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आत्महत्या करते किसान और नकारा हमलोग 
[हमारी शिक्षा और व्यवस्था,

हम एक कृषिप्रधान और आत्मनिर्भर सभ्यता थे, उन्नत थे, इसीलिये सोने की चिडिया माने जाते थे। प्राचीन भारत का कृषि सम्बंधी ज्ञान और उपलब्धियो को मुसलमान आक्रांताओं के युग-आगमन के पश्चात से भुलाया जाने लगा। ब्रिटिश उपनिवेश बन जाने के पश्चात तो खेती मतलब नील, रबड, चाय-कॉफी वगैरह हो गया था। परम्परागत किसान मध्ययुग और उसके पश्चात से जो दयनीय हुए कि सिलसिला आज भी लगातार चल रहा है। कहाँ से कहाँ आ गये हैं हम। यदि हरितक्रांति न होती तो संभव है आज भी हम खाद्य आत्मनिर्भर न होते तथापि रासायनिक खाद तथा भारी-भरकम मशीनों के प्रयोग ने किसानों के दो वर्ग आज पैदा कर दिये हैं। एक ओर बडे किसान हैं जिन्हें विशाल भूमि, उन्नत उपकरण, सिंचाई की व्यवस्था, अधिक पैदावार वाले बीज, बैंकों से असीमित ऋण आदि उपलब्ध हैं तथा उनके लिये कृषि और उद्योग लगभग एक ही परिभाषा के अंतर्गत आता है। दूसरी ओर है परम्परागत किसान जो आसमान की ओर ताकता रहता है कि बादल बरसेंगे तो पानी गिरेगा। फसल होगी तो आधी कमाई से साहूकार का कर्जा चुकेगा आधी से घर चलेगा। पानी नहीं गिरा तो किसी पेड से लटका किसान का शव अखबार की सुर्खिया बन जाता है। ठहर कर विवेचना कीजिये कि क्या किसानों की आत्महत्याओं के पीछे हमारे पाठ्यक्रमों  का भी दोष तो नहीं? लागत वाली उन्नत खेती पढाने के साथ साथ क्या हमने अपनी प्राचीन पुस्तकें और उसमें प्रदान किया गया कृषि सम्बन्धी ज्ञान विद्यार्थियों को प्रदान किया है? उत्तर है नहीं। यह विवेचना आवश्यक है कि क्या हमारा कृषिविषयक प्राचीन ज्ञान ऐसा था जिससे आधुनिकता भी लाभ उठा सकती है?

सिंधुघाटी के किनारे की सभ्यतायें कृषि के विकास का केवल अध्याय ही नहीं लिख रही थीं अपितु लोग बड़े बडे कोठारों मे उत्पादित फसलों का संग्रहण और संरक्षण करने की विधियों से भी परिचित थे। आज भी पाश्चिमी भारत में ट्रिटिकम कंपैक्टम अथवा ट्रिटिकम स्फीरौकोकम प्रजाति के गेहूँ की फसल की जाती है जिसकी उस दौर में प्रमुखता से खेती होती थी। वाजसनेयी संहिता हमें ब्रीहि (चावल), यव (जौ), मूंग, माष, तिल, अण्ड, खल्व, गोधूम (गेहूँ), नीवार, प्रियंगु, मसूर तथा श्यामक जैसी फसलों के उत्पादन की जानकारी प्रदान करती है। कौटिल्य का आर्थशास्त्र हमें तीन मौसमी फसलों अर्थात रबी (हेमंत), खरीफ (ग्रैषमिक) और जायद (केदार) की जानकारी प्रदान करता है - कर्मोदकप्रमाणेन केदारं हैमनं ग्रैषमिक वा सस्यं स्थापत्येन। क्या आज भी फसलों के लिये हमारा यही वर्गीकरण नहीं है? अर्थशास्त्र कहता है कि वर्षाऋतु के आरम्भ में शालि (धान का प्रकार), ब्रीही (चावल), कोद्रव (कोदो), तिल, प्रियंगु (कंगनी का चावल), दारक (दाल), वरक (मोठ) को बोया जाना चाहिये। वर्षा ऋतु के समाप्त हो जाने के पश्चात कुसुम्भ (कुसुंवा), मसूर, कुलत्थ (कुल्थी), यव (जौ), गोधूम (गेहूँ), कलाय (चना), अतसी (अलसी) और सर्षप (सरसों) को बोया जाना चाहिये। कौटिल्य चाणक्य अपने ग्रंथ में यह तक उल्लेख करते हैं कि यदि वर्षा आधारित खेती नहीं है तो किस तरह की भूमि में क्या फसल लेनी चाहिये - फेनाघातो वल्लीफलानां, परिवाहांता: पिप्पलीमृद्वीकेक्षूणां, कूपपर्यंता" शाकमूलानां हरणीपर्यंता: हरितकानां, पाल्योलपानां गंधभैषज्योशीरहीरबेरपिण्डालुकादीनाम अर्थात जो भूमि नदी जल से आप्लावित है (फेनाघात) उसपर खरबूजा, तरबूज लौकी जैसे फल (वल्लीफल) लगाये जाने चाहिये। यदि सिंचन की समुचित व्यवस्था है तो भूमि पर पिप्पली, मृद्धीका (अंगूर) और ईख लगाना चाहिये। कूप-तडाग के समीप की भूमि पर शाक-भाली, मूली आदि लगाने चाहिये जबकि जहाँ पहले कभी तालाब आदि रहे हों (हरणीपर्यंत) उस भूमि पर हरी फसलों को लगाने से उत्पादन अच्छा प्राप्त होगा। क्यारियों की मेड पर सुगंधि, भैषज्य आदि के पौधे लगाये जाने चाहिये।

आज कृषि विज्ञान हमें क्या सलाह देता है? यही न कि मौसम की जानकारी इकट्ठी करो, मृदा के प्रकार की जानकारी रखो, सही फसल का चयन करो, फसल नाशी कीटपतंगों व जीव जंतुओं से सुरक्षा सुनिश्चित करो, उन्नत बीज लगाओ आदि। इसी दृष्टिकोण को हमारी अनेक प्राचीन पुस्तकें भी सामने रखती हैं वह भी शताब्धियों पूर्व। कृषि पाराशर इस दृष्टिकोण से उद्धरणयोग्य ग्रंथ है जो वर्षा के अनुमापन आदि की जानकारी भी सविस्तार प्रदान करता है  - शतयोजनविस्तीर्णं त्रिंशद्योजनमुच्छि्रतम्‌।  अढकस्य भवेन्मानं मुनिभिः परिकीर्तितक्‌ अर्थात सौ योजन विस्तीर्ण तथा तीन सौ  योजन ऊँचाई में उपलब्ध वर्षा के पानी की मात्रा का अनुमापन। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी द्रोण (1 द्रोण = 4  अढक = 6.4 सेंटीमीटर) के आधार पर वर्षा के अनुमापन का उल्लेख है।  ऋग्वेद में हल के लिये सीर अथवा लाडगल शब्द का प्रयोग मिलता है जबकि उन्नत कृषि का रुचिकर उदाहरण काठक संहिता से ज्ञात होता है कि हलों में चौबीस बैल तक जोते जा सकते थे। चौबीस बैल अर्थात वे हल सामान्य तो नहीं होंगे? क्या हलों के वे प्रारूप अब हमें अज्ञात हो गये हैं? प्राचीन शास्त्रों में सिंचाई की अनेक विधियों का हमें परिचय प्राप्त होता है। वाल्मीकी रामायण के अनुसार वर्षा से सिंचाई पर जो भूमि निर्भर थी उसे देवमातृक तथा जो भूमि सिंचाई के अन्य साधनों से सम्पन्न थी उसे अदेवमातृक वर्गीकृत किया गया है। महाभारत का सभापर्व कहता है - कच्चिद्राष्ट्रे तडागानि पूर्णानि च बृहंति च। भागशो विनिविष्टानि न कृषिर्देवमाटृका अर्थात बारिश की राह तकते खेती को छोडना उचित नहीं है बल्कि स्थान स्थान पर बडे बडे जलाशयों का निर्माण कर खेंतों के सिंचन की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिये। हमें अनेक प्राचीन उद्धरण  बाँध बनाने यहाँ तक कि संयुक्त जलाशय बनाने (दो असमान ऊँचाई पर निर्मित जलाशय जिसमें एक से दूसरे को जलापूर्ति की जाती हो) के उदाहरण भी महाभारत तथा अर्थशास्त्र जैसे ग्रंथों में प्राप्त होते हैं।

मनुस्मृति में लिखा है - सुनीणम् सुक्षेगे जायते सम्पद्येन जिसका अर्थ है कि अच्छा बीज अच्छी मिट्टी में श्रेष्ठ उपज देता है। अच्छा उत्पादन लेना है तो बीज बेहतर चाहिये। क्रोप  वेरायटी को हम आधुनिक समय की सोच के साथ जोडते हैं जबकि अथर्ववेद और तैत्तरीय संहिता जैसे शास्त्रों में केवल चावल की ही विविध किस्में अर्थात ब्रीहि, महाब्रीहि, तण्डुल, शारिशाका, आशु, प्लाशुक, नीवार, हायन आदि की जानकारी प्राप्त हो जाती है। प्लांट ग्राफ्टिंग जैसे आज समुन्नत मानी जाने वाली तकनीक के लिये वाराहमिहिर की वृहत्संहिता के पन्नो को पलटा जा सकता है जहाँ वे एक पादप के तने से दूसरे के तने को साथ ही एक पादप के जडभाग में दूसरे पादप के तना भाग को काट कर जोडने साथ ही मिट्टी व गोबर के प्रयोग से उसे जोड कर रखने की विधि भी बताते हैं। इतना ही नहीं उल्लेख हैं कि - संजग्माना अबिभ्युषीरस्मिन्‌ गोष्ठं करिषिणी। बिभ्रंती सोभ्यं। मध्वनमीवा उपेतन (अथर्ववेद) अर्थात खाद का भी भरपूर्व प्रयोग वैदिक समयों में कृषि कार्य के लिये होता था। खाद बनाने के लिये गोबर और अन्य वनस्पतियों  के अवशेषों का प्रयोग किया जाता था। जब बीजों से अंकुर निकल आयें तब मछली की खाद और आक का दूध प्रयोग में लाया जाता था - पुरुडांश्चाशुष्ककटुमत्स्यांश्च स्नुहि क्षीरेण वापयेत (अर्थशास्त्र)। हम फसलों की गुणवत्ता को ही बढाने के लिये प्रयासरत नहीं थे अपितु वृक्षायुर्वेद जैसे प्राचीन ग्रंथ वृक्षों तथा पेड़-पौधों की बीमारियों का कैसे इलाज किया जाए, इसका भी ज्ञान प्रदान करने के लिये उपलब्ध थे।

क्या यह विडम्बना नहीं है कि ग्रामवासी भारत की पाठ्यपुस्तकों में खेती और उससे जुडी तकनीके प्राथमिक स्थान नहीं रखतीं। कृषिविज्ञान के सभी पाठ्यक्रम पाश्चात्य ज्ञान का विस्तारीकरण ही हैं जिसमे हमारे अपने पुरा-शास्त्रों व परम्परागत बोध का कोई स्थान नहीं है। रेखांकित कीजिये कि देश में अमीर किसान और गरीब किसान जैसे दो वर्ग इसी लिये बनते जा रहे हैं चूंकि आधुनिकता की धमक ने पुरानी कृषिविषयक पुस्तकों को दीमक चटवाने के लिये छोड रखा है। किसानों की आत्महत्यायें इसी लिये होती हैं चूंकि उन्हें जडों से काट कर आधुनिक खेती की अंधी दौड में शामिल कर लिया गया है जहाँ पैसे और पसीने का होम भर है लेकिन अंतत: हासिल कुछ भी नहीं। आईये मिल कर इस मिथक को तोडें कि पुरानी पुस्तकें विज्ञान नहीं हैं।
 

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