हरियाणा में हुक्का पीने की परंपरा बहुत हावी रही है
एक ओर हुक्का-पानी सम्मान और आतिथ्य का विषय रहा है दूसरी तरफ किसी का सामाजिक बहिष्कार करना हो तो सबसे पहला संकट उसके हुक्के-पाणी पर ही आता रहा है यानि हुक्का-पाणी बंद
हुक्के के समर्थक उसे हरियाणा की विरासत परंपरा और संस्कृति और यहाँ तक कि पंचतत्व के प्रतिनिधि तक मानते हैं
कुछ समर्पित समर्थको की तो यहां तक हालत हो गई है कि तड़कै तड़कै हुक्का न पिया तो कब्ज भी नहीं टूटती
किसी सच्चाई की पुष्टि के लिए संदिग्ध व्यक्ति को हुक्के पर हाथ रखकर शपथ दिलाई जाती है, जो सर्वमान्य होती है। इसलिए इसे न्यायिक आस्था ⚖के रूप में माना जाता है।
अभी हरियाणा सरकार ने हुक्के मुक्त गांवो को सम्मानित करने की पहल की है #नोट :- ब्रांडेड सिगरेटों पर बात करने की सरकारों की औकात भी नहीं है क्योंकि उनको तथाकथित भारीभरकम tax जो मिलता है
योग्यता मापने का पैमाना भी है हुक्का
हुक्के का देसी तंबाकू बड़ी मेहनत से तैयार किया जाता है। तंबाकू के पौधे को सुखाकर कूटा जाता है और उसमें गुड़ या गुड़ से बनी लाट डाली जाती है, जिससे उसमें निकोटीन का प्रभाव कम हो जाता है। थोड़ा तंबाकू डालने पर ज्यादा देर चलता है। इसलिए कहा गया है कि 'घालो पूणा, आये दूणा'। ग्रामीणों का दिनचर्या प्रात: हुक्के से ही आरंभ होती है, जो सायं देर तक चलती है। बहु-बेटों की योग्यता मापने का पैमाना भी हुक्के को माना जाता है।
हुक्का अब आंगुतक या बहुओं को बजुर्गों की मौजूदगी का अहसास भी दिलाता है। सुबह से शाम तक खेत में हल जोतने वाले किसान हुक्के की मौजूदगी में स्वयं को अकेला महसूस नहीं करता। उसकी थकान को नई ऊर्जा हुक्के के चंद कशो से ही मिल जाती है। हुक्के के लिए उपले की आग को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि यह आग हुक्के को धीरे-धीरे गर्म करती है, जिससे हुक्का ज्यादा देर तक चलता है। हुक्का, जहां राजा-महाराजाओं की शान-शौकत और सामंती वर्ग की प्रतीक रहा है, वहीं उसे एक गरीब के स्वाभिमान और परिश्रम की सेवा का प्रतीक भी माना जाता है।
आईए जानते हैं हुक्कादि माध्यमों से किए गए धूम्रपान के आयुर्वेदिक शास्त्रीय दृष्टिकोण से
धूमपान(धूम्रपान नहीं) आयुर्वेद शास्त्रीय विधान हैं,
किन्तु धूमपान का विधान मुख एवं नासिका से हैं,
किन्तु धूम का त्याग नासिका से नहीं हों , इसका ध्यान रखना अनिवार्य हैं।
अन्यथा इंद्रियां(चक्षु इन्द्रिय) उपहत हो सकती हैं, दृष्टि उपहत हो सकती हैं।।
धूमपान कफदोष का शमन करता हैं।
इसमें कर्पूर लवंग तेजपत्र लघुएला केसर आदि द्रव्य होते हैं।।
सावधानी जिनके शरीर में उष्णता/गर्मी/पित्त बढ़ा हुआ रहता हैं वे न करें।
धू्मपान पूर्णतः शास्त्रीय हैं, किन्तु इसमें तम्बाकू नहीं था।
एक शर्कण्डे (12अंगुल लंबा) पर ओसधीय द्रव्य (कल्क/पेस्ट) 8 अंगुल तक लपेट कर सुखा लें , जिसे उतारकर पिया जाता हैं, जिसे आजकल मिट्टी के सिगार से पिया जा सकता हैं।
सिगार में द्रव्य डालकर तम्बाकू वाले सिगार की तरह पिया जाए तो कफज रोगों की शांति होती हैं।।
अष्टाङ्ग हॄदय में इसका वर्णन मिलता हैं, तथा चरक संहिता आदि में भी हैं ।।
हम चरक संहिता को श्रेष्ठ मानते हैं।
उन्हीं के आधार पर आचार्य वाग्भट्ट ने अष्टाङ्ग की रचना की।।
लवंग त्वक पत्र एला पूग समानुपात में
लवंग - लौंग
त्वकपत्र - तेजपत्ता
एला - ईलायची
पूग - सुपारी
इनका यवकुट(बालू रेत जितना बड़ा) चूर्ण बना लें, यह हुक्के में काम आएगा।
अथवा इन्हीं द्रव्यों का कपड छान चूर्ण सादे जल में गीला करके सरकंडे पे मोटा लेपकर सुखा सकते हैं
☝☝यह उनके लिए जो छोड़ना चाहे हमारे लिए नहीं , सर्वदा हुक्कादि किसी भी प्रकार का हो , धर्म दृष्टि से साक्षात् अग्निदेव का अपमान ही होता है
इन सबको लोक में प्रचारित करके अंग्रेजी ब्रांड्स के नशे छुड़ाने वाले प्रोडक्ट का और फार्मा कंपनी का इलाज हो पाए तो अछ्या हैं
क्योंकि लोक में जो कैंसर फैला हैं उसका असली कारण बीड़ी हुक्का नहीं हैं। ये बिज़नेस घराने एवं दूसरे मिलावटी समान हैं , पर इनको बीड़ी बंद करवा के हाइजेनिक cigg पिलानी हैं, उसमें एडिशनल निकोटिन डाल के नशा लगवाना हैं, फिर उसे मिटवाने के लिए , और दवा पानी बेचना हैं, उस दवा से फिर नई बीमारियां। फिर डियगनोसिस - ऑपेरशन .....
कत्था, तम्बाकू, अफीम, गांजा , हथकढ़ दारू के नाम पे डरा डरा के सिंथेटिक मॉर्फीन - अंग्रेजी दारू बेचा जा रहा फार्मा कंपनीज़ एवं इंडस्ट्रीज द्वारा
कुछ महीनों पूर्व आयुर्वेदाचार्य श्री Hemant Paliwal जी से चर्चा के अंश

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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद