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गायन वादन के अतिरिक्त अनंत कलाएं जो गुरुकुल के विषय का ज्ञान





प्शदचीन काल में भारतीय शिक्षा-क्रम का क्षेत्र बहुत व्यापक था। शिक्षा में कलाओं की शिक्षा भी अपना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती थीं कलाओं के सम्बन्ध में रामायण, महाभारत, पुराण, काव्य आदि ग्रन्थों में जानने योग्य, सामग्री भरी पड़ी है; परंतु इनका थोड़े में, पर सुन्दर ढंग से विवरण शुक्राचार्य के 'नीतिसार' नामक ग्रन्थ के चौथे अध्याय के तीसरे प्रकरण में मिलता है। उनके कथनानुसार कलाएँ अनन्त हैं, उन सबके नाम भी नहीं गिनाये जा सकते; परंतु उनमें 64 कलाएँ मुख्य हैं।
कला का लक्षण बतलाते हुए आचार्य लिखते हैं कि जिसको एक मूक (गूँगा) व्यक्ति भी, जो वर्णोच्चारण भी नहीं कर सकता, कर सके, वह 'कला' है।[1]
केलदि श्रीबसवराजेन्द्रविरचित 'शिवतत्त्वरत्नाकर' में मुख्य-मुख्य 64 कलाओं का नामनिर्देश इस प्रकार किया हे-
इतिहास
आगम
काव्य
अलंकार
नाटक
गायकत्व
कवित्व
कामशास्त्र
दुरोदर (द्यूत)
देशभाषालिपिज्ञान
लिपिकर्प
वाचन
गणक
व्यवहार
स्वरशास्त्र
शाकुन
सामुद्रिक
रत्नशास्त्र
गज-अश्व-रथकौशल
मल्लशास्त्र
सूपकर्म (रसोई पकाना)
भूरूहदोहद (बागवानी)
गन्धवाद
धातुवाद
रससम्बन्धी खनिवाद
बिलवाद
अग्निसंस्तम्भ
जलसंस्तम्भ
वाच:स्तम्भन
वय:स्तम्भन
वशीकरण
आकर्षण
मोहन
विद्वेषण
उच्चाटन
मारण
कालवंचन
स्वर्णकार
परकायप्रवेश
पादुका सिद्धि
वाकसिद्धि
गुटिकासिद्धि
ऐन्द्रजालिक
अंजन
परदृष्टिवंचन
स्वरवंचन
मणि-मन्त्र औषधादिकी सिद्धि
चोरकर्म
चित्रक्रिया
लोहक्रिया
अश्मक्रिया
मृत्क्रिया
दारूक्रिया
वेणुक्रिया
चर्मक्रिया
अम्बरक्रिया
अदृश्यकरण
दन्तिकरण
मृगयाविधि
वाणिज्य
पाशुपाल्य
कृषि
आसवकर्म
लावकुक्कुट मेषादियुद्धकारक कौशल
वात्स्यायन प्रणीत 'कामसूत्र' के टीकाकार जयमंगल ने दो प्रकार की कलाओं का उल्लेख किया है-
'काम शास्त्रांगभूता'
'तन्त्रावापौपयिकी'।
इन दोनों में से प्रत्येक में 64 कलाएँ हैं। इनमें कई कलाएँ समान ही हैं और बाकी पृथक। पहले प्रकार में 24 कर्माश्रया, 20 द्यूताश्रया, 16 शयनोपचारिका और 4 उत्तर कलाएँ,- इस तरह 64 मूल कलाएँ है; इनकी भी अवान्तर और कलाएँ हैं, जो सब मिलकर 518 होती हैं।
कर्माश्रया 24 कलाओं के नाम इस प्रकार हैं-
गीत
नृत्य
वाद्य
कौशल-लिपिज्ञान
उदारवचन
चित्रविधि
पुस्तकर्म
पत्रच्छेद्य
माल्यविधि
गन्धयुत्स्यास्वाद्यविधान
रत्नपरीक्षा
सीवन
रंगपरिज्ञान
उपकरणक्रिया
मानविधि
आजीवज्ञान
तिर्यग्योनिचिकित्सित
मायाकृतपाषण्डपरिज्ञान
क्रीड़ाकौशल
लोकज्ञान
वैचक्षण्य
संवाहन
शरीरसंस्कार
विशेष कौशल
द्यूताश्रया 20 कलाओं में 15 निर्जीव और 5 सजीव हैं। निर्जीव कलाएँ ये हैं-

आयु:प्राप्ति
अक्षविधान
रूप-संख्या
क्रियामार्गण
बीजग्रहण
नयज्ञान
करणादान
चित्राचित्रविधि
गूढ़राशि
तुल्याभिहार
क्षिप्रग्रहण
अनुप्राप्तिलेखस्मृति
अग्निक्रम
छलव्यामोहन
ग्रहदान
सजीव 5 कलाएँ ये हैं-
उपस्थानविधि
युद्ध
रूत
गत
नृत्त
शयनोपचारिका 16 कलाएँ ये हैं-
पुरुष का भावग्रहण
स्वरागप्रकाशन
प्रत्यंगदान
नख-दन्तविचार
नीविस्त्रंसन
गुह्यांगका संस्पर्शनानुलोम्य
परमार्थ कौशल
हर्षण
समानार्थताकृतार्थता
अनुप्रोत्साहन
मृदुक्रोधप्रवर्तन
सम्यक्क्रोधनिवर्तन
क्रुद्धप्रसादन
सुप्तपरित्याग
चरमस्वापविधि
गुह्यगूहन
4 उत्तरकलाएँ ये हैं-
साश्रुपात रमण को शापदान,
स्वशपथक्रिया,
प्रस्थितानुगमन और
पुन:पुनर्निरीक्षण। इस प्रकार दूसरे प्रकार की भी सर्वसाधारण के लिये उपयोगिनी 64 कलाएँ हैं।
श्रीमद्भागवत के टीकाकार श्रीधरस्वामी ने भी 'भागवत' के दशम स्कन्ध के 45वें अध्याय के 64वें श्लोक की टीका में प्राय: दूसरे प्रकार की कलाओं का नामनिर्देश किया है; किंतु शुक्राचार्य ने अपने 'नीतिसार' में जिन कलाओं का विवरण दिया है, उनमें कुछ तो उपर्युक्त कलाओं से मिलती हैं, पर बाकी सभी भिन्न हैं। यहाँ पर जयमंगलटीकोक्त दूसरे प्रकार की कलाओं का केवल नाम ही पाठकों की जानकारी के लिये देकर उसके बाद 'शुक्रनीतिसार' के क्रमानुसार कलाओं का दिग्दर्शन कराया जायगा।
जयमंगल के मातनुसार 64 कलाएँ ये हैं-
गीत कला
वाद्य कला
नृत्य कला
आलेख्य कला
विशेषकच्छेद्य कला (मस्तक पर तिलक लगाने के लिये काग़ज़, पत्ती आदि काटकर आकार या साँचे बनाना)
तण्डुल-कुसुमबलिविकार कला (देव-पूजनादि के अवसर पर तरह-तरह के रँगे हुए चावल, जौ आदि वस्तुओ तथा रंगविरंगे फूलों को विविध प्रकार से सजाना)
पुष्पास्तरण कला
दशनवसनांगराग कला (दाँत, वस्त्र तथा शरीर के अवयवों को रँगना)
मणिभूमिका-कर्म कला (घर के फर्श के कुछ भागों को मोती, मणि आदि रत्नों से जड़ना)
शयनरचन कला (पलंग लगाना)
उदकवाद्य कला (जलतरंग)
उदकाघात कला (दूसरों पर हाथों या पिचकारी से जल की चोट मारना)
चित्राश्च योगा कला (जड़ी-बूटियों के योग से विविध वस्तुएँ ऐसी तैयार करना या ऐसी औषधें तैयार करना अथवा ऐसे मन्त्रों का प्रयोग करना जिनसे शत्रु निर्बल हो या उसकी हानि हो),
माल्यग्रंथनविकल्प कला (माला गूँथना)
शेखरकापीड़योजन कला (स्त्रियों की चोटी पर पहनने के विविध अलंकारों के रूप में पुष्पों को गूँथना)
नेपथ्यप्रयोग कला(शरीर को वस्त्र, आभूषण, पुष्प आदि से सुसज्जित करना)
कर्णपत्रभंग कला (शंक्ख, हाथीदाँत आदि के अनेक तरह के कान के आभूषण बनाना)
गन्धयुक्ति कला (सुगन्धित धूप बनाना)
भूषणयोजन कला
ऐन्द्रजाल कला (जादू के खेल)
कौचुमारयोग कला (बल-वीर्य बढ़ाने वाली औषधियाँ बनाना)
हस्तलाघव कला (हाथों की काम करने में फुर्ती और सफ़ाई)
विचित्रशाकयूषभक्ष्यविकार-क्रिया कला(तरह-तरह के शाक, कढ़ी, रस, मिठाई आदि बनाने की क्रिया)
पानकरस-रागासव-योजन कला (विविध प्रकार के शर्बत, आसव आदि बनाना)
सूचीवान कर्म कला (सुई का काम, जैसे सीना, रफू करना, कसीदा काढ़ना, मोजे-गंजी बुनना)
सूत्रक्रीड़ा कला (तागे या डोरियों से खेलना, जैसे कठपुतली का खेल)
वीणाडमरूकवाद्य कला
प्रहेलिका कला (पहेलियाँ बूझना)
प्रतिमाला कला (श्लोक आदि कविता पढ़ने की मनोरंजक रीति)
दुर्वाचकयोग कला (ऐसे श्लोक आदि पढ़ना, जिनका अर्थ और उच्चारण दोनों कठिन हों)
पुस्तक-वाचन कला
नाटकाख्यायिका-दर्शन कला
काव्य समस्यापूरण कला
पट्टिकावेत्रवानविकल्प कला (पीढ़ा, आसन, कुर्सी, पलंग, मोढ़े आदि चीज़ें बेंत बगेरे वस्तुओं से बनाना)
तक्षकर्म कला (लकड़ी, धातु आदि को अभष्टि विभिन्न आकारों में काटना)
तक्षण कला (बढ़ई का काम)
वास्तुविद्या कला
रूप्यरत्नपरीक्षा कला (सिक्के, रत्न आदि की परीक्षा करना)
धातुवाद कला (पीतल आदि धातुओं को मिलाना, शुद्ध करना आदि)
मणिरागाकर ज्ञान कला (मणि आदि का रँगना, खान आदि के विषय का ज्ञान)
वृक्षायुर्वेदयोग कला
मेषकुक्कुटलावकयुद्धविधि कला (मेंढे, मुर्गे, तीतर आदि को लड़ाना)
शुकसारिका प्रलापन कला (तोता-मैना आदि को बोली सिखाना)
उत्सादन-संवाहन केशमर्दनकौशल कला (हाथ-पैरों से शरीर दबाना, केशों का मलना, उनका मैल दूर करना आदि)
अक्षरमुष्टि का कथन (अक्षरों को ऐसी युक्ति से कहना कि उस संकेत का जानने वाला ही उनका अर्थ समझे, दूसरा नहीं; मुष्टिसकेंत द्वारा वातचीत करना, जैसे दलाल आदि कर लेते हैं),
म्लेच्छित विकल्प कला (ऐसे संकेत से लिखना, जिसे उस संकेत को जानने वाला ही समझे)
देशभाषा-विज्ञान कला
पुष्पशकटिका कला
निमित्तज्ञान कला (शकुन जानना)
यन्त्र मातृका कला (विविध प्रकार के मशीन, कल, पुर्जे आदि बनाना)
धारणमातृका कला (सुनी हुई बातों का स्मरण रखना)
संपाठ्य कला
मानसी काव्य-क्रिया कला (किसी श्लोक में छोड़े हुए पद को मन से पूरा करना)
अभिधानकोष कला
छन्दोज्ञान कला
क्रियाकल्प कला (काव्यालंकारों का ज्ञान)
छलितक योग कला (रूप और बोली छिपाना)
वस्त्रगोपन कला (शरीर के अंगों को छोटे या बड़े वस्त्रों से यथायोग्य ढँकना)
द्यूतविशेष कला
आकर्ष-क्रीड़ा कला (पासों से खेलना)
बालक्रीड़नक कला
वैनयिकी ज्ञान कला (अपने और पराये से विनयपूर्वक शिष्टाचार करना)
वैजयिकी-ज्ञान कला (विजय प्राप्त करने की विद्या अर्थात् शस्त्रविद्या)
व्यायामविद्या कला इनका विशेष विवरण जयमंगल ने कामसूत्र की व्याख्या में किया है।

कन्दरिया मन्दिर, खजुराहो
शुक्राचार्य का कहना है कि कलाओं के भिन्न-भिन्न नाम नहीं हैं, अपितु केवल उनके लक्षण ही कहे जा सकते हैं; क्योंकि क्रिया के पार्थक्य से ही कलाओं में भेद होता है। जो व्यक्ति जिस कला का अवलम्बन करता है, उसकी जाति उसी कला के नाम से कही जाती है।
पहली कला है नृत्य (नाचना)। हाव-भाव आदि के साथ गति नृत्य कहा जाता है। नृत्य में करण, अंगहार, विभाव, भाव, अनुभाव और रसों की अभिव्यक्ति की जाती है। नृत्य के दो प्रकार हैं- एक नाट्य, दूसरा अनाट्य। स्वर्ग-नरक या पृथ्वी के निवासियों की कृतिका अनुकरण 'नाटय' कहा जाता है और अनुकरण-विरहित नृत्य 'अनाटय'। यह कला अति प्राचीन काल से यहाँ बड़ी उन्नत दशा में थी। श्रीशंकर का ताण्डवनृत्य प्रसिद्ध है। आज तो इस कला का पेशा करने वाली एक जाति ही 'कत्थक' नाम से प्रसिद्ध है। वर्षाऋतु में घनगर्जना से आनन्दित मोर का नृत्य बहुतों ने देखा होगा। नृत्य एक स्वाभाविक वस्तु है, जो हृदय में प्रसन्नता का उद्रेक होते ही बाहर व्यक्त हो उठती है। कुछ कलाविद पुरुषों ने इसी स्वाभाविक नृत्य को अन्यान्य अभिनय-वेशषों से रँगकर कला का रूप दे दिया है। जंगली-से-जंगली और सभ्य-से-सभ्य समाज में नृत्य का अस्तित्व किसी-न-किसी रूप में देखा ही जाता है। आधुनिक पाश्चात्त्यों में नृत्यकला एक प्रधान सामाजिक वस्तु हो गयी है। प्राचीन काल में इस कला की शिक्षा राजकुमारों तक के लिये आवश्यक समझी जाती थीं। अर्जुन द्वारा अज्ञातवासकाल में राजा विराट की कन्या उत्तरा को बृहन्नला रूप में इस कला की शिक्षा देने की बात 'महाभारत' में प्रसिद्ध है। दक्षिण-भारत में यह कला अब भी थोड़ी-बहुत विद्यमान है। 'कथकली' में उसकी झलक मिलती है। श्री उदयशंकर आदि कुछ कला प्रेमी इस प्राचीन कला को फिर जाग्रत करने के प्रयत्न में लगे हुए हैं।
अनेक प्रकार के वाद्यों का निर्माण करने और उनके बजाने का ज्ञान 'कला' है। वाद्यों के मुख्यतया चार भेद हैं-
तत-तार अथवा ताँत का जिसमें उपयोग होता है, वे वाद्य 'तत' कहे जाते हैं- जैसे वीणा, तम्बूरा, सारंगी, बेला, सरोद आदि।
सुषिर- जिसका भीतरी भाग सच्छिद्र (पोला) हो और जिसमें वायु का उपयोग होता हो, उसको 'सुषिर' कहते हैं- जैसे बांसुरी, अलगोजा, शहनाई, बैण्ड, हारमोनियम, शंख आदि।
आनद्ध -चमड़े से मढ़ा हुआ वाद्य 'आनद्ध' कहा जाता है- जैसे ढोल, नगाड़ा, तबला, मृदंग, डफ, खँजड़ी आदि।
घन- परस्पर आघात से बजाने योग्य वाद्य 'घन' कहलाता है- जैसे झांझ, मंझीरा, करताल आदि। यह कला गाने से सम्बन्ध रखती हैं बिना वाद्य के गान में मधुरता नहीं आती। प्राचीन काल में भारत के वाद्यों में वीणा मुख्य थी। इसका उल्लेख प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में भी उपलब्ध होता है। सरस्वती और नारद का वीणा वादन, श्रीकृष्ण की वंशी, महादेव का डमरू तो प्रसिद्ध ही है। वाद्य आदि विषयों के संस्कृत में अनेक ग्रन्थ हैं। उनमें अनेक वाद्यों के परिमाण, उनके बनाने और मरम्मत करने की विधियाँ मिलती हैं। राज्यभिषेक, यात्रा, उत्सव, विवाह, उपनयन आदि मांगलिक कार्यों के अवसरों पर भिन्न-भिन्न वाद्यों का उपयोग होता था। युद्ध में सैनिकों के उत्साह, शौर्य को बढ़ाने के लिये अनेक तरह के वाद्य बजाये जाते थे।
स्त्री और पुरुषों को वस्त्र एवं अलंकार सुचारू रूप से पहनाना 'कला' है।
अनेक प्रकार के रूपों का आविर्भाव करने का ज्ञान 'कला' है। इसी कला का उपयोग हनुमान जी ने श्रीरामचन्द्रजी के साथ पहली बार मिलने के समय ब्राह्मण-वेश धारण करने में किया था।
शैय्या और आस्तरण (बिछौना) सुन्दर रीति से बिछाना और पुष्पों को अनेक प्रकार से गूँथना 'कला' है।
द्यूत (जूआ) आदि अनेक क्रीड़ाओं से लोगों का मनोरंजन करना 'कला' है। प्राचीन काल में द्यूत के अनेक प्रकारों के प्रचलित होने का पता लगता है। उन सबमें अक्षक्रीड़ा (चौपड़ा) विशेष प्रसिद्ध थी। नल, युधिष्ठिर, शकुनि आदि इस कला में निपुण थे।
अनेक प्रकार के आसनों द्वारा सुरत क्रीड़ा का ज्ञान 'कला' है। इन सात कलाओं का उल्लेख 'गान्धर्ववेद' में किया गया है।
🌻 भारतीय शास्त्रीय संगीत के विविध राग और उन्हें सुनने से फायदे :
1. राग दुर्गा – आत्मविश्वास बढानेवाला.
2. राग यमन – कार्यशक्ति बढानेवाला.
3. राग देसकार – उत्थान व संतुलन साधनेवाला
4. राग बिलावल – अध्यात्मिक उन्नति व संतुलन साधनेवाला.
5. राग हंसध्वनि – सत्य असत्य को परिभाषित करनेवाला राग.
6. राग शाम कल्याण – मुलाधार उत्तेजित करनेवाला और आत्मविश्वास बढानेवाला.
7. राग हमीर – आक्रामकता बढानेवाला, यश देनेवाला, शक्ति और उर्जा निर्माण करनेवाला.
8. राग केदार – स्वकर्तृत्व पर पूर्ण विश्वास, भरपूर उर्जा निर्माण करनेवाला और मुलाधार उत्तेजित करनेवाला.
9. राग भूप – शांति निर्माण,  संतुलन साधकर अहंकार मिटाता है.
10. राग अहिर भैरव – शुद्ध इच्छा, प्रेम एवं भक्ति भाव निर्माण करता है व आध्यात्मिक उन्नति, पोषक वातावरण निर्मित कारक.
11. राग भैरवी – भावना प्रधान राग, सर्व सदिच्छा पूर्ण कर प्रेम सशक्त और वृद्धि करता है.  
12. राग मालकौस – अतिशय शांत एवं मधुर राग.  प्रेमभाव निर्माण करता है व संसारिक सुख में वृद्धि करेगा.
13. राग भैरव – शांत वृत्ति व शुध्द इच्छा निर्माण करता है. आध्यात्मिक प्रगति के लिये पोषक एवं शिवत्व जागृत करनेवाला राग.
14. राग जयजयवंती – सुख समृद्धि और यश देने वाला राग. समस्या दूर करनेकी क्षमता.
15. राग भीम पलासी -  संसार सुख व प्रेम देता है.
16. राग सारंग – अति मधुर राग. कल्पना शक्ति व  कार्यकुशलता बढाकर नवनिर्मित ज्ञान प्रदान करता है,  आत्मविश्वास बढाकर परिस्थिति का ज्ञान देता है.
17. राग गौरी – गुण वर्घक राग - शुद्ध ईच्छा, मर्यादाशीलता, प्रेम, उत्थान ,समाधान कारक.
विविध प्रकार के मकरन्दों (पुष्परस) से    
 आसव, मद्य आदि की ज्ञान कराया जाता था संकलन अजय कर्मयोगी

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