#भारत_का_आर्थिक_इतिहास:
1813 में ब्रिटेन के चार्टर में इस बात की चर्चा हुई कि ईस्ट इंडिया कंपनी और ईसाई मिशनरियों के द्वारा हिन्दुओ के धर्म परिवर्तन का सबसे शशक्त अस्त्र क्या होगा - निष्कर्ष निकल कर आया कि शिंक्षा।
तदन्तर भारत मे तत्कालीन शिंक्षा की पद्धति और शिक्षक और छात्रों का डेटा इकट्ठा करने का कार्य तात्कालिक 1820 से 1830 में ईसाई अफसरों को सौंपा गया। जिसका डेटा धरमपाल जी की "ब्यूटीफुल ट्री" में प्रस्तुत किया गया है - जिसमे तात्कालिक समय मे शिंक्षा ग्रहण करने वाले शूद्र छात्र और छात्राओ की संख्या सवर्ण छात्रों की तुलना में चार गुना थी।
1835 में मैकाले भारत आता है और शिंक्षा का माध्यम नग्रेजी को बनाने की बात तय की जाती है। 1854 में तथाकथित मैग्नाकार्टा आता है। और फिर सिस्टेमेटिक तरीके से भारत के कृषि-शिल्प-वाणिज्य के साथ साथ शिंक्षा को नष्ट किया जाता है।
मैक्समुलर, विलियम मोनियर, रोबर्ट दे निबोली, एम ए शेररिंग के अनुसार धर्म परिवर्तन में अगली बड़ी बाधा - ब्रामहण ( सवर्ण) और जाति नामक संस्था थी। इसलिए इन दोनों को सिस्टेमिक तरीके से गरियाते हुए हिंदूइस्म को निम्न बताने का अभियान चलाया गया। चूंकि भारत का तात्कालिक पढे लिखे वर्ग का शिंक्षा के माध्यम से पूरी तरह माइंड मैनीपुलेशन किया जा चुका था, और सूचना प्रसारण का समस्त माध्यम गोरे और उनके कॉले गुलामों के हाँथ में आज तक रही है - इसलिए इन बातों का खुलासा न हो पाया।
आगे पढ़िए।
मनुषमृति तक धावा बोलने वालों को कल तक का भी ज्ञान नही है।
अब तो सर्वविदित है कि भारत अनंत काल से दुनिया की एक तिहाही से एक चौथाई जीडीपी का उत्पादक देश 1750 तक रहा है, जबकि अमेरिका और ब्रिटेन मिलकर 1750 तक मात्र 2% जीडीपी के मालिक थे।
Shashi Tharoor ने इस बात को ऑक्सफ़ोर्ड में दो वर्ष पूर्व बोला और पूरी दुनिया ने स्वीकार किया।
लेकिन लूट मार और भारत की गावँ गांव और घर घर होने वाले उत्पादन को नष्ट करने के कारण 1900 आते आते भारत मात्र 2% जीडीपी का शेयर होल्डर बचा।
अब प्रश्न ये है कि इस जीडीपी के उत्पादक कौन थे और जब उद्योग धंधे नष्ट हो गए तो इन उत्पादकों का इन 150 सालों में हुवा क्या ? और उनके वंशजो का क्या हुआ ?
इसका उत्तर विल दुरान्त, दादा भाई नौरोजी, दादा भाई नौरोजी, गदेश सखराम देउस्कर ने दिया है।
दूसरी बात इस लूट का परिणाम भारतीय समाज पर क्या पड़ा ?
विल दुरान्त ने बताया कि - इसका परिणाम हुवा कि सोने का वो भारत, जिसे लूटने तुर्क मोघल और सात समंदर पार से गोरे ईसाई आये थे, दरिद्रता और गरीबी के दाढ़ में फंसकर चकनाचूर हो गया। जिसका परिणाम हुवा कि पूरा भारत Ignorance, superstition, disease and death ( अज्ञानता, अंधविश्वास, बीमारीं और महामृत्यु ) के दुष्चक्र में फंस गया।
उपर्युक्त लेखकों के अनुसार मात्र 50 वर्षो में, 1850 से 1900 के बीच भारत की कुल आबादी की 10 से 15% जनसंख्या (2.5 से 3 करोड़) जो हजारो वर्षो से ऊपर वर्णित जीडीपी की उत्पादक थी, वो प्राण रक्षा हेतु अन्न खरीदने में अक्षम होने के कारण मौत के मुहँ में समा गई।
जो लोग जिंदा बचे वे एक ऐसी स्थिति में रहने को बाध्य हुए जिसमे पेट की आग बुझाना भी बहुत मुश्किल काम था तो वे शिक्षा और सामाजिक सुचिता, (जिसको आज Sanitation और Hygiene के नाम से जाना जाता है) की बात भी कैसे सोच सकते थे।
इन्ही पृष्टितियों में एक सामाजिक कुरीति का जन्म हुआ जिसको #अछूतपन कहते हैं। सती प्रथा को सामाजिक कुरीति बताकर उज़को खत्म करने का श्रेय लेने वाले लुटेरे पाखण्डी और निम्न कोटि के गोरे ईसाइयो ने इस कुरीति को खत्म करने का कानून नही बनाया, जिसके जनक वे खुद थे, वरन उसका राजनैतिक उपयोग कर शासन शोषण और ईसाइयत में धर्म परिवर्तन की पृष्ठिभूमि तैयार किया।
क्रमशः 1911 और 1916 में गोखले और तिलक जी के सर्वशिक्षा के यूनिवर्सल प्राइमरी एजुकेशन के बिल को विसरेगल समिति के ब्रिटिश और उनके द्वारा चुने गए सदस्यों ने खारिज कर दिया और उन्ही बेरोजगार और बेघर लोगों के बकचो की शिक्षा हेतु 1912 से 1917 के बीच एक योजना का एलान किया। पहली बार हिन्दू समाज के इस वर्ग को डिप्रेस्ड क्लास का नाम दिया।
अभी तक वे भारत के उन हिन्दुओ को जो अपनी रोजी नष्ट किये जाने के कारण अंग्रेजो का सशस्त्र विरोध करते थे उनको #क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट बनाकर पैदायशी अपराधी घोसित कर चुके थे।
भारत के एक दूसरे वर्ग , वनवासी और गिरिवासी हिन्दुओ को कभी #एनिमिस्ट और कभी #Aborigine (मूलनिवासी #आदिवासी) चिन्हित कर चुके थे।
अब ये तीसरा नया वर्ग तैयार किया जिसको डिप्रेस्ड क्लास की संज्ञा दी। 1921 की जनगणना में इस शब्द और टाइटल का उपयोग कर इसको सरकारी कागजो में स्थान दिलाया, यद्यपि इस संज्ञा को कभी परिभाशित नही किया।
1928 से 1931 में कभी इनको Exterior Caste और कभी untochable घोसित कर सरकारी कानूनो और आदेशो का हिस्सा बनाया। अंततः 1935 में इनको #स्कीडुलेड #कास्ट घोसित किया जिनकी कुल संख्या 429 थी।
एनिमिस्ट और Aborigine घोसित किये गए लोगो को #स्कीडुलेड #ट्राइब की संज्ञा दी।
संविधान में भी ये जस के तस शामिल किए गए।
क्रिमिनल ट्राइब्स को 1952 में denotified कास्ट या #विमुक्त #जाति घोसित किया गया।
पिछले 70 साल से यही ईसाइयो के मुख्य टारगेट रहे है धर्म परिवर्तन हेतु।
#पूरी_दुनिया_में_निगाह_उठाकर_देखिये।
कोई भी भूभाग जो आज तक ईसाइयत और इस्लामियों के कब्जे में आया, वहां मूल संस्कृति और धर्म के अनुयायियों को समूल नाश किया।
यूरोप में ईसाइयों ने 313 AD और 385 AD के बीच समस्त सेक्युलर रोमन संस्कृति और धर्म के अनुयायियों और कम्युनल यहूदियों की संस्कृति और अनुयायियों का विनाश किया। और वह विनाशिकारण दूसरे विश्वयुद्ध तक जारी रहा। आज उनके पास इजरायल नामक एक भूमि है और वे शशक्त शक्ति हैं विश्व की।
इस्लाम के उदय के बाद पूरे अरब धर्म और संस्कृति का विनाश मात्र 50 वर्ष में किया गया।
भारत मे इन धर्मो के फनाटिक आतंक से आतंकित यहूदियों और पारसियों को हमने शरण दिया।
1030 AD में अलुबेरणी ने लिखा - कि समस्त भारतीय मात्र विधर्मियों के प्रति धर्मांध विरोधी ( फनाटिक) हैं।
भारत एक हजार साल तक इस्लामियों और ईसाइयों का गुलाम होने के बाद भी आज हिन्दू राष्ट्र है तो - ब्रामहण क्षत्रिय वैश्य और शूद्रों के, विधर्मियो के विरुद्ध संगठित प्रयास के कारण।
इसका उदाहरण सीमांत सिंध पर ब्रामहण राजाओं का फनाटिक मुस्लिम आक्रान्ताओं से लड़ने का प्रमाण है।
इसका उदाहरण है - राणा प्रताप की मदद भामाशाह नामक वणिज्यिकि याणि वैश्य ने किया, जिससे वे फनाटिक अकबर को उसकी औकात बता पाए। राणा प्रताप के युद्धक वनवासी कोल थे, जिनको आज scheduled ट्राइब कहा जाता है।
इसका प्रमाण है बिजली पासी और राजा सुहेलदेव पासी, जिन्होंने फनाटिक मोहमडंस से दो दो हाँथ किये।
जिनमे एक का उदाहरण है लखनऊ में बिजली पॉसी का महल और राहुल देव का बहराइच में भहराता महल है। लेकिन ये आज scheduled Caste हैं।
अंग्रेजो के भारत मे आने के पूर्व भारत के चारों वर्णों ने तुर्क अफगानी और मुगलों के विरुद्ध लड़ाई किया। अपने प्राणों का उन विधर्मियों से लड़ने के लिए उत्सर्ग किया।
लेकिन नग्रेज् आने के बाद भारत के चारो वर्णों - मेधा शक्ति, रक्षा शक्ति, वाणिज्य और श्रम शक्ति का विनाश कर उंनको अगड़े और पिछड़ों में बांटने में सफल रहे।
हमारे ब्रिटिश "एडुकेटेड इडियट इनोसेंट imbecile बररिस्टर्स ( BEIIIBS) ने अंग्रेजो की उस बांटो, लूटो, राज करो, और धर्म परिवर्तन करो" की नीति को संविधान में आत्म सात किया।
लेकिन एक बात की बात करना आवश्यक है कि - नग्रेजो के विरुद्ध मात्र तथाकथित #वर्णो ने ही लड़ाई की।
तथाकथित ##वर्णो के नेता उनके द्वारा प्रायोजित नेता थे, जिनको 70 साल में महा बुद्ध बनाया गया।
हमने इस अन्याय को भी कुसूचनाओ के कारण पचा लिया कि हमारे पूर्वजों ने तुम्हारे उप्पर 3000 वर्ष से अत्याचार किया, इसलिए - "तिलक तराजू और तलवार" के नारे के साथ आरक्षण को भी पचा लिया।
लेकिन अब पोल खुल चुकी हैं।
एट्रोसिटी एक्ट का कितना दुरुपयोग हुवा, उसका सर्वेक्षण नहीं किया, परंतु अमेरिका, कांग्रेस, वामपंथ, आयोजित एक आपराधिक हिंसा के कारण इस एक्ट को सुप्रीम कोर्ट द्वारा नाजायज ठहराए जाने के बाद भी, नया आपराधिक कानून ले आये ?
#पढ़ने_लिखने_की_त्रासदी: #वामपंथ
Confidence without clarity leads one to fanatism: वामपंथ की यही परिभाषा है।
वे हिटलर मुसोलिनी जार को अपने देश की संस्कृति में खोंजेंगे। नही मिलेंगे तो appropriate करेंगे अंड का बंड उदाहरण प्रस्तुत करेंगे।
और जहां कोर्ट उंनको फेवर करेगी वहां उसकी वकालत करेंगे, जहां कोर्ट उनका विरोध करेगी वहां उसको गाली देंगे।
यह साइकोलॉजिकल ड्रामा तैयार कैसे होता है इनके मस्तिष्क में? यह विरोधाभास आता कहाँ से है इनके चरित्र में ?
दुनियां भर की सूचनाएं कुसूचनाये पढ़कर आंख बंद करके सोचते है तभी यह विरोधभासी और फनाटिक चरित्र का निर्माण होता है।
इसी कूड़ा को मस्तिष्क में इकट्ठा करने को ही यह पढ़ना लिखना कहते हैं।
हर देश और समाज का अपनी संस्कृति होती है, जिसके अनुसार वहां कोई परिवर्तन होता है। पश्चिम में पूंजीवाद के जन्म के पूर्व वहां की संस्कृति - Plunder slavery through militia power पर आधारित थी। इसलिए पूंजीवाद और मशीनीकरण के कारण वहां उस संस्कृति की विकृतता को बढ़ावा मिला। इस तरह मार्क्सवाद का जन्म होता है।
उस कचड़े को ये फनाटिक अपने घर मे ले आये, जहां बिल्कुल ही अलग संस्कृति थी।
साथ मे ले आये पैगम्बर मार्क्स का आदेश जो उसने 1853 में भारत मे ईसाई दस्युओं को दिया था कि "यद्यपि यह भारत देश हजारो वर्षो से आत्मनिर्भर समाज से निर्मित था, लेकिन चूंकि यहां गाय और हनुमान की पूजा होती है इसलिए यह अर्ध बर्बर समाज है, अतः यहां क्रांति आवश्यक है।
उसके लिए नग्रेजो को दो काम करना होगा -
1- भारतीय समाज का विनाश
2- और उस पाश्चात्य भौतिकवाद की नींव डालना।
तो ये तब से अपने पैगम्बर के आदेश का पालन कर रहे है। भारतीय संस्कृति का विनाश और उस पर भौतिकता की नींव ही नही बल्कि इमारत खड़ी कर रहे हैं।
डेविड के घर का कचडा पांडेय जी के आंगन में खोज रहे है और थॉमस के घर का कचडा राम जियावन के आंगन में डाल रहै है।
लेकिन चूंकि मार्क्स बाबा को यूरोप के ईसाइयो द्वारा अमेरिका के 20 करोड़ natives का कत्ल नही दिखा तो इनको भी वह आज तक नही दिखाई दिया।
#पढ़ा_लिखा_होने_का_अहंकार : #वामपंथ
अभी सुमन्त भट्टाचार्य की वाल से और स्वयम् के अनुभव से यह पता चला कि वामपंथियों को यह अहंकार रहता है कि वह बहुत पढ़ते लिखते हैं, या पढे लिखे होते हैं। बाकी दक्षिण पंथी तो काला अक्षर भैंस बराबर होते हैं।
तो इनके पढ़ने लिखने पर टिप्पड़ी करने से पूर्व एक निष्कर्ष दे दूं - कि पिछले 150 या 70 वर्षो में पढे लिखे भारतीयों ने ही देश को लूटा खसोटा और सर्वनाश किया है। तो तुम्हारी पढ़ाई और लिखाई की तो ऐसी की तैसी।
क्या पढे हो बे ?
डॉक्टरी इंजीनियरी लोहारी आर्किटेक्ट चमड़ा निर्माड ?
क्या पढे हो जिससे समाज की प्रोडक्टिविटी बढ़ी हो?
तुमसे तो अच्छे वे अनपढ़ किसान है जो अपढ़ हैं परंतु 125 करोड़ भारतीयों को जिंदा रखने के लिए भोजन और अनाज पैदा करते हैं।
अब जब बात पढ़ने लिखने की है तो वो भी बात कर लेता हूँ। जो भी छपा है - यदि वह भाषा तुमको आती है तो तुम पढ़ लिख सकते हो ।
चाहे वह सड़क छाप चौसंठिया हो, शोभा डे की इलीट पोर्नोग्राफी की किताब हो, रोमिला थापर की बकवास हो या फिर गीता और रामायण हो।
लेकिन यही यदि चीनी में लिखा हो तो ?
तुम भी जहिलिया की श्रेणी में आ गए।
तुमको तो सूचना और कुसूचना का भेद नही पता लेकिन उसको पढ़कर चींटे की तरह पिछवाड़ा ऊंचा किये घूम रहै हो अहंकार से।
तुम जैसे पढे लिखे लोगों की तरह ही पिछले शताब्दी में आर्यन अफवाह को पढ़कर चम्बरलीन ने "फॉउंडेशन्स ऑफ 19th सेंचुरी" लिखी - जिसके कारण पूरे जर्मनी के ईसा


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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद