धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बनाम धर्माधारित लोकतंत्र
पहली बात तो हम सब को जान लेना चाहिए कि विश्व में कहीं भी धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र नहीं है. यह धर्मनिरपेक्ष शब्द ही अवास्तविक है ,झूठा है और केवल भारत में बदमाशों और लफंगों के द्वारा प्रचारित है.संसार में कोई भी इस गंदे शब्द का उच्चारण तक नहीं करता . इतने दुस्साहसिक लफंगे केवल भारत में हैं जो इस नितांत असभ्यता सूचक शब्द का उच्चारण करें क्योंकि इस शब्द की अंग्रेजी होगी Lawlessness, Arbitraryness , Virtuelessness , Democracy without Any Value , इत्यादि .
दूसरी बात यह है कि पश्चिमी यूरोप का कोई भी Nation State धर्म से उदासीन नहीं है या कह सकते हैं कि रिलीजन से उदासीन नहीं है अपितु प्रत्येकNation State का एक धर्म है ,उसके द्वारा घोषित रूप से एक विशेष रिलिजन का राजकीय संरक्षण किया जाता है जिसका अर्थ होता है कि वहां की शिक्षा और न्याय व्यवस्था तथा शासन की संरचना में उस रिलीजन का आधारभूत प्रभाव रहेगा और वह रिलिजन ही वहां विधि का प्रथम स्रोत होगा .इस तथ्य को अच्छी तरह जान लेना आवश्यक है अतः धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र विश्व में कहीं नहीं है .
यूरोपीय राष्ट्र में से प्रत्येक का एक घोषित राजधर्म है . जिन में से कुछ के संकेत मात्र मैं यहां प्रस्तुत करता हूं .
१. इंग्लैंड जिससे हम बहुत अधिक परिचित हैं, उसका घोषित राजधर्म है प्रोटेस्टेंट ईसाइयत . इंग्लैंड का क्राउन अर्थात राजा या रानी जो भी हो ,सब क्राउन ही कहलाएंगे , वह प्रोटेस्टेंट चर्च ऑफ़ इंग्लैंड अर्थात प्रोटेस्टेंट क्रिश्चियनिटी नामक religion का ऑफिशियल संरक्षक है.
वहां की शिक्षा और न्याय व्यवस्था दोनों का स्रोत इंग्लैंड की प्रोटेस्टेंट क्रिश्चियनिटी है .वैसे भी इंग्लैंड में कोई लिखित संविधान नहीं है और वहां की प्रोटेस्टेंट क्रिश्चियनिटी की प्रथाएं एवं कस्टम्स ,रीति रिवाज, law का , विधि व्यवस्था एवं न्याय व्यवस्था का आधार है और इस अर्थ में अलिखित संविधान का आधार भी ये ही है .
२. संयुक्त राज्य अमेरिका का अधिकृत राजधर्म भी प्रोतेस्टेंट ईसाइयत है . पर वहां प्रांतों को यह अधिकार प्राप्त है कि वह चाहे तो कैथोलिक को भी अपने राज्य में विशेष संरक्षण दे सकते हैं .विश्व से घनिष्ठ परिचय और संपर्क के कारण और सारे विश्व में ठीक से व्यापार करने की इच्छा के कारण संयुक्त राज्य अमेरिका की यह नीति है कि वह विश्व के अन्य मजहब और पंथों को भी अपने यहां फैलने का एक मर्यादा के भीतर अधिकार देता है.
३. आस्ट्रिया एक प्राचीन राष्ट्र है जो कभी एक विशाल साम्राज्य होता था. आस्ट्रिया का राजधर्म है रोमन कैथोलिक क्रिश्चियनिटी . यद्यपि अन्य ईसाइयों को भी वहां उपासना का अधिकार है.
४. इसी प्रकार फ्रांस का भी राजधर्म है रोमन कैथोलिक ईसाईयत यद्यपि प्रोतेस्तेंट्स को भी वहां अब उपासना का अधिकार प्राप्त हो गया है .पहले वहां यह अधिकार केवल कैथोलिक्स को प्राप्त था
५. जर्मनी का राजधर्म है प्रोटेस्टेंट क्रिश्चियनिटी यद्यपि अन्य ईसाई पंथों को भी वहां संरक्षण प्राप्त है .
मुख्य बात यह है कि पादरियों की महासभा के द्वारा अनुमोदित होने पर ही सब जगह चर्च के विषय में कानून बनाए जा सकते हैं .बिना चर्च की अनुमति के इंग्लैंड या आस्ट्रिया या फ्रांस या जर्मनी या संयुक्त राज्य अमेरिका ,कहीं भी चर्च के विषय में कोई कानून नहीं बनाया जा सकता.
६. स्पेन का राजधर्म है रोमन कैथोलिक ईसाईयत .स्पेन की विशेषता यह है कि वहां कोई भी प्रोटेस्टेंट ईसाई स्पेन की सेना में भर्ती नहीं हो सकता . कैथोलिक चर्च की महासभा ही चर्च की संपत्ति और प्रशासन तथा प्रबंधन संबंधी कानून बना सकती है .गैर ईसाईयों को तो स्पेन में कभी कोई पद मिल ही नहीं सकता .
७ स्वीडन में लुथेरियन चर्च राजधर्म है , उसे ही विशेष राजकीय संरक्षण प्राप्त है . गैर ईसाइयों को तो वहां संपत्ति में ईसाईयों जैसे अधिकार प्राप्त ही नहीं है .
८. स्विट्ज़रलैंड में प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक्स दोनों को राजकीय संरक्षण प्राप्त है परन्तु किसी गैर इसाई को वहां कोई राजकीय पद नहीं मिल सकता .
९. इटली में रोमन कैथोलिक चर्च को राजकीय संरक्षण प्राप्त है .कोई भी गैर ईसाई नागरिक इटली में कोई महत्वपूर्ण पद नहीं पा सकता और कोई भी गैर ईसाई व्यक्ति इटली में सेना में भर्ती नहीं हो सकता .इटली की न्याय व्यवस्था का संपूर्ण संचालन रोमन कैथोलिक पादरी लोगों के द्वारा ही होता है
अब यूरोप के कुछ कम्युनिस्ट देशों के विषय में जानकारी देता हूँ .
१. हंगरी में कम्युनिस्ट पार्टी का शासन है परंतु वहां रोमन और कैथोलिक दोनों ही प्रकार के ईसाई पादरियों को राजकोष से वेतन दिया जाता है.
२. इसी प्रकार बुल्गारिया एक कम्युनिस्ट राज्य है परंतु वहां ऑर्थोडॉक्स चर्च के पादरियों को राज्य द्वारा राजकोष से वेतन दिया जाता है और ऑर्थोडॉक्स चर्च को बुल्गारिया में विशेष राज्य संरक्षण प्राप्त है .
पुनः अन्य यूरोपीय राष्ट्रों की चर्चा करते हैं .
क . जिसे अंग्रेजी में ग्रीस कहते हैं परंतु वस्तुतः जो उसका कभी भी नाम नहीं था, जिसे भारत में प्राचीन काल में भारतवर्ष का एक प्रांत माना जाता था: यवन प्रांत और जिसका अधिकृत नाम आज भी ऐल्निक या हेलेनिक गणराज्य है (इसे ही अंग्रेजी में ग्रीस कहते हैं) वहां पूर्वी ऑर्थोडॉक्स चर्च राजधर्म है और वहां के संविधान के अनुसार कोई भी गैर इसाई वहां कभी भी शीर्ष पद पर नहीं हो सकता .
ख. डेनमार्क में लुथेरियन चर्च राजधर्म है .गैर लुथेरियन इसाई भी वहां कभी भी सम्राट नहीं हो सकता . फिर गैर ईसाइयों की तो बात ही क्या की जाये .
ग . फ़िनलैंड में भी लुथेरियन चर्च ही राजधर्म है . चर्च की महासभा ही वहां सर्वोच्च विधायिका है .
कोई भी गैर ईसाई व्यक्ति वहां कोई महत्वपूर्ण पद नहीं प्राप्त कर सकते .
घ यही स्थिति आइसलैंड की है . लुथेरियन चर्च वहां का राजधर्म है और वहां भी किसी गैर इसाई को कोई महत्वपूर्ण पद नहीं मिल सकता .
अब बची लोकतंत्र के अन्य लक्षणों की बात .
तो पश्चिमी यूरोप का इतिहास यह है कि 9 वीं शताब्दी से यूरोप में ईसाईयत उल्लेखनीय स्तर पर फैलने लगी चौथी में वह कुछ सौ लोगों तक सीमित थी . 9 वीं शताब्दी से कुछ देशों में कुछ इलाकों में क्रिस्चियन चर्च फैला .और क्रमशः कहीं दसवीं ,कहीं 11वीं 12वीं. कहीं १३ या १४ वीं , कहीं 15 ,16या 17 वीं शताब्दी तक अलग-अलग इलाकों में क्रिश्चियनिटी फैली और दूसरी ओर उसका वहां विरोध होने लगा .सनातन धर्म के पुनर्जन्म का दौर चला जिसे उन्होंने रेनेसां कहा और जो प्रारम्भ में टेढ़े मेढे ढंग से फैला पर अब व्यवस्थित रीतिसे फ़ैल रहा है .
धीरे-धीरे यूरोप में चर्च फैला और फिर उसने ऐसा अपना शिकंजा कसा कि वहां के लोगों का जीवन परेशानियों से ,,कष्टों से, पीड़ाओं से भर गया .
एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य जो हमें जानना चाहिए वह यह है कि यूरोप में जो भी राजवंश है ,वह मूलतः भरतवंशी है . अभी तो वह वह अपने को मध्य एशियाई क्षेत्र से गया हुआ बताते हैं लेकिन स्वयं मध्य एशिया तो हजारों साल तक भारत वर्ष का ही अंग था . समस्त जंबूद्वीप में भारत राष्ट्रथा .
तो स्वभावतः हूणों शकों आदि भारतवंशी राजवंशों का ईसाइयत से आतंरिक टकराव रहा . ऊपर से कहीं कहीं वे क्रमशः ईसाई बनते गए पर वही वे चर्च से अनेक बातों में अपना मतभेद रखते रहे इसीलिए तो इंग्लैंड में एक बार यह स्थिति तक आ गई कि चर्च के समर्थक लोगों ने इंग्लैंड के राजा को ही एक बहुत मामूली बात पर मृत्युदंड दे दिया. जब जनता क्रोध से पादरियों को मारने बढ़ी तो उन्होंने उस राजा का कटा हुआ सिर मोटे सूजे से सिल दिया क्योंकि उन्हें तब तक कोई शल्य चिलित्सा तो आती नहीं थी. वह तो बाद में भारत से सीखी .
तो जब जनता दौड़ी नाराज होकर पादरियों को मारने तो मोटे सूजे से सिल दिया तलवार से कटे सर को और रुई के मोटे मोटे पूले चरों और लगा कर कहा : देखो , राजा मरे नहीं हैं. ऐसा बड़ा छल और नीचता . लोग लौट गए और वह राजा का कटा सर भी लुढ़ककर गिर गया . तो ऐसे झगडे चलते रहे .
चर्च और राजाओं में जो झगड़े होते रहे उसके लिए दो तलवारों का सिद्धांत १६ वीं शताब्दी में सामने रखा किएक तलवार चर्च की , दूसरी राजा की . Theory of Two swords कहा गया इसे .
इसमें भी जब और टकराहट बढ़ी तो बीसवीं शताब्दी ईस्वी में पहली बार कहा गया कि राज्य secular रहेगा अर्थात वह बहुसंख्यकों के पंथ को तो विशेष संरक्षण देगा पर अन्य चर्चों को भी नष्ट नहीं करेगा . अर्थात वह किसी भी इसाई पंथ का विशेष पक्षपात नहीं करेगा और एक पंथ को विशेष संरक्षण देगा भी तो दूसरे पक्ष के लोगों का जाति संहार अर्थात वंश नाश नहीं करेगा क्योंकि इसके पहले वहां एक ईसाई पंथ दूसरे पंथ का पूरा सफाया यानी जाति संघार करता था.
तो राजा लोग और प्रबुद्ध लोग बहुत ही दुखी थे और उन्होंने कहा कि देखो ,जो जन्म के, मृत्यु के ,मुक्ति के ,आत्मा के, परमात्मा के, पुनर्जन्म के ,स्वर्ग के, नरक के, आदि प्रश्न अलग अलग, अलग अलग ढंग से हर चर्च के पादरी बताते रहेंगे परंतु जो सामान्य लौकिक जीवन है ,गृहस्थ जीवन है ,उसमें राज्य अपने सेकुलर यानी लौकिक कानून बनाएगा और उसमें चर्च का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं. इसे ही secular राज्य की धारणा कहा गया २० वीं शताब्दी ईस्वी में पहली बार .
तो सेकुलर का अर्थ क्या हुआ ? ईसाई चर्चों के झगड़ों को राज्याश्रय नहीं देना .अधिकृत रूप से प्रत्येक नेशन स्टेट का एक राजधर्म है .किसी न किसी इसाई पंथ को ही उन्होंने हर नेशन स्टेट ने अपना राजधर्म घोषित कर रखा है और उसे विशेष संरक्षण देते हैं, शिक्षा और न्याय व्यवस्था में उस चर्च का भारी प्रभाव है, हस्तक्षेप है और दूसरों को भी वहां रहने की अनुमति है जो पहले नहीं दी जाती थी , १०० वर्ष से कम हुआ जब यह अनुमति दी गयी है तो ऐसे भयंकर असहिष्णु , भयंकर कलह रत लोग भारत को क्या सिखा सकते हैं ? पर इन ईसाइयों के भारतीय हिन्दू कुछ चेले भारत को सहिष्णुता सिखाते हैं .
वर्तमान में दुनिया के अन्य पंथों को भी एक मर्यादा में काम करने की अनुमति यूरोप अमेरिका में है लेकिन ना तो संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान में ,ना हीं यूरोप के किसी भी देश के संविधान में secular शब्द राज्य के विशेषण के रूप में कहीं जुड़ा है ,जैसे हमारे यहां आपातकाल में एक संशोधन जोड़कर कह दिया गया कि भारत एक सेकुलर समाजवादी लोकतांत्रिक संप्रभु गणराज्य है .संसार के किसी भी स्टेट में अपने नेशन स्टेट को सेकुलर घोषित नहीं किया है यद्यपि विभिन्न देशों के बीच पहले जैसी कट्टरता नहीं करने और अन्य पंथों को भी थोड़ा-बहुत फैलने देने की छूट देने को वे बातचीत में सेकुलरिज्म कहते हैं लेकिन घोषणा नहीं की गयी है किसी महत्वपूर्ण देश के संविधान में कि यह नेशन स्टेट secular है ..
बहुसंख्यकों के religion को प्रत्येक देश में विशेष राजधर्म के रूप में राज्य का अधिकृत संरक्षण प्राप्त है और कानून व्यवस्था, न्याय और शिक्षा में बहुसंख्यक समाज के religion का ही मुख्य आधार लिया जाता है .
जहां तक लोकतंत्र की बात है, वह भी यूरोप में कुल १०० वर्षों से है , बस. जबकि भारत में हजारों वर्षों से है .
स्त्रियों को तो १०० वर्ष पूर्व तक ईसाइयत में कोई व्यक्ति नहीं माना जाता था .माना जाता था कि स्त्री के आत्मा नहीं होती और वह कोई व्यक्ति नहीं है , वह पुरुष के व्यक्तित्व का ही अंग है .स्त्री का अपना कोई भी स्वतंत्र व्यक्तित्व यूरोप के किसी भी नेशन स्टेट में 19वीं शताब्दी ईस्वी तक मान्य नहीं था .
वहां की वीर स्त्रियों ने तथा उनके समर्थक प्रबुद्ध पुरुषों ने शांतिपूर्वक अहिंसक आंदोलन चला कर जनमानस को जगाया और दबाव बनाया .कई मुकदमे भी चलाएं .तब 1930 के बाद अलग-अलग देशों में इन्हें वोट देने का अधिकार मिला .कुछ देशों में तो 1940 के बाद स्त्रियों को वोट देने का अधिकार मिला है और हर बालिग व्यक्ति को वोट देने का अधिकार बीसवीं शताब्दी ईस्वी में ही यूरोप के नेशन स्टेट में मिला है ,यह जानना चाहिए. यह तो है वहां के लोकतंत्र की सचाई .
अब आप भारत में आइए. वर्तमान भारत में जो लोकतंत्र है, वह संसार की किसी भी कसौटी पर एक स्वस्थ लोकतंत्र नहीं कहा जा सकता. वस्तुतः भारत में भारतीयों का कोई अपना शासन है, यह भी सार्वभौम कसौटियों के आधार पर नहीं कहा जा सकता क्योंकि किसी भी देश में उसका अपना शासन तभी माना जाता है जब वह वहां की अपनी प्रथाओं परंपराओं और वहां के मान्य न्याय नियमों से संचालित हो जैसा कि 1947 ईस्वी तक सब जगह भारत देश में था .
जाति पंचायत और खाप पंचायतें ,गांव या मेडी की पंचायत ,अलग-अलग व्यापारियों की पंचायत, इन सब को और शिष्ट परिषद आदि सब को वैधानिक मान्यता प्राप्त थी और झगड़े निपटाने का अधिकार प्राप्त था .
शुरू में अंग्रेजों ने अपने यहां संबंधित समुदाय के लोगों को जूरी के रूप में रखने की परंपरा चलाई .
हिंदुओं का कोई विवाद है तो कोई धर्म शास्त्रों का ज्ञाता पंडित जूरी होगा ,मुसलमानों से संबंधित विवाद है तो कोई मौलवी होगा, दोनों से संबंधित है तो मौलवी और पंडित दोनों रहेंगे क्योंकि यह माना जाता था कि समाज की परंपराएं ही कानून है और उन परंपराओं को कानून मानकर उन्हीं के अनुसार जो निर्णय होगा वही न्याय कहलाएगा
यहां तक कि जो हिंदू लॉ है उस पर जितनि भी पुस्तकें लिखी गई हैं ,उन सब में यह स्पष्ट कहा गया है कि हिंदुओं का आधार स्मृतियाँ यानी धर्मशास्त्र हैं और उसके बाद उन पर लिखी गई टीकाएँ हैं और समाज के अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित सर्वमान्य प्रथाएं हैं अर्थात हिंदू प्रथाएं, हिंदू धर्मशास्त्र और हिंदू विद्वानों की टीका यही हिंदू लॉ का आधार है .परंतु बाद में निर्णय आया, सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अगर किसी मामले में धर्म शास्त्रों के अर्थ को लेकर मतभेद है और प्रिवी काउंसिल ने अंग्रेजों की काउंसिल ने उस पर कोई अपना निर्णय दे दिया है तो वही मान्य होगा .लेकिन इस पर विवाद चलता रहा कि धर्मशास्त्र का मूल प्रावधान ही मूल विधि है परंतु बाद में कांग्रेस सरकार ने 1950 के बाद अलग-अलग प्रावधानों में ऐसी व्यवस्था दी कि Law वह है जो संसद में विधानसभा में बनाया जाये और साथ ही इसके विषय में कोई न्यायाधीश जो निर्णय दें , वह Lawहै .
जब हम किसी समाज के धर्म शास्त्रों को और उसकी परंपराओं को अमान्य कर देते हैं, तब जो कानून बनाते हैं वह न्याय नहीं अन्याय कहलाता है और वहां पर जो शासन है, वह उस समाज का शासन नहीं कहलाता क्योंकि शासन मुख्यतः कानून से चलता है तो कानून संबंधित समाज के होने चाहिए .
भारत में स्थिति यह है कि राज्य कर्ताओं ने अपना एक स्वतंत्र संप्रदाय मान लिया है और वह अपनी इच्छा से जो भी कहते हैं वही कानून है . इस प्रकार कानून के बनाने वाले जिसे अंग्रेजी में कहते हैं Law Maker उनकी पात्रता की भारत में कोई भी कसोटी नहीं है .LawMaker को धर्मशास्त्र का ज्ञान होना चाहिए ,अपने देश की प्रथाओं परंपराओं के ज्ञान सहित धर्म शास्त्र का ज्ञान होना चाहिए ,उस पर लिखी टीकाओं का ज्ञान होना चाहिए .संबंधित समाज में कौन सी परंपराएं और प्रथाये चल रही हैं, इनका ज्ञान होना चाहिए .पर भारत में तो प्रधानमंत्री हुए हैं ,केंद्रीय मंत्री हुए हैं, किसी को धर्म शास्त्रों का ज्ञान नहीं और अपने इलाके की परंपराओं का ज्ञान ,भारत की परंपराओं का ज्ञान नहीं और बन गए हैं LawMaker.
जो ला के एडवोकेट और जो लॉ के विषय में सूक्ष्म बुद्धि से परीक्षण कर निर्णय देने वाले हैं यानी जो एडवोकेट यानी वकील अधिवक्ता और ला पर निर्णय देने वाले संविधान के प्रकाश में ,वह है न्यायाधीश ,इनके लिए तो योग्यताएं अर्हताएंनिर्धारित हैं . एडवोकेट को ला का स्नातक होना चाहिए .न्यायाधीश में स्नातक होने के अतिरिक्त अन्य कई गुण होने चाहिए पर law maker को कोई ज्ञान नहीं ?
दूसरी बात यह है कि जब तक आप भारत के अपने धर्म शास्त्रों को ,उन पर लिखी गई थी टीकों को और यहां की परंपराओं को जानना ,उनका विशाल अध्ययन और उनका ज्ञान होना हर अधिवक्ता के लिए ,हर विधि स्नातक के लिए और हर न्यायाधीश के लिए अनिवार्य नहीं करते और आप स्वयं उनका ज्ञान नहीं रखते तब तक इस देश के आप वास्तविक शासक नहीं .क्योंकि शासक भी और न्यायाधीश भी वही है जो अपने समाज के धर्म शास्त्र को जानता हो , उस पर लिखी गई टीकाओं को जानता हो और उसकी परंपराओं को जानता हो .
तो जो इस विषय में सबसे आधारभूत प्रश्न उठता है कि भारत के पास तो अपना मानो कोई शासक ही नहीं है .भारतीय समाज का अपना कोई शासक है ही नहीं क्योंकि अभी शासन जिन नियमों से चल रहा है , वे तो अंग्रेजी राज्य के AngloSaxonLaw हैं और अंग्रेजी राज्य के ढांचे के अनुसरण में राज्य चल रहा है .उसमें थोड़ा बहुत समायोजन कर एक व्यवस्था की गई है ,वह अलग बात है.
या तो हम कहें कि असली शासक आज भी इंग्लैंड का क्राउन है तो यह कथन सत्य नहीं होगा क्योंकि सत्ता का हस्तांतरण हो चुका है तो फिर यह मानना होगा कि भारत के असली शासक तो पंडित जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ,डॉ भीमराव अंबेडकर आदि ही हैं . मनो उनका ही सूक्ष्म शरीर शासन चला रहा है . वोट देकर हम उनकी बनायीं विधायिका के लिए पूर्व निर्धारित ढांचे के भीतर एक प्रत्याशी चुनते हैं , बस .
कार्यपालिका और न्यायपालिका अंग्रेजी ढांचे वाली है और प्रोटेस्टेंट ईसाइयत की अवधारणा से रचित है और विधायिका का जो स्वरुप दिया गया उसके लिए हम अपनी ओर से एक प्रत्याशी का चयन भर कर सकते हैं .
दूसरी बात यह है कि भारत का अभी जो संविधान है जिसमें आपातकाल में secular और समाजवाद शब्द घुसेड़ा गया, उसमें भी इस संविधान का एक अधिकृत हिंदी अनुवाद छपा है तो वहां इसे पंथनिरपेक्ष समाजवादी गणराज्य कहा गया है .कहीं भी धर्मनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग ही नहीं है .
तो यूरोप में ,अमेरिका में धार्मिक राज्य हैं और भारतवर्ष में नास्तिकों का राज्य चल रहा है पर वहां भी धर्मनिरपेक्ष नहीं कहा है , पंथनिरपेक्ष शब्द का प्रयोग है.
अतः धर्म निरपेक्षता शब्द का प्रयोग बदमाशों और लफंगों का लक्षण है क्योंकि संविधान के अधिकृत हिंदी अनुवाद में इसे एक पंथनिरपेक्ष समाजवादी संप्रभु गणराज्य कहा है.
एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि secular और समाजवाद परस्पर विरोधी है .क्योंकि राज्य के सेकुलर होने के लिए यह आवश्यक है कि समाज में अलग-अलग रिलीजन हो ,अलग-अलग पंथों के नागरिक हैं और अलग-अलग धार्मिक पंथ को मानते हैं, तभी राज्य secular होगा जबकि समाजवाद नास्तिकों का राज्य होता है , समाजवादी राज्य कभी भी secular नहीं होता.
कोई भी सोशलिस्ट या कम्युनिस्ट राज्य कभी सेकुलर हो ही नहीं सकता क्योंकि वह तो रिलिजन को अफीम मानकर समाज में इस अफीम को ,अफीम के नशे की अनुमति नहीं दे सकता इसलिए संसार का कोई भी सोस लिस्ट राज्य secular नहीं हो सकता.
एक साथ भारत को सोशलिस्ट भी और सेकुलर भी कहना स्वयं को हास्यास्पद बनाना है क्योंकि कोई भी सोशलिस्ट देश कभी सेकुलर नहीं होता ,वह तो नास्तिक होता है, वह तो किसी रिलिजन को मानता नहीं और सेकुलर वही स्टेट हो सकता है जो रिलिजन को मानता हो और समाज के लोगों को अलग-अलग रिलिजन मानने की छूट देता हो.परंतु भारत के माननीय सांसदों और नेताओं को शायद यह विरोध नहीं दीखता तो इस नयी स्थिति में दोनों शब्दों की नयी व्याख्या माननीय संसद को अवश्य करने की कृपा करनी चाहिए .
इसी प्रकार समाजवाद शब्द का एकमात्र अर्थ होता है राष्ट्र के संसाधनों पर राज्य का पूर्ण नियंत्रण तो क्या भारत इसी अर्थ में एक समाजवादी स्टेट है ?अगर है तो माननीय सांसदों को संसद में इस बात को स्पष्ट कर देना चाहिए कि उनका आशय क्या है क्योंकि अभी जो अर्थ चलता है उसमें राज्य राष्ट्र के सभी संसाधनों का स्वामी भी है और साथ ही उदारीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रिया भी चल रही है जबकि दोनों सिद्धांततः परस्पर विरोधी हैं .


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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद