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इस लेख में बहुत सारे विचार हम से भिन्न है आप भी इसे पढ़कर हमें अपने विचार देने का कष्ट करें अजय कर्मयोगी
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यजुर्वेद व्याख्या की कठिनाई-इनका मुख्य भाष्य उव्वट-महीधर का है। तैत्तिरीय संहिता के भाष्य सायण तथा भट्ट भास्कर के हैं। एक नया फैशन दीखा है कि सायण तथा महीधर को वामपन्थी कह कर उनका बहिष्कार करे। पिछले 100 वर्ष के सभी वामपन्थियों के वे बिल्कुल विपरीत हैं। सायण और महीधर भी वामपन्थ के घोर विरोधी थे। उन्होंने ब्राह्मण ग्रन्थों के यज्ञ सम्बन्धी विवरणों के अनुसार भाष्य लिखा है। कई स्थानों पर यह निराधार या मनमाना हो जाता है। सबसे अधिक भ्रम प्रथम तथा अन्तिम श्लोकों में ही है जो प्रायः सभी भाष्यों में है। परिणाम स्वरूप सभी वेदों की व्याख्याओं में है। ऋग्वेद मूर्ति, यजुर्वेद गति तथा सामवेद महिमा रूप है। पर कई लोग वेद का नाम सुनते ही मूर्ति या ऋग्वेद का विरोध शुरू कर देते हैं। यज्ञ का अर्थ जाने बिना यजुर्वेद की व्यवस्था नहीं हो सकती। यज्ञ का अर्थ मन्त्र पढ़कर आग में हवन करना नहीं है। यजुर्वेद में गति का वर्णन है। कई गति क्रिया रूप में होती हैं। क्रिया नाशक या उपयोगी हो सकती है। उपयोगी वस्तु का चक्र में उत्पादन यज्ञ है। यह गीता की परिभाषा है  (3/10-16) तथा इसी का निर्देश यजुर्वेद की सभी शाखाओं के प्रथम मन्त्र में है। अघ्न्या का अर्थ गौ है पर व्यापक अर्थ यज्ञ चक्र होगा जिसे सुरक्षित रखने पर ही मानव सभ्यता चल सकती है। प्रथम मन्त्र यही कह रहा है कि यज्ञ से धन सम्पत्ति, निरोगता आदि होगी। सभी प्रकार के यज्ञों की धुरी इषा है। ईसा भी प्रायः समानार्थक है। कोष में इनके विभिन्न अर्थ देख सकते हैं। कहीं भी यह अर्थ नहीं है कि यह गाय दुहने समय बछड़े को दूर रखने के लिए छड़ी है। मूल भौतिक यज्ञ कृषि है जिससे अन्न पैदा होता है जो मनुष्य को स्वस्थ रखता है। इस यज्ञ के लिये इषा का अर्थ है हल का दण्ड जिसे हलीष या हरीस भी कहते हैं। शारीरिक यज्ञ के लिये मेरुदण्ड ही इषा है। अन्तिम श्लोक है-क्रतो स्मर कृतं स्मर। हर काम के समय कृत कर्म तथा बाकी यज्ञ कर्म का ख्याल रखना है। इन दो सीमाओं के बीच ही पूरे यजुर्वेद की व्याख्या होगी।

वेद पढ़ने के अधिकारी-
वेद पाठ वर्जन का जो श्लोक कहा जाता है उसमें द्विजों के लिये भी वर्जन है-
स्त्री शूद्र द्विज बन्धूनां त्रयी न श्रुति गोचरा।
इसमें सभी वर्गों की अपनी अपनी विशेषताएं हैं, पर वे वेद समझने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। स्त्री घर सम्भालने तथा बच्चों के पालन में दक्ष होती है। शूद्र दक्षता से काम करता है-आशु द्रवति इति शूद्रः। पर उसकी प्रवृत्ति है कि तुरंत काम पूरा करें और अपनी फीस लें। छान्दोग्य उपनिषद् (4/3) तथा स्कन्द पुराण  (3/1/26) में राजा जानश्रुति की कहानी है। वह गाड़ी वाले रैक्व के पास वेद ज्ञान के लिए गया तथा इसके लिए धन सम्पत्ति देने का आग्रह किया। रैक्व ने उसे शूद्र कह कर भगा दिया। यहां गाड़ी वाला वर्ण व्यवस्था में स्वयं शूद्र था पर क्षत्रिय राजा को शूद्र कह रहा था। राजा पैसे देकर ज्ञान लेना चाहता था। हर काम का मूल्य पैसे से करना शूद्र प्रवृत्ति है। यह ऐसा ही है जैसे पैसे से डिग्री खरीद लें।
द्विज बन्धु में ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य तीनों आते हैं। इनके लिए भी वेद मना है। इसका अर्थ है कि केवल इन परिवारों में जन्म लेने से कोई वेद का विद्वान नहीं होता। मेरे पिता वेद के विद्वान थे, राजा थे या बड़े सेठ थे, केवल इसी कारण वेद नहीं समझ में आयेगा। यहां कई लोग तर्क देते हैं कि केवल द्विज बन्धु के लिए मना है, विद्वान ब्राह्मण के लिए नही। यही तर्क स्त्री और शूद्र के लिए भी दिया जा सकता है।
प्रश्न है कि वेद का अधिकारी कौन है या कौन इसे समझ सकता है। पहली शर्त है कि जानने की इच्छा होनी चाहिये-अथातो ब्रह्म जिज्ञासा  (ब्रह्म सूत्र का आरम्भ)। यदि कोई जानना या पढ़ना नहीं चाहता, उसे कोई नहीं पढ़ा सकता। उसके बाद उसके लिए प्राथमिक योग्यता और शिक्षा होनी चाहिए। यज्ञोपवीत में वेदारम्भ संस्कार होता है जिसमें गायत्री मन्त्र का अर्थ बताया जाता है। जैसे इंजीनियरिंग में प्रवेश के लिये +2 परीक्षा विज्ञान तथा गणित विषयों में पास करना जरूरी है, वैसे ही वेद आरम्भ करने के लिए गायत्री जरूरी है। गायत्री मन्त्र समझने के लिए वे सभी चीजें जानना जरूरी है जो वेद पढ़ने के लिए आवश्यक हैं। इस अर्थ में भी गायत्री वेदमाता है। गायत्री मन्त्र के पहले 3 या 7 लोकों का नाम लेते हैं। इन लोकों की रचना और आकार जानने के लिये ज्योतिष का सभी अंग जानना जरूरी है तथा आधुनिक भौतिक विज्ञान भी इसके लिए पर्याप्त नहीं है। सभी भाषाओं में  सभी छन्द 4 पाद के होते हैं। गायत्री छन्द भी 4 पाद का है, पर गायत्री मन्त्र 3 पाद का ही है। मीमांसा दर्शन के अनुसार छन्द और पाद के अनुसार मन्त्र की अर्थ व्यवस्था होती है। अर्थात् वाक्य का अर्थ उसके पद या वाक्यांशों के अनुसार होगा। सभी वाक्यांशों का अलग अलग अर्थ कर उनको जोड़ देंगे। एक वाक्यांश के शब्द को दूसरे वाक्यांश से मिला कर अन्य नहीं कर सकते। सभी भाषाओं के लिए यही नियम है। गायत्री मन्त्र की दूसरी विशेषता है कि पहला पाद या चरण आधिदैविक या आकाश के विश्व का वर्णन करता है। दूसरा चरण आधिभौतिक या पृथ्वी से दीखने वाले विश्व का है। तीसरा चरण आध्यात्मिक या मनुष्य शरीर के लिए है। तीनों विश्वों का परस्पर सम्बन्ध ही वेद मन्त्रों का विषय है जो गायत्री मन्त्र से स्पष्ट होता है। इन विश्वों के प्रसंग में ही शब्दों या पदों का अर्थ होगा। सब अर्थों या विषयों का समन्वय करने पर पूरा अर्थ स्पष्ट होगा। इंजीनियरिंग के विषय भौतिक विज्ञान तथा गणित पर आधारित हैं। चिकित्सा विज्ञान का आधार जीवन विज्ञान, रसायन आदि है। इन सबका आधार लोक भाषा में शब्दों का अर्थ है। अतः वेद या किसी भी विज्ञान को समझने के लिए शास्त्रों का समन्वय होना चाहिए। यह ब्रह्मा सूत्र के प्रथम 4 सूत्रों का आशय है-अथातो ब्रह्म जिज्ञासा। जन्माद्यस्य यतः। शास्त्र योनित्वात्। तत्तु समन्वयात्।
अन्य योग्यता है कि वेद के सहायक अंगों-ज्योतिष, छन्द, निरुक्त, व्याकरण, शिक्षा, कल्प का अध्ययन। व्यावहारिक उदाहरण से समझने के लिए इतिहास पुराण जानना जरूरी है जैसा महाभारत के प्रथम अध्याय में लिखा है-
इतिहास पुराणाभ्यां वेदं समुपवृंहयेत्।
बिभेत्यल्प श्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति।।
अर्थात् इतिहास पुराण से वेद समझना चाहिए। इनको नहीं जानने वाले से वेद भी डरता है कि यह मेरी हत्या कर देगा।

वेद को ३ अर्थों में अपौरुषेय कहा है-
(१) अतीन्द्रिय ज्ञान-सामान्यतः ५ ज्ञानेन्द्रियों से ५ प्राणों के माध्यम से ज्ञान होता है। अन्य २ असत् प्राणों से अतीन्द्रिय ज्ञान होता है। इनको परोरजा तथा ऋषि कहा गया है। सृष्टि का मूल ऋषि प्राण है जो सभी चेतना से परे होने के कारण असत् है। ऊपर (स्रोत) से नीचे (शिष्य) तक ज्ञान का प्रवाह परोरजा प्राण द्वारा है, यह परोऽवरीय कहा है (पर से अवर)-
सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् (मुण्डकोपनिषद् २/१/८),
पञ्च प्राणोर्मिं पञ्च बुद्ध्यादि मूलाम्। (श्वेताश्वतर उपनिषद्१/५)
परोरजसेऽसावदोम् (बृहदारण्यक ५/१४/७), परोरजा य एष तपति (भ्रुह. ५/१४/३)
परोवरीयसो ह लोकाञ्जयति, य एतदेवं विद्वान् (छान्दोग्य उपनिषद् १/९/२)
असद्वा ऽइदमग्र ऽआसीत् । तदाहः – किं तदासीदिति । ऋषयो वाव तेऽग्रेऽसदासीत् । तदाहुः-के ते ऋषय इति । ते यत्पुराऽऽस्मात् सर्वस्मादिदमिच्छन्तः श्रमेण तपसारिषन्-तस्मादृषयः (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/१)
(२) कई ऋषियों का समन्वय- वेद मन्त्रों का दर्शन मनुष्य ऋषियों द्वारा हुआ। किन्तु कई हजार वर्षों तक विभिन्न देशों के ऋषियों द्वारा मन्त्र का दर्शन होने से उनका समन्वय अपौरुषेय है।
ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः साक्षात् कृतकर्माण ऋषयो बभूवुः। (निरुक्त १/२०)
तद्वा ऋषयः प्रति बुबुधिरे य उतर्हि ऋषय आसुः (शतपथ ब्राह्मण २/२/१/१४)
नमो ऋषिभ्यो मन्त्रकृद्भ्यो मन्त्रविद्भ्यो मन्त्रपतिभ्यो। मा मामृषयो मन्त्रकृतो मन्त्रविदः प्राहु (दु) र्दैवी वाचमुद्यासम्॥ (वरदापूर्वतापिनी उपनिषद्, तैत्तिरीय आरण्यक, ४/१/१, मैत्रायणी संहिता ४/९/२)
ऋषे मन्त्रकृतां स्तोत्रैः कश्यपोद्वर्धयत् गिरः। सोऽयं नमस्य राजानं यो जज्ञे वीरुधां पतिः ॥ (ऋक् ९/११४/२)
आप्तोपदेशः शब्दः। (न्याय सूत्र १/१/७)
(३) तीन विश्वों का समन्वय-विश्व के ३ स्तरों का समन्वय जो विज्ञान के प्रयोगों द्वारा सम्भव नहीं है-आधिदैविक (आकाश की सृष्टि), आधिभौतिक (पृथ्वी पर), आध्यात्मिक (मनुष्य शरीर के भीतर)। इनका एक दूसरे की प्रतिमा रूप दर्शन परोरजा या ऋषि प्राण से सम्भव है।
स ऐक्षत प्रजापतिः (स्वयम्भूः) इमं वा आत्मनः प्रतिमामसृक्षि। आत्मनो ह्येतं प्रतिमामसृजत। ता वा एताः प्रजापतेरधि देवता असृज्यन्त-(१) अग्निः (तद् गर्भितो भूपिण्डश्च), (२) इन्द्रः (तद् गर्भितः सूर्यश्च), सोमः (तद् गर्भितः चन्द्रश्च), (४) परमेष्ठी प्राजापत्यः (स्वायम्भुवः)-शतपथ ब्राह्मण (११/६/१/१२-१३)
पुरुषोऽयं लोक सम्मित इत्युवाच भगवान् पुनर्वसुः आत्रेयः, यावन्तो हि लोके मूर्तिमन्तो भावविशेषास्तावन्तः पुरुषे, यावन्तः पुरुषे तावन्तो लोके॥ (चरक संहिता, शारीरस्थानम् ५/२),
अध्यात्ममधिभूतमधिदैवं च (तत्त्व समास ७)
किं तद् ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥१॥
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्म उच्यते। भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्म संज्ञितः॥३॥
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषस्याधिदैवतम्। (गीता, अध्याय ८)

भारत के वैदिक नाम-
वेद और तन्त्र के अनुसार विन्दु या इन्दु से हिन्दू हुआ है। यह मूल वैदिक  धारणा लगती है। बाद में चिन्तन कर लगा कि यह आध्यात्मिक,  आधिदैविक, आधिभौतिक सभी स्तरों पर सत्य है।
आकाश में शून्य (असत्) से सृष्टि हुई जिसका प्रतीक विन्दु है। विन्दु का प्रसार सोम या इन्दु है। यह चन्द्र विन्दु है। इसका पुरुष-प्रकृति के भेद का द्वैत विसर्ग है जिससे सृष्टि होती है।
पृथ्वी पर सभ्यता का केन्द्र भारत था। हिम युगके चक्र से हिमालय द्वारा सुरक्षित रहने के कारण यहाँ स्थायी सनातन सभ्यता रही। हिमालय तीन विष्टप (विटप के मूल की तरह हजारों स्रोतों से जल ग्रहण) में बंटा है, अतः त्रिविष्टप (तिब्बत) कहते हैं। जिस क्षेत्र का जल सिन्धु नदी से निकलता है वह विष्णु विटप है। इस अर्थ में कश्मीर पृथ्वी का स्वर्ग है। जिस क्षेत्र का जल गंगा द्वारा समुद्र तक पहुंचता है वह शिव विटप या शिव जटा है। पूर्व भाग का जल ब्रह्मपुत्र से निकलता है,  वह ब्रह्म विटप है। ब्रह्मपुत्र के परे ब्रह्म देश (बर्मा) अब महा-अमर = म्याम्मार है। इन तीनों क्षेत्रों का केंद्र विन्दु सरोवर है जिसे मान सरोवर भी कहते हैं। कुल मिलाकर दो समुद्रों में विसर्ग होता है। सिन्धु नदी का विसर्ग स्थल सिन्धु समुद्र तथा गंगा का विसर्ग स्थल गंगा सागर है। यही ब्रह्मा का कमण्डल भी है जिसमें गंगा विलीन होती है। कर-मण्डल का संक्षेप कमण्डल है। इसका बंगला उच्चारण कोरोमण्डल है जो भारत के पूर्व समुद्र तट का नाम है।
मस्तिष्क में भी विन्दु चक्र बाहरी प्रेरणा का स्रोत है जहां चोटी रखते हैं। इसका मस्तिष्क के दाहिने और बांये भागों में विसर्ग होता है जिनको मानस के दो हंस कहा गया है। इन हंसों के आलाप से 18 प्रकार की विद्या होती है।
समुन्मीलत् संवित् कमल मकरन्दैक रसिकं,
भजे हंस द्वन्द्वं किमपि महतां मानस चरम्।
यदालापाद् अष्टादश गुणित विद्या परिणतिः,
यदादत्ते दोषादू गुणमखिलमद्भ्यः पय इव।।
(सौन्दर्य लहरी 38)
हुएनसांग ने लिखा है कि भारत तीन अर्थों में इन्दु कहा जाता था-
उत्तर से देखने पर अर्ध चन्द्राकार हिमालय इसकी सीमा है।
हिमालय चन्द्र की तरह ठण्डा है।
जैसे चन्द्रमा पूरे विश्व को प्रकाश देता है उसी प्रकार भारत विश्व को ज्ञान का प्रकाश देता है।
हुएनसांग के अनुसार ग्रीक लोग इन्दु का उच्चारण इण्डे करते थे।
पुराणों में भी लिखा है (जैसे मत्स्य,  विष्णु) कि भारत तथा जम्बू द्वीप दोनों की उतरी सीमा धनुषाकार है।
दक्षिण से देखने पर यह अधोमुख त्रिकोण है जिसे शक्ति त्रिकोण कहते हैं। भारतभारतवर्ष के 9 खण्डों में यह मुख्य होने के कारण कुमारिका है जो शक्ति का मूल रूप है।
विश्व सभ्यता के क

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