वामपंथ के सबसे बड़े मसीहा कार्ल मार्क्स के बारे में आपको कुछ बताना चाहता हूँ जिससे आप इनके बारे में ठीक से समझ सकें ।
तो कार्ल मार्क्स के यहूदी पिता एक बहुत ही धनी वक़ील थे और इनकी माँ बहुत ही धनाढ़्य व्यापारी की बेटी थीं ।
मिलिनेयर मार्क्स ने खुद कभी एक ढेले का काम नहीं किया , केवल कुछ न्यूज़पेपर्स और कुछ इधर उधर पेपर लिखते थे ।
मार्क्स ने जनसंख्या पर लोगों को ज्ञान बाँटे और खुद ने सात बच्चे पैदा किया ।
मक्कार मार्क्स के पास अकूत सम्पत्ति उसके रिश्तेदारों के मरने के बाद ही आई थी, खुद कुछ भी ऐसा नहीं किया जिससे दो पैसे कमा सके ।
कार्ल मार्क्स के एक अवैध बेटा भी था । जी हाँ, आप ठीक पढ़ रहे हैं , अपने घरेलू नौकरानी से मक्कार मार्क्स ने यह संतान पैदा करी थी । और आप एकदम ठीक पढ़ रहे हैं मार्क्स के घरों में घरेलू नौकर भरे हुए थे । हाँ, यह बात दूसरी है कि वो घरेलू नौकर रखने के सिद्धांत के विरोध में था ।
कथनी और करनी का विरोधाभास वामपंथ का मूल है ।
अपने कॉलेज के दिनों में मार्क्स ने एक Trier Tavern Club नामक दारू पीने की सोसाइटी ज्वाइन करी थी । और दारू की वजह से कॉलेज में सबसे घटिया छात्रों में मार्क्स की गिनती थी । बाद में तंग आकर मार्क्स के बाप ने मार्क्स को दर्शन शास्त्र को छोड़कर क़ानून पढ़ने को कहा ।
तो अभी तक आपने देखा कि समाजवाद के प्रणेता मककार मार्क्स एक अत्यंत धनाढ़्य परिवार में पैदा हुए ।
बाप के पैसे पर गुलछर्रे उड़ाए । खुद एक धेला नहीं कमाया ।घरेलू नौकर के सिद्धांत का विरोध किया पर खुद के घर में घरेलू नौकर और नौकरानियाँ रखीं और नौकरानी से बच्चे भी पैदा किया ।
( नेहरू या थरूर के आदर्श तो थे ही ) ।
अब आप खुद सोचिए एक आदमी जिसका नाम मार्क्स था, जिसके ज़िन्दा रहते है सारे सिद्धांत व्यवहारिक धरातल पर फ़ेल हो चुके थे । जिसने, घरेलू प्रापर्टी को अपने वामपंथी सिद्धांत के अनुसार राज्य का विषय बताया पर खुद सारे रिश्तेदारों की प्रापर्टी खुद हड़पता गया कि बात क्यों कर सुनेगें ?
और ध्यान दीजिए, मक्कार मार्क्स ने खुद एक दिन “काम” नहीं किया और दुनिया भर के “कामगार” के पिता बन गए ।
समाजवाद का मूल जो कहता है कि कामगार ही काम का वास्तविक मालिक है बस सिद्धांत रूप में ही ठीक लगता है । व्यवहारिक धरातल पर कुछ दिनों के बाद उन्हीं कामगारों में कुछ लोग आगे बढ़कर पूरे काम पर क़ब्ज़ा कर लेते हैं और इतिहास गवाह है ऐसे लोग और शोषण करते हैं । समाजवाद के नाम पर लालू और मुलायम का उदाहरण आपके सामने है ।
यहाँ पर ध्यान दीजिए, समाजवाद और वामपंथ के विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं का घमासान मचा हुआ है और पहले भी था । उदार साम्यवाद से लेकर सर्वहारा की तानाशाही और लोकतांत्रिक समाजवाद जैसे कितनी ही विचार सारणियां आज के समय में भी हैं और 1950 के दिनों में भी हवा में थीं। धर्म सम्राट करपात्री जी कहते थे कि ये विचारधाराएं असल में एक ही हैं। कोई बुखार सौ डिग्री का होता है तो कोई एक सौ दो, चार, छह और आठ दस तक होता है। होते सभी बुखार हैं, लेकिन डिग्री के अंतर से उनके नाम भी बदल जाते हैं।
नोट: इस पोस्ट के माध्यम से मैं केवल मार्क्स , लेनिन, स्टैलिन या माओ का वह रूप बाहर लाऊँगा जो लोगों को बहुत पता नहीं है । इन सभी ने अपनी अपनी जगहों पर इतिहास में जगह बनाई है अत: इनकी महानता में कोई शक नहीं हैं , मैं केवल यह बताऊँगा कि हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती । बस ।
तो कार्ल मार्क्स के यहूदी पिता एक बहुत ही धनी वक़ील थे और इनकी माँ बहुत ही धनाढ़्य व्यापारी की बेटी थीं ।
मिलिनेयर मार्क्स ने खुद कभी एक ढेले का काम नहीं किया , केवल कुछ न्यूज़पेपर्स और कुछ इधर उधर पेपर लिखते थे ।
मार्क्स ने जनसंख्या पर लोगों को ज्ञान बाँटे और खुद ने सात बच्चे पैदा किया ।
मक्कार मार्क्स के पास अकूत सम्पत्ति उसके रिश्तेदारों के मरने के बाद ही आई थी, खुद कुछ भी ऐसा नहीं किया जिससे दो पैसे कमा सके ।
कार्ल मार्क्स के एक अवैध बेटा भी था । जी हाँ, आप ठीक पढ़ रहे हैं , अपने घरेलू नौकरानी से मक्कार मार्क्स ने यह संतान पैदा करी थी । और आप एकदम ठीक पढ़ रहे हैं मार्क्स के घरों में घरेलू नौकर भरे हुए थे । हाँ, यह बात दूसरी है कि वो घरेलू नौकर रखने के सिद्धांत के विरोध में था ।
कथनी और करनी का विरोधाभास वामपंथ का मूल है ।
अपने कॉलेज के दिनों में मार्क्स ने एक Trier Tavern Club नामक दारू पीने की सोसाइटी ज्वाइन करी थी । और दारू की वजह से कॉलेज में सबसे घटिया छात्रों में मार्क्स की गिनती थी । बाद में तंग आकर मार्क्स के बाप ने मार्क्स को दर्शन शास्त्र को छोड़कर क़ानून पढ़ने को कहा ।
तो अभी तक आपने देखा कि समाजवाद के प्रणेता मककार मार्क्स एक अत्यंत धनाढ़्य परिवार में पैदा हुए ।
बाप के पैसे पर गुलछर्रे उड़ाए । खुद एक धेला नहीं कमाया ।घरेलू नौकर के सिद्धांत का विरोध किया पर खुद के घर में घरेलू नौकर और नौकरानियाँ रखीं और नौकरानी से बच्चे भी पैदा किया ।
( नेहरू या थरूर के आदर्श तो थे ही ) ।
अब आप खुद सोचिए एक आदमी जिसका नाम मार्क्स था, जिसके ज़िन्दा रहते है सारे सिद्धांत व्यवहारिक धरातल पर फ़ेल हो चुके थे । जिसने, घरेलू प्रापर्टी को अपने वामपंथी सिद्धांत के अनुसार राज्य का विषय बताया पर खुद सारे रिश्तेदारों की प्रापर्टी खुद हड़पता गया कि बात क्यों कर सुनेगें ?
और ध्यान दीजिए, मक्कार मार्क्स ने खुद एक दिन “काम” नहीं किया और दुनिया भर के “कामगार” के पिता बन गए ।
समाजवाद का मूल जो कहता है कि कामगार ही काम का वास्तविक मालिक है बस सिद्धांत रूप में ही ठीक लगता है । व्यवहारिक धरातल पर कुछ दिनों के बाद उन्हीं कामगारों में कुछ लोग आगे बढ़कर पूरे काम पर क़ब्ज़ा कर लेते हैं और इतिहास गवाह है ऐसे लोग और शोषण करते हैं । समाजवाद के नाम पर लालू और मुलायम का उदाहरण आपके सामने है ।
यहाँ पर ध्यान दीजिए, समाजवाद और वामपंथ के विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं का घमासान मचा हुआ है और पहले भी था । उदार साम्यवाद से लेकर सर्वहारा की तानाशाही और लोकतांत्रिक समाजवाद जैसे कितनी ही विचार सारणियां आज के समय में भी हैं और 1950 के दिनों में भी हवा में थीं। धर्म सम्राट करपात्री जी कहते थे कि ये विचारधाराएं असल में एक ही हैं। कोई बुखार सौ डिग्री का होता है तो कोई एक सौ दो, चार, छह और आठ दस तक होता है। होते सभी बुखार हैं, लेकिन डिग्री के अंतर से उनके नाम भी बदल जाते हैं।
नोट: इस पोस्ट के माध्यम से मैं केवल मार्क्स , लेनिन, स्टैलिन या माओ का वह रूप बाहर लाऊँगा जो लोगों को बहुत पता नहीं है । इन सभी ने अपनी अपनी जगहों पर इतिहास में जगह बनाई है अत: इनकी महानता में कोई शक नहीं हैं , मैं केवल यह बताऊँगा कि हर चमकती चीज़ सोना नहीं होती । बस ।
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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद