कितने हिन्दू इस बात को जानते हैं कि पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने पुरी जगन्नाथ मंदिर को अमृतसर के विष्णु मंदिर (हरमंदिर साहिब) की तुलना में बहुत अधिक स्वर्ण दान किया था। कितने लोग यह जानते हैं कि इसके ठीक बाद उन्हीं महाराज रणजीत सिंह ने पुरी शंकराचार्य पीठ के संरक्षण में कोहिनूर हीरा भगवान जगन्नाथ के मुकुट के मणि के रूप में पूरा अखण्ड टुकड़ा देने का निर्णय लिया था।
इसके बाद अंग्रेजों में बड़ी हलचल मची। उनके दो स्वार्थ इससे संकट में पड़ सकते थे। एक तो यह कि सिक्खों को हिंदुओं से विभाजित करने का उनका षड्यंत्र सफल नहीं होता, वे सिक्खों का नियोजन सनातन विरोधी अभियानों के लिए उतनी प्रखरता से नहीं कर पाते, और दूसरा जो पीठ तथा मंदिर उनके लिए तब (और आज भी) एक विकट चुनौती थी, उसे अचानक से अपार धन और जन का समर्थन मिलने लगता।
इसीलिए अंग्रेजों ने बलपूर्वक अपनी ही बनाई हुई सन्धियाँ और नियम तोड़कर महाराजा रणजीत सिंह के साथ विश्वासघात किया और कोहिनूर को उनसे चुरा लिया। उन्होंने दर्शनार्थियों से कर वसूलना तो प्रारम्भ कर ही दिया था , उल्टे यह अफवाह उड़ाई कि पुरी की रथयात्रा नरसंहार का एक व्यापक षड्यंत्र है।
अंग्रेजों ने यह कहा कि १४वीं शताब्दी की एक प्रसिद्ध किताब The Travels of Sir John Mandeville में कुछ हिन्दुओं को एक धार्मिक बलिदान के रूप में बताया गया है जो कि स्वयं को इस विशाल रथ के पहियों के नीचे अर्पित कर कुचले जाकर मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इस दावे के आधार पर ब्रिटिश आक्रांताओं ने यह दावा प्रवर्तित किया कि एक काल्पनिक देवता कृष्ण के हिन्दू भक्त सिरफिरे और हठधर्मी हैं जो मोक्ष प्राप्त करने के लिये स्वयं को इन रथों के पहियों के नीचे फेंक देते हैं।
हालांकि अन्न के अधिग्रहण के कारण, तथा अत्यधिक राजस्व के कारण करोड़ों भारतीयों को नृशंसता से मृत्यु देने वाले अंग्रेजों ने अपने दोषों की उपेक्षा करके मनगढ़ंत तथा अप्रामाणिक बातों के आधार पर श्रीजगन्नाथ रथयात्रा पर ही प्रश्नचिह्न लगवा दिया। हालांकि उसी समय के कुछ अन्य लोगों के यह प्रमाण देने पर कि मृत्यु का कारण भगदड़ तथा बेचैनी से उत्पन्न अस्थायी हलचल आदि थी, इसपर स्थगन रोका गया।
प्राचीन रथयात्रा की नकल करते हुए पश्चिम के शासकों ने जगरनॉट नाम की रथयात्रा निकालनी शुरू की। जगरनॉट अंग्रेजी भाषा का एक शब्द है जिसका अर्थ अपराजित या सर्वोच्च प्रभुसत्ता से सम्बंधित होता है। यह प्रायः किसी बड़ी सेना, या इकट्ठे कार्य करने वाले लोगों के समूह के लिये या किसी प्रभावशाली शासक या नेता द्वारा चलाये जा रहे उभर रहे राजनीतिक आन्दोलन के लिये प्रयुक्त होता है।
इसका उद्भव और इसकी धारणा संस्कृत के जगन्नाथ शब्द से ही हुई है। पश्चिमी देशों में इसका सम्बन्ध प्रायः शोषण, कुचले जाने अथवा भौतिक हानि से जोड़ा जाता है, जबकि भगवान जगन्नाथ की सौम्य तथा चातुर्वर्ण्य हितकारिणी रथयात्रा हज़ारों लोगों की आस्था के साथ साथ स्वायत्त आजीविका का भी प्रबल माध्यम है।
हमने संकेत कर दिया है, आगे के सन्दर्भ आप सब ढूंढिए। खोजी और प्रामाणिक वार्ता में रुचि रखने वाले बौद्धिक महारथी गण अपने व्यापक सूत्रों से आगे के क्रियान्वयन में तत्पर हो सकते हैं। सर्वकालिक सार्वभौमिक सार्वजनिक श्रीजगन्नाथ रथयात्रा जैसा अद्भुत प्रबंधन और व्यवस्थापन सर्वदा सनातन जनमानस के लिए प्रेरणास्रोत बनता रहे यही श्रीमहाप्रभुजी के चरणकमलों में प्रार्थना है।
अजय कर्मयोगी
इसके बाद अंग्रेजों में बड़ी हलचल मची। उनके दो स्वार्थ इससे संकट में पड़ सकते थे। एक तो यह कि सिक्खों को हिंदुओं से विभाजित करने का उनका षड्यंत्र सफल नहीं होता, वे सिक्खों का नियोजन सनातन विरोधी अभियानों के लिए उतनी प्रखरता से नहीं कर पाते, और दूसरा जो पीठ तथा मंदिर उनके लिए तब (और आज भी) एक विकट चुनौती थी, उसे अचानक से अपार धन और जन का समर्थन मिलने लगता।
इसीलिए अंग्रेजों ने बलपूर्वक अपनी ही बनाई हुई सन्धियाँ और नियम तोड़कर महाराजा रणजीत सिंह के साथ विश्वासघात किया और कोहिनूर को उनसे चुरा लिया। उन्होंने दर्शनार्थियों से कर वसूलना तो प्रारम्भ कर ही दिया था , उल्टे यह अफवाह उड़ाई कि पुरी की रथयात्रा नरसंहार का एक व्यापक षड्यंत्र है।
अंग्रेजों ने यह कहा कि १४वीं शताब्दी की एक प्रसिद्ध किताब The Travels of Sir John Mandeville में कुछ हिन्दुओं को एक धार्मिक बलिदान के रूप में बताया गया है जो कि स्वयं को इस विशाल रथ के पहियों के नीचे अर्पित कर कुचले जाकर मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इस दावे के आधार पर ब्रिटिश आक्रांताओं ने यह दावा प्रवर्तित किया कि एक काल्पनिक देवता कृष्ण के हिन्दू भक्त सिरफिरे और हठधर्मी हैं जो मोक्ष प्राप्त करने के लिये स्वयं को इन रथों के पहियों के नीचे फेंक देते हैं।
हालांकि अन्न के अधिग्रहण के कारण, तथा अत्यधिक राजस्व के कारण करोड़ों भारतीयों को नृशंसता से मृत्यु देने वाले अंग्रेजों ने अपने दोषों की उपेक्षा करके मनगढ़ंत तथा अप्रामाणिक बातों के आधार पर श्रीजगन्नाथ रथयात्रा पर ही प्रश्नचिह्न लगवा दिया। हालांकि उसी समय के कुछ अन्य लोगों के यह प्रमाण देने पर कि मृत्यु का कारण भगदड़ तथा बेचैनी से उत्पन्न अस्थायी हलचल आदि थी, इसपर स्थगन रोका गया।
प्राचीन रथयात्रा की नकल करते हुए पश्चिम के शासकों ने जगरनॉट नाम की रथयात्रा निकालनी शुरू की। जगरनॉट अंग्रेजी भाषा का एक शब्द है जिसका अर्थ अपराजित या सर्वोच्च प्रभुसत्ता से सम्बंधित होता है। यह प्रायः किसी बड़ी सेना, या इकट्ठे कार्य करने वाले लोगों के समूह के लिये या किसी प्रभावशाली शासक या नेता द्वारा चलाये जा रहे उभर रहे राजनीतिक आन्दोलन के लिये प्रयुक्त होता है।
इसका उद्भव और इसकी धारणा संस्कृत के जगन्नाथ शब्द से ही हुई है। पश्चिमी देशों में इसका सम्बन्ध प्रायः शोषण, कुचले जाने अथवा भौतिक हानि से जोड़ा जाता है, जबकि भगवान जगन्नाथ की सौम्य तथा चातुर्वर्ण्य हितकारिणी रथयात्रा हज़ारों लोगों की आस्था के साथ साथ स्वायत्त आजीविका का भी प्रबल माध्यम है।
हमने संकेत कर दिया है, आगे के सन्दर्भ आप सब ढूंढिए। खोजी और प्रामाणिक वार्ता में रुचि रखने वाले बौद्धिक महारथी गण अपने व्यापक सूत्रों से आगे के क्रियान्वयन में तत्पर हो सकते हैं। सर्वकालिक सार्वभौमिक सार्वजनिक श्रीजगन्नाथ रथयात्रा जैसा अद्भुत प्रबंधन और व्यवस्थापन सर्वदा सनातन जनमानस के लिए प्रेरणास्रोत बनता रहे यही श्रीमहाप्रभुजी के चरणकमलों में प्रार्थना है।
अजय कर्मयोगी

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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद