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#इनफार्मेशन_टेररिज्म का  पूरा विश्व शिकार हुवा:

15वीं शदी में यूरोप के राजसत्ताओं ने यूरोपीय दस्युवो को ईसाइयत के फैलाव और विश्व के गैर ईसाइयों के जर जोरू जमीन पर कब्जा करने के लिए स्टेट स्पॉन्सर्ड टेररिज्म को विस्तार दिय्या। 1492 में कोलूम्बस अमेरिका पहुंचा और 1498 में वास्कोडिगामा भारत।
तय यह हुवा था कि लूट के माल में बीस प्रतिशत इन दस्युओं को मिलेगा साथ मे कब्जा की गई भूमि का गोवेर्नेरशिप भी।
अमेरिका ऑस्ट्रेलिया आदि पर कब्जा पिछले कुछ शताब्दियों का इतिहास है।
कालांतर में तय यह भी हुवा कि जिन देशों का कोई इतिहास नहीं है, उनके बारे में मनमाना इतिहास लिखा जाए। और जिन देशों का इतिहास हो उसकी मनमानी व्याख्या कर ईसाइयत के फैलाव का आधार पैदा किया जाय। भारत दूसरी कैटेगरी में आता है।
उन्होंने अपने तथाकथित नई दुनिया में किये गए अपने अत्याचार और अनुभव को #आर्यन नाम से एक फिक्शन लिखा और उसको वैश्विक स्तर पर फैलाया।
इसके पीछे राजनीतिक और धार्मिक कारण यह था - कि वे अपने लूटतंत्र को कोई नई घटना न बताकर पुरानी घटना की पुनरावृत्ति सिद्ध किया। दूसरे वे अपनी रिश्तेदारी यहूदियों से खत्म करना चाहते थे जो बाइबिल के माध्यम से उंनको जोड़ती है। यह कार्य सर्वप्रथम 1858 में मैक्समुलर ने किय्या। मुझे कोई आश्चर्य नही होगा कि 99% तथाकथित स्कॉलरो में मैक्समुलर का ओरिजिनल फिक्शन नहीं पढ़ा होगा। परिणाम यह हुवा कि जर्मनी के इसाइयो का इन आतंकी सूचना से भयानक  माइंड मैनीपुलेशन किय्या गया और उन्होंने हिटलर के नेतृत्व में 60 लाख यहूदियों और 40 लाख जिप्सियों का निर्मम कत्ल किया।

 इसको  कैसे किया गया? एक झलक देखें।

"चलिए पहले यही क्लियर किया जाय की मिथ क्या है ?और माइथोलॉजी क्या है?
    विलियम जोंस ने 1885 में जब सन्स्कृत की तुलना ग्रीक और लैटिन से की और संस्कृत को उनसे श्रेष्ठ बताया और एक नयी बहस को जन्म दिया कि संस्कृत बोलने वाले इंडो- ईरानियन, इंडो युरोपियन उत्पत्ति के हैं, जो विलुप्त प्रोटॉइण्डियन भाषा से जन्मी है ?
( इसको कैसे पता चला ? किसी ने भी नहीं पूँछा आज तक)

    पूरे विश्व पर कब्जा करने के बाद   Christian  Theologists  ने पूरी मानवता को बाइबिल के अनुसार बाइबिल में वर्णित बेबल के टावर से के अनुसार पूरी दुनिया के लोगों को को Noah के तीनों पुत्रो Jepheth Sam और  Ham के वंशजों के हिसाब से विभाजित किया तो भारत को Ham के वंशजों में वर्गीकृत किया। इसी तरह अफ्रीका के काले लोगों को भी Ham के वंशजों में वर्गीकृत किया।
   बाइबिल के अनुसार प्रलय (बाढ़) के अनुसार पूरी दुनिया noah के तीनों पुत्रो के वंशजों से बसनी है ।इसलिए पूरी दुनिया के निवासियों को ऊपर वर्णित कुनबों में बांटा गया। आप गूगल करिए samites hamites तो ज्यादा स्पस्ट हो जाएगा। Noah ने अपने पुत्र Ham के वंशजों यानि Hamites को अपने बाकी दो पुत्रो के वंशजों की perpetual slavery में रहने का श्राप दिया था।
अब जब यूरोपियन ने पूरी दुनिया में कॉलोनियां बनाई,  तो उनको अनजानी रीति रिवाज संस्कृति और साहित्य  का पता चला। यूरोप में ये गहरे बहस का विषय था कि इन लोगों को बाइबिल के अनुसार किस कुनबे में ड़ाला जाय। काले रंग के लोंगो को hamites में गणना किया गया।
--जब यूरोपियन लोगों ने पूरी दुनिया में अपना उपनिवेश बनाया और वहां के मूल निवासियों से उनका साबका पड़ा जिनकी रीति रिवाज साहित्य और धार्मिक पुस्तकें बाइबिल से भिन्न थीं । प्रसिद्द विद्वान रुडयार्ड किप्प्लिंग के अनुसार अंग्रेजों का भारतीयों पर शासन करना एक ईश्वरीय आदेश और whitemen burden था । और इसलिए मूलनिवासियों के लिए नियम कानून बनाना और उनके रीति रिवाजों और साहित्य को भी परिभाषित करना भी उनका धर्म था ।" मूल निवासियों के उन साहित्य और धर्मग्रंथों को जो बाइबिल के फ्रेमवर्क में फिट नहीं बैठते थे ,खास तौर पर वो साहित्य जो 4000 यानि मूसा के पूर्व के थे ,उनको "मिथ" कहा और उसमे वर्णित इतिहास कथाओं को "माइथोलॉजी" कहा । इसी लिए महाभारत और रामायण जैसी ऐतिहासिक कथाओ को माइथोलॉजी की संज्ञा दी गयी ।
(भारत के मन्दमति बुद्धजीवियों ने माइथोलॉजी का अनुवाद किया - पौराणिक।)

 साथ में मूलनिवासियों  के इन ऐतिहासिक ग्रंथों और साहित्यो  के आधार पर प्रचलित हजारों सालों के रीति रिवाज और तिथि त्योहारों को -"अन्धविश्वास" की संज्ञा से नवाजा गया ।
   चूंकि बाइबिल में hamites श्रापित थे तो उन काले मूलनिवासियों को बर्बर असभ्य अनैतिक दुष्ट और स्लेवरी को deserve करने लायक, जैसी उपाधियों से लादा गया।
यही से अवर्ण (discolored) की शुरुवात हुई।
white लोग सवर्ण और काले अवर्ण या असवर्ण ।
इसीलिये christianon ने वर्ण को मतलब चमड़ी के रंग से जोड़ा ।
यहाँ तक की प्रोटोस्टेंट आन्दोलन के जनक मार्टिन लूथेर ने कहा कि hamites के अन्दर शैतानी गुण और घृणा भरी होती है।
    रंगभेद इसाइयत के शुरुवात से ही है।चर्च के शुरुवाती फाउंडर अलेक्सांद्रिया के Priest Origen(185-254CE) ने Egyptians की गुलामी का कारण ही उनका discolor /Black होना है क्योंकि वे दुस्ट Ham के वंशज हैं ।
   यानि सवर्ण और असवर्ण भी मॉडर्न फलसफा है और भारत को इसाई फलसफा की गिफ्ट है।
   इसीलिए महाभारत और रामायण एक मिथक हैं।
   रंग के आधार पर अफ्रीका का इतिहास सब जानते हैं। लेकिन शायद ये न पता हो की इसके मूल में बाइबिल के निहित मूलमंत्र हैं।
 वापस आते हैं आर्यन (जिन लोगों की भाषा संस्कृत है ) invasion मिथ पर । जब विलियम जॉन ने संस्कृत भाषा को यूरोपियन भाषाओँ की जननी स्थापित कर लिया तो उनके, बाद के यूरोपीय विद्वानो ने ये सिद्ध करना शुरू किया भारत/इंडो ईरानियन ही समस्त   मानवजगत के जनक हैं । जिनको आर्यन रेस के नाम से जाना जाता है ।
इनके दो समूह पूर्व से पश्चिम की तरफ माइग्रेट किये तो जो लोग जर्मनी पहुंचे ,उन्होंने संस्कृत संस्कृति को , जो कि एक डायनामिक उत्तम और प्रकृति के रहस्यों को ज्यादा बढ़िया तरीके से एक्सप्लेन करती है , उसकी शुद्धता जर्मन निवासियों ने   शुरुवात से अक्षुण रखा वो विशुद्ध जर्मन आर्यन रेस है ।
आर्यों (संस्कृत बोलने वाले ) का दूसरा मानव समूह जो पश्चिमी विश्व कि तरफ गए वे  ग्रीक और रोमन कल्चर के जन्मदाता हैं , लेकिन वे संस्कृत कि शुद्धता बरक़रार न रख पाये, वे आर्य होते हुए भी जर्मन आर्यों से इन्फीरियर रेस हैं , इसलिए फ्रांस जो ग्रीक और रोमन कल्चर का वाहक है ,और इसीलिये उसको पुनर्जागरण की जरूरत है ।
लेकिन एक बात जो दोनों में कॉमन है वो है --monogod के उपासक हैं यानि क्रिस्चियन हैं , क्योंकि आर्य मूलतः एकब्रम्ह के उपासक थे ।
एक तीसरा आर्यों का मानव समूह जो पूर्व यानि भारत और फिर दक्षिणी भारत कि और माइग्रेट किया, वो Degenerate  हो गया क्योंकि वे मूर्तिपूजक और बहुदेव वाद के उपासक हो गए ।
अब आगे इसी में ये कहानी गढ़ी जायेगी कि जो भारतीय आर्य थे, उन्होंने भारत के मूल निवासी "द्रविड़ों" को दक्षिण कि और खदेड़ दिया । लेकिन उसके बारे में बाद में ।
ज्ञातव्य हो कि अमरसिंह प्रणीत अमरकोश में #आर्य का अर्थ - महाकुल कुलीन आर्य सभ्य सज्जन और साधु होता है।
षट सज्जनस्य : महाकुल कुलीन आर्य सभ्य सज्जन साधव:।
गोत्र अर्थात स्कूल ऑफ थॉट।
जाति अर्थात एक्सटेंडेड फैमिली ट्री।
विस्तारित वंश वृक्ष।
समस्त जातियों का गोत्र होता है।
जाति का अर्थ वंश वृष।
फैमिली ट्री
भारत 10 000 साल से ऊपर की संस्कृति है।

आज एक परिवार में इन वर्षो में कितने परिवार बने होंगे।
सोचिए।

भारत मे यदि निम्न और उच्च  जाति का कांसेप्ट होता क्या राणा कुम्भा की  बहू मीरा बाई रैदास हो सकते थे क्या?

समस्या जाति से है कि उसके पोलिटिकल एक्सप्लॉइटशन से?

मुलायम यादव जब  सामाजिक न्याय के योद्धा लालू यादव से आज भी रिश्तेदारी करते हैं तो आपको दिक्कत नही आती।

संविधान में जाति घुसेड़ी तो दिक्कत नही आई।
ब्रामहण क्षत्रिय वैश्य - वर्ण थे।
उंनको 1901 में रिश्ले ने जाति घोसित किया जनगणना के सरकारी कागजों में, और आप ने उसे संविधान सम्मत बनाया तब तो लाज नही आई।

आज जाति पर लाज आती है।
पाखंडी भारतीयों।

बाबा ने जब उमा के मुह से कहलवाया कि -
जद्यपि दुख दारुण जग नाना।
सबसे कठिन जाति अपमाना।

तो पाखंडियों ये बताओ कि वह किसकी बात कह रही थी।
शिव जी की न।
वही तो उनका परिवार था।

पाखंडी भारतीय नग्रेजी झाड़ना बन्द करो।
गुलामी से बाहर निकलो।

हयूमैनिटिज़ के पढ़ने वाले भारतीय कलंक है इस देश के।
जिन्होंने गुलामी को शिंक्षा के माध्यम से आकंठ अपनी आत्मा तक को गुलाम बना रखा है 150 वर्षो से।
डूब मरो निकम्मो।

मुझे मालूम है कि #आर्यन फिक्शन की भांति भांति तरह का विस्तृत फिक्शन दुनिया के बहुत से लोगों ने पढ़ा होगा।

लेकिन मुझे पूरा भरोसा है कि #ओरिजिनल_फिक्शन किसी ने नहीं पढ़ा है। आज आइये इस फिक्शन के मूल स्वरूप से आपको परिचित करवाते हैं।

इसकी फिक्शन का मूल आधार एक अलग ईसाई विद्वान  विलियम जोहन्स नामक धूर्त धर्मांध कलकत्ता हाइकोर्ट के ज़ज् ने तैयार किया था - 1786 में जब उसने संस्कृत भाषा की तुलना ग्रीक और लैटिन से करते हुए उसको इंडो इरानियन इंडो युरोपियन और इंडो जर्मन भाषा घोसित किया था।

उसका उद्देध्य था - ईसाइयत को श्रेष्ठ और हिंदूइस्म को प्रिमिटिव ( जो भी इसका अर्थ होता हो) धर्म घोसित करना।
(आप जानते हैं कि यह कितनी कमीनी और पाखंडी कौम है। आपकी आंख के सामने की बात है इराक में वेपन ऑफ मास डिस्ट्रक्शन की अफवाह उड़ाकर कैसे उस देश पर कब्जा किया और उसको बर्बाद किया। और आज उसका क्या हाल है। लीबिया पर कैसे कब्जा किया झूंठ बोलकर, और आज उसकी समस्त तेल भंडार पर कब्जा किया हुवा है। कोई उनसे आज भी प्रश्न पूँछ रहा है , कि ऐसा क्यों किया ?)

एशियाटिक सोसाइटी के नाम से जो भी कूड़ा करकट विलियम जोहन्स ने भारत से लिखकर यूरोप भेजा उसको ब्रम्हसत्य मानकर यूरोप के लोगो ने पढ़ा और अपने मनोनुकूल पुनरविश्लेशण किया।

ऐसा क्यों किया ?
आपको याद है कि जब ये दस्यु भारत आये थे तो भारत दुनिया का सबसे धनी देश था। जैसे आज आप यूरोप अमेरिका के समाज के बारे में जिज्ञासु रहते हैं, वैसे ही वे भारत के बारे में जिज्ञासु थे।

इस तरह वहां फिलोलोजिस्ट और इंडोलॉजिस्ट की एक खेप पैदा हुई और वहां के विश्व विद्यालयों में इस तरह के विभाग बने - जैसे साइंस ऑफ लैंग्वेज।

किसी ने आज तक पूँछा नही कि भारत आते ही विलियम जोहन्स को संस्कृत में विशेज्ञता कैसे मिल गयी कि वह उसकी तुलना ग्रीक और लैटिन से करने योग्य हो गया ?
सिंपल सा प्रश्न है।
किसी ने यह तक नही पूँछा कि फिलोलोजिस्ट और इंडोलॉजिस्ट नामक चिड़िया होती क्या हैं ?

फिर जन्म होता है मैक्समुलर जैसे फ्रॉड का जिसकी टोटल एजुकेशन मेट्रिक थी लेकिन जिसको आज भी डॉ प्रोफ मैक्समुलर कहा जाता है। गूगल पर सर्च कीजियेगा तो मिलेगा - टेलेरियन प्रोफेसर - जो कि एक मॉडर्न युरोपियन भाषा पढ़ाये जाने का विभाग था।

उसने जीवन यापन के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी में नौकरी की। जिसमे उसको ऋग्वेद की एक मैनुस्क्रिप्ट के एक पेज को 8 पौंड के दर से   copy and collate ( चित्र या स्केच बनाने का )  का ठेका मिला।

टोटल सालाना कमाई - उसके अंदाजे से लगभग 200 पौंड।
1858 यह फिक्शन उसने लिखा।
जो प्रदोष अइछ की पुस्तक Truths से फ़ोटो स्कैन है।
इस फिक्शन और अफवाह को कालांतर में भारतीय संविधान में भी जगह मिली। जिसको  कल मोदी सरकार  पुनः वैधानिक बनाया।

यदि इस विषय मे कोई भी जिज्ञासा हो तो निसंकोच उठाएं। क्योंकि यह विषय जासूसी उपन्यास के रहस्य की तरह ही रहस्यमयी है इसलिए विद्वत गण इतने भ्रमित हैं।

जिन्होंने भी अंग्रेजी या सुरेंद्र मोहन पाठक के फिक्शन पढे होंगे उंनको इस फिक्शन को पढ़ने में मजा आएगा।

येलो वाला ओरिजिनल फिक्शन है। और जो हाइलाइटेड नहीं है वह लेखक के द्वारा उठाये गए प्रश्न हैं।

अब आज की #राजनीति_और_संविधान:
इस अफवाह के अनुसार आर्य में कौन कौन आते हैं ?
ब्रामहण क्षत्रिय और वैश्य।
अर्थात सवर्ण।
copy
अजय कर्मयोगी

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