प्राचीन भारत में ऋषि-मुनियों को जैसा अदभुत ज्ञान था, उसके बारे में जब हम जानते हैं,
पढ़ते हैं तो अचंभित रह जाते हैं.
रसायन और रंग विज्ञान ने भले ही आजकल इतनी उन्नति कर ली हो, परन्तु आज से 2000 वर्ष पहले भूर्ज-पत्रों पर लिखे गए "अग्र-भागवत" का रहस्य आज भी अनसुलझा ही है.
जानिये इसके बारे में कि आखिर यह "अग्र-भागवत इतना विशिष्ट क्यों है?
अदृश्य स्याही से सम्बन्धित क्या है वह पहेली,
जो वैज्ञानिक आज भी नहीं सुलझा पाए हैं
आमगांव… यह महाराष्ट्र के गोंदिया जिले की एक छोटी सी तहसील, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की सीमा से जुड़ी हुई.
इस गाँव के ‘रामगोपाल अग्रवाल’, सराफा व्यापारी हैं.
घर से ही सोना, चाँदी का व्यापार करते हैं.
रामगोपाल जी, ‘बेदिल’ नाम से जाने जाते हैं.
एक दिन अचानक उनके मन में आया, ‘असम के दक्षिण में स्थित ‘ब्रम्हकुंड’ में स्नान करने जाना है.
अब उनके मन में ‘ब्रम्हकुंड’ ही क्यूँ आया,
इसका कोई कारण उनके पास नहीं था.
यह ब्रम्हकुंड (ब्रह्मा सरोवर), ‘परशुराम कुंड’ के नाम से भी जाना जाता हैं.
असम सीमा पर स्थित यह कुंड, प्रशासनिक दृष्टि से अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में आता हैं.
मकर संक्रांति के दिन यहाँ भव्य मेला लगता है.
‘ब्रम्हकुंड’ नामक स्थान अग्रवाल समाज के आदि पुरुष/प्रथम पुरुष भगवान अग्रसेन महाराज की ससुराल माना जाता है.
भगवान अग्रसेन महाराज की पत्नी, माधवी देवी इस नागलोक की राजकन्या थी.
उनका विवाह अग्रसेन महाराज जी के साथ इसी ब्रम्हकुंड के तट पर हुआ था, ऐसा बताया जाता है.
हो सकता हैं, इसी कारण से रामगोपाल जी अग्रवाल ‘बेदिल’ को इच्छा हुई होगी ब्रम्हकुंड दर्शन की..!
वे अपने ४–५ मित्र–सहयोगियों के साथ ब्रम्हकुंड पहुँच गए.
दूसरे दिन कुंड पर स्नान करने जाना निश्चित हुआ.
रात को अग्रवाल जी को सपने में दिखा कि, ‘ब्रम्हसरोवर के तट पर एक वटवृक्ष है, उसकी छाया में एक साधू बैठे हैं.
इन्ही साधू के पास, अग्रवाल जी को जो चाहिये वह मिल जायेगा..!
दूसरे दिन सुबह-सुबह रामगोपाल जी ब्रम्हसरोवर के तट पर गये,
तो उनको एक बड़ा सा वटवृक्ष दिखाई दिया और साथ ही दिखाई दिए, लंबी दाढ़ी और जटाओं वाले वो साधू महाराज भी.
रामगोपाल जी ने उन्हें प्रणाम किया तो साधू महाराज जी ने अच्छे से कपड़े में लिपटी हुई एक चीज उन्हें दी और कहा,
“जाओं, इसे ले जाओं, कल्याण होगा तुम्हारा.”
वह दिन था, ९ अगस्त, १९९१.
आप सोच रहे होंगे कि ये कौन सी "कहानी" और चमत्कारों वाली बात सुनाई जा रही है,
लेकिन दो मिनट और आगे पढ़िए तो सही...
असल में दिखने में बहुत बड़ी, पर वजन में हलकी वह पोटली जैसी वस्तु लेकर, रामगोपाल जी अपने स्थान पर आए, जहाँ वे रुके थे.
उन्होंने वो पोटली खोलकर देखी, तो अंदर साफ़–सुथरे ‘भूर्जपत्र’ अच्छे सलीके से बाँधकर रखे थे.
इन पर कुछ भी नहीं लिखा था.
एकदम कोरे..!
इन लंबे-लंबे पत्तों को भूर्जपत्र कहते हैं,
इसकी रामगोपाल जी को जानकारी भी नहीं थी.
अब इसका क्या करे..?
उनको कुछ समझ नहीं आ रहा था.
लेकिन साधू महाराज का प्रसाद मानकर वह उसे अपने गाँव, आमगांव, लेकर आये.
लगभग ३० ग्राम वजन की उस पोटली में ४३१ खाली (कोरे) भूर्जपत्र थे.
बालाघाट के पास ‘गुलालपुरा’ गाँव में रामगोपाल जी के गुरु रहते थे.
रामगोपाल जी ने अपने गुरु को वह पोटली दिखायी और पूछा, “अब मैं इसका क्या करू..?”
गुरु ने जवाब दिया,
“तुम्हे ये पोटली और उसके अंदर के ये भूर्जपत्र काम के नहीं लगते हों, तो उन्हें पानी में विसर्जित कर दो.”
अब रामगोपाल जी पेशोपेश में पड गए.
रख भी नहीं सकते और फेंक भी नहीं सकते..!
उन्होंने उन भुर्जपत्रों को अपने पूजाघर में रख दिया.
कुछ दिन बीत गए.
एक दिन पूजा करते समय सबसे ऊपर रखे भूर्जपत्र पर पानी के कुछ छींटे गिरे, और क्या आश्चर्य..!
जहाँ पर पानी गिरा था, वहाँ पर कुछ अक्षर उभरकर आये. रामगोपाल जी ने उत्सुकतावश एक भूर्जपत्र पूरा पानी में डुबोकर कुछ देर तक रखा और वह आश्चर्य से देखते ही रह गये..!
उस भूर्जपत्र पर लिखा हुआ साफ़ दिखने लगा.
अष्टगंध जैसे केसरिया रंग में, स्वच्छ अक्षरों से कुछ लिखा था.
कुछ समय बाद जैसे ही पानी सूख गया, अक्षर भी गायब हो गए.
अब रामगोपाल जी ने सभी ४३१ भुर्जपत्रों को पानी में भिगोकर, सुखने से पहले उन पर दिख रहे अक्षरों को लिखने का प्रयास किया.
यह लेखन देवनागरी लिपि में और संस्कृत भाषा में लिखा था.
यह काम कुछ वर्षों तक चला.
जब इस साहित्य को संस्कृत के विशेषज्ञों को दिखाया गया,
तब समझ में आया, कि भूर्जपत्र पर अदृश्य स्याही से लिखा हुआ यह ग्रंथ, अग्रसेन महाराज जी का ‘अग्र भागवत’ नाम का चरित्र हैं.
लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व जैमिनी ऋषि ने ‘जयभारत’ नाम का एक बड़ा ग्रंथ लिखा था.
उसका एक हिस्सा था, यह ‘अग्र भागवत’ ग्रंथ.
पांडव वंश में परीक्षित राजा का बेटा था, जनमेजय.
इस जनमेजय को लोक साधना, धर्म आदि विषयों में जानकारी देने हेतू जैमिनी ऋषि ने इस ग्रंथ का लेखन किया था, ऐसा माना जाता हैं.
रामगोपाल जी को मिले हुए इस ‘अग्र भागवत’ ग्रंथ की अग्रवाल समाज में बहुत चर्चा हुई.
इस ग्रंथ का अच्छा स्वागत हुआ.
ग्रंथ के भूर्जपत्र अनेकों बार पानी में डुबोकर उस पर लिखे गए श्लोक, लोगों को दिखाए गए.
इस ग्रंथ की जानकारी इतनी फैली की इंग्लैंड के प्रख्यात उद्योगपति लक्ष्मी मित्तल जी ने कुछ करोड़ रुपयों में यह ग्रंथ खरीदने की बात की.
यह सुनकर / देखकर अग्रवाल समाज के कुछ लोग साथ आये और उन्होंने नागपुर के जाने माने संस्कृत पंडित रामभाऊ पुजारी जी के सहयोग से एक ट्रस्ट स्थापित किया.
इससे ग्रंथ की सुरक्षा तो हो गयी.
आज यह ग्रंथ, नागपुर में ‘अग्रविश्व ट्रस्ट’ में सुरक्षित रखा गया हैं. लगभग १८ भारतीय भाषाओं में इसका अनुवाद भी प्रकाशित हुआ हैं.
रामभाऊ पुजारी जी की सलाह से जब उन भुर्जपत्रों की ‘कार्बन डेटिंग’ की गयी, तो वह भूर्जपत्र लगभग दो हजार वर्ष पुराने निकले.
यदि हम इसे काल्पनिक कहानी मानें, बेदिल जी को आया स्वप्न, वो साधू महाराज, यह सब ‘श्रध्दा’ के विषय अगर ना भी मानें... तो भी कुछ प्रश्न तो मन को कुरेदते ही हैं.
जैसे, कि हजारों वर्ष पूर्व भुर्जपत्रों पर अदृश्य स्याही से लिखने की तकनीक किसकी थी..?
इसका उपयोग कैसे किया जाता था..?
कहाँ उपयोग होता था, इस तकनीक का..?
भारत में लिखित साहित्य की परंपरा अति प्राचीन हैं.
ताम्रपत्र, चर्मपत्र, ताडपत्र, भूर्जपत्र... आदि लेखन में उपयोगी साधन थे.
मराठी विश्वकोष में भूर्जपत्र की जानकारी दी गयी हैं, जो इस प्रकार है – “भूर्जपत्र यह ‘भूर्ज’ नाम के पेड़ की छाल से बनाया जाता था.
यह वुक्ष ‘बेट्युला’ प्रजाति के हैं और हिमालय में, विशेषतः काश्मीर के हिमालय में, पाए जाते हैं.
इस वृक्ष के छाल का गुदा निकालकर, उसे सुखाकर, फिर उसे तेल लगा कर उसे चिकना बनाया जाता था.
उसके लंबे रोल बनाकर, उनको समान आकार का बनाया जाता था. उस पर विशेष स्याही से लिखा जाता था.
फिर उसको छेद कर के, एक मजबूत धागे से बाँधकर, उसकी पुस्तक / ग्रंथ बनाया जाता था.
यह भूर्जपत्र, उनकी गुणवत्ता के आधार पर दो – ढाई हजार वर्षों तक अच्छे रहते थे.
भूर्जपत्र पर लिखने के लिये प्राचीन काल से स्याही का उपयोग किया जाता था.
भारत में, ईसा के पूर्व, लगभग ढाई हजार वर्षों से स्याही का प्रयोग किया जाता था, इसके अनेक प्रमाण मिले हैं.
लेकिन यह कब से प्रयोग में आयी, यह अज्ञात ही हैं.
भारत पर हुए अनेक आक्रमणों के चलते यहाँ का ज्ञान बड़े पैमाने पर नष्ट हुआ है.
परन्तु स्याही तैयार करने के प्राचीन तरीके थे, कुछ पद्धतियाँ थी, जिनकी जानकारी मिली हैं.
आम तौर पर ‘काली स्याही’ का ही प्रयोग सब दूर होता था.
चीन में मिले प्रमाण भी ‘काली स्याही’ की ओर ही इंगित करते हैं.
केवल कुछ ग्रंथों में गेरू से बनायी गयी केसरियां रंग की स्याही का उल्लेख आता हैं.
मराठी विश्वकोष में स्याही की जानकारी देते हुए लिखा हैं – ‘भारत में दो प्रकार के स्याही का उपयोग किया जाता था.
कच्चे स्याही से व्यापार का आय-व्यय, हिसाब लिखा जाता था तो पक्की स्याही से ग्रंथ लिखे जाते थे.
पीपल के पेड़ से निकाले हुए गोंद को पीसकर, उबालकर रखा जाता था.
फिर तिल के तेल का काजल तैयार कर उस काजल को कपड़े में लपेटकर, इस गोंद के पानी में उस कपडे को बहुत देर तक घुमाते थे.
और वह गोंद, स्याही बन जाता था, काले रंग की..’ भूर्जपत्र पर लिखने वाली स्याही अलग प्रकार की रहती थी.
बादाम के छिलके और जलाये हुए चावल को इकठ्ठा कर के गोमूत्र में उबालते थे.
काले स्याही से लिखा हुआ, सबसे पुराना उपलब्ध साहित्य तीसरे शताब्दी का है.
आश्चर्य इस बात का हैं, कि जो भी स्याही बनाने की विधि उपलब्ध हैं, उन सब से पानी में घुलने वाली स्याही बनती हैं.
जब की इस ‘अग्र भागवत’ की स्याही, भूर्जपत्र पर पानी डालने से दिखती हैं.
पानी से मिटती नहीं.
उलटे, पानी सूखने पर स्याही भी अदृश्य हो जाती हैं.
इस का अर्थ यह हुआ, की कम से कम दो – ढाई हजार वर्ष पूर्व हमारे देश में अदृश्य स्याही से लिखने का तंत्र विकसित था.
यह तंत्र विकसित करते समय अनेक अनुसंधान हुए होंगे.
अनेक प्रकार के रसायनों का इसमें उपयोग किया गया होगा.
इसके लिए अनेक प्रकार के परीक्षण करने पड़े होंगे.
लेकिन दुर्भाग्य से इसकी कोई भी जानकारी आज उपलब्ध नहीं हैं.
उपलब्ध हैं, तो अदृश्य स्याही से लिखा हुआ ‘अग्र भागवत’ यह ग्रंथ.
लिखावट के उन्नत आविष्कार का जीता जागता प्रमाण..!
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि ‘विज्ञान, या यूँ कहें, "आजकल का शास्त्रशुद्ध विज्ञान, पाश्चिमात्य देशों में ही निर्माण हुआ" इस मिथक को मानने वालों के लिए, ‘अग्र भागवत’ यह अत्यंत आश्चर्य का विषय है.
स्वाभाविक है कि किसी प्राचीन समय इस देश में अत्यधिक प्रगत लेखन शास्त्र विकसित था, और अपने पास के विशाल ज्ञान भंडार को, पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करने की क्षमता इस लेखन शास्त्र में थी, यह अब सिद्ध हो चुका है..!
दुर्भाग्य यह है कि अब यह ज्ञान लुप्त हो चुका है.
यदि भारत में समुचित शोध किया जाए एवं पश्चिमी तथा चीन की लाईब्रेरियों की ख़ाक छानी जाए, तो निश्चित ही कुछ न कुछ ऐसा मिल सकता है जिससे ऐसे कई रहस्यों से पर्दा उठ सके।
पढ़ते हैं तो अचंभित रह जाते हैं.
रसायन और रंग विज्ञान ने भले ही आजकल इतनी उन्नति कर ली हो, परन्तु आज से 2000 वर्ष पहले भूर्ज-पत्रों पर लिखे गए "अग्र-भागवत" का रहस्य आज भी अनसुलझा ही है.
जानिये इसके बारे में कि आखिर यह "अग्र-भागवत इतना विशिष्ट क्यों है?
अदृश्य स्याही से सम्बन्धित क्या है वह पहेली,
जो वैज्ञानिक आज भी नहीं सुलझा पाए हैं
आमगांव… यह महाराष्ट्र के गोंदिया जिले की एक छोटी सी तहसील, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की सीमा से जुड़ी हुई.
इस गाँव के ‘रामगोपाल अग्रवाल’, सराफा व्यापारी हैं.
घर से ही सोना, चाँदी का व्यापार करते हैं.
रामगोपाल जी, ‘बेदिल’ नाम से जाने जाते हैं.
एक दिन अचानक उनके मन में आया, ‘असम के दक्षिण में स्थित ‘ब्रम्हकुंड’ में स्नान करने जाना है.
अब उनके मन में ‘ब्रम्हकुंड’ ही क्यूँ आया,
इसका कोई कारण उनके पास नहीं था.
यह ब्रम्हकुंड (ब्रह्मा सरोवर), ‘परशुराम कुंड’ के नाम से भी जाना जाता हैं.
असम सीमा पर स्थित यह कुंड, प्रशासनिक दृष्टि से अरुणाचल प्रदेश के लोहित जिले में आता हैं.
मकर संक्रांति के दिन यहाँ भव्य मेला लगता है.
‘ब्रम्हकुंड’ नामक स्थान अग्रवाल समाज के आदि पुरुष/प्रथम पुरुष भगवान अग्रसेन महाराज की ससुराल माना जाता है.
भगवान अग्रसेन महाराज की पत्नी, माधवी देवी इस नागलोक की राजकन्या थी.
उनका विवाह अग्रसेन महाराज जी के साथ इसी ब्रम्हकुंड के तट पर हुआ था, ऐसा बताया जाता है.
हो सकता हैं, इसी कारण से रामगोपाल जी अग्रवाल ‘बेदिल’ को इच्छा हुई होगी ब्रम्हकुंड दर्शन की..!
वे अपने ४–५ मित्र–सहयोगियों के साथ ब्रम्हकुंड पहुँच गए.
दूसरे दिन कुंड पर स्नान करने जाना निश्चित हुआ.
रात को अग्रवाल जी को सपने में दिखा कि, ‘ब्रम्हसरोवर के तट पर एक वटवृक्ष है, उसकी छाया में एक साधू बैठे हैं.
इन्ही साधू के पास, अग्रवाल जी को जो चाहिये वह मिल जायेगा..!
दूसरे दिन सुबह-सुबह रामगोपाल जी ब्रम्हसरोवर के तट पर गये,
तो उनको एक बड़ा सा वटवृक्ष दिखाई दिया और साथ ही दिखाई दिए, लंबी दाढ़ी और जटाओं वाले वो साधू महाराज भी.
रामगोपाल जी ने उन्हें प्रणाम किया तो साधू महाराज जी ने अच्छे से कपड़े में लिपटी हुई एक चीज उन्हें दी और कहा,
“जाओं, इसे ले जाओं, कल्याण होगा तुम्हारा.”
वह दिन था, ९ अगस्त, १९९१.
आप सोच रहे होंगे कि ये कौन सी "कहानी" और चमत्कारों वाली बात सुनाई जा रही है,
लेकिन दो मिनट और आगे पढ़िए तो सही...
असल में दिखने में बहुत बड़ी, पर वजन में हलकी वह पोटली जैसी वस्तु लेकर, रामगोपाल जी अपने स्थान पर आए, जहाँ वे रुके थे.
उन्होंने वो पोटली खोलकर देखी, तो अंदर साफ़–सुथरे ‘भूर्जपत्र’ अच्छे सलीके से बाँधकर रखे थे.
इन पर कुछ भी नहीं लिखा था.
एकदम कोरे..!
इन लंबे-लंबे पत्तों को भूर्जपत्र कहते हैं,
इसकी रामगोपाल जी को जानकारी भी नहीं थी.
अब इसका क्या करे..?
उनको कुछ समझ नहीं आ रहा था.
लेकिन साधू महाराज का प्रसाद मानकर वह उसे अपने गाँव, आमगांव, लेकर आये.
लगभग ३० ग्राम वजन की उस पोटली में ४३१ खाली (कोरे) भूर्जपत्र थे.
बालाघाट के पास ‘गुलालपुरा’ गाँव में रामगोपाल जी के गुरु रहते थे.
रामगोपाल जी ने अपने गुरु को वह पोटली दिखायी और पूछा, “अब मैं इसका क्या करू..?”
गुरु ने जवाब दिया,
“तुम्हे ये पोटली और उसके अंदर के ये भूर्जपत्र काम के नहीं लगते हों, तो उन्हें पानी में विसर्जित कर दो.”
अब रामगोपाल जी पेशोपेश में पड गए.
रख भी नहीं सकते और फेंक भी नहीं सकते..!
उन्होंने उन भुर्जपत्रों को अपने पूजाघर में रख दिया.
कुछ दिन बीत गए.
एक दिन पूजा करते समय सबसे ऊपर रखे भूर्जपत्र पर पानी के कुछ छींटे गिरे, और क्या आश्चर्य..!
जहाँ पर पानी गिरा था, वहाँ पर कुछ अक्षर उभरकर आये. रामगोपाल जी ने उत्सुकतावश एक भूर्जपत्र पूरा पानी में डुबोकर कुछ देर तक रखा और वह आश्चर्य से देखते ही रह गये..!
उस भूर्जपत्र पर लिखा हुआ साफ़ दिखने लगा.
अष्टगंध जैसे केसरिया रंग में, स्वच्छ अक्षरों से कुछ लिखा था.
कुछ समय बाद जैसे ही पानी सूख गया, अक्षर भी गायब हो गए.
अब रामगोपाल जी ने सभी ४३१ भुर्जपत्रों को पानी में भिगोकर, सुखने से पहले उन पर दिख रहे अक्षरों को लिखने का प्रयास किया.
यह लेखन देवनागरी लिपि में और संस्कृत भाषा में लिखा था.
यह काम कुछ वर्षों तक चला.
जब इस साहित्य को संस्कृत के विशेषज्ञों को दिखाया गया,
तब समझ में आया, कि भूर्जपत्र पर अदृश्य स्याही से लिखा हुआ यह ग्रंथ, अग्रसेन महाराज जी का ‘अग्र भागवत’ नाम का चरित्र हैं.
लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व जैमिनी ऋषि ने ‘जयभारत’ नाम का एक बड़ा ग्रंथ लिखा था.
उसका एक हिस्सा था, यह ‘अग्र भागवत’ ग्रंथ.
पांडव वंश में परीक्षित राजा का बेटा था, जनमेजय.
इस जनमेजय को लोक साधना, धर्म आदि विषयों में जानकारी देने हेतू जैमिनी ऋषि ने इस ग्रंथ का लेखन किया था, ऐसा माना जाता हैं.
रामगोपाल जी को मिले हुए इस ‘अग्र भागवत’ ग्रंथ की अग्रवाल समाज में बहुत चर्चा हुई.
इस ग्रंथ का अच्छा स्वागत हुआ.
ग्रंथ के भूर्जपत्र अनेकों बार पानी में डुबोकर उस पर लिखे गए श्लोक, लोगों को दिखाए गए.
इस ग्रंथ की जानकारी इतनी फैली की इंग्लैंड के प्रख्यात उद्योगपति लक्ष्मी मित्तल जी ने कुछ करोड़ रुपयों में यह ग्रंथ खरीदने की बात की.
यह सुनकर / देखकर अग्रवाल समाज के कुछ लोग साथ आये और उन्होंने नागपुर के जाने माने संस्कृत पंडित रामभाऊ पुजारी जी के सहयोग से एक ट्रस्ट स्थापित किया.
इससे ग्रंथ की सुरक्षा तो हो गयी.
आज यह ग्रंथ, नागपुर में ‘अग्रविश्व ट्रस्ट’ में सुरक्षित रखा गया हैं. लगभग १८ भारतीय भाषाओं में इसका अनुवाद भी प्रकाशित हुआ हैं.
रामभाऊ पुजारी जी की सलाह से जब उन भुर्जपत्रों की ‘कार्बन डेटिंग’ की गयी, तो वह भूर्जपत्र लगभग दो हजार वर्ष पुराने निकले.
यदि हम इसे काल्पनिक कहानी मानें, बेदिल जी को आया स्वप्न, वो साधू महाराज, यह सब ‘श्रध्दा’ के विषय अगर ना भी मानें... तो भी कुछ प्रश्न तो मन को कुरेदते ही हैं.
जैसे, कि हजारों वर्ष पूर्व भुर्जपत्रों पर अदृश्य स्याही से लिखने की तकनीक किसकी थी..?
इसका उपयोग कैसे किया जाता था..?
कहाँ उपयोग होता था, इस तकनीक का..?
भारत में लिखित साहित्य की परंपरा अति प्राचीन हैं.
ताम्रपत्र, चर्मपत्र, ताडपत्र, भूर्जपत्र... आदि लेखन में उपयोगी साधन थे.
मराठी विश्वकोष में भूर्जपत्र की जानकारी दी गयी हैं, जो इस प्रकार है – “भूर्जपत्र यह ‘भूर्ज’ नाम के पेड़ की छाल से बनाया जाता था.
यह वुक्ष ‘बेट्युला’ प्रजाति के हैं और हिमालय में, विशेषतः काश्मीर के हिमालय में, पाए जाते हैं.
इस वृक्ष के छाल का गुदा निकालकर, उसे सुखाकर, फिर उसे तेल लगा कर उसे चिकना बनाया जाता था.
उसके लंबे रोल बनाकर, उनको समान आकार का बनाया जाता था. उस पर विशेष स्याही से लिखा जाता था.
फिर उसको छेद कर के, एक मजबूत धागे से बाँधकर, उसकी पुस्तक / ग्रंथ बनाया जाता था.
यह भूर्जपत्र, उनकी गुणवत्ता के आधार पर दो – ढाई हजार वर्षों तक अच्छे रहते थे.
भूर्जपत्र पर लिखने के लिये प्राचीन काल से स्याही का उपयोग किया जाता था.
भारत में, ईसा के पूर्व, लगभग ढाई हजार वर्षों से स्याही का प्रयोग किया जाता था, इसके अनेक प्रमाण मिले हैं.
लेकिन यह कब से प्रयोग में आयी, यह अज्ञात ही हैं.
भारत पर हुए अनेक आक्रमणों के चलते यहाँ का ज्ञान बड़े पैमाने पर नष्ट हुआ है.
परन्तु स्याही तैयार करने के प्राचीन तरीके थे, कुछ पद्धतियाँ थी, जिनकी जानकारी मिली हैं.
आम तौर पर ‘काली स्याही’ का ही प्रयोग सब दूर होता था.
चीन में मिले प्रमाण भी ‘काली स्याही’ की ओर ही इंगित करते हैं.
केवल कुछ ग्रंथों में गेरू से बनायी गयी केसरियां रंग की स्याही का उल्लेख आता हैं.
मराठी विश्वकोष में स्याही की जानकारी देते हुए लिखा हैं – ‘भारत में दो प्रकार के स्याही का उपयोग किया जाता था.
कच्चे स्याही से व्यापार का आय-व्यय, हिसाब लिखा जाता था तो पक्की स्याही से ग्रंथ लिखे जाते थे.
पीपल के पेड़ से निकाले हुए गोंद को पीसकर, उबालकर रखा जाता था.
फिर तिल के तेल का काजल तैयार कर उस काजल को कपड़े में लपेटकर, इस गोंद के पानी में उस कपडे को बहुत देर तक घुमाते थे.
और वह गोंद, स्याही बन जाता था, काले रंग की..’ भूर्जपत्र पर लिखने वाली स्याही अलग प्रकार की रहती थी.
बादाम के छिलके और जलाये हुए चावल को इकठ्ठा कर के गोमूत्र में उबालते थे.
काले स्याही से लिखा हुआ, सबसे पुराना उपलब्ध साहित्य तीसरे शताब्दी का है.
आश्चर्य इस बात का हैं, कि जो भी स्याही बनाने की विधि उपलब्ध हैं, उन सब से पानी में घुलने वाली स्याही बनती हैं.
जब की इस ‘अग्र भागवत’ की स्याही, भूर्जपत्र पर पानी डालने से दिखती हैं.
पानी से मिटती नहीं.
उलटे, पानी सूखने पर स्याही भी अदृश्य हो जाती हैं.
इस का अर्थ यह हुआ, की कम से कम दो – ढाई हजार वर्ष पूर्व हमारे देश में अदृश्य स्याही से लिखने का तंत्र विकसित था.
यह तंत्र विकसित करते समय अनेक अनुसंधान हुए होंगे.
अनेक प्रकार के रसायनों का इसमें उपयोग किया गया होगा.
इसके लिए अनेक प्रकार के परीक्षण करने पड़े होंगे.
लेकिन दुर्भाग्य से इसकी कोई भी जानकारी आज उपलब्ध नहीं हैं.
उपलब्ध हैं, तो अदृश्य स्याही से लिखा हुआ ‘अग्र भागवत’ यह ग्रंथ.
लिखावट के उन्नत आविष्कार का जीता जागता प्रमाण..!
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि ‘विज्ञान, या यूँ कहें, "आजकल का शास्त्रशुद्ध विज्ञान, पाश्चिमात्य देशों में ही निर्माण हुआ" इस मिथक को मानने वालों के लिए, ‘अग्र भागवत’ यह अत्यंत आश्चर्य का विषय है.
स्वाभाविक है कि किसी प्राचीन समय इस देश में अत्यधिक प्रगत लेखन शास्त्र विकसित था, और अपने पास के विशाल ज्ञान भंडार को, पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित करने की क्षमता इस लेखन शास्त्र में थी, यह अब सिद्ध हो चुका है..!
दुर्भाग्य यह है कि अब यह ज्ञान लुप्त हो चुका है.
यदि भारत में समुचित शोध किया जाए एवं पश्चिमी तथा चीन की लाईब्रेरियों की ख़ाक छानी जाए, तो निश्चित ही कुछ न कुछ ऐसा मिल सकता है जिससे ऐसे कई रहस्यों से पर्दा उठ सके।
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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद