नेता जी सुभाष चन्द्र बोस: मृत्यु के जन्म की खोज"
भाग (८)
सुभाष चन्द्र बोस का जर्मनी प्रवास को लेकर लोग सबसे ज्यादा दिग्भ्रमित है. वहां उनके बिताये गए २ वर्षो के बारे में बहुत कम ही जानकारी उपलब्ध है. ज्यादातर द्वितीय विश्वयुद्ध के बात जो बात सामने आई वो ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गयी थी , जो एक विजेता का अपना सच था , उन्होंने सुभाष चन्द्र बोस के बारे में एक तरफा ही बाते कहीं और उनके वास्तविक क्रिया कलापों और चरित्र को सामने न लाकर, उनके खिलाफ ही लिखा गया था . भारत का दुर्भाग्य यह रहा की ब्रटिश सरकार का ही सच, स्वतंत्रता के बाद से ही, नेहरु की कांग्रेस सरकार ने अपना लिया और सुभाष चन्द्र बोस के विरुद्ध कही जाने वाली बातो और आंकलन को, मौन हो कर सच बने रहने दिया गया. आगे और बताने से पहले यह बहुत जनना जरुरी है की ब्रिटिश शासन ने सुभाष चन्द्र बोस के खिलाफ बातो को क्यों प्रचारित किया और क्यों बोस के सच को सामने क्यों नही आने दिया गया.
जब सुभाष चन्द्र बोस काबुल में थे और रूस में घुसने के लिए जरुरी पासपोर्ट और ट्रांजिट वीसा का इंतज़ार कर रहे थे तब ब्रिटिश सरकार को बोस के काबुल में होने की अपुष्ट खबरे लगी थी. उनको यह तो एहसास हुआ था की बोस काबुल से यूरोप की तरफ बढना चाहते है लेकिन उनको इनकी आगे होने वाली यात्रा का रास्ता और अंतिम गन्तव्य स्थान का नही पता था. ब्रिटिश सरकार ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान शत्रु देशो के इलाको में तोड़ फोड़ और भूमिगत गतिविधियों के लिए लंदन में एक 'स्पेशल ऑपरेशन एग्जीक्यूटिव' (SOE) का १९४० में गठन किया था. SOE ने अपने इस्तांबुल और काहिरा के अपने प्रतिनिधियों को सुचना दी की उनके ख्याल से बोस अफ़ग़ानिस्तान से जर्मनी वाया ईरान, इराक और टर्की जायेंगे और उनको आदेश दिया गया की वो सुभाष चन्द्र बोस की हत्या करने के लिए सारे इंतजाम कर ले. यह आदेश अपने आप में बहुत कुछ कहता है. भारत के किसी भी राजनैतिक व्यक्ति के लिए, ब्रिटिश सम्राज्य से स्वतंत्रता के लिए विद्रोह करने के पर .कभी ही इस तरह के आदेश, पहले नही दिए गए थे. ब्रिटिश सम्राज्य के लिए उनकी हत्या एक आवश्यकता बन गयी थी. इस निर्णय के पीछे जो कारण दिया गया था वो यह था की "उनकी मृत्यु अनिवार्य है क्यों की उनकी भारत में बड़ी संख्या में समर्थक है"( He was to die because he had a large following in India.)
मई महीने के अंत में लंदन ऑफिस ने दिल्ली को सूचना दी की बोस शायद अभी भी अफगानिस्तान में हो सकते है क्यूंकि अभी तक रूस , इटली या जर्मनी से कोई उनके वहां वाकई होने के पुष्ट समाचार नही मिले है , हालाँकि मार्च १९४१ में ही एक गुप्त कोडेड सूचना पढ़ ली गयी थी की बोस अफगानिस्तान से निकल गए है, फिर भी बोस पर सही सूचना नही थी. इसी दौरान जून १३, १९४१ को ब्रिटिश SOE ने अपने इस्तांबुल ऑफिस को बताया की बोस की हत्या के आदेश प्रभावी बने रहेंगे. और यह आदेश कभी भी, बाद में भी निरस्त नही किये गए. बाद में पूर्वी फ्रंट पर जब हिन्द आज़ाद फ़ौज से युद्ध चल रहा था तब ब्रिटिश भारत के वाईस रॉय वॉवेल ने सुभाष चन्द्र बोस के पकड़े जाने की दशा में, बंदी बना कर भारत लाये जाने की किसी भी संभावना से इंकार कर दिया था और आदेश दिए गए थे की सुभाष चन्द्र बोस यदि पकड़े जाते है, तो उनका निस्तारण "ओन द स्पॉट" कर दिया जाये(dealing with the leader ‘on the spot’). इसका दूसरे शब्दों में अर्थ है की जहां भी, जिस हाल में वो मिल जाये, उनकी हत्या कर देनी है.
इतना सब कुछ बताने के पीछे कारण यह है की , हम जब बोस के काबुल से निकल जर्मनी और फिर उनके आगामी जीवन यात्रा को पढ़े तो यह एहसास जरूर रक्खे की बोस ब्रिटिश सम्राज्य के लिए वो जिन्दा कितना बड़ा खतरा थे और उनकी हत्या पर निर्णय १९४१ में ही ले लिया गया था.
बर्लिन पहुंच कर सुभाष चन्द्र बोस ३ अप्रैल १९४१, को ‘ऑर्लैंडो मजोता’, के नाम से जर्मन फॉरेन ऑफिस, जो की विल्हेल्मस्ट्रस्से बर्लिन में स्थित था पहुंचे और उनकी मुलाकात अंडर सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट , डॉ एर्न्स्ट वोेर्मन्न, से हुयी. उन्होंने उनका स्वागत किया और उनके आने का प्रयोजन पूछा. बोस ने जर्मनी में भारत की "गवर्नमेंट - इन - एक्साइल" की स्थापना और उसकी एक्सिस राष्ट्रों द्वारा मान्यता देने की बात कही और साथ में भारत को ब्रिटिश शासन से आज़ाद करने के लिए उत्तरी अफ्रीका में बंदी भारतीय सैनिको को लेकर पूरी तरह भारतीय सेना के गठन में मदद के साथ सैन्य सहायता की बात भी कही. उनसे अपनी मांगो के लिए प्रस्ताव देने के लिए कहा गया जो उन्होंने ९ अप्रैल १९४१ को दे दिया था और उसमे स्पष्ट रूप से ३ मांगे सामने रक्खी थी
(i) एक्सिस पावर्स ‘फ्री इंडियन गवर्नमेंट इन एक्साइल’ के साथ संधि करेगी जिसमे वो युद्ध जीतने के बाद ब्रिटिश शासन से भारत की स्वतंत्रता की गारंटी देंगे.
(ii) ५०००० भारतीय मूल के सैनिको से भारतीय सेना का गठन.
(iii) भारत के स्वतंत्र होने के बाद जर्मनी, भारत का शासन सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व वाली, "गवर्नमेंट - इन - एक्साइल" को दे देंगे.
सुभाष चन्द्र बोस के इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए उनसे समय माँगा गया और उनको रहने के लिए एक रिहायशी, तमाम सुविधा से पूर्ण एक मकान दे दिया गया.
जर्मनी में आकर और उनको मिले आश्वासनों से बोस प्रसन्न नही थे. लेकिन उनके पास कोई और चारा भी नही रह गया था क्यूंकि वो जानते थे की समय ने स्थिति बदल दी है. बोस की नापसंदगी हिटलर और नाज़ी पार्टी को लेकर पहले से ही सामने थी ,
बोस इससे पहले ३० के दशक में जर्मनी आते रहे थे लेकिन वो इटली के मुसलोनी से ज्यादा करीबी थे. १९३६ में जब जर्मनी गए तब उन्होंने व्यक्तिगत रूप से हिटलर से मिलने कोशिश की ताकि हिटलर की किताब "मैं कम्प्फ"(Mein Kampf), जो भारतीयों के खिलाफ बात लिखी गयी है उसका विरोध कर सके और नए संस्करणों से उस भाग को हटाया जा सके, लेकिन उस वक्त हिटलर से उनकी मुलाकत नही हुयी थी और उन्होंने बर्लिन के मेयर से मिल कर अपने विरोध को लिखित रूप से दे पाये थे. बोस नाज़ी पार्टी की नस्लवादी नीतियों के खिलाफ थे और जब हिटलर ने १९३६ में गोरी नस्लों के बाकि नस्लों से उच्च होने की बात कही तब जेनेवा में एक पत्रकार सम्मेलन में हिटलर की इस नीति का पुरजोर विरोध किया था और जर्मनी का व्यापारिक बहिष्कार करने का आवाहन किया था. इसी तरह जब 'हरमन गोरिंग' ने गांधी जी के लिए अपशब्द बोले थे, तब उन्होंने गोरिंग को सर्वजनिक रूप से लताड़ा था. इसलिए अपने पिछले योरप प्रवास के दौरान जहां वो जर्मनी आकर संबन्ध बना रहे थे वहीं वो इटली भी जाते थे और मुसलोनी से उनके संबन्ध ज्यादा अच्छे थे. लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के शुरू होने के बाद, धरातल की वास्तविकता बदल चुकी थी और इटली जर्मनी का बराबर का सहयोगी नही रह गया था, एक्सिस गढ़बंधन का नेतृत्व, जर्मनी के हाथो में चला गया था . इस लिए भारत की स्वतंत्रता के लिए ब्रिटश शासन से सशस्त्र संघर्ष में सहयोग के लिए सिर्फ जर्मनी ही एक मात्र विकल्प उनके पास रह गया था.
जिस वक्त बोस जर्मनी पहुंचे थे तब तक हिटलर रूस पर आक्रमण की तैयारी कर चूका था और बोस को इसके बारे में कुछ भी नही पता था. जर्मनी और रूस के बीच संबन्ध खराब जरूर होने लगे थे और सीमा पर तनाव था. बर्लिन में रहने के बाद कुछ ही दिनों में सुभाष चन्द्र बोस को यह एहसास हुआ की हिटलर रूस से युद्ध छेड़ सकता है , जो बोस के लिए एक बुरी खबर थी . उन्होंने ने एक मेमोरंडम जर्मन नेतृत्व को दिया जिसमे जर्मनी से रूस की सीमा पर स्थिति समान्य रखने को कहा ताकि ब्रिटिश सेना का योरप और मिडिल ईस्ट से सफाया किया जा सके. वो पूरी तरह रूस से किसी भी युद्ध के खिलाफ थे. उन्होंने जर्मन 'विदेश मंत्री रिब्बेन्ट्रोप' से मुलाकात की और कहा जर्मनी को यह समझ लेना चाहिए की भारत की जनता जर्मन फ़ज़िस्म के खिलाफ है और सोवियत रूस के प्रति उनका व्यवहार सहानुभूतिपूर्ण है.
जर्मनी से कोई जल्दी निर्णय न आता देख बोस इटली चले गए और वहां मुसलोनी से मिले. उस मुलकात से बोस यह अच्छी तरह समझ गए थे की इटली वो इटली नही रह गया था और मुसलोनी की वास्तविक स्थिति हिटलर के एक पिट्ठू से ज्यादा नही रह गयी थी.
लौट के आकर १३ मई १९४१ को सुभाष चन्द्र बोस ने भारत की स्वतंत्रता की घोषणा का एक ड्राफ्ट बनाया और जर्मन नेतृत्व को प्रकाशित करने के लिए भेज दिया. उसमे कहा गया था भारत की स्वतंत्रता के बाद उसकी ही जनता तय करेगी की भारत का संविधान कैसा हो और जर्मनी भारत के इस अधिकार को स्वीकार करेगा. मई २४ को सुभाष चन्द्र बोस को बताया गया की इस तरह की घोषणा का सही समय अभी नही है और इसकी जगह स्वतंत्रता के लिए गतिविधियाँ करने के लिए १० मिलियन मार्क दिए गए जिससे "फ्री इंडिया सेंटर" की स्थापना की गयी. जर्मनी ने उनके रहने का अच्छा प्रबंध किया था लेकिन सुभाष चन्द्र बोस से जो उनकी उम्मीदे थी वो पूरी नही हो पारही थी. सुभाष चन्द्र बोस का पुराना इतिहास, नाज़ी पार्टी की नीतियों के खिलाफ था और सोवियत रूस के प्रति उनका झुकाव था. उनके जाने आने पर निगाह रक्खी जाने लगी , उनके टेलीफोन टेप होने लगे और उनके पत्र भी सेंसर किये जाने लगे थे. जर्मनी का बोस के प्रति यह व्यवहार स्पष्ट करता है की जर्मनी बोस पर विशवास नही कर पाया था. बोस जर्मनी के 'भविष्य की योजना' में उपयोगी नही हो रहे थे.
सुभाष चन्द्र बोस के दिलो दिमाग में भारत की स्वतंत्रता के आलावा कोई भी बात नही थी और वो किसी भी और योजना के बारे में बात नही करना चाहते थे और न ही तैयार थे. बोसे से अलग हिटलर के दिमाग में भारत को लेकर अलग ही विचार था . उसका मकसद रूस से युद्ध की दशा में, भारत की स्वतंत्रता की घोषणा को लेकर ब्रिटेन से सौदा करना चाहता था. हिटलर पश्चिमी मोर्चे पर ब्रिटेन से युद्ध में फसी सेना को खाली करवाना चाहता था. वो भारत को लेकर ब्रिटेन को मजबूर करना चाहता था की वो जर्मनी से पश्चिमी मोर्चे पर युद्ध बंद कर दे और उसको पूरा ध्यान रूस के साथ पूर्वी मोर्चे पर देने दे. हिटलर को यह मालूम था की बोस उसकी नस्लभेदी नीति का खुल के विरोध कर चुके है और भारतियों को लेकर की गयी टिप्पिणियो को उसकी किताब से हटाने के लिए बराबर पीछे पड़े है. यही कारण था की कई बार प्रयास करते के बाद भी हिटलर सुभाष चन्द्र बोस से नही मिला था. वो बोस के टूटने का इंतज़ार करना चाहता था ताकि फिर वो उनसे अपने भविष्य की योजना के लिए तैयार कर ले.
जब २२ जून १९४१ को जर्मनी ने रूस के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी और सुभाष चन्द्र बोस के भारत को लेकर भविष्य की योजना को धक्का लगा. जब सुभाष चन्द्र बोस ने कलकत्ता छोड़ा था तब उन्होंने जो भी भविष्य के सशस्त्र संघर्ष की योजना बनायीं थी, उसमे यह आंकलन कभी नही था की जर्मनी, रूस के विरुद्ध युद्ध छेड़ कर पशिमी और पूर्वी दोनों ही सीमाओं ने अपने आप को फसा लेगा. शुरू में जर्मन सेना को रूस में बढ़त मिली तब अगस्त १५, १९४१ , को जर्मन विदेश मंत्री रिब्बेन्ट्रोप को उन्होंने एक कड़ा पत्र लिखा और कहा ," जर्मनी का सोवियत रूस पर आक्रमण भारतीयों की निगाह में जर्मनी का पूर्व की तरफ प्रसार है और जर्मनी उनकी निगाह में एक आक्रमणकरी है. बिना भारत की स्वतंत्रता की घोषणा किये हुए , भारत की सीमा के पास पहुचती हुयी जर्मन सेना को भारत की जनता का प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा और जर्मनी का यह व्यवहार मित्रतापूर्ण न लेकर शत्रुतापूर्ण माना जायेगा."
जब इस बार भी सुभाष चन्द्र बोस की मांग को एक बार फिर अस्वीकार कर दिया गया तब बोस ने सारा ध्यान "फ्री इण्डिया सेंटर" को स्थापित करने में लगा दिया,अब इसके साथ उन्होंने पूरी सत्रह से भारतीय सैनिको की सेना के गठन के भी प्रयास तेज केर दिए थे. उस वक्त जर्मन सेना में बंदी बनाये गए भारतीय भी थे. जिनकी सख्या बढ़ रही थी. ये बंदी जर्नल रोममेल की अफ्रीका कॉर्प द्वारा उत्तरी अफ्रीका में किये गए अभियान के दौरान बनाये गए थे. इनको लेकर योजना यह थी की एक आज़ाद भारतीय सेना का गठन किया जाये. इस सेना का उपयोग, जर्मनी की रूस पर
भाग (८)
सुभाष चन्द्र बोस का जर्मनी प्रवास को लेकर लोग सबसे ज्यादा दिग्भ्रमित है. वहां उनके बिताये गए २ वर्षो के बारे में बहुत कम ही जानकारी उपलब्ध है. ज्यादातर द्वितीय विश्वयुद्ध के बात जो बात सामने आई वो ब्रिटिश सरकार द्वारा दी गयी थी , जो एक विजेता का अपना सच था , उन्होंने सुभाष चन्द्र बोस के बारे में एक तरफा ही बाते कहीं और उनके वास्तविक क्रिया कलापों और चरित्र को सामने न लाकर, उनके खिलाफ ही लिखा गया था . भारत का दुर्भाग्य यह रहा की ब्रटिश सरकार का ही सच, स्वतंत्रता के बाद से ही, नेहरु की कांग्रेस सरकार ने अपना लिया और सुभाष चन्द्र बोस के विरुद्ध कही जाने वाली बातो और आंकलन को, मौन हो कर सच बने रहने दिया गया. आगे और बताने से पहले यह बहुत जनना जरुरी है की ब्रिटिश शासन ने सुभाष चन्द्र बोस के खिलाफ बातो को क्यों प्रचारित किया और क्यों बोस के सच को सामने क्यों नही आने दिया गया.
जब सुभाष चन्द्र बोस काबुल में थे और रूस में घुसने के लिए जरुरी पासपोर्ट और ट्रांजिट वीसा का इंतज़ार कर रहे थे तब ब्रिटिश सरकार को बोस के काबुल में होने की अपुष्ट खबरे लगी थी. उनको यह तो एहसास हुआ था की बोस काबुल से यूरोप की तरफ बढना चाहते है लेकिन उनको इनकी आगे होने वाली यात्रा का रास्ता और अंतिम गन्तव्य स्थान का नही पता था. ब्रिटिश सरकार ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान शत्रु देशो के इलाको में तोड़ फोड़ और भूमिगत गतिविधियों के लिए लंदन में एक 'स्पेशल ऑपरेशन एग्जीक्यूटिव' (SOE) का १९४० में गठन किया था. SOE ने अपने इस्तांबुल और काहिरा के अपने प्रतिनिधियों को सुचना दी की उनके ख्याल से बोस अफ़ग़ानिस्तान से जर्मनी वाया ईरान, इराक और टर्की जायेंगे और उनको आदेश दिया गया की वो सुभाष चन्द्र बोस की हत्या करने के लिए सारे इंतजाम कर ले. यह आदेश अपने आप में बहुत कुछ कहता है. भारत के किसी भी राजनैतिक व्यक्ति के लिए, ब्रिटिश सम्राज्य से स्वतंत्रता के लिए विद्रोह करने के पर .कभी ही इस तरह के आदेश, पहले नही दिए गए थे. ब्रिटिश सम्राज्य के लिए उनकी हत्या एक आवश्यकता बन गयी थी. इस निर्णय के पीछे जो कारण दिया गया था वो यह था की "उनकी मृत्यु अनिवार्य है क्यों की उनकी भारत में बड़ी संख्या में समर्थक है"( He was to die because he had a large following in India.)
मई महीने के अंत में लंदन ऑफिस ने दिल्ली को सूचना दी की बोस शायद अभी भी अफगानिस्तान में हो सकते है क्यूंकि अभी तक रूस , इटली या जर्मनी से कोई उनके वहां वाकई होने के पुष्ट समाचार नही मिले है , हालाँकि मार्च १९४१ में ही एक गुप्त कोडेड सूचना पढ़ ली गयी थी की बोस अफगानिस्तान से निकल गए है, फिर भी बोस पर सही सूचना नही थी. इसी दौरान जून १३, १९४१ को ब्रिटिश SOE ने अपने इस्तांबुल ऑफिस को बताया की बोस की हत्या के आदेश प्रभावी बने रहेंगे. और यह आदेश कभी भी, बाद में भी निरस्त नही किये गए. बाद में पूर्वी फ्रंट पर जब हिन्द आज़ाद फ़ौज से युद्ध चल रहा था तब ब्रिटिश भारत के वाईस रॉय वॉवेल ने सुभाष चन्द्र बोस के पकड़े जाने की दशा में, बंदी बना कर भारत लाये जाने की किसी भी संभावना से इंकार कर दिया था और आदेश दिए गए थे की सुभाष चन्द्र बोस यदि पकड़े जाते है, तो उनका निस्तारण "ओन द स्पॉट" कर दिया जाये(dealing with the leader ‘on the spot’). इसका दूसरे शब्दों में अर्थ है की जहां भी, जिस हाल में वो मिल जाये, उनकी हत्या कर देनी है.
इतना सब कुछ बताने के पीछे कारण यह है की , हम जब बोस के काबुल से निकल जर्मनी और फिर उनके आगामी जीवन यात्रा को पढ़े तो यह एहसास जरूर रक्खे की बोस ब्रिटिश सम्राज्य के लिए वो जिन्दा कितना बड़ा खतरा थे और उनकी हत्या पर निर्णय १९४१ में ही ले लिया गया था.
बर्लिन पहुंच कर सुभाष चन्द्र बोस ३ अप्रैल १९४१, को ‘ऑर्लैंडो मजोता’, के नाम से जर्मन फॉरेन ऑफिस, जो की विल्हेल्मस्ट्रस्से बर्लिन में स्थित था पहुंचे और उनकी मुलाकात अंडर सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट , डॉ एर्न्स्ट वोेर्मन्न, से हुयी. उन्होंने उनका स्वागत किया और उनके आने का प्रयोजन पूछा. बोस ने जर्मनी में भारत की "गवर्नमेंट - इन - एक्साइल" की स्थापना और उसकी एक्सिस राष्ट्रों द्वारा मान्यता देने की बात कही और साथ में भारत को ब्रिटिश शासन से आज़ाद करने के लिए उत्तरी अफ्रीका में बंदी भारतीय सैनिको को लेकर पूरी तरह भारतीय सेना के गठन में मदद के साथ सैन्य सहायता की बात भी कही. उनसे अपनी मांगो के लिए प्रस्ताव देने के लिए कहा गया जो उन्होंने ९ अप्रैल १९४१ को दे दिया था और उसमे स्पष्ट रूप से ३ मांगे सामने रक्खी थी
(i) एक्सिस पावर्स ‘फ्री इंडियन गवर्नमेंट इन एक्साइल’ के साथ संधि करेगी जिसमे वो युद्ध जीतने के बाद ब्रिटिश शासन से भारत की स्वतंत्रता की गारंटी देंगे.
(ii) ५०००० भारतीय मूल के सैनिको से भारतीय सेना का गठन.
(iii) भारत के स्वतंत्र होने के बाद जर्मनी, भारत का शासन सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व वाली, "गवर्नमेंट - इन - एक्साइल" को दे देंगे.
सुभाष चन्द्र बोस के इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए उनसे समय माँगा गया और उनको रहने के लिए एक रिहायशी, तमाम सुविधा से पूर्ण एक मकान दे दिया गया.
जर्मनी में आकर और उनको मिले आश्वासनों से बोस प्रसन्न नही थे. लेकिन उनके पास कोई और चारा भी नही रह गया था क्यूंकि वो जानते थे की समय ने स्थिति बदल दी है. बोस की नापसंदगी हिटलर और नाज़ी पार्टी को लेकर पहले से ही सामने थी ,
बोस इससे पहले ३० के दशक में जर्मनी आते रहे थे लेकिन वो इटली के मुसलोनी से ज्यादा करीबी थे. १९३६ में जब जर्मनी गए तब उन्होंने व्यक्तिगत रूप से हिटलर से मिलने कोशिश की ताकि हिटलर की किताब "मैं कम्प्फ"(Mein Kampf), जो भारतीयों के खिलाफ बात लिखी गयी है उसका विरोध कर सके और नए संस्करणों से उस भाग को हटाया जा सके, लेकिन उस वक्त हिटलर से उनकी मुलाकत नही हुयी थी और उन्होंने बर्लिन के मेयर से मिल कर अपने विरोध को लिखित रूप से दे पाये थे. बोस नाज़ी पार्टी की नस्लवादी नीतियों के खिलाफ थे और जब हिटलर ने १९३६ में गोरी नस्लों के बाकि नस्लों से उच्च होने की बात कही तब जेनेवा में एक पत्रकार सम्मेलन में हिटलर की इस नीति का पुरजोर विरोध किया था और जर्मनी का व्यापारिक बहिष्कार करने का आवाहन किया था. इसी तरह जब 'हरमन गोरिंग' ने गांधी जी के लिए अपशब्द बोले थे, तब उन्होंने गोरिंग को सर्वजनिक रूप से लताड़ा था. इसलिए अपने पिछले योरप प्रवास के दौरान जहां वो जर्मनी आकर संबन्ध बना रहे थे वहीं वो इटली भी जाते थे और मुसलोनी से उनके संबन्ध ज्यादा अच्छे थे. लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के शुरू होने के बाद, धरातल की वास्तविकता बदल चुकी थी और इटली जर्मनी का बराबर का सहयोगी नही रह गया था, एक्सिस गढ़बंधन का नेतृत्व, जर्मनी के हाथो में चला गया था . इस लिए भारत की स्वतंत्रता के लिए ब्रिटश शासन से सशस्त्र संघर्ष में सहयोग के लिए सिर्फ जर्मनी ही एक मात्र विकल्प उनके पास रह गया था.
जिस वक्त बोस जर्मनी पहुंचे थे तब तक हिटलर रूस पर आक्रमण की तैयारी कर चूका था और बोस को इसके बारे में कुछ भी नही पता था. जर्मनी और रूस के बीच संबन्ध खराब जरूर होने लगे थे और सीमा पर तनाव था. बर्लिन में रहने के बाद कुछ ही दिनों में सुभाष चन्द्र बोस को यह एहसास हुआ की हिटलर रूस से युद्ध छेड़ सकता है , जो बोस के लिए एक बुरी खबर थी . उन्होंने ने एक मेमोरंडम जर्मन नेतृत्व को दिया जिसमे जर्मनी से रूस की सीमा पर स्थिति समान्य रखने को कहा ताकि ब्रिटिश सेना का योरप और मिडिल ईस्ट से सफाया किया जा सके. वो पूरी तरह रूस से किसी भी युद्ध के खिलाफ थे. उन्होंने जर्मन 'विदेश मंत्री रिब्बेन्ट्रोप' से मुलाकात की और कहा जर्मनी को यह समझ लेना चाहिए की भारत की जनता जर्मन फ़ज़िस्म के खिलाफ है और सोवियत रूस के प्रति उनका व्यवहार सहानुभूतिपूर्ण है.
जर्मनी से कोई जल्दी निर्णय न आता देख बोस इटली चले गए और वहां मुसलोनी से मिले. उस मुलकात से बोस यह अच्छी तरह समझ गए थे की इटली वो इटली नही रह गया था और मुसलोनी की वास्तविक स्थिति हिटलर के एक पिट्ठू से ज्यादा नही रह गयी थी.
लौट के आकर १३ मई १९४१ को सुभाष चन्द्र बोस ने भारत की स्वतंत्रता की घोषणा का एक ड्राफ्ट बनाया और जर्मन नेतृत्व को प्रकाशित करने के लिए भेज दिया. उसमे कहा गया था भारत की स्वतंत्रता के बाद उसकी ही जनता तय करेगी की भारत का संविधान कैसा हो और जर्मनी भारत के इस अधिकार को स्वीकार करेगा. मई २४ को सुभाष चन्द्र बोस को बताया गया की इस तरह की घोषणा का सही समय अभी नही है और इसकी जगह स्वतंत्रता के लिए गतिविधियाँ करने के लिए १० मिलियन मार्क दिए गए जिससे "फ्री इंडिया सेंटर" की स्थापना की गयी. जर्मनी ने उनके रहने का अच्छा प्रबंध किया था लेकिन सुभाष चन्द्र बोस से जो उनकी उम्मीदे थी वो पूरी नही हो पारही थी. सुभाष चन्द्र बोस का पुराना इतिहास, नाज़ी पार्टी की नीतियों के खिलाफ था और सोवियत रूस के प्रति उनका झुकाव था. उनके जाने आने पर निगाह रक्खी जाने लगी , उनके टेलीफोन टेप होने लगे और उनके पत्र भी सेंसर किये जाने लगे थे. जर्मनी का बोस के प्रति यह व्यवहार स्पष्ट करता है की जर्मनी बोस पर विशवास नही कर पाया था. बोस जर्मनी के 'भविष्य की योजना' में उपयोगी नही हो रहे थे.
सुभाष चन्द्र बोस के दिलो दिमाग में भारत की स्वतंत्रता के आलावा कोई भी बात नही थी और वो किसी भी और योजना के बारे में बात नही करना चाहते थे और न ही तैयार थे. बोसे से अलग हिटलर के दिमाग में भारत को लेकर अलग ही विचार था . उसका मकसद रूस से युद्ध की दशा में, भारत की स्वतंत्रता की घोषणा को लेकर ब्रिटेन से सौदा करना चाहता था. हिटलर पश्चिमी मोर्चे पर ब्रिटेन से युद्ध में फसी सेना को खाली करवाना चाहता था. वो भारत को लेकर ब्रिटेन को मजबूर करना चाहता था की वो जर्मनी से पश्चिमी मोर्चे पर युद्ध बंद कर दे और उसको पूरा ध्यान रूस के साथ पूर्वी मोर्चे पर देने दे. हिटलर को यह मालूम था की बोस उसकी नस्लभेदी नीति का खुल के विरोध कर चुके है और भारतियों को लेकर की गयी टिप्पिणियो को उसकी किताब से हटाने के लिए बराबर पीछे पड़े है. यही कारण था की कई बार प्रयास करते के बाद भी हिटलर सुभाष चन्द्र बोस से नही मिला था. वो बोस के टूटने का इंतज़ार करना चाहता था ताकि फिर वो उनसे अपने भविष्य की योजना के लिए तैयार कर ले.
जब २२ जून १९४१ को जर्मनी ने रूस के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी और सुभाष चन्द्र बोस के भारत को लेकर भविष्य की योजना को धक्का लगा. जब सुभाष चन्द्र बोस ने कलकत्ता छोड़ा था तब उन्होंने जो भी भविष्य के सशस्त्र संघर्ष की योजना बनायीं थी, उसमे यह आंकलन कभी नही था की जर्मनी, रूस के विरुद्ध युद्ध छेड़ कर पशिमी और पूर्वी दोनों ही सीमाओं ने अपने आप को फसा लेगा. शुरू में जर्मन सेना को रूस में बढ़त मिली तब अगस्त १५, १९४१ , को जर्मन विदेश मंत्री रिब्बेन्ट्रोप को उन्होंने एक कड़ा पत्र लिखा और कहा ," जर्मनी का सोवियत रूस पर आक्रमण भारतीयों की निगाह में जर्मनी का पूर्व की तरफ प्रसार है और जर्मनी उनकी निगाह में एक आक्रमणकरी है. बिना भारत की स्वतंत्रता की घोषणा किये हुए , भारत की सीमा के पास पहुचती हुयी जर्मन सेना को भारत की जनता का प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा और जर्मनी का यह व्यवहार मित्रतापूर्ण न लेकर शत्रुतापूर्ण माना जायेगा."
जब इस बार भी सुभाष चन्द्र बोस की मांग को एक बार फिर अस्वीकार कर दिया गया तब बोस ने सारा ध्यान "फ्री इण्डिया सेंटर" को स्थापित करने में लगा दिया,अब इसके साथ उन्होंने पूरी सत्रह से भारतीय सैनिको की सेना के गठन के भी प्रयास तेज केर दिए थे. उस वक्त जर्मन सेना में बंदी बनाये गए भारतीय भी थे. जिनकी सख्या बढ़ रही थी. ये बंदी जर्नल रोममेल की अफ्रीका कॉर्प द्वारा उत्तरी अफ्रीका में किये गए अभियान के दौरान बनाये गए थे. इनको लेकर योजना यह थी की एक आज़ाद भारतीय सेना का गठन किया जाये. इस सेना का उपयोग, जर्मनी की रूस पर

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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद