आर्यभट्ट और वाराताहमिहिर में कुछ नहीं रखा,भूतिया फिल्मों से प्रेरित ब्रम्हाण्ड कैसे बना इसपर बिगबैंग थ्योरी दे
पूरब का ब्रम्हाण्ड, पश्चिम का बिगबैंग और भूतों वाली फिल्म
[हमारी शिक्षा और व्यवस्था, आलेख – 25]
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किसी ने लिखा – “एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो” और हम पत्थर लिये पिल पडे। आसमान में तो सूराख नहीं हुआ, दो चार सर अवश्य फट गये हैं। कथनाशय यह है कि शब्दार्थ और भावार्थ के मध्य जमीन और आसमान का अंतर है और यही प्राचीन ज्ञान के प्रति समझ विकसित करने का प्राथमिक सूत्र है। प्राचीन का विषय उठा है तो ज्ञान होना चाहिये कि क्या आर्यभट्ट के इस राष्ट्र भारत के पास सृष्टि और इसकी उत्पत्ति की कोई मौलिक अवधारणा पहले से समुपस्थित थी? इस विषय पर गहरे उतरने से पूर्व यह भी समझना चाहिये कि ब्राम्हाण्ड की उत्पत्ति से संदर्भित बिग-बैंग थ्योरी जिसे आज कमोबेश सर्वत्र मान्यता प्राप्त है, से पहले, क्या समझ विकसित थी।
बाईबल सेवन डे थ्योरी प्रदान करती है अर्थात परमेश्वर ने सात दिन में सृष्टि का निर्माण किया। आरम्भिक छः दिनों में परमेश्वथर ने ब्रह्माण्ड और पृथ्वी (दिन 1), आकाश और वायुमण्डल (दिन 2), सूखी भूमि और सभी पौधे के जीवन (3 दिन), सितारों, सूरज और चन्द्रमा सहित अनेक निकायों का गठन किया (दिन 4), पक्षियों और जल जीवों (5 दिन), और सभी जानवरों और मनुष्य (दिन 6) में रचना की, सातवे दिन ईश्वर ने विश्राम किया। लगभग समानता पूर्वक सात दिवस में सृष्टि के निर्माण की बात कुरान भी सामने रखता है - अल्ल्जी खलकस्समावाति वल्अर्ज व मा बैनहुमा फी सित्तति अय्यामिन् सुम्मस्तवा अलल्अर्शि अर्रह्मानु फस्अल् बिही खबीरन् (आयत 59)। मध्यकाल के कवि मलिक मुहम्मद जायसी ने अपनी कृति अखरावट में सृष्टि की कहानी को कविता में बदला है। उनके अनुसार - “गगन हुता नहिं महि दुती, हुते चंद्र नहिं सूर। ऐसइ अंधकूप महं स्पत मुहम्मद नूर” अर्थात जब आसमान, धरती, सूर्य, चंद्रमा आदि कुछ भी नहीं थे तब शून्य में पैगम्बर मोहम्मद की ज्योति उत्पन्न हुई। सृष्टि की उत्पत्ति को ले कर वन्दनीय गुरुनानक के विचार उपनिषदों के उल्लेखों से साम्यता रखते हैं। वे कहते हैं कि परमात्मा ने अपने आप, बिना किसी की सहायता के सृष्टि रची। उनकी रचनाओं में अनेक उल्लेख है कि परमात्मा ही स्वयं सृष्टि के रूप में परिवर्तित हुआ है। गुरुनानक के अनुसार सृष्टिरचना का समय अनिश्चित है। एकदम ही नवीन अवधारणा बौद्ध धर्म में पायी जाती है, बौद्ध संसार की उत्पत्ति तथा प्रलय की अवधारणा को नहीं मानते। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार संसार में वस्तु उत्पन्न तथा नष्ट होती रहती है, जीवों के जन्म मरण का प्रवाद चलता रहता है परंतु समग्र संसार की न तो उत्पत्ति होती है, न ही विनाश। जैन शस्त्रों के अनुसार ब्रह्माण्ड का मूल क्रम अनन्त (आत्मा) से महत, महत से अन्धकार, अन्धकार से आकाश, आकाश से वायु, वायु से अग्नि,अग्नि से जल, जल से पृथ्वी तथा पृथ्वी से जीवन है।
आधुनिक निष्कर्षों पर पहुँचने से पहले विज्ञान ने अपनी पूर्ववर्ती शोध-अवधारणों में ब्रम्हाण्ड को ले कर कपोलकल्पनाओं का जम कर सहारा लिया, सिद्ध करने की दिशा तो इक्कीसवी सदी में जा कर आंशिक रूप से पकडी गयी है। अरस्तु ने जिस ब्रम्हाण्ड की कल्पना की उसके केंद्र में धरती थी। पृथ्वी अपनी धुरी पर सूर्य के इर्दगिर्द घूमती रहती है, यह मॉडल कॉपरनिक्स की देन माना जाता है। एक समय अल्बर्ट आईंस्टाईन मानते थे कि ब्रह्मांड स्थिर, शाश्वत एवं सीमित है तथा सदैव ऐसा ही रहेगा। वर्ष 1922 में रूस के वैज्ञानिक एलेक्जेंडर फ्रीडमैन ने ब्रम्हाण्ड का सिकुडना, फैलना और गतिशील होना सिद्ध किया। अंतरिक्ष में कौन किसके केन्द्र में अथवा किसके इर्दगिर्द जैसी परिकल्पनाओं को अमेरिकी वैज्ञानिक ऍडविन पावल हबल ने सार्थक दिशा तब प्रदान की जबकि उन्होंने आकाशगंगा सहित अनेक अन्य गैलेक्सियाँ खोज निकालीं। अब बात यह कि मुर्गी तो तलाश ली गयी लेकिन अंडे का पता लगाना शेष था।
कई कल्पनाओं ने अपने घोडे दौडाये। बीसवी सदी में प्रतिपादित ब्रम्हाण्ड की उत्पत्ति के सम्बंध में कुछ चर्चित वैज्ञानिक मान्यताओं में स्थायी अवस्था सिद्धांत (Steady State Theory) प्रमुख है। इस सिद्धांत को ब्रह्माण्ड विज्ञानी फ्रेड हॉयल, अंग्रेज गणितज्ञ हरमान बांडी और अमेरिकी वैज्ञानिक थोमस गोल्ड के साथ संयुक्त रूप से सामने रखा था। सिद्धांत के अनुसार ब्रह्माण्ड का कोई आदि है और न ही अंत, न ही यह समयानुसार परिवर्तित होता है। ब्रह्माण्ड के घनत्व को स्थिर रखने के लिए इसमें पदार्थ स्वत: रूप से सृजित होता रहता है। रोचक बात हैं कि हॉयल, बांडी और गोल्ड ने भूतों पर आधारित एक फिल्म से प्रेरित होकर स्थायी अवस्था सिद्धांत को प्रतिपादित किया था। कालांतर में इस सिद्धांत के एक प्रतिपादक फ्रेड हॉयल के साथ मिलकर भारतीय वैज्ञानिक जयंत नार्लेकर ने हॉयल-नार्लीकर गुरुत्व सिद्धान्त (Hoyle–Narlikar theory of gravity) का प्रतिपादन किया जिसके अनुसार ब्रह्माण्ड का एक अर्ध-स्थायी अवस्था मॉडल (quasi steady state model) है। अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. एलन संडेज ने दोलायमान ब्रह्मांड सिद्धांत (Oscillating Universe theory) को सामने रखा जिसके अनुसार ब्रह्मांड करोड़ों वर्षों के अंतराल में विस्तृत और संकुचित होता रहता है। अनुमानत: एक सौ बीस करोड़ वर्ष पहले एक तीव्र विस्फोट हुआ था जिसके पश्चात से ब्रह्मांड फैलता जा रहा है। लगभग दो सौ नब्बे करोड़ वर्ष बाद गुरुत्वाकर्षण बल के कारण इसका विस्तार रुक जाएगा और फिर ब्रह्मांड संकुचित होने लगेगा तथा अनंत रूप से बिंदुमय आकार धारण कर लेगा। उसके बाद एक बार पुनः विस्फोट होगा तथा यह क्रम चलता रहेगा। ब्रम्हाण्ड की उत्पति का वर्तमान में सर्वमान्य सिद्धांत है बिगबैंग थ्योरी जिसे बेल्जियम के खगोलज्ञ पादरी जार्ज लैमेन्टर ने 1960-70 ई. में सामने रखा था। उनके अनुसार, लगभग 15 अरब वर्ष पूर्व सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड एक परमाण्विक इकाई के रूप में था। उसमें अचानक एक महाविस्फोट ( Big Bang ) हुआ जिससे सामान्य पदार्थों का निर्माण आरम्भ हुआ और अत्यधिक ऊर्जा का उत्सर्जन हुआ। महाविस्फोट के पश्चात् ही विभिन्न ब्रह्माण्डीय पिण्डों, तथा आकाशगंगाओं का सृजन हुआ। इसी प्रक्रिया से कालांतर में ग्रहों का निर्माण भी हुआ। महाविस्फोट के मात्र 1.43 सेकंड के बाद भौतिकी के नियम लागू होने लग गए थे। बिग बैंग ब्रह्मांड सिद्धांत की मूलभूत आलोचना यह है कि यह प्रारंभिक स्थिति की व्याख्या नहीं करता, तथापि ब्रह्मांड के सामान्य विकास की तार्किक व्याख्या अवश्य प्रस्तुत करता है।
जो कुछ आज विज्ञान है उसके विषय में भारतीय प्राचीन वैज्ञानिक क्या दृष्टि रखते थे? श्याम बेनेगल ने अपने चर्चित धारावाहिक भारत एक खोज में सृष्टि निर्माण सम्बंधी ऋग्वेद के कतिपय श्लोकों का अनुवाद कर प्रस्तुत किया था। कुछ पंक्तियाँ उसी अनुवाद से इस सम्बन्ध में अवश्य पठनीय है। ऋग्वेद के अनुसार - सृष्टि से पहले सत् नहीं था/ असत् भी नहीं/ अंतरिक्ष भी नहीं/ आकाश भी नहीं था। छिपा था क्या, कहां/ किसने ढका था। उस पल तो अगम, अतल
जल भी कहां था। नहीं थी मृत्यु/ थी अमरता भी नहीं। नहीं था दिन, रात भी नहीं/
हवा भी नहीं। सांस थी स्वयमेव फिर भी/ नहीं था कोई, कुछ भी/ परमतत्व से अलग, या परे भी। इस सूक्त की गहरी विवेचना करते हुए हमें ऋग्वेद का ही एक और श्लोक संज्ञान में लेना चाहिये जो कहता है – “हिरण्यगर्भ: समवर्तताग्रे भूतस्य जात: पतिरेकासीत्। स दाधारं पृथ्वीं ध्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम्” अर्थात ”वह था हिरण्यगर्भ, सृष्टि से पहले विद्यमान/ वहीं तो सारे भूत जात का स्वामी महान/ जो हैं अस्तित्वमान, धरती- आसमान धारण कर/ ऐसे किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर”। हिरण्यगर्भ की तुलना आधुनिक नेबुला (Nebula) से करते हुए ऋग्वेद के कुछ अन्य श्लोकों को बिग-बैंग थ्योरी के आलोक में देखने का यत्न करें। ऋग्वेद में ही उल्लेख है – “तम आसीत्तमसा गूलहमग्रेअप्रकेतम सलिलम सर्वमाइदम। तुच्छयेनाभ्वापिहितम यदासीत त्पस्तन्महिनाजायतैकम” अर्थात उस सर्वत्र व्यापक अंधकार में एक तरल पदार्थ सर्वत्र (परमाणविक इकाई), अतिसूक्ष्म उपस्थित था। तभी वहाँ महान, महिमावान, चलायमान करने वाला परमात्मा समुपस्थित (ऊर्जा का उत्सर्जन) हुआ। इसके पश्चात की घटना के लिये यह श्लोक देखें कि “यदक्रंद: प्रथमं जायमान उद्यंत्समुद्रादुत वा पुरीषात्। श्येनस्य पक्षा करिणस्य बाहू उपस्तुत्यं महि जातं ते अर्वन” अर्थात आदि में उत्पन्न हुआ वह (ऊर्जा) अपने अनादि कारणों से और उपर उठता हुआ फैल गया। घोर शब्द करता हुआ वह बाज की बाहों और हिरण की टांगे के वेग (गति) से फैल गया (महाविस्फोट अथवा Big-Bang)।
यह ठीक है कि अमेरिकी वैज्ञानिक ऍडविन पावल हबल ने गैलेक्सी आदि की खोज की परंतु जो पाया क्या वही विवरण श्रामद्भाग्वतगीता के उन प्रसंगों में नहीं प्राप्त होता है जब कृष्ण अर्जुन को अपने विराटरूप का अवलोकन कराते हैं। क्या वे विवरण हजारो गैलेक्सी यहाँ तक कि अनगिनत सूर्यों की समुपस्थिति नहीं बताते? इस दिशा में कुछ परवर्ती भारतीय शोध की ओर भी देखना आवश्यक है। जो बहुत बाद में सिद्ध हुआ उसे कितना पहले कह दिया गया था उदाहरण के लिये सूर्य के कारण ही दिन और रात हैं, इस लोक में प्रतिदिन जो सूरज का उगना और अस्त होना दिखाई पडता है वह वास्तविक नहीं है (स दा एष न कदाचनास्तमेति नोदेति) अथवा सूर्य के कारण ही ऋतुओ का बदलना होता है, वही समस्त भुवनों का आधार है (तास्मिन्न्र्पितं भुवनानि विश्वा), सूर्य अपनी आकर्षण शक्ति से पृथ्वी आदि क्रहों को अपनी कक्षा में चलाता है, उन्हें गिरने नहीं देता (सविचा यंत्रै: पृथ्वीमरम्णादस्कम्भने सविता धामदहतु। अश्वविवाधुक्षध्दुनिमंतरिक्षमतूर्ते बद्धम सविता समुद्रम)। सूर्य पृथ्वी की पूर्व दिशा को धारण करता है अर्थात पृथ्वी अपने केंद्र पर पूर्व की ओर गति करती है। पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण है, मिट्टी का ढेला उपर फेंकने पर आवश्यक रूप से नीचे की ओर ही आयेगा (लोष्ठ: क्षिप्तो बाहुवेगं गत्वा नैव तिर्यग्गच्छति। नोर्ध्वमारोहति पृथ्य्वी विकार: पृथ्वीमेव गच्छति)। अन्य ग्रहों से आकृष्ट होने के कारण पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती रहती है (पंचमहाभूतमयस्तारा गुणपंजरे महीगोल:। स्वेयस्कांतांत: स्थो लोह इवावस्थितो वृत:)। चंद्रमा के आकर्षण से ज्वार-भाटा उत्पन्न होता है (स्थलिस्थमाग्नि संयोगादुद्रेकि सलिलं यथा तथेंद्रु वृद्धो सलिलं भोधिकुरुसतम)। सूरज की रोशनी के कारण चंद्रमा प्रकाशित होता है (सूर्यरश्मिचंद्रमा गंधर्व:)।
हम यूरोप के ज्ञान से ही ब्रम्हाण्ड को जानते समझते आये है। परिस्थिति यह है कि प्राचीन शास्त्रों में लिखे हुए सिद्धांत जो बाद में जा कर सिद्ध भी हुए उन्हें न मान्यता मिली न ही हमारी शिक्षण संस्थाओं ने तवज्जो दी। बच्चा पढता है गेलेलियो, या कि कॉपरनिकस उसे अरस्तु और प्लेटो भी पढा दिया जाता है लेकिन बहुत धीरे से जहर पिलाया जाता है कि वैदिक साहित्य मिथक हैं, आर्यभट्ट और वाराहमिहिर में कुछ नहीं रखा धरा। भूतिया फिल्मों से प्रेरित हो कर पश्चिम, ब्रम्हाण्ड कैसे बना इसपर थ्योरी दे देता है लेकिन हमारे लिये तो सारी लिखित संहिताये ही त्याज्य हो गयी हैं। सच्चाई यह है कि पश्चिम का ज्ञान पूरब तक पहुँचे और पढाया जाये यह समय की मांग बताया गया लेकिन पूरब के ज्ञान को भुला दिया जाये यह एक सोचा समझा षडयंत्र है।
अजय कर्मयोगी
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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद