स्वतंत्र भारत में पहला प्रयास यह होना चाहिए था कि ब्रिटिश दस्युयों के बनाये गए विधान शिंक्षा और प्रशासन को अमूल परिवर्तन किया जाता।
1813 में ब्रिटेन की संसद में चार्टर पास हुवा कि भारत मे धर्म परिवर्तन का शशक्त माध्यम क्या हो सकता - उत्तर आया कि शिंक्षा ही वह सशक्त माध्यम हो सकता है।
आप जानते है कि भारत हजारो वर्ष से वर्णधर्माश्रम की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था से ही विश्व का आर्थिक सम्राट बना हुआ था।
वहीं यूरोप की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था रोमन - डकैती पर आधारित थी। अंगुस मैडिसन ने लिखा - Roman Empire was based on plunder slavery and Military power.
भारत के कृषि शिल्प वाणिज्य का सिस्टेमेटिक विनाश करने के कारण 1850 से 1900 के बीच 2.5 से 3.0 करोड़ भारतीयों की अन्न के अभाव में मृत्यु हो जाती है क्योंकि उनके पास अन्न खरीदने का पैसा नही था।
एक बहुत बड़ा वर्ग तैयार हुवा जो अन्न स्वास्थ्य और शिंक्षा से बंचित हो गया - जब पेट न भरे तो शिंक्षा की कौन सोचेगा ?
लेकिन समाज मे "डिवाइड रूल लूट और कन्वर्ट" की नीति के तहत अनेक फर्जी अफवाह, विशेष कर #आर्यन अफवाह को विज्ञान बोलकर भारतीयों का माइंड मैनीपुलेशन किया गया।
1901 में जनगणना में वर्ण शब्द को कास्ट शब्द से विस्थापित किया गया - ब्रामहण क्षत्रिय, वैश्य को तीन वर्ण के स्थान पर तीन कास्ट घोसित किया गया। वह वर्ग जो मूलतः शिल्प वाणिज्य से हजारो साल से जीवन यापन करता था उसको 10 अन्य श्रेणियों की कास्ट में ग्रुपिंग करके इसको वैधानिक विधान बनाया गया। बहुत से लोगों को आश्चर्य होता है कि किसी किसी प्रदेश में इन तीनो वर्णों को आरक्षित ग्रुप में रखा गया है। उंनको बताना चाहता हूँ कि इन तीन वर्णों में जो लोग मूलतः शिल्प वाणिज्य और इसकी सहायक सिस्टम से जीवन यापन करते थे, उनकी भी गणना उसी वर्ग में की गई।
दो कार्य उन्होंने किया - एक वैधानिक रूप से हिन्दुओ का बंटवारा करना।
दूसरा विज्ञान ( philology Indology : Logy याणि विज्ञान) बोलकर फर्जी अफवाह को पढे लिखे लोगों का माइंड मैनीपुलेशन करना। जिसको सोशियोलॉजी ह्यस्ट्री आदि आदि का अंग बनाया गया। सवर्ण असवर्ण आर्य द्रविडं आदि अफवाहों को शिंक्षा के माध्यम से प्रसारित किया गया।
चूंकि ब्रिटिश दस्यु सदैव यह पाखंड किया कि वे भारत की भलाई के लिए आये थे, उन्होंने 1917 में उन्ही बेघर बेरोजगार किये गए लोगों के बच्चों की शिक्षा देने का पाखंड रचते हुए उंनको "डिप्रेस्ड क्लास" टाइटल दिया।
पाखंड इसलिए कि 1911 और 1916 में गोखले और तिलक के उस प्रस्ताव को विसरेगल समिति ने खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने यूनिवर्सल प्राइमरी एजुकेशन का प्रस्ताव रखा था।
क्यो ?
क्योंकि उनके इरादे और थे।
1921 की जनगणना में पुणः "डिप्रेस्ड क्लास" शब्द का प्रयोग किया गया, जबकि उसको परिभाषित नही किया गया।
1928 में डॉ आंबेडकर कुचर्चित साइमोंड के साथ मिलकर इस डिप्रेस्ड क्लास को "untouchable" घोसित करते हैं और 1931 में लोथियन समिति को अपनी रिपोर्ट सौंपते हैं।
1932 में ब्रिटिश दस्यु राउंड टेबल कांफ्रेंस में डॉ आंबेडकर को इन untouchables का प्रतिनिधि बनाते हैं और उंनको कम्युनल अवार्ड (इसका अर्थ में नही जानता) देते हुए उस चिन्हित वर्ग को seperate electorate का लालच और पुरस्कार देते हैं, जिसके विरोध में गांधी ने उपवास रखा - पूना पैक्ट।
1935 में ब्रिटिश संसद में "गवर्नमेंट एक्ट ऑफ इंडिया" पास होता है।
1936 में एक GO से इस एक्ट के तहत 429 कास्ट को बिना किसी परिभाषित क्राइटेरिया SC और ST घोसित कर दिया जाता है।
यही लिस्ट जस की तस 1950 में संविधान का हिस्सा बन जाती है।
या तो यह मान लीजिए कि वे आपके भले के लिए आये थे, तो भगाया क्यों ? या भागे क्यों ?
उन्होंने हिन्दुओ को दो फाड़ करके ईसाइयत को फैलाने का वैधानिक व्यवस्था की थी।
संविधान के जानकार बताए कि क्या संविधान में #कास्ट_ट्राइब_और_अनुशूचित शब्दों को परिभाषित किया गया है ?
मेरा अनुमान है कि ये शब्द को परिभाषित नही किया गया है ?
ऐसा क्यों भाई ?

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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद