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भारत का स्वर्णिम इतिहास: भाग-५
============= गुरुकुलों के आधार पर जो भारत में जो चलता रहा है, वो क्या है, इन गुरुकुलों में विद्यार्थी धातु विज्ञान सीखते है या नक्षत्र विज्ञान सीखते है या खगोल विज्ञान सीखते है या धातुकर्म सीखते है या भवन विज्ञान सीखते है जो कुछ भी सीखते है, और सीख कर निकलते है, शायद वही बड़े बड़े वैज्ञानिक और इंजिनियर हो जाते है. १४ वर्ष की पढाई सामान्य नहीं होती है. आज की आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में अगर हम देखें तो यहाँ १४ वर्ष की पढाई तो जो प्रोफेशनल एजुकेशन है उसी में होती है. यहाँ तो भारत में सामान्य गुरुकुलों में १४ वर्ष की पढाई होती है. और इसके बाद विशेषज्ञता हासिल करनी है, पंडित होना है, पांडित्य आपको लाना है, तो उसके लिए उच्च शिक्षा के केंद्र इस देश में चलते है. जिनको उच्च शिक्षा केंद्र अंग्रेजो ने कहा है, आज उनको हम भारत में यूनिवर्सिटी और कॉलेजेस कह सकते है. आज इस भारत देश में, २००९ में, भारत सरकार के लाखो करोड़ो रूपये खर्च होने के बाद लगभग साढ़े तेरह हजार कॉलेजेस है प्राइवेट और सरकारी सब मिलाकर और ४५० विश्वविद्यालय है, निजी और सरकारी कोनो मिलाकर, साढ़े तेरह हजार कॉलेजेस है और ४५० विश्वविद्यालय है. जब लाखो करोड़ो रूपये सरकार ने खर्च किया है.

अब मै आपको १८२२ के बारे में जानकारी देता हु, कि १८२२ में अकेले मद्रास प्रान्त में, मद्रास प्रेसीडेंसी उसको कहा जाता है. अकेले मद्रास प्रान्त में, मद्रास प्रान्त का मतलब क्या है? आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक का कुछ हिस्सा, ये पूरा मद्रास प्रान्त है. अकेले मद्रास प्रान्त में १८२२ में ११,५७५ कॉलेजेस रहे है और १०९ विश्वविद्यालय रहे है. अकेले मद्रास प्रान्त में, और फिर मद्रास प्रान्त के बाद ऐसे ही मुंबई प्रान्त है, और फिर मुंबई प्रान्त के बाद ऐसे ही पंजाब प्रान्त है. फिर नार्थ – वेस्ट फ्रंटियर है, ये चारो स्थानों को मिला दिया जाये तो भारत में लगभग १४००० से भी ऊपर कॉलेजेस रहे है और लगभग ५०० से सवा ५०० के बीच में विश्वविद्यालय रहे है. अब विश्वविद्यालय आज से ज्यादा, कॉलेजेस भी आज से ज्यादा, सन १८२२ में भारत की ये स्थिति है, माने उच्च  शिक्षा भारत में अदभुत रही है, अंग्रेजो के आने के पहले तक, माध्यमिक शिक्षा तो अदभुत है ही, प्राथमिक शिक्षा भी बहुत अदभुत है लेकिन उच्च शिक्षा भी इस देश में अदभुत है. और इन कॉलेजेस में विशेष रूप से जो कॉलेजेस रहे है, अभियांत्रिकी के अलग कॉलेजेस है, इंजीनियरिंग के अलग कॉलेजेस है, सर्जरी के अलग कॉलेज है, मेडिसिन के अलग कॉलेज है. जिनको आज हम कहते है न मेडिकल कॉलेज अलग है, इंजीनियरिंग कॉलेज अलग है. मैनेजमेंट के कॉलेज अलग है, ये तो भारत में १८२२ में भी है, सर्जरी के विश्वविद्यालय अलग है. और ये हमारे चिकित्सा विज्ञान में जिसको हम आयुर्वेद कहते है, इसके विश्वविद्यालय अलग है, और मैनेजमेंट के विश्वविद्यालय अलग है. ये पुरे भारत में फैले हुए है और पुरे भारत के विद्यार्थियो की व्यवस्था यहाँ पर है. हमने सुना है तक्षशिला एक विश्वविद्यालय कभी होता था, हमने सुना है कभी नालंदा नाम का एक विश्वविद्यालय होता था. ये तक्षशिला नालंदा तो दो नाम है ऐसे तो ५०० से ज्यादा विश्वविद्यालय सम्पूर्ण भारत देश में हमारे आज से लगभग डेढ़ सौ – पोने दो सौ तक रहे है. तक्षशिला नालंदा तो आज से ढाई हजार साल पहले की कहानी है. लेकिन डेढ़ सौ पोने दो सौ साल पहले के भारत में सवा पांच सौ से ज्यादा विश्वविद्यालय है और १४००० के आस पास डिग्री कॉलेजेस है. तो शिक्षा व्यवस्था में भारत मजबूत है पूरी दुनिया में. आपको एक हंसी की बात मै कहू वो ये कि पुरे यूरोप में ऐसा माना जाता है कि सबसे पहले शिक्षा व्यवस्था सामान्य लोगों के लिए इंग्लैंड में आई. और वो सन. १८६८ में आई. इसका माने यूरोप के देशो में में तो उसके और बाद में आई. तो आप बोलेंगे १८६८ के पहले इंग्लैंड में स्कूल नहीं थे? स्कूल नहीं थे, ये बात को सही तरह से समझना है, राजाओं के जो बच्चे जो होते थे, राजाओं के जो अधिकारी होते थे, उन्ही के लिए स्कूल होते थे. और वो राजाओं के महल में चला करते थे, वो सामान्य रूप से सार्वजनिक स्थानों पर नहीं चला करते थे. और साधारण लोगों को उनमे प्रवेश भी नहीं था, इंग्लैंड और यूरोप में ये माना जाता था कि शिक्षा जो है वो विशेषज्ञो के लिए है. और राजा विशेषज्ञ है तो राजा को शिक्षा है, उसके बच्चों को शिक्षा है, उसके अधिकारियो के बच्चों को शिक्षा है. आम आदमी को शिक्षित होने की जरूरत नहीं है. क्यों? तो यूरोप के दार्शनिक कहते है कि आम आदमी को तो गुलाम बन के रहना है, उसको शिक्षित होने से फायदा क्या है. दुनिया में बहुत बड़ा दार्शनिक माना जाता है अरस्तू और उससे भी बड़ा माना जाता है सुकरात. अरस्तू और सुकरात दोनों कहते है कि अन्य बच्चों को शिक्षा नहीं देनी चाहिए, शिक्षा सिर्फ राजा के बच्चों को, राजा के अधिकारियो के बच्चों को ही देनी चाहिए, तो उनके लिए कुछ पढने और पढ़ाने की व्यवस्था है, आम बच्चों के लिए नहीं है. जबकि भारत में बिलकुल उलटा है. शिक्षा आम बच्चों के लिए है, साधारण बच्चों के लिए है, वो गरीब हो, या अमीर हो, ऐसी अदभुत शिक्षा व्यवस्था हमारे देश में रही है.

शिक्षा के बाद में थोड़ी सी कृषि की बात करू कि भारत में कृषि व्यवस्था कैसी रही है. हमारे अतीत में कृषि व्यवस्था के बारे में जिन अंग्रेजो ने बहुत ज्यादा शोध किया है. उनमे से लेस्टर नाम का एक अंग्रेज है, वो ये कहता है कि भारत में कृषि उत्पादन दुनिया में सर्वोच्च है. और अंग्रेजो की संसद में भाषण देते समय वो कह रहा है कि भारत में एक एकड़ में सामान्य रूप से ५६ क्विंटल धान पैदा होता है, एक एकड़ में सामान्य रूप से. वो ये कह रहा है कि ये उत्पादन औसतन है, एवरेज है, वो ये कहता है की भारत के कुछ इलाके तो ऐसे है, जहाँ एक एकड़ में ७० से ७५ क्विंटल तक धान होता है. और कुछ इलाके ऐसे है जहाँ ४५ से ५० क्विंटल धान पैदा होता है. और वो कहता है कि मैंने औसत निकला है पुरे भारत का, तो ५६ क्विंटल धान पैदा होता है भारत की खेती में, इतनी उन्नत कृषि व्यवस्था भारत में है. आज के अनुसार मै आपको इसको अगर तुलना कर के बताऊ तो आज भारत में सबसे ज्यादा यूरिया, डी. एस. बी., सुपर फास्फेट, डालने के बाद, सबसे ज्यादा रासायनिक खाद डालने के बाद, औसतन एक एकड़ में ३० क्विंटल से ज्यादा धान पैदा नहीं होता, और आज से लगभग १५० साल पहले भारत में एक एकड़ में ५६ क्विंटल धान पैदा हो रहा है, जबकि उस समय यूरिया, डी. एस. बी. कुछ भी नहीं है. खाली गाय का गोबर और गौमूत्र का उपयोग किया जा रहा है. तो उत्पादन का स्तर ये है. फिर इसी में गन्ने के उत्पादन के बारे में आंकड़े है, अंग्रेजो की संसद में, वो ये कह रहा है कि भारत में एक एकड़ में १२० मीट्रिक टन गन्ना सामान्य रूप से पैदा होता है, पुरे भारत में. १२० मीट्रिक टन, और आज सन २००९ में, यूरिया, डी. एस. बी., सुपर फास्फेट के बोरे पर बोरे खेत में डालने के बाद, गन्ने का औसत उत्पादन पुरे देश में ३० से ३५ मीट्रिक टन है, एक एकड़ में. आप तो महाराष्ट्र से आए है, महाराष्ट्र का एक इलाका है, जिसको पश्चिम महाराष्ट्र आप कहते है, सांगली है, सतारा है, कोलापुर है, और पुणे के बीच का, इस पुरे इलाके में गन्ना औसतन रूप से एक एकड़ में ८० से ९० मीट्रिक टन है, बस यही क्षेत्र है भारत का जहाँ गन्ने का उत्पादन सबसे ऊँचा है पश्चिम महाराष्ट्र में, बाकि पुरे देश में तो गन्ने का उत्पादन ३० – ३५ मीट्रिक टन से ज्यादा नहीं है. और अंग्रेज उस समय का सर्वेक्षण कर रहे है और कह रहे है कि १२० मीट्रिक टन गन्ने का उत्पादन है भारत में  ऐसी खेती है, फिर वो कह रहे है कि कपास का उत्पादन सारी दुनिया में सबसे ज्यादा है. और एक ख़ास बाद जो अंग्रेज कह रहे है वो ये कि भारत में फसलों की विविधता सबसे ज्यादा दुनिया में भारत में ही है. एक अंग्रेज कह रहा है की भारत में धान के कम से कम १ लाख प्रजाति के बीज है, कम से कम १ लाख प्रजाति के बीज है. और ये बात अंग्रेज कह रहा है सन १८२२ के आस पास कह रहा है. सन १८२२ तक इस देश में धान की १ लाख से ज्यादा प्रजातियाँ मौजूद थी. और आज सन. २००९ के आते आते भी पचास हजार धान की प्रजातियाँ तो अभी भी इस पुरे देश में मौजूद है सन. २००९ के आते आते भी. तो इतना ज्यादा विविधता वाला ये देश है. फिर अंग्रेज कहते है कि भारत में सबसे पहला हल बना पूरी दुनिया का, और सारी दुनिया ने हल बनाना और खेत में हल को चलाना भारतवासियो से सिखा है ये भारत का सारी दुनिया को सबसे बड़ा कन्ट्रीब्युसन है. फिर एक अंग्रेज कहता है कि हल के अलावा खुरपी, खुरपी आप समझते है? निदाई, कुदाई करने के लिए उपयोग में आती है. खुरपी है, खुरपा है, हसिया है, हथोडा है, बेलची है, कुदाली है, फावड़ा है, पवित्र है, रैट है, ये सभी शब्द शायद आपके जाने पहचाने है. अंग्रेज कहते है कि ये सब चीजे दुनिया में बाद में आई है, भारत में सैकड़ो साल पहले ही ये बन चुकी है और इनका उपयोग होता रहा है. माने खुरपी, खुरपा, हसिया, फावड़ा, कुदाली जो सारी दुनिया में आज भी इस्तेमाल होते है खेत के लिए. वो भारत में सबसे पहले विकसित हुई है. और बीज को एक पंक्ति में बोने की जो परंपरा है वो हजारों साल पहले भारत में विकसित हुई है. दुसरे देशो को तो कभी उसकी कल्पना नहीं रही है. और इसी तरह अंग्रेजो के इंग्लैंड में १७५० में पहली बार कुछ किसानो ने भारत आ कर खेती सीखी और यहाँ से जा कर अपने इंग्लैंड में उन्होंने कुछ प्रयोग किये, और उसके बाद खेती का काम थोड़ा बहुत उनके यहाँ आगे बढ़ा. इसके पहले कोई उनके यहाँ रिकॉर्ड नहीं मिलते है कि खेती उनके यहाँ कोई बहुत अच्छी होती थी. तो आप पूछेंगे, १७५० के पहले ये इंग्लैंड वाले जीते कैसे थे, या स्कोटलैंड वाले कैसे जीते थे, अगर उनके यहाँ खेती नहीं थी, वो जंगल के द्वारा होने वाले उत्पादन और पशुओ को शिकार कर के उससे उत्पादित होने वाले मांस पर जिन्दा रहते थे. जंगल से जो कुछ मिल गया और पशुओ को मारकर जो मांस पैदा कर लिया, उसी को खा कर उनका जीवन हजारो साल गुजरा है, और जिस समय इंग्लैंड वाले या यूरोप वाले दो ही चीजें खा पाते थे या तो मांस या तो जंगल के फल. उस समय भारत में खाने के लिए १ लाख किस्म के चावल उपलब्ध हुआ करते थे. तो बाकि चीजो की तो बात छोड़ दीजिए. तो ऐसी अदभुत हमारी कृषि व्यवस्था रही है. अजय कर्मयोगी

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