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भारतीय मीडिया तो उत्तर कोरिया को इस तरह दिखाती है जैसे वह भारत पर आक्रमण करने जा रहा है ! शर्म भी नहीं आती कि मुट्ठी भर के देश ने भारत से बेहतर ICBM बना डाला है और पूरे इतिहास में पहली बार अमरीका को इस बात का अहसास कराया गया है कि यदि अमरीका ने दूसरों पर आक्रमण किया तो अमरीका को अपनी भूमि पर उसका हिसाब चुकाना पडेगा, वरना विश्वयुद्ध में भी अमरीका की मुख्य भूमि युद्ध से अछूती रही थी, केवल आरम्भ में जापान द्वारा धोखे से हवाई द्वीप पर आक्रमण किया गया था | साभार विनय झा के वॉल से
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कोरिया ने अपने पूरे इतिहास में कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया, जबकि अमरीका दशकों से वहां आक्रमण भी कर रहा है और लगातार तनाव बनाए हुए है | अमरीकी खतरे के कारण ही उत्तर कोरिया अपने संसाधनों को रक्षा पर नष्ट करने के लिए विवश है और अमरीका के कारण जो आपातकालीन स्थिति उत्तर कोरिया में बनी रहती है उसमें तानाशाही को पनपने का अवसर मिलता है, वरना तानाशाही और कम्युनिज्म उत्तर कोरिया में कब का समाप्त हो गया होता | लोकतन्त्र का ठेका लेने वाले अमरीका ने अपने देश में रेड इंडियनों का सफाया किया और पूरी दुनिया में तानाशाही की सहायता की, जिसका सबसे नजदीकी उदाहरण है पाकिस्तान |
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उत्तर और दक्षिण कोरिया के अधिकाँश लोग कोरिया का एकीकरण चाहते हैं, किन्तु अमरीका की जिद है कि जो कुछ हो वह अमरीका से पूछकर हो, अर्थात अमरीकी सेठों के वित्तीय हितों के अनुरूप हो -- यही समस्या की जड़ है |
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विश्व के किसी भी देश में कैसी व्यवस्था हो यह निर्णय करने का अधिकार किसे है ? अमरीका के मुट्ठीभर धन्नासेठों को ? रोथ्सचाइल्ड को ? या उस देश की जनता को ? संयुक्त राष्ट्र संघ को ? संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका अमरीका क्यों निभाये ? डॉलर छपने की मशीन अमरीका के पास है और उस डॉलर को दूसरों पर थोपकर बिना कमाए सबको लूटने की शक्ति है इसलिए ?
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अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं का समाधान संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा हो और वहां भी पाँच गुण्डों को वीटो का अधिकार नहीं मिले तभी विश्व में शान्ति और समानता का वातावरण सम्भव होगा | लेकिन वीटो का अधिकार न मिले तो ये गुण्डे संयुक्त राष्ट्र संघ से निकल जायेंगे !! और यही गुण्डे हमें समानता, स्वतन्त्रता, आत्मनिर्णय, मानवाधिकार, आदि पर प्रवचन सुनाते रहते हैं !
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अमरीका और चीन में इस बात की प्रतिस्पर्धा है कि भारत किसका आर्थिक उपनिवेश बने | आर्थिक तौर पर चीन का पलड़ा भारी है और सामरिक तौर पर अमरीका का | भारत की क्षमता तो बहुत है, किन्तु टेक्नोक्रेसी को दबाने वाली ब्यूरोक्रेसी इस बात को सुनिश्चित करती है की भारत में कभी भी मेधा का सदुपयोग न हो, सही अनुसन्धान न हो, हमारे अच्छे वैज्ञानिकों को अमरीका पलायन करने के लिए विवश किये जाय, ताकि इन नौकरशाहों और नेताओं की तिजोरियां विदेशी सेठों द्वारा भरी जाती रहें | उत्तर कोरिया भारत से बेहतर ICBM बनाता है जबकि भारत राइफल एवं बुलेट तक आयात करता है !
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मोदी ने सत्ता सँभालते ही रक्षा के 28 बन्द कारखानों को खुलवाया और रक्षा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ाने का पूरा प्रयास किया | किन्तु शीघ्र ही नौकरशाही हावी हो गयी और हथियार के अन्तर्राष्ट्रीय दलालों ने भारत की रक्षा सामग्री आयात नीति बदलवा दी |
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अब हमारी मीडिया बेशर्मी से डींग मारती रहती है कि हम अमुक-अमुक हथियार विदेश से खरीद रहे हैं, और यही मीडिया दुःख व्यक्त करती है कि उत्तर कोरिया ने अमरीका की नीन्द हराम करने वाले ICBM बना लिए !! यह भारत की मीडिया है या हथियारों के अमरीकी सौदागरों के नौकरों की मीडिया है ?
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अमरीका का वर्चस्व तोड़ने के लिए ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन (BRIC) ने वस्तु-विनिमय बढ़ाने का निर्णय लिया था, किन्तु भाजपा को अमरीका से इतना प्रेम है की BRIC का उद्देश्य खटाई में पड़ गया है | विनिमय मूल्य पर भारत का राष्ट्रीय उत्पादन जितना है लगभग उतना धन हर वर्ष अमरीका के नेतृत्व में विकसित देशों द्वारा भारत से लूटा जा रहा है - रूपये की विनिमय दर वास्तविक क्रय शक्ति की तुलना में चार गुनी घटाकर (इसपर विस्तार से पहले लिख चुका हूँ)| इस लूट की एकमात्र कारगर काट है वस्तु-विनिमय, ताकि डॉलर की आवश्यकता ही आयात हेतु न रहे | किन्तु भारत की इस सर्वोच्च प्राथमिकता को 
किनारे
  कर दिया है ताकि अमरीका प्रसन्न रहे |संकलन  अजय कर्मयोगी

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