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कुम्भ पर्व-स्थलों का
सांस्कृतिक व भौगोलिक रहस्य

ज्योतिष विद्या के स्रोत के विषय में दो मत हैं –
१. ज्योतिष विद्या अनेक देशों में स्वतन्त्रतया जन्मी।
२. ज्योतिष विद्या मूलत: भारतीय है।

हमारा मत इन दोनों से अन्य और तीसरा है
और वह उपर्युक्त दोनों मतों से प्राचीन है किन्तु मानवता द्वारा उसे विस्मृत कर दिया गया है। वह मत है –
३. मानवता के आरम्भिक काल में जब संस्कृतियाँ व राष्ट्र पृथक् नहीं हुए थे तभी ज्योतिष का जन्म हो चुका था और उनके पृथक् होने के उपरान्त श्रेष्ठ संस्कृतियों व राष्ट्रों ने स्वतन्त्रतया इसका पृथक्-पृथक् विकास किया जिसका समय-समय पर न केवल विनिमय हुआ अपितु संयुक्त परियोजनाएँ भी चलाईं गईं।

ऐसी ही एक संयुक्त परियोजना थी –
रेखांशों का निर्धारण!

अक्षांशों (latitudes) व रेखांशों (longitudes) का ज्ञान अति महत्त्वपूर्ण है। इनके बिना समुद्र यात्रा, मानचित्र-निर्माण आदि अनेक बातें अशक्य ही हैं। अक्षांशों का ज्ञान अपेक्षाकृत सरल है। सूर्य की सहायता से इनका अनुमान हो सकता है। उत्तरी गोलार्ध में ध्रुवतारे (Polaris) की सहायता से अक्षांश जानने की परम्परा अति प्राचीन है किन्तु रेखांश जानना अत्यन्त कठिन बात रही है। इसके दो पक्ष हैं –

१. किन्हीं दो स्थलों में से कौनसा पूर्व में है और कौनसा पश्चिम में?
अथवा अमुक स्थल के रेखांश पर पड़ने वाले अन्य स्थल क्या-क्या हैं ?
२. किस स्थल के रेखांश को ०° रेखांश माना जाए?

द्वितीय प्रश्न अति महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसी से पूरी पृथ्वी के समय का निर्धारण हो सकता था।

टॉलमी (90 AD - 168 AD) ने इनके निर्धारण हेतु विभिन्न स्थलों पर हुए चन्द्र-ग्रहण के समय का उपयोग किया और ग्रीक पुराणों में वर्णित “फॉर्चुनेट द्वीपसमूह” (Fortunate isles) के किसी रेखांश को ०° रेखांश मानने का प्रस्ताव किया। ऐसी मान्यता है कि उक्त द्वीपसमूह आधुनिक “केनैरी द्वीपसमूह” (Canary islands) और “केप वर्ड द्वीपसमूह” (Cape Verde islands) में से कोई एक था। उनके पश्चात् भी अन्य विद्वानों द्वारा यह कार्य किया जाता रहा। आधुनिक काल में फ्रांस, इंग्लैण्ड व अमेरिका ने इस पर सर्वाधिक कार्य किया किन्तु यही कार्य अति प्राचीन काल में अधिक न्यायोचितरूपेण हो चुका था किन्तु विस्मृत कर दिया गया! तब पृथ्वी को रेखांशों के समानान्तर पूर्वी व पश्चिमी २ गोलार्धों में विभक्त न कर ४ गोलपादों में विभक्त किया गया था जिनका आरम्भ क्रमश: ०°, ९०°, १८०° व २७०° रेखांशों पर होता था और विषुव दिवस में इन रेखांशों पर एक ही समय में क्रमश: मध्यरात्र, सूर्योदय, मध्याह्न व सूर्यास्त हो रहा होता था।

अति प्राचीन काल में ही यह ज्ञात हो चुका था कि एशिआ, योरोप व ऍफ्रीका जुड़े हुए हैं और इन तीनों में ऍफ्रीका ही सर्वाधिक पश्चिम में है। अत: ऍफ्रीका की मुख्यभूमि के सर्वाधिक पश्चिमी बिन्दु (westernmost point of African mainland) के रेखांश को ही ०° रेखांश मानने का निश्चय किया गया और “उस स्थल की पहचान कर ली गई थी।”

आधुनिक भूगोलवेत्ताओं के अनुसार ऍफ्रीका के सेनेगल (Senegal) देश का कैप-वर्ट (Cap-Vert) ही ऍफ्रीका का सर्वाधिक पश्चिमी बिन्दु है और यह टॉलमी द्वारा प्रस्तावित केनैरी द्वीपसमूह अथवा केप वर्ड द्वीपसमूह से अधिक उपयुक्त है। इसके अक्षांश व रेखांश क्रमश: हैं –
१४°·७४०२ उत्तर व १७°·५१८८ पश्चिम।

कैप-वर्ट (Cap-Vert) से ९०° पूर्व का रेखांश भारतवर्ष से गुजरता है। अत: उसी रेखांश को भारतवर्ष का मानक रेखांश (Standard longitude) माना गया।

भारतवर्ष में स्वतन्त्रतया रेखांशों पर कार्य हो रहा था और इस कार्य के केन्द्र ज्योतिर्लिंगों के रूप में विख्यात थे। इनमें से उज्जयिनी का ज्योतिर्लिंग मुख्यतम था क्योंकि यहीं से तत्कालीन ९०° रेखांश गुजरता था। ९०° रेखांश पर स्थित होने के कारण यह कुम्भ पर्व-स्थल भी था क्योंकि इस रेखांश के पूर्व का भारतीय भूभाग द्वितीय गोलपाद में था तथा पश्चिम का प्रथम गोलपाद में। कालनिर्णायक रेखांश का स्थल होने के कारण इस ज्योतिर्लिंग का नाम “महाकाल” था। किन्तु कैप-वर्ट व उज्जयिनी (२३°·१७९३ उत्तर व ७५°·७८४९ पूर्व) के रेखांशों में ९०° से अधिक (९३°·३०३७) का अन्तर है और इसी में कुम्भ पर्व-स्थलों की अनेकता का रहस्य अन्तर्निहित है!

वस्तुत: भारतवर्ष एक स्वतन्त्र भूप्लेट (tectonic plate) पर स्थित है जो पहले भारतीय महासागर (Indian ocean) के पश्चिम-दक्षिणी भाग में थी और पूर्वोत्तर दिशा में गति करती हुई तिब्बत से आ टकराई। इसी सचल प्लेट के कारण भारतवर्ष को “भरतखण्ड” (Indian plate) भी कहा गया है। उक्त टक्कर के फलस्वरूप भारत व तिब्बत के मध्य का भूभाग ऊपर उठा जिससे हिमालय का उद्भव हुआ। अब भी हिमालय उठ रहा है अर्थात् अब भी भरतखण्ड पूर्वोत्तर दिशा में गति कर रहा है यद्यपि टक्कर के उपरान्त यह गति मन्द अवश्य होती गई। भरतखण्ड की गति की उक्त दिशा के कारण ही हिमालय का पूर्वी भाग पश्चिमी भाग की अपेक्षा ऊँचा व सँकरा है जिससे पता लगता है कि पूर्वी भाग पर पश्चिमी भाग की अपेक्षा अधिक धक्का पड़ रहा है।

भरतखण्ड की पूर्वोत्तर दिशा में गति होने के कारण भारतीय स्थलों के रेखांशीय मान (longitudinal value) में वृद्धि हुई। टक्कर के उपरान्त उत्तर के स्थलों के रेखांशीय मान में दक्षिण के स्थलों की अपेक्षा न्यून वृद्धि हुई क्योंकि पूर्व समुद्र (बंगाल की खाड़ी) भरतखण्ड के दक्षिणी भाग को गति करने हेतु अवकाश प्रदान करता है जबकि उत्तरी भाग तिब्बत में अटका हुआ है।

अस्तु पहले उज्जयिनी कैप-वर्ट से ९०° पूर्व के रेखांश पर ही थी किन्तु भरतखण्ड की गति के कारण वह इस रेखांश से पूर्व की ओर हट गई और नासिक इस रेखांश पर आ गया‌, अत: नासिक कुम्भ पर्व-स्थल बन गया। अब प्राचीन से नवीन के क्रम में कुम्भ पर्व-स्थलों, उनके अक्षांशों, रेखांशों व कैप-वर्ट से उनकी रेखांशीय दूरियों को देखें –

प्रयाग          २५°·४३५८ उत्तर
                  ८१°·८४६३ पूर्व    ९९°·३६५१
हरद्वार         २९°·९४५७ उत्तर
                  ७८°·१६४२ पूर्व    ९५°·६८३
उज्जयिनी    २३°·१७९३ उत्तर
                   ७५°·७८४९ पूर्व    ९३°·३०३७
नासिक        १९°·९९७५ उत्तर
                   ७३°·७८९८ पूर्व    ९१°·३०८६

अर्थात् कैप-वर्ट से ९०° पूर्व के रेखांश पर उज्जयिनी के पहले हरद्वार था और उसके भी पहले प्रयाग था।

अर्थात् कुम्भ पर्व की परम्परा न्यूनतम तब से है जब प्रयाग उक्त रेखांश पर था।

प्रयाग, हरद्वार, उज्जयिनी व नासिक उक्त रेखांश से पूर्व दिशा की ओर क्रमश: ९, ५, ३ व १ अंश (पूर्णांक में) हट चुके हैं। स्पष्ट है कि नासिक भी उक्त रेखांश से हट चुका है और भविष्य में सोमनाथ उक्त रेखांश पर आ सकता है। अब भरतखण्ड की गति मन्द हो गई है, अत: ऐसा होने में पहले की तुलना में अधिक समय लगेगा। सोमनाथ के अक्षांश, रेखांश व कैप-वर्ट से उसकी रेखांशीय दूरी को देखें –

सोमनाथ      २०°·९०६० उत्तर
                   ७०°·३८४३ पूर्व    ८७°·९०३१

सम्प्रति सोमनाथ उक्त रेखांश से २° (पूर्णांक में) दूर है!

सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि
कुम्भ पर्व भरतखण्ड की उक्त अविराम यात्रा में हुए पूर्वी विस्थापन के सद्योगत ९° का रिकॉर्ड है!

और यह वैश्विक ज्योतिष की प्राचीनता का रिकॉर्ड भी है!

अजय कर्मयोगी

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