ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसरों को भारत का शासक मानना निपट अज्ञान
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इसी संदर्भ में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रभाव के विषय में कुछ आवश्यक तथ्यों का भी स्मरण और चर्चा करना उचित होगा .
जब कंपनी को भारत में व्यापार में कुछ मामूली सी सफलता मिली तो उसने कुछ जगहों पर अपने तथाकथित किले बनवाए जो भारतीय राजाओं के किलों के सामने उपहास के योग्य है.
ऐसा ही दलदली इलाके में नए बसाए गए कोलकाता में फोर्ट विलियम के नाम से एक किला बनाया और उसके आसपास कंपनी का जो व्यापार और लगान वसूली के ठेके वाला इलाका था, उसे कंपनी ने अपने कागजात में अपनी प्रेसिडेंसी कह दिया और उस इलाके में कंपनी के कर्मचारियों का एक महाप्रबंधक बनाया गया जिस की उपाधि दी गई गवर्नर जनरल ऑफ़ प्रेसिडेंसी फोर्ट विलियम.
इस गवर्नर जनरल की नियुक्ति ईस्ट इंडिया कंपनी का निदेशक मंडल करता था और इस निदेशक मंडल ने भारत में अपने चार अन्य अफसरों को एक परिषद का सदस्य नामजद कर दिया.उस परिषद का काम था कंपनी के इस महाप्रबंधक को यानी गवर्नर जनरल को काम करने के तरीके के बारे में सलाह देना ताकि अधिक से अधिक मुनाफा वसूला जा सके.
4 सदस्यों वाली इस परिषद की सलाह मानना कंपनी के गवर्नर जनरल यानी कंपनी के महाप्रबंधक के लिए बाध्यकारी था .1835 तक यही स्थिति रही और बाद में कंपनी ने अपने अधिकारी को अपनी कंपनी के मामलों में समस्त भारत के महा प्रबंधक की संज्ञा दे दी .
इस प्रकार यह सब लोग कंपनी के अधिकारी थे और जो लोग इनको भारतवर्ष के गवर्नर जनरल मानते या बताते हैं ,वे लोग अपने घोर अज्ञान और अंग्रेज जाति की निरर्थक चाटुकारिता तथा विमूढ़ भक्ति के लिए तरस और दया के पात्र हैं .
वायसराय एक उपधिमात्र थी , कोई विधिक अथॉरिटी नहीं
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1857- 58 ईस्वी में जब पहली बार ब्रिटिश भारतीय क्षेत्र के लिए ब्रिटेन के शासन ने एक वायसराय नियुक्त किया तो यह उपाधि भी केवल प्रचार के लिए थी . वायसराय की नियुक्ति ब्रिटेन की संसद नहीं करती थी .ब्रिटेन के अभिलेखों में स्पष्ट लिखा है कि वायसराय को कोई भी विधिक अथॉरिटी नहीं प्राप्त थी अर्थात विधिक रुप से वायसराय नामक कोई पद अधिकृत ब्रिटिश शासन का वैधानिक अंग नहीं था अपितु वह एक काम चलाऊ पद उपाधि थी .
अपने प्रभुत्व वाले इलाके के भारत का शासन ब्रिटेन का एक सचिव (सेक्रेटरी )करता था और उसने भारत के वायसराय की सलाह के लिए 4 सदस्यों की परिषद स्वयं भी बनाई थी.
पूर्व में कंपनी के मामूली कर्मचारियों और अधिकारियों को भारत का शासक बताना और प्रचारित करना वस्तुतः भारत द्रोह है परंतु अज्ञान के कारण जो लोग ऐसा करते हैं ,उन्हें क्षमा किया जा सकता है .पर अगर किसी अधिकृत पुस्तक में ऐसा कुछ लिखा जाता है तो यह दंडनीय रूप से भारत द्रोह है.
कंपनी के द्वारा तैनात कर्मचारी कोई राजपुरुष नहीं हैं
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वारेन हेस्टिंग्स पर जो प्रसिद्ध मुकदमा चला ,उसमें ब्रिटिश संसद ने उस पर जो अभियोग लगाए थे उनसे भी यह बात स्पष्ट है कि यह लोग ब्रिटेन के शासन के प्रतिनिधि नहीं थे बल्कि इंग्लॅण्ड के कुछ व्यापारियों द्वारा बनाई गई एक कंपनी के कर्मचारी और अफसर मात्र थे . इसीलिए जो लोग वारेन हेस्टिंग्स या कार्नवालिस आदि आदि के महत्व को बताते हैं अथवा मैकाले की तथाकथित शिक्षा नीति की बात करते हैं , वह अनधिकृत और तथ्यहीन बातें करते हैं .
वर्तमान शिक्षा नीति भारतीयों ने ही बनायीं है और इसके सभी दोष भारतीय शासकों प्रशासकों के दोष हैं
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भारत में जो भी शिक्षा नीति चल रही है वह अपने अपने समय के शासकों द्वारा चलाई गई शिक्षा पद्धति और शिक्षा नीति है तथा उसमें मैंकाले नामक एक मामूली व्यक्ति की कोई भी भूमिका नहीं है.
जो लोग मैकाले को अनावश्यक रुप से अपशब्दों से विभूषित करते हैं ,वे निश्चय ही दया के पात्र हैं और उनका यह काम अनुचित कार्य है क्योंकि भारत में जो भी शिक्षा चल रही है उसके लिए भारत के 1947 के बाद के प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री या मानव संसाधन विकास मंत्री जिम्मेदार हैं .
उसके लिए मैकाले को जिम्मेदार ठहराना पूरी तरह गलत है. किसी भी व्यक्ति के साथ इस प्रकार का अन्याय करना अनुचित है
दिल्ली दरबारों की झलकियाँ
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महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के राजाओं से संधि के साथ 1858 ईस्वी में एक इलाके में ब्रिटिश शासन स्थापित हुआ .स्वयं ब्रिटिश अभिलेखों के अनुसार भारत में उसकी संपूर्ण सत्ता नहीं थी . किसी प्रकार ब्रिटेन की महारानी को या वहां के क्राउन को भारत के अभिजन अपना स्वीकार करने लगें , इसके लिए योजना पूर्वक और भारतीय राजाओं महाराजाओं से सलाह पूर्वक अंग्रेजों ने 3 दिल्ली दरबार आयोजित किये
इनमें से पहला दिल्ली दरबार 1877 में आयोजित किया गया जिसमें ब्रिटेन की महारानी ने आने की हिम्मत नहीं थी और वातावरण की थाह पाने के लिए यह आयोजन किया गया .
भारत के अनेकों राजा महाराजा इसमें पूरी शान से शामिल हुए और रानी विक्टोरिया का संदेश पढ़कर सुनाया गया जिसमें उन्होंने कहा था कि हम अपनी समस्त प्रजा के साथ बराबरी से न्याय का व्यवहार करेंगे और उन्हें अपने धार्मिक मामलों में पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त रहेगी तथा हम उनकी खुशी बढ़ाने और उनकी संपन्नता बढ़ाने के लिए निरंतर कार्य करेंगे तथा उनके हितों का सभी प्रकार से संरक्षण करेंगे .
महत्वपूर्ण बात यह है कि इसी दिल्ली दरबार में पुणे का एक युवक गणेश वासुदेव जोशी खादी का कुर्ता और धोती पहन कर खड़ा हुआ और बहुत ही सभ्य तथा सुसंस्कृत भाषा में मांग की कि ब्रिट्रेन के शासन के द्वारा अपने क्षेत्र की समस्त प्रजा को भारत में वे सभी अधिकार, विशेषतया वे सभी राजनैतिक अधिकार प्रदान किए जाने चाहिए जो ब्रिटेन में ब्रिटेन के नागरिकों को प्राप्त है किसी ने भी इसका विरोध नहीं किया . इससे स्पष्ट है कि भारत में ब्रिटिश प्रभुत्व की वास्तविक स्थिति क्या थी.
इसके बाद 1903 ईस्वी में दिल्ली में दूसरा दरबार आयोजित किया गया . एडवर्ड सप्तम और उनकी पत्नी को भारत के भी सम्राट और सम्राज्ञी के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए ही यह आयोजन किया गया . इसमें अंग्रेजों के समर्थक भारत के सभी राजा महाराजा बहुत शान से आए. इसमें रीवा के महाराजा का हाथी की सवारी के साथ जो शाही जुलूस निकला उसके चित्र भारत और लंदन में विशेषकर प्रकाशित हुए .इसी प्रकार अन्य अनेक राजा महाराजा अपने अपने हाथियों या घोड़े की सवारी पर शान से इस दरबार में जुलूस के रुप में उपस्थित हुए और उनके हीरे जवाहरातों की सारी दुनिया में फोटो छपी और चर्चा होती रही . परंतु इस आयोजन में एडवर्ड सप्तम स्वयं नहीं आए जिससे राजा महाराजा लोग बहुत दुखी हुए यद्यपि खुफिया रिपोर्ट में यह है कि दिल्ली के वातावरण से आतंकित होने के कारण एडवर्ड सप्तम और महारानी 1903 ईस्वी के दिल्ली दरबार में आने की हिम्मत नहीं जुटा सके.
अंत में 1911 ईस्वी में तीसरा दिल्ली दरबार हुआ जिसमें जॉर्ज पंचम और उनकी महारानी मेरी शामिल हुए और इसमें राजा और रानी को आश्वस्त करने के लिए देश भर से अनेक राजे-महाराजे शाही वेशभूषा में पूरी शान के साथ सम्मिलित हुए और सम्राट ने 6170 उत्कृष्ट हीरों से सज्जित एक मुकुट जो भारत में ही तैयार किया गया था उसे धारण किया जिसमें साथ ही माणिक मोती नीलम पन्ना आदि भी जगमग कर रहे थे. दिल्ली दरबार में 1000000 से ज्यादा दिल्ली और आसपास के लोग शामिल हुए और सम्राट ने लाल किले के झरोखे से झांक कर सबको हाथ हिलाकर अभिवादन स्वीकार किया . महारानी मेरी को पटियाला की महारानी ने गले का एक खूबसूरत हार भेंट में दिया जो आज तक इंग्लैंड के राजकोष की शोभा बढ़ा रहा है .
इसी दिन की नक़ल में आज तक लाल किले से झंडा फहराया जाता है अन्यथा राष्ट्रपति भवन या उसके सम्मुख के मैदान में ही यह आयोजन गणतंत्र दिवस की भांति हो सकता है ..
दिल्ली दरबार में प्रथम महायुद्ध में तथा 1857 के गृह युद्ध में अंग्रेजों का साथ देने वाले सैनिक अधिकारियों को 26800 वीरता पदक प्रदान किए गए तथा साथ ही अंग्रेजों का साथ देने वाले राजाओं और उनके सैनिक अधिकारियों को अनेक स्वर्ण पदक दिए गए .इससे हम तत्कालीन भारत के वातावरण को समझ सकते हैं और राजाओं और महाराजाओं और जनता के द्वारा ब्रिटिश भारतीय क्षेत्र में शासन करने के लिए अंग्रेजों को दी जा रही सहमति और अनुमोदन की एक झांकी पा सकते हैं .
उन सब लोगों को गुलाम कहना गुलामी के शब्द से अपरिचय का प्रमाण है.
अंग्रेजों के मित्रों को ही हुआ सत्ता का हस्तांतरण
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साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि गांधी जी भारत में लोकप्रिय ही इसी आधार पर हुए कि उनकी अंग्रेजों से अच्छी खासी दोस्ती है और अंग्रेज अफसर उनकी कुछ-कुछ सुनते हैं. नेहरू की लोकप्रियता का भी यही कारण था और अंत में अंग्रेजों की इच्छा और सहमति तथा अनुग्रह से ही कांग्रेस को यानी नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस को सत्ता का हस्तांतरण किया गया .
इसी के समानांतर एक और धारा भी लगातार चल रही थी जो भारत के धर्मनिष्ठ देशभक्तों की धारा थी और जिसका मुख्य गुण अंग्रेजों से मित्रता या रुतबा न होकर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध करना और आतंककारी अंग्रेजों की हत्या और अंग्रेजों का प्रचंड विरोध था जिसमें समस्त क्रांतिकारी युवक और युवतियां तथा भगत सिंह, राजगुरु ,सुखदेव, राम प्रसाद बिस्मिल , चंद्रशेखर आजाद, भगवती चरण वोहरा, र दुर्गा रानी वोहरा सहित हजारों वीर और देशभक्त युवक-युवती शामिल हैं .
नेताजी सुभाष चंद्र बोस में आकर वीरता की यह धारा पराकाष्ठा को पहुंच गयी .
वीरता की धारा की कीमत पर हुआ समझौता
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अगर वीरता की धारा को सफलता मिलती तो भारत में अंग्रेजों का छोड़ा गया कानून और छोड़े गए ढांचे को कोई भी जगह नहीं बचती और भारत तब अपनी विजय की घोषणा कर सकता था .
स्वाधीनता उसे तब भी नहीं कहा जाता क्योंकि भारत कभी पराधीन हुआ ही नहीं .वह तो अधर्म और अन्याय और पाप पर धर्म ,न्याय और पुण्य की विजय कही जाती . पर उसी वीरता की धारा के दबाव का लाभ उठाकर अंग्रेजों से दोस्ती करने वाले समूह ने उनकी शर्तें मान कर और उनकी सभी संस्थाओं को यथावत बनाए रखते और अधिक शान वाली बनाते रहने का वचन देकर सत्ता का हस्तांतरण प्राप्त किया. 15 अगस्त 1947 अधिकृत रूप से सत्ता के हस्तांतरण का दिवस है . इस तथ्य को याद रखना ही इतिहास का ज्ञान है .
अंग्रेज भारत में १८५८ से पहले कभी भी राज करने नहीं आये और १८ वीं शती तक अंग्रेज एक कौम नहीं थे ,परस्पर भयंकर युद्धरत समूहों का पुंज थे .इस आधारभूत तथ्य को न जानने वाला एक काल्पनिक दुनिया में जीता है .उस से कोई गंभीर बात हो ही नहीं सकती .
इसी प्रकार भारत विश्व का सबसे अधिक संगठित और एकात्म समाज है और आज भी उसके आपसी झगडे विश्व में सब से कम हैं .इसे जाने बिना हिन्दू समाज की किसी काल्पनिक कमी की चिंता और उपचार में विभोर लोग या समूह मनोरंजक वस्तु ही कहे जायेंगे .यह ऐसा ही है जैसे छोटे केशों वाली परम आधुनिक कन्याओं को कोई बेचारी बाल विधवाएं बताने लगे और विश्व विद्यालय में उनके लिए सहानुभूति जगाने लगे तो जितना दयनीय और हास्यास्पद छात्रों के बीच वह लगेगा ,उतने ही दयनीय और हास्यास;पद अनेक तथाकथित हिन्दू समाज सुधारक हैं।
सार रूप में :
1.Nation State का अर्थ है कौमी राज्य यानी एक कौम का राज्य .राष्ट्र का पर्याय कोई शब्द यूरोप की किसी भाषा में नहीं है .यह वैदिक शब्द है
२ १९ वीं शती ईस्वी से पूर्व यूरोप में कोई Nation State था ही नहीं इसलिए जो उचक्के लफंगे या लुटेरे या ठग और डकैत या कुछ व्यापारिक
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इसी संदर्भ में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रभाव के विषय में कुछ आवश्यक तथ्यों का भी स्मरण और चर्चा करना उचित होगा .
जब कंपनी को भारत में व्यापार में कुछ मामूली सी सफलता मिली तो उसने कुछ जगहों पर अपने तथाकथित किले बनवाए जो भारतीय राजाओं के किलों के सामने उपहास के योग्य है.
ऐसा ही दलदली इलाके में नए बसाए गए कोलकाता में फोर्ट विलियम के नाम से एक किला बनाया और उसके आसपास कंपनी का जो व्यापार और लगान वसूली के ठेके वाला इलाका था, उसे कंपनी ने अपने कागजात में अपनी प्रेसिडेंसी कह दिया और उस इलाके में कंपनी के कर्मचारियों का एक महाप्रबंधक बनाया गया जिस की उपाधि दी गई गवर्नर जनरल ऑफ़ प्रेसिडेंसी फोर्ट विलियम.
इस गवर्नर जनरल की नियुक्ति ईस्ट इंडिया कंपनी का निदेशक मंडल करता था और इस निदेशक मंडल ने भारत में अपने चार अन्य अफसरों को एक परिषद का सदस्य नामजद कर दिया.उस परिषद का काम था कंपनी के इस महाप्रबंधक को यानी गवर्नर जनरल को काम करने के तरीके के बारे में सलाह देना ताकि अधिक से अधिक मुनाफा वसूला जा सके.
4 सदस्यों वाली इस परिषद की सलाह मानना कंपनी के गवर्नर जनरल यानी कंपनी के महाप्रबंधक के लिए बाध्यकारी था .1835 तक यही स्थिति रही और बाद में कंपनी ने अपने अधिकारी को अपनी कंपनी के मामलों में समस्त भारत के महा प्रबंधक की संज्ञा दे दी .
इस प्रकार यह सब लोग कंपनी के अधिकारी थे और जो लोग इनको भारतवर्ष के गवर्नर जनरल मानते या बताते हैं ,वे लोग अपने घोर अज्ञान और अंग्रेज जाति की निरर्थक चाटुकारिता तथा विमूढ़ भक्ति के लिए तरस और दया के पात्र हैं .
वायसराय एक उपधिमात्र थी , कोई विधिक अथॉरिटी नहीं
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1857- 58 ईस्वी में जब पहली बार ब्रिटिश भारतीय क्षेत्र के लिए ब्रिटेन के शासन ने एक वायसराय नियुक्त किया तो यह उपाधि भी केवल प्रचार के लिए थी . वायसराय की नियुक्ति ब्रिटेन की संसद नहीं करती थी .ब्रिटेन के अभिलेखों में स्पष्ट लिखा है कि वायसराय को कोई भी विधिक अथॉरिटी नहीं प्राप्त थी अर्थात विधिक रुप से वायसराय नामक कोई पद अधिकृत ब्रिटिश शासन का वैधानिक अंग नहीं था अपितु वह एक काम चलाऊ पद उपाधि थी .
अपने प्रभुत्व वाले इलाके के भारत का शासन ब्रिटेन का एक सचिव (सेक्रेटरी )करता था और उसने भारत के वायसराय की सलाह के लिए 4 सदस्यों की परिषद स्वयं भी बनाई थी.
पूर्व में कंपनी के मामूली कर्मचारियों और अधिकारियों को भारत का शासक बताना और प्रचारित करना वस्तुतः भारत द्रोह है परंतु अज्ञान के कारण जो लोग ऐसा करते हैं ,उन्हें क्षमा किया जा सकता है .पर अगर किसी अधिकृत पुस्तक में ऐसा कुछ लिखा जाता है तो यह दंडनीय रूप से भारत द्रोह है.
कंपनी के द्वारा तैनात कर्मचारी कोई राजपुरुष नहीं हैं
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वारेन हेस्टिंग्स पर जो प्रसिद्ध मुकदमा चला ,उसमें ब्रिटिश संसद ने उस पर जो अभियोग लगाए थे उनसे भी यह बात स्पष्ट है कि यह लोग ब्रिटेन के शासन के प्रतिनिधि नहीं थे बल्कि इंग्लॅण्ड के कुछ व्यापारियों द्वारा बनाई गई एक कंपनी के कर्मचारी और अफसर मात्र थे . इसीलिए जो लोग वारेन हेस्टिंग्स या कार्नवालिस आदि आदि के महत्व को बताते हैं अथवा मैकाले की तथाकथित शिक्षा नीति की बात करते हैं , वह अनधिकृत और तथ्यहीन बातें करते हैं .
वर्तमान शिक्षा नीति भारतीयों ने ही बनायीं है और इसके सभी दोष भारतीय शासकों प्रशासकों के दोष हैं
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भारत में जो भी शिक्षा नीति चल रही है वह अपने अपने समय के शासकों द्वारा चलाई गई शिक्षा पद्धति और शिक्षा नीति है तथा उसमें मैंकाले नामक एक मामूली व्यक्ति की कोई भी भूमिका नहीं है.
जो लोग मैकाले को अनावश्यक रुप से अपशब्दों से विभूषित करते हैं ,वे निश्चय ही दया के पात्र हैं और उनका यह काम अनुचित कार्य है क्योंकि भारत में जो भी शिक्षा चल रही है उसके लिए भारत के 1947 के बाद के प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री या मानव संसाधन विकास मंत्री जिम्मेदार हैं .
उसके लिए मैकाले को जिम्मेदार ठहराना पूरी तरह गलत है. किसी भी व्यक्ति के साथ इस प्रकार का अन्याय करना अनुचित है
दिल्ली दरबारों की झलकियाँ
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महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत के राजाओं से संधि के साथ 1858 ईस्वी में एक इलाके में ब्रिटिश शासन स्थापित हुआ .स्वयं ब्रिटिश अभिलेखों के अनुसार भारत में उसकी संपूर्ण सत्ता नहीं थी . किसी प्रकार ब्रिटेन की महारानी को या वहां के क्राउन को भारत के अभिजन अपना स्वीकार करने लगें , इसके लिए योजना पूर्वक और भारतीय राजाओं महाराजाओं से सलाह पूर्वक अंग्रेजों ने 3 दिल्ली दरबार आयोजित किये
इनमें से पहला दिल्ली दरबार 1877 में आयोजित किया गया जिसमें ब्रिटेन की महारानी ने आने की हिम्मत नहीं थी और वातावरण की थाह पाने के लिए यह आयोजन किया गया .
भारत के अनेकों राजा महाराजा इसमें पूरी शान से शामिल हुए और रानी विक्टोरिया का संदेश पढ़कर सुनाया गया जिसमें उन्होंने कहा था कि हम अपनी समस्त प्रजा के साथ बराबरी से न्याय का व्यवहार करेंगे और उन्हें अपने धार्मिक मामलों में पूर्ण स्वाधीनता प्राप्त रहेगी तथा हम उनकी खुशी बढ़ाने और उनकी संपन्नता बढ़ाने के लिए निरंतर कार्य करेंगे तथा उनके हितों का सभी प्रकार से संरक्षण करेंगे .
महत्वपूर्ण बात यह है कि इसी दिल्ली दरबार में पुणे का एक युवक गणेश वासुदेव जोशी खादी का कुर्ता और धोती पहन कर खड़ा हुआ और बहुत ही सभ्य तथा सुसंस्कृत भाषा में मांग की कि ब्रिट्रेन के शासन के द्वारा अपने क्षेत्र की समस्त प्रजा को भारत में वे सभी अधिकार, विशेषतया वे सभी राजनैतिक अधिकार प्रदान किए जाने चाहिए जो ब्रिटेन में ब्रिटेन के नागरिकों को प्राप्त है किसी ने भी इसका विरोध नहीं किया . इससे स्पष्ट है कि भारत में ब्रिटिश प्रभुत्व की वास्तविक स्थिति क्या थी.
इसके बाद 1903 ईस्वी में दिल्ली में दूसरा दरबार आयोजित किया गया . एडवर्ड सप्तम और उनकी पत्नी को भारत के भी सम्राट और सम्राज्ञी के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए ही यह आयोजन किया गया . इसमें अंग्रेजों के समर्थक भारत के सभी राजा महाराजा बहुत शान से आए. इसमें रीवा के महाराजा का हाथी की सवारी के साथ जो शाही जुलूस निकला उसके चित्र भारत और लंदन में विशेषकर प्रकाशित हुए .इसी प्रकार अन्य अनेक राजा महाराजा अपने अपने हाथियों या घोड़े की सवारी पर शान से इस दरबार में जुलूस के रुप में उपस्थित हुए और उनके हीरे जवाहरातों की सारी दुनिया में फोटो छपी और चर्चा होती रही . परंतु इस आयोजन में एडवर्ड सप्तम स्वयं नहीं आए जिससे राजा महाराजा लोग बहुत दुखी हुए यद्यपि खुफिया रिपोर्ट में यह है कि दिल्ली के वातावरण से आतंकित होने के कारण एडवर्ड सप्तम और महारानी 1903 ईस्वी के दिल्ली दरबार में आने की हिम्मत नहीं जुटा सके.
अंत में 1911 ईस्वी में तीसरा दिल्ली दरबार हुआ जिसमें जॉर्ज पंचम और उनकी महारानी मेरी शामिल हुए और इसमें राजा और रानी को आश्वस्त करने के लिए देश भर से अनेक राजे-महाराजे शाही वेशभूषा में पूरी शान के साथ सम्मिलित हुए और सम्राट ने 6170 उत्कृष्ट हीरों से सज्जित एक मुकुट जो भारत में ही तैयार किया गया था उसे धारण किया जिसमें साथ ही माणिक मोती नीलम पन्ना आदि भी जगमग कर रहे थे. दिल्ली दरबार में 1000000 से ज्यादा दिल्ली और आसपास के लोग शामिल हुए और सम्राट ने लाल किले के झरोखे से झांक कर सबको हाथ हिलाकर अभिवादन स्वीकार किया . महारानी मेरी को पटियाला की महारानी ने गले का एक खूबसूरत हार भेंट में दिया जो आज तक इंग्लैंड के राजकोष की शोभा बढ़ा रहा है .
इसी दिन की नक़ल में आज तक लाल किले से झंडा फहराया जाता है अन्यथा राष्ट्रपति भवन या उसके सम्मुख के मैदान में ही यह आयोजन गणतंत्र दिवस की भांति हो सकता है ..
दिल्ली दरबार में प्रथम महायुद्ध में तथा 1857 के गृह युद्ध में अंग्रेजों का साथ देने वाले सैनिक अधिकारियों को 26800 वीरता पदक प्रदान किए गए तथा साथ ही अंग्रेजों का साथ देने वाले राजाओं और उनके सैनिक अधिकारियों को अनेक स्वर्ण पदक दिए गए .इससे हम तत्कालीन भारत के वातावरण को समझ सकते हैं और राजाओं और महाराजाओं और जनता के द्वारा ब्रिटिश भारतीय क्षेत्र में शासन करने के लिए अंग्रेजों को दी जा रही सहमति और अनुमोदन की एक झांकी पा सकते हैं .
उन सब लोगों को गुलाम कहना गुलामी के शब्द से अपरिचय का प्रमाण है.
अंग्रेजों के मित्रों को ही हुआ सत्ता का हस्तांतरण
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साथ ही हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि गांधी जी भारत में लोकप्रिय ही इसी आधार पर हुए कि उनकी अंग्रेजों से अच्छी खासी दोस्ती है और अंग्रेज अफसर उनकी कुछ-कुछ सुनते हैं. नेहरू की लोकप्रियता का भी यही कारण था और अंत में अंग्रेजों की इच्छा और सहमति तथा अनुग्रह से ही कांग्रेस को यानी नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस को सत्ता का हस्तांतरण किया गया .
इसी के समानांतर एक और धारा भी लगातार चल रही थी जो भारत के धर्मनिष्ठ देशभक्तों की धारा थी और जिसका मुख्य गुण अंग्रेजों से मित्रता या रुतबा न होकर अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध करना और आतंककारी अंग्रेजों की हत्या और अंग्रेजों का प्रचंड विरोध था जिसमें समस्त क्रांतिकारी युवक और युवतियां तथा भगत सिंह, राजगुरु ,सुखदेव, राम प्रसाद बिस्मिल , चंद्रशेखर आजाद, भगवती चरण वोहरा, र दुर्गा रानी वोहरा सहित हजारों वीर और देशभक्त युवक-युवती शामिल हैं .
नेताजी सुभाष चंद्र बोस में आकर वीरता की यह धारा पराकाष्ठा को पहुंच गयी .
वीरता की धारा की कीमत पर हुआ समझौता
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अगर वीरता की धारा को सफलता मिलती तो भारत में अंग्रेजों का छोड़ा गया कानून और छोड़े गए ढांचे को कोई भी जगह नहीं बचती और भारत तब अपनी विजय की घोषणा कर सकता था .
स्वाधीनता उसे तब भी नहीं कहा जाता क्योंकि भारत कभी पराधीन हुआ ही नहीं .वह तो अधर्म और अन्याय और पाप पर धर्म ,न्याय और पुण्य की विजय कही जाती . पर उसी वीरता की धारा के दबाव का लाभ उठाकर अंग्रेजों से दोस्ती करने वाले समूह ने उनकी शर्तें मान कर और उनकी सभी संस्थाओं को यथावत बनाए रखते और अधिक शान वाली बनाते रहने का वचन देकर सत्ता का हस्तांतरण प्राप्त किया. 15 अगस्त 1947 अधिकृत रूप से सत्ता के हस्तांतरण का दिवस है . इस तथ्य को याद रखना ही इतिहास का ज्ञान है .
अंग्रेज भारत में १८५८ से पहले कभी भी राज करने नहीं आये और १८ वीं शती तक अंग्रेज एक कौम नहीं थे ,परस्पर भयंकर युद्धरत समूहों का पुंज थे .इस आधारभूत तथ्य को न जानने वाला एक काल्पनिक दुनिया में जीता है .उस से कोई गंभीर बात हो ही नहीं सकती .
इसी प्रकार भारत विश्व का सबसे अधिक संगठित और एकात्म समाज है और आज भी उसके आपसी झगडे विश्व में सब से कम हैं .इसे जाने बिना हिन्दू समाज की किसी काल्पनिक कमी की चिंता और उपचार में विभोर लोग या समूह मनोरंजक वस्तु ही कहे जायेंगे .यह ऐसा ही है जैसे छोटे केशों वाली परम आधुनिक कन्याओं को कोई बेचारी बाल विधवाएं बताने लगे और विश्व विद्यालय में उनके लिए सहानुभूति जगाने लगे तो जितना दयनीय और हास्यास्पद छात्रों के बीच वह लगेगा ,उतने ही दयनीय और हास्यास;पद अनेक तथाकथित हिन्दू समाज सुधारक हैं।
सार रूप में :
1.Nation State का अर्थ है कौमी राज्य यानी एक कौम का राज्य .राष्ट्र का पर्याय कोई शब्द यूरोप की किसी भाषा में नहीं है .यह वैदिक शब्द है
२ १९ वीं शती ईस्वी से पूर्व यूरोप में कोई Nation State था ही नहीं इसलिए जो उचक्के लफंगे या लुटेरे या ठग और डकैत या कुछ व्यापारिक
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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद