वेल्लार समुदाय #आरक्षण छोड़ रहा है।
वह भी SC जैसी दुर्लभ और #मालदार सूची से,,, जिसमें घुसने के लिए लोग तो खून की नदियाँ भी बहाने को तैयार है।
दुनिया में इक्का दुक्का लोग तो त्यागी,तपस्वी और यशस्वी मिलते हैं, पर यहाँ पूरे 60 लाख का समुदाय उस बैशाखी के बोझ को लात मार रहा है,,,, यह युग के स्वभाव के सर्वथा प्रतिकूल और आश्चर्य में डालने वाला है।
इससे पहले लाखों लोगों ने जब गैस सब्सिडी छोड़ी तो कई लोगों को विश्वास नहीं हुआ था।
इस देश में,,,,,
लोग तो जानबूझकर तलाक ले, परित्यक्त बन, विधवा हो कर, आंख आदि फोड़कर विकलांग बन, आरक्षण का लाभ लेना चाहते हैं।
सक्षम, सम्पन्न लोग BPL में नाम लिखवाना चाहते हैं, जानबूझकर टांग, हाथ कटवा नौकरी में आना चाहते हैं, जरा सी मौसम की मार पड़ते ही किसान मुआवजे की लाइन में लग जाते हैं, झूठ ही स्वतंत्रता सैनानी घोषित हो मलाई खाना चाहते हैं तब ,,,, ये सिंह समान कौनसी पराक्रमी जाति अस्तित्व में आ गई भई,,,,!!
इज्जत की चिन्ता करने वाली ऐसी जाति, कौन है, इधर तो ओबीसी में घुसने को भी लोग पागलपन की हद तक मरे जा रहे हैं, पटरियां उखाड़ रहे हैं, विषैले भाषण दे रहे हैं, जानबूझकर अत्याचारों की मनगढ़ंत कथाएं गढ़ रहे हैं, ,,, जबकि देश में मानसिकता तो यह है कि गाली दे दो, बलात्कार का शिकार घोषित कर दो, चाहो तो नीच से नीच इल्जाम लगा दो, पेशाब भी पी लेंगे,,,, पर फायदा मिलना चाहिए,,, ऐसे समय में यह कौन नया वर्ग पैदा हो गया भई,,,,!!!
कभी द्रविड़ देश में #भक्ति जन्मी थी और देखते ही देखते उत्तर में फैल गई।
कभी दक्षिण में शंकराचार्य जी हुए थे और कायरता और यौनाचार के उपासक बौद्धों का समूलोच्छेदन कर दिया था।
पर हमें कोई आश्चर्य नहीं हो रहा।
जिन्होंने #भारत के अस्तित्व की अनुभूति की है,,,, सतत त्याग के कंटक पथ का अवलम्बन किया है, घर फूंक परहित का वरण किया उनके लिए यह सहज स्वाभाविक भारत का पुनरुज्जीवन है।
क्या करना और कहाँ ठहरना, यह भारतीय समाज के विवेक पर छोड़ देना चाहिए।
Sc/st/obc में दो तीन दबंग जातियों का बोलबाला है आज। उन्हें आत्मावलोकन करना चाहिए कि वे अपने से पिछड़ों को क्या दे रहे हैं। हर भाई का एक छोटा भाई भी होता है, उसकी चिन्ता करनी चाहिए।
सिक्खों को, जैनियों को सरकार ने तो अलग मजहब का सर्टिफिकेट दे दिया पर आज भी अधिसंख्य, स्वयं को हिन्दू कहलाना ही पसन्द करते हैं। आज भी अनेक लोग अपने जीवन की चिंता किये बिना, घर परिवार त्याग कर समाज हित में अर्पित हैं। आज भी कई जातियों ने स्वयं का आहार, वेश इत्यादि छोड़ा नहीं है। आज भी कई जातियाँ समाज और देश के प्रति अपने स्वाभाविक दायित्व को स्वीकार कर बिखरते, पिटते भारत को बचाने में जुटी हैं।
"मैं ही जीवित रहूं, शेष सब मर जाएँ!" यह आसुरी विचार है। आज इसी को युगधर्म किंवा विश्वधर्म समझ झूठ, फरेब और स्वयं को नीचा गिराकर, दूसरे के पराभव के सपने देखने वालों को चिंतन का अवसर दिया है,,,, #वेल्लार_समाज ने।
संकलन अजय कर्मयोगी
केसरी सिंह सूर्यवंशी
#वर्ण_जाति_कास्ट के भेद को समझ सकते हों तो समझिए। न समझ आये तो जिज्ञासा रखिये।
How The Fluid Indian "Jaat Pratha" was changed into Alien / European Rigid Caste System : Part- 2
M A Shering शृंखला -3 जात और Caste का भेद
Caste and tribes of India वॉल्यूम -१ (1872)
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kushta
इनको बनिया वर्ग में रखा ग्या है , ये ज्यादातर सिल्क के मॅन्यूफॅक्चरिंग का काम करते हैं / इनके निम्नलिखित वंश (Clans) वनारस में पाये जाते हैं, लेकिन इनकी सांख्या बहुत कॅम है / इनको निम्नलिखित वर्गों में विभाजित किया गया है -
१- पटवा
२- दक्खिनी
3- वनारसी
(नोट - सिल्क का मॅन्यूफॅक्चरिंग बंद होने के बाद शायद ये बचे ही नहीं/ अगर इस शब्द और वर्ग से कोई वाकिफ हो तो लिखे )
पेज-300
हलवाई -
The Confectioners Caste , यद्यपि कई caste के लोग खासतौर पर वैश्य , यहाँ तक की ब्राम्हण भी मिठाइयों के निर्माण और विक्री का काम करते हैं , लेकिन बनारस और निचले दोआब में एक अलग ट्राइब इस व्यवसाय को करती है /
हालांकि लोग हलवाई को भुजवा ( दाना भूंजने वाले ) से कन्फ्यूज़ करते हैं , क्योंकि दोनों ही एक दूसरे का व्यवसाय करते हैं / लेकिन ये अलग अलग Caste हैं क्योंकि ये आपस में शादिया नहीं करते /
हलवाइयों की सात शाखाएं है /
!- कन्नौजिया २- पंचपीरिया
3- बौनिवाला 4- गौड़
5- मधेसिया 6- तिहरा
7- लखनौवा
( नोट - यहाँ फिर स्पस्ट कर दूँ कि भारतीय परंपरा जात पांत थी , इस्लाम के आगमन के बाद हुई जात विरादरी / जाति शब्द Caste का अनुवाद है / संस्कृत dictionary " अमरकोश के अनुसार जाति का अर्थ हैं - "मालती सुमन ( पुष्पों के नाम ) और सामान्य जन्म " /
जात का अर्थ हैं - किसी वंश कुल में जन्म लेना , उसकी वंश वृक्षावली , खानदान , जिसका एक regional affiliation होता हैं , और जो आपस में ही खानपान करते हैं और शादी ब्याह करते हैं , और उसका एक व्यसाय विशेष से सबंध /ऊपर वर्णित 143 साल पहले के इस लेख को देखें तो बात पूर्णतया स्पस्ट हो जाती है । तो अपने कुल परिवार पर गर्व होना एक बात है , caste के आधार पर गिरोहबंद होना दूसरी बात है / आजकल गिरोहबंदी होती है , वंशपरम्परा पर कोई गर्व अनुभूति न्हीं होती /)
A L Basham ने लिखा कि भारत में caste system पहले rigid नहीं थी । उदहारण देखे ;
पेज -301
" तेली
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ये लोग तेल विक्रेता हैं निचली जातियों में इनका एक सम्मानजनक स्थान है।इनमे से अधिकतर लोग तेल पेरते हैं और उसकी बिक्री करते हैं ।बनारस में इनकी कई शाखाएं हैं जो आपस में न शादी व्याह करते हैं और न ही एक दूसरे के यहाँ खाते पीते हैं । इनका मैंने निम्नलिखित संकलन किया है।
1- वियाहुत वंश
2- जौनपुरी
3-कन्नौजिया
4- तुर्किया तेली
5- चचरा
6- बनारासिया
7- गुलहरिया
8- गुल्हानी
9- श्रीवस्तक
10- जैस्वारा
11- लाहौरी
वियाहुत वंशी इन सबसे श्रेष्ठ समझे जाते हैं क्योंकि वे विधवा विवाह को परमिट नहीं करते।बाकी सब में विधवा विवाह की अनुमति है।जौनपुरी तेली तेल न बेंचकर एक तरह की दाल (मटर) बेंचते हैं , जोकि उत्तर पश्चिमी प्रदेशों के लोग बहुतायत से प्रयोग करते हैं । जौनपुरी कन्नौजिया लाहौरी बनारासिया, जैसा कि नाम से ही स्पस्ट है क़ि जौनपुर कन्नौज लाहौर और बनारस के मूलनिवासी हैं ।
तुर्किया तेली मुस्लमान होते हैं ।"
नोट : भारत मे वर्ण व्यवस्था के तहत समाज के ह्यूमन रिसोर्स का वर्गीकरण होता था - मेधाशक्ति (ब्राम्हण) रक्षाशक्ति (क्षत्रिय), वाणिज्य शक्ति ( वैश्य) श्रमशक्ति ( शुद्र)।
श्रमशक्ति - सर्विस सेक्टर मैन्युफैक्चरिंग वाणिज्य तीनो में जा सकता था।
बाकी वर्ण भी मैन्युफैक्चरिंग में सम्मिलित थे - जिसमें प्रमुख कार्य था - सूत का कातना, जो एक राष्ट्रीय उद्योग था।
अब वर्ण के क्रम में वंश या जातियाँ आती थी - जैसे क्षत्रियों में चंद्रवंशी, सूर्यवंशी, सोमवंशी आदि आदि। अब इन वंशो के अंदर कई वंश या वंशवृक्ष या फैमिली ट्री।
ब्राम्हणो के अंदर - पांडेय शुक्ला तिवारी मिश्र आदि आदि वंश। अब इनके भी उपवंश या फैमिली ट्री - किसी पंडी जी से पूँछिये कि साहब -"या अल्लाह पांडेय में भी पांडेय" का क्या अर्थ है, तो वह बताएंगे।
इसी तरह वैश्यों में अनेक वंश और उपवंश।
इसी तरह शूद्रों में भी अनेक वंश और उपवंश।
सबके जीवन यापन की एक विधा या माध्यम था - और शादी की एक परंपरा - वंश या उपवंश को जाति कहते थे। इनकी शादी का एक सिस्टम था।
ये जातियाँ आत्मनियन्त्रित यूनिट थीं, जिनके नियम और कानून उसी जाति के अनुवांशिक रूप से स्थापित मुखिया करते थे। ये हजार वर्ष पुरानी बात नहीं कर रहा, मात्र 200 वर्ष पुरानी बात कर रहा हूँ। यह सिस्टम धर्म सततः और राजसत्ता से नियंत्रित नहीं होता था।
इस सिस्टम ने #दस्यु_मुसलमानों के 800 वर्ष का शासन होने के बाद भी भारत का इस्लामीकरण नहीं होने दिय्या।
लेकिन #दस्यु_ईसाई मुसलमानों से 600 साल सीनियर और 6000 गुना हरामी थे - उन्होंने भारतीय मैन्युफैक्चरिंग के साथ साथ इस आत्मनियन्त्रित यूनिट को खत्म कर सबको #कास्ट में बदल कर उसको सरकारी दस्तावेज का अंग बना दिया।
संविधान निर्माताओं ब्रिटिश एडुकेटेड इडियट इंडियन बररिस्टर्स को अक्ल कितनी ? मैकाले पुत्र। उन्होंने उसी दस्युओं द्वारा साजिशन बनाये गए सिस्टम को संविधान का अंग बना दिया।
फिर लोकतंत्र आ गया - इमोशनल अत्याचार का खेल। लोगों की भावनाओं को उकसाकर वोट मांगने और देश लूटने का वैधानिक मार्ग। इसीलिए मात्र 70 साल में जातिवाद इतनी बड़ी समस्या बन गई। 70 हजार साल में जो सिस्टम भारत का सगुण था वह दुर्गुण बन गया।
आज सफोला तेल का प्रचार टी वी पर आता है, और आपकी घरानी उसको मार्किट से खरीद लाती है। ऊपर सफोला के बाप तेलियों के वंशज याणि जातियों का वर्णन है संकलन अजय कर्मयोगी

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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद