बात की वे इसी caste के हैं । यहाँ छोटी छोटी रियासतों वाले राजा हैं जो आपसी मतभेद की वजह से मुग़लों कि छत्रछाया में रहने को मजबूर हैं । लेकिन जो सेवा या मुग़लों को देते हैं उसके बदले में इनको भरपूर सम्मान और सैलरी दिया जाता है । ये राजा और उनके संरक्षण में रहने वाले राजपूत ही मुग़ल शक्ति के आधार स्तम्भ हैं । राजा जयसिंघ और जसवंत सिंह ने ही औरंगजेब को गद्दी पर बैठाया था । लेकिन यहाँ ये उल्लेख करना भी उचित होगा कि दूसरी caste के समस्त लोग इस शास्त्र व्यसाय में सन्नद्ध नहीं हैं । वो राजपूत अलग हैं जो घुड़सवार सैनिक के रूप में युद्ध में भाग लेते हैं । लेकिन जहाँ तक khetris (क्षत्रियो) की बात है वे अपने बहादुर पूवजों से निम्न हो चुके हैं और हथियार त्यागकर व्यापार (Merchandise) के छेत्र में उतर चुके हैं । (1)

 तीसरी caste है बनियों का जो ट्रेड या व्यापर सँभालते हैं ,इन्हीं में से कुछ शर्राफ (Shroff ) जो मनी एक्सचैंजिंग या बैंकर का काम करते है ।और कुछ लोग ब्रोकर हैं जिनके एजेंसीज के जरिये व्यापारी (मर्चेंट्स ) खरीद फरोख्त करते है । इस caste के लोग इतने व्यवहारिक ( Subtle ) और व्यसाय प्रवीण हैं कि ये धूर्त यहूदियों को भी मात दे सकते हैं । ये अपने बच्चो को बालपन से ही आलस्य से दूर रहने कि शिक्षा देते हैं और हमारे बच्चों कि तरह आवारागर्दी से रोकते हैं और उनको अंकगणित कि मुहँजबानी शिक्षा इस तरह से देते हैं कि वे कठिन से कठिन सवाल का जबाब चुटकियों में दे देते हैं ।
इनके बच्चे हमेशा पिता के साथ रहते हैं और ये अपने बच्चो को व्यापार के साथ उसके गुड और दोष समझते जाते हैं और काम करते जाते हैं । ये जिस संख्या (figures ) का इस्तेमाल करते है उसी का प्रयोग पूरे देश में होता है , चाहे भाषा के बोलने वाला हो ।  यदि कोई व्यक्ति इनसे नाराज होता है तो ये बिना जबाव दिए धैर्य के साथ सुनते हैं और चुपचाप वहां से खिसक लेते हैं । और चार पांच दिन बाद जब उस व्यक्ति का गुस्सा शांत हो जाता है तब उससे मिलते हैं । ये हर उस चीज को अभक्ष्य मानते हैं जिसमे प्राण हों । किसी प्राणी कि हत्या करने के बजाय ये सवयं जान देना पसंद करते हैं ।  यहाँ तक कि ये कीड़े मकोड़ों की भी हत्या पसंद नहीं करते और ये अपने धर्म के पक्के है ।  यहाँ ये भी बता दूँ कि ये युद्ध में भाग नहीं लेते , किसी पर हाथ नहीं उठाते ।

 ये किसी राजपूत के घर न कहते है न पानी पीते हैं क्योंकि वे जानवरों का बध करते हैं खाने के लिए, गाय को छोड़कर क्योंकि गाय अबध्य है और कोई उसको खा नहीं सकता । (2)

चौथी caste को Charados या Soudra कहते हैं, ये राजपूतों कि तरह ही युद्ध में भाग लेते हैं लेकिन दोनों में मात्र इतना फर्क है कि राजपूत घुड़सवार योद्धा होते हैं और ये पदाति योद्धा । दोनों ही युद्ध में जान देने में अपना गौरव समझते हैं ।  एक योद्धा चाहे वो घुड़सवार हो या फिर पदाति योद्धा , यदि युद्ध के दौरान मैदान छोड़कर भाग जाता है तो वो हमेश के लिए अपना सम्मान खो देता है और ये पूरे परिवार के लिए लज्जा का विषय है । इसी सन्दर्भ में एक कहानी सुनना चाहूँगा जो मुझे इस देश में सुनायी गयी ।  एक योद्धा जो अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता था और बदले में पत्नी अपने पति को उतना ही प्यार करती थी ।  ये योद्धा एक यद्ध के दौरान मृत्यु के भयवश नहीं बल्कि पत्नी के प्रेमवश और उसके विधवा होने के ख्याल से युद्ध भूमि त्याग कर भाग खड़ा होता है । जब ये सूचना उसकी पत्नी के पास पहुंची और उसने अपने पति को घर कि तरफ आते देखा तो उसने पति के मुह पर ही दरवाजा बंद कर लिया । उसने अपने पति से कहा कि वो उस इंसान को पहचानती भी नहीं जिसको अपने सम्मान से ज्यादा अपनी पत्नी प्यारी हो और वो उसका मुहं भी नहीं देखना चाहती जिसने परिवार की प्रतिष्ठा पर कला धब्बा लगाया हो और ये बात मैं अपने बच्चो को जरूर बताऊँगी कि वोअपने पिता से ज्यादा बहादुर बनें । वो अपने फैसले पर अडिग रही । अंततः उस योद्धा को अपना सम्मान और पत्नी के प्यार को वापस लाने के लिए युद्ध के मैदान में वापस जाना पड़ा जहाँ उसने अभूतपूर्व शौर्य का परिचय दिया । तब कहीं जाकर उसके घर के दरवाजे उसके लिए खुले और उसकी पत्नी ने उसका प्यार के साथ स्वागत किया ।

 अब जो बाकी बचे लोग हैं जो न चार caste में समाहित नहीं होते उनको PAUZECOUR के नाम से जाना जाता है ये सब मैकेनिकल आर्ट (अर्टिसन यानि शिल्प और अन्य उद्योग ) का कार्य करते हैं । इनमे आपस में कोई भेद नहीं है सिवा इस बात के कि वे अलग अलग व्यवसाय करते हैं जो इनको अपने पिता से स्वाभाविक रूप से मिलता है ।
 और एक अन्य बात ये है कि उदाहरण के तौर पर यदि मान लीजिये कोई दरजी कितना भी धनवान  क्यों न हो उसको जाति परंपरा का ज्ञान अपने बच्चों में डालना ही  था

Comments

Unknown said…
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