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श्राद्ध का ऐतिहासिक महत्व पितृ पक्ष मैं तर्पण दान परंपरा का शास्त्री विधान



*श्रद्धा से श्राद्ध शब्द बना है। श्रद्धा पूर्वक किए हुए कार्य को श्राद्ध कहते हैं।* सत्कार्यों के लिए सत्पुरुषों के लिए सद्भाव के लिए अंदर की कृतज्ञता  की भावना रखना ही श्रद्धा कहलाता है। *उपकारी तत्वों के प्रति आदर प्रकट करना जिन्होंने अपने को किसी प्रकार लाभ पहुंचाया है, उनके लिए कृतज्ञ होना श्रद्धालुओं का आवश्यक कर्तव्य है।* ऐसी श्रद्धा ही धर्म का मेरुदंड है इस श्रद्धा को हटा दिया जाए तो धर्म के सारी महत्ता नष्ट हो जाएगी और वह एक निः सत्व पुछ मात्र बनकर रह जाएगा। *श्रद्धा ही धर्म का एक अंग है इसलिए श्राद्ध उसका धार्मिक कृत्य है* इस प्रकार जीवन में जो भी कार्य श्रृद्धा पूर्वक किते जाते हैं।वे ही श्रेष्ठ फल प्रदान करते हैं।   https://ajaykarmyogi.blogspot.com/2017/11/blog-post_26.html?m=1
पर अब्राहिमिक संस्कृतियों के दरिंदे हमारे आस्था और श्रद्धा विश्वास पर अनेक घात कर रहे हैं हमें इससे अलग करने का षड्यंत्र जो पिछले हजार साल से चल रहा
अपने पूर्वजों का अतुलनीय योगदान का यह एक पक्ष है
हे परम आदरणीय एवं पूज्यनींय पूर्वजों हम आपको नमन करते हैं
सात सौ साल के इस्लामिक हैवानिक राज और दो सौ साल के पाखँडी ईसाई पाशविक शासन के बाद भी आज हम अपनी सनातनी संस्कृति से जुड़े हैं, अपने देवी देवताओं की पूजा कर पाते हैं और अपने देश मे गर्व से रह पाते हैं, ये सब इसीलिए सम्भव हो पाया क्योंकि आपने तलवार के डर अथवा पैसों के मोह में अपना धर्म नहीं बदला। जबकि संपूर्ण दुनिया के सारे संस्कृतियां विनस्ट  व लुप्त हो चुकी है
हम सदैव आपके ऋणी रहेंगे, ये पितृपक्ष आपके अदम्य शौर्य, दृढ़ संकल्प और आपकी निःस्वार्थ भक्ति को समर्पित।
*आपके गौरवशाली एवं गर्वित वंशज*
अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष स्वामी नरेंद्रानंद गिरि की आत्महत्या से मीडिया में एक नया बाजा बजना चालू है जिसमें सभी त्यागी तपस्वी को पाखंडी ढोंगी और और अनेक तरह के प्र् लाप से सनातन परंपरा को बदनाम करके इसे समाप्त करने की साजिश चल रही है अधिकांश लोगों को यह पता भी नहीं है पहले इन्ही षड्यंत्रकारी लोगों के द्वारा इन्हें पहले समाज में स्थापित किया जाता है फिर इन की छमता का उपयोग करके समाज का शोषण किया जाता है यदि यह इसमें से निकलने का प्रयास करते तो इनकी बनी हुई छवि नष्ट करवा कर जेल या आत्महत्या या धन का शोषण करते हैं और दूसरा भयानक पहलू जिससे सनातन परंपरा को बदनाम कर हमारी आस्था हमारे विश्वास हमारी संस्कृति नष्ट करते हैं इसलिए अब एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान 7984113987 पर संपर्क करें
गाय गुरुकुल के आधार श्रेष्ठ भारत की संकल्पना को साकार करने और अपने पूर्वजों का श्राद्ध करने का एक विशेष अवसर का लाभ लेने के लिए इस पितृ पक्ष में विशेष तैयारी की गई है पूर्ण मंत्रोचारण के बाद
21 ब्राम्हण भोजन दक्षिणा एक दिन 11000
या 21 दिन का 2 लाख११००० हजार , गोदान के लिए 21 हजार निस्वार्थ दान मर्यादा का पालन के हेतु संपर्क करें  किसी नजदीकी गुरुकुल में कर का लाभ लेने के लिए विद्यादान में अधिक सहयोग (दो लाख )से ऊपर सहयोगी बनने हेतु संपर्क करें गौ ब्रम्हाण ज्ञान से युक्त श्रेष्ठ विद्या के लिए आपका उत्तम दान,लोक परलोक और आपके परिवार को कल्याणकारी बनाएगा अब सुपात्र के चयन करने विकल्प आपके हाथ में एक श्रेष्ठ विकल्प देना मेरा कर्तव्य है
आज तक सार्वजनिक रुप से कभी मैं अकाउंट शेयर नहीं किया है केवल देश धर्म ,पित्रों पूर्वजों और धन की सद्गति के लिए यह आवाहन किया है
https://ajaykarmyogi.blogspot.com/2019/09/blog-post_19.html?m=1
*"मेरी प्यासी गाय को पानी मिले।"*
*पंडितजी के पूछने पर उस पाखंडी ने कहा कि...*
*जब आपके चढाये जल और भोग आपके पुरखों को मिल जाते हैं तो मेरी गाय को भी मिल जाएगा.*
*इस पर पंडितजी बहुत लज्जित हुए।"*
*यह मनगढंत कहानी सुनाकर एक इंजीनियर मित्र जोर से ठठाकर हँसने लगे और मुझसे बोले कि -*
*"सब पाखण्ड है जी..!"*
*शायद मैं कुछ ज्यादा ही सहिष्णु हूँ...*
*इसीलिए, लोग मुझसे ऐसी बकवास करने से पहले ज्यादा सोचते नहीं है क्योंकि, पहले मैं सामने वाली की पूरी बात सुन लेता हूँ... उसके बाद ही उसे जबाब देता हूँ*.
*खैर...  मैने कुछ कहा नहीं ...*.
*बस, सामने मेज पर से *'कैलकुलेटर' उठाकर एक नंबर डायल किया...*
*और, अपने कान से लगा लिया.*
*बात न हो सकी... तो, उस इंजीनियर साहब से शिकायत की.*
*इस पर वे इंजीनियर साहब भड़क गए.*
*और, बोले- " ये क्या मज़ाक है...??? 'कैलकुलेटर' में मोबाइल का फंक्शन भला कैसे काम करेगा..???"*
*तब मैंने कहा.... तुमने सही कहा...*
*वही तो मैं भी कह रहा हूँ कि....  स्थूल शरीर छोड़ चुके लोगों के लिए बनी व्यवस्था जीवित प्राणियों पर कैसे काम करेगी ???*
*इस पर इंजीनियर साहब अपनी झेंप मिटाते हुए कहने लगे-*
*"ये सब पाखण्ड है , अगर ये सच है... तो, इसे सिद्ध करके दिखाइए"*
*इस पर मैने कहा.... ये सब छोड़िए*
*और, ये बताइए कि न्युक्लीअर पर न्युट्रान के बम्बारमेण्ट करने से क्या ऊर्जा निकलती है ?*
*वो बोले - " बिल्कुल ! इट्स कॉल्ड एटॉमिक एनर्जी।"*
*फिर, मैने उन्हें एक चॉक और पेपरवेट देकर कहा, अब आपके हाथ में बहुत सारे न्युक्लीयर्स भी हैं और न्युट्रांस भी...!*
*अब आप इसमें से एनर्जी निकाल के दिखाइए...!!*
*साहब समझ गए और तनिक लजा भी गए एवं बोले-*
*"जी , एक काम याद आ गया; बाद में बात करते हैं "*
*कहने का मतलब है कि..... यदि, हम किसी विषय/तथ्य को प्रत्यक्षतः सिद्ध नहीं कर सकते तो इसका अर्थ है कि हमारे पास समुचित ज्ञान, संसाधन वा अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं है ,*
*इसका मतलब ये कतई नहीं कि वह तथ्य ही गलत है.*
*क्योंकि, सिद्धांत रूप से तो हवा में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन दोनों मौजूद है..*
*फिर , हवा से ही पानी क्यों नहीं बना लेते ???*
*अब आप हवा से पानी नहीं बना रहे हैं तो... इसका मतलब ये थोड़े ना घोषित कर दोगे कि हवा में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन ही नहीं है.*
*उसी तरह... हमारे द्वारा श्रद्धा से किए गए सभी कर्म दान आदि भी आध्यात्मिक ऊर्जा के रूप में हमारे पितरों तक अवश्य पहुँचते हैं.*
*इसीलिए, व्यर्थ के कुतर्को मे फँसकर अपने धर्म व संस्कार के प्रति कुण्ठा न पालें...!*
*और हाँ...*
*जहाँ तक रह गई वैज्ञानिकता की बात तो....*
*क्या आपने किसी भी दिन पीपल और बरगद के पौधे लगाए हैं...या, किसी को लगाते हुए देखा है?*
*क्या फिर पीपल या बरगद के बीज मिलते हैं ?*
*इसका जवाब है नहीं....*
*ऐसा इसीलिए है क्योंकि... बरगद या पीपल की कलम जितनी चाहे उतनी रोपने की कोशिश करो परंतु वह नहीं लगेगी.*
*इसका कारण यह है कि प्रकृति ने यह दोनों उपयोगी वृक्षों को लगाने के लिए अलग ही व्यवस्था कर रखी है.*
*जब कौए इन दोनों वृक्षों के फल को खाते हैं तो उनके पेट में ही बीज की प्रोसेसिंग होती है और तब जाकर बीज उगने लायक होते हैं.*
*उसके पश्चात कौवे जहां-जहां बीट करते हैं, वहां वहां पर यह दोनों वृक्ष उगते हैं.*
*और... किसी को भी बताने की आवश्यकता नहीं है कि पीपल जगत का एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो round-the-clock ऑक्सीजन (O2) देता है और वहीं बरगद के औषधि गुण अपरम्पार है.*
*साथ ही आप में से बहुत लोगों को यह मालूम ही होगा कि मादा कौआ भादो महीने में अंडा देती है और नवजात बच्चा पैदा होता है.*
*तो, इस नयी पीढ़ी के उपयोगी पक्षी को पौष्टिक और भरपूर आहार मिलना जरूरी है...*
*शायद, इसलिए ऋषि मुनियों ने कौवों के नवजात बच्चों के लिए हर छत पर श्राघ्द के रूप मे पौष्टिक आहार की व्यवस्था कर दी होगी.*
*जिससे कि कौवों की नई जनरेशन का पालन पोषण हो जाये......*
*इसीलिए....  श्राघ्द का तर्पण करना न सिर्फ हमारी आस्था का विषय है बल्कि यह प्रकृति के रक्षण के लिए नितांत आवश्यक है*.
*साथ ही... जब आप पीपल के पेड़ को देखोगे तो अपने पूर्वज तो याद आएंगे ही क्योंकि उन्होंने श्राद्ध दिया था इसीलिए यह दोनों उपयोगी पेड़ हम देख रहे हैं.*
*अतः.... सनातन धर्म और उसकी परंपराओं पे उंगली उठाने वालों से इतना ही कहना है कि....*
*उस समय भी हमारे ऋषि मुनियों को मालूम था कि धरती गोल है और हमारे सौरमंडल में 9 ग्रह हैं.*
*साथ ही... हमें ये भी पता था कि किस बीमारी का इलाज क्या है...*
*कौन सी चीज खाने लायक है और कौन सी नहीं...?*
*अपनी संस्कृति और आस्था बनाये रखें|*
*हमे हमारे पित्तरों श्राध्द अवश्य करना चाहिए।*
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पितर शब्द  के अरथ-वेद के आधार पर इसका विस्तृत वर्णन दो पुस्तकों में है-(१) पण्डित मधुसूदन ओझा की पितृ-समीक्षा-हिन्दी व्याख्या सहित जोधपुर विश्वविद्यालय के मौधुसूदन ओझा शोध प्रकोष्ठ से प्रकाशित। (२) ओझा जी के शिष्य पण्डित मोतीलाल शर्मा का श्राद्ध विज्ञान, खण्ड-२, राजस्थान पत्रिका, जयपुर से प्रकाशित।
श्रुति में पितर शब्द कई अर्थों में प्रयुक्त हुआ है-१. अग्नि (सघन ताप या तेज, सीमाबद्ध पिण्ड अग्नि है), २. सोम (विरल फैला हुआ तेज या पदार्थ), ३. ऋतु (समरूप परिवेश या क्षेत्र), ४. संवत्सर (पृथ्वी कक्षा, कक्षा में पृथ्वी का परिक्रमा काल, सौर-चान्द्र मास का समन्वय जिसके अनुसार समाज चलता है, गुरु का मध्यम गति से १ राशि का भ्रमण काल, सौर मण्डल जहां तक १ वर्ष में सूर्य किरण पहुंचती है), ५. विट् (समाज, उसका पालक वैश्य), ६. मास, ७. ओषधि (जो वृक्ष फल पकने पर समाप्त होता है, बाकी वनस्पति हैं), ८. यम (अष्टाङ्ग योग का प्रथम अङ्ग, निषेध के नियम, नियन्त्रण, भारतवर्ष की पश्चिमी सीमा के राजा, शनि का अन्धकार भाग, दक्षिण दिशा), ९. अपराह्ण (दिन का अन्तिम भाग), १०. कूप (पानी के लिये खोदा गया गड्ढा, खाली स्थान जैसे रोमकूप, नदी के बीच वृक्ष), ११. नीवि (वस्त्र को कमर में बान्धने का नाड़ा, मूलधन या सम्पत्ति), १२. मघा (इस नक्षत्र के पितर देवता हैं), १३. मन, १४. ह्लीक (लज्जा या संकोच, पिता, नेवला, दीवाल की नींव या आधार), १५. ऊष्मा (पितरों का एक गण जो यमसभा में यमराज की उपासना करता है। महाभारत, सभा पर्व ८/३०-अग्निष्वात्ताश्च पितरः फेनपाश्चोष्मपाश्च ये। स्वधावन्तो वर्हिषदो मूर्तिमन्तस्तथापरे॥, गीता, ११/२२, महाभारत सभापर्व, १०९/२ के अनुसार दक्षिण दिशा में ऊष्मपा पितर रहते हैं-अत्र लोकत्रयस्यास्य पितृपक्षः प्रतिष्ठितः। अत्रोष्मपाणां देवानां निवासः श्रूयते द्विज॥), १६. ऊम (मित्र, सहचर), १७. ऊर्व (वड़वानल = समुद्र के भीतर की अग्नि, जल का पात्र, या समुद्र, मेघ, पशु रखने का स्थान, एक प्रकार के पितर, और्व ऋषि द्वारा सगर का जन्म), १८. काव्य (सृष्टि रचना, रसात्मक वाक्य, किसी तात्कालिक घटना का वर्णन वाक्य, उसका शाश्वत रूप काव्य), १९. देव (आकाश, पृथ्वी या शरीर के भीतर प्राण, एक मनुष्य जाति जो अपने यज्ञ या उत्पादन पर निर्भर है, असुर लूट पर निर्भर, जिस प्राण से सृष्टि होती है वह देव प्राण, निष्क्रिय असुर प्राण), २०.-प्राण (ऊर्जा, गति या क्रियात्मक शक्ति, जीवन), २१. रात्रि (शान्त अवस्था में सृष्टि या निर्माण होता है), २२. अवान्तर दिशायें (एक दिशा में गति होने से निर्माण नहीं होता, सांख्य अनुसार सञ्चर-प्रतिसञ्चर दोनों होना चाहिये, ईशावास्योपनिषद् का सम्भूति-असम्भूति), २३. तिर (तिरछा, पार करना, ऋग्वेद १०/१२९/५ के नासदीय सूक्त में सृष्टि का प्रकार-तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषा), २४. सुप्त भाव (शान्त अवस्था में सृष्टि), २५. अग्नि से खाया जाने वाला तत्त्व (अग्निष्वात, निर्माण स्थान में ऊर्जा द्वारा कुछ वस्तु का उपयोग होने से नया निर्माण), २६. मर्त्य तत्त्व (निर्माण के लिये पुराना रूप नष्ट होकर नया बनता है), २७. प्रजापति (प्रजा का पालन, उसके लिये निर्माण), २८. गृहपति (यह भी परिवार का पालन करता है), २९. वाक्-मन का समुच्चय (वाक् = क्रिया या उसका क्षेत्र, मन -निर्माण के लिये चेतन तत्त्व), ३०. अन्न-मूल कृषि यज्ञ के प्रसंग में गीता ३/११-१३ में इसका प्रयोग है-यज्ञ से पर्जन्य तथा पर्जन्य से अन्न होता है। बाकी यज्ञों में कोई भी दृश्य या अदृश्य उत्पाद अन्न है, उत्पादन के साधन पर्जन्य हैं, एक यज्ञ के अन्न से अन्य यज्ञ में उत्पादन-पुरुष सूक्त-यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः)। ३१. मित्र, वरुण-अर्यमा (इनकी व्याख्या नीचे है)। अन्य भी कई अर्थ हैं।
पितृ शब्द की उत्पत्ति पा रक्षणे (धातुपाठ २/४९) धातु से है। जो पालन या रक्षण करे वह पितृ है। इसका एकवचन रूप पिता = जन्म या पालन करने वाला पुरुष है। द्विवचन पितरौ का अर्थ माता-पिता है। बहुवचन पितरः का अर्थ सभी पूर्वज हैं। व्यापक अर्थ में पितर के लिये जितने शब्द प्रयुक्त हैं, वे किसी न किसी प्रकार सृष्टि की उत्पत्ति या पालन करते हैं। ऋषिभ्यः पितरो जाताः पितृभ्यो देवदानवाः। देवेभ्यश्च जगत् सर्वं चरं स्थाण्वनुपूर्वशः॥ (मनुस्मृति, ३/२०१)
= ऋषियों से पितर हुए, पितरों से देव-दानव, देवों से पूरा जगत् हुआ। जगत् में अनुपूर्वशः चर और स्थाणु लिखा है। यह निश्चित रूप से मनुष्य या अचर नहीं है जो आगे पीछे के क्रम से हों (अनुपूर्वशः)। इसमें चर-अचर का कोई निश्चित क्रम नहीं है। जो आज चर है, वह प्राण या शक्ति समाप्त होने पर अचर हो जायेगा। यहां केवल अचर नहीं, स्थाणु अर्थात् धुरी जैसा स्थिर कहा है। ये ३ प्रकार के परमाणु के कण हैं। स्थाणु = भारी, परमाणु की नाबि के कण, जिनको संयुक्त रूपसे बेरिओन (भारी) कण कहते हैं। हलके चक्कर लगाने वाले सभी कणों को लेप्टान कहते हैं। विभिन्न कणों को जोड़ने वाले कण मेसोन (राज मिस्त्री) हैं। यह जगत् का सूक्ष्म रूप है। इनकी उत्पत्ति देवों से हुई। दानव या असुर प्राण उत्पादक नहीं हैं। देव-दानव पितरों से हुए, इनको आज की भाषा में क्वार्क कहा जा सकता है। यहां पितर का अर्थ हुआ प्रोटो-टाईप, निर्माणाधीन अवस्था।
मनुष्य से छोटे विश्व के ७ स्तर क्रमशः १-१ लाख भाग छोटे हैं-१. कलिल (सेल), २. जीव (अणु, श्वेताश्वतर उपनिषद् ५/९ के अनुसार यह बालाग्र का १०,००० भाग, अर्थात् परमाणू है जो कल्प या रासायनिक क्रिया में नष्ट नहीं होता है), ३. कुण्डलिनी (परमाणु की नाभि), ४. जगत्-परमाणु के ३ प्रकार के कण, ५. देव-दानव, ६. पितर, ऋषि (रस्सी, दो कणों को जोड़े, ब्रह्म-मनुष्य को जोड़े, वंश क्रम को जोड़े)।
वालाग्र शत साहस्रं तस्य भागस्य भागिनः। तस्य भागस्य भागार्धं तत्क्षये तु निरञ्जनम् ॥ (ध्यानविन्दु उपनिषद् , ४)
= (मनुष्य से छोटे स्तर ७ हैं) वालाग्र १०० हजार भाग है, इतना ही भाग पुनः ६ बार करें।
वालाग्रमात्रं हृदयस्य मध्ये विश्वं देवं जातरूपं वरेण्यं (अथर्वशिर उपनिषद् ५)
अनाद्यनन्तं कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम् ।
विश्वस्यैकं परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्व पाशैः ॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ५/१३) = कलिल भी विश्व का एक रूप है।
वालाग्र शत भागस्य शतधा कल्पितस्य च ॥
भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते ॥ (श्वेताश्वतर उपनिषद्, ५/९)
षट्चक्र निरूपण, ७-एतस्या मध्यदेशे विलसति परमाऽपूर्वा निर्वाण शक्तिः कोट्यादित्य प्रकाशां त्रिभुवन-जननी
कोटिभागैकरूपा । केशाग्रातिगुह्या निरवधि विलसत .. ।९। अत्रास्ते शिशु-सूर्यकला चन्द्रस्य षोडशी शुद्धा नीरज
सूक्ष्म-तन्तु शतधा भागैक रूपा परा ।७। = बालाग्र का कोटि भाग। इसका १००वां भाग सूक्ष्म तन्तु, परमाणु की नाभि के बराबर है।
असद्वा ऽइदमग्र ऽआसीत् । तदाहः – किं तदासीदिति । ऋषयो वाव तेऽग्रेऽसदासीत् । तदाहुः-के ते ऋषय इति ।
ते यत्पुराऽऽस्मात् सर्वस्मादिदमिच्छन्तः श्रमेण तपसारिषन्-तस्मादृषयः (शतपथ ब्राह्मण, ६/१/१/१) = जो श्रम और तप से खींचते हैं (रस्सी की तरह) वे ऋषि हैं।
इस क्रम में ऋषि का आकार मनुष्य आकार १.३५ मीटर (लम्बाई चौड़ाई का औसत) का १० घात ३५ भाग छोटा होगा। यह आधुनिक भौतिक विज्ञान में सबसे छोटी दूरी है जिसे प्लाङ्क दूरी कहते हैं। भागवत पुराण (३/११/४) के अनुसार इस दूरी को प्रकाश जितने समय में पार करता है, वह काल का परमाणु है (१ सेकण्ड का १० घात ४३ भाग)-स कालः परमाणुर्वै यो भूङ्क्ते परमाणुताम्। इसी कालमान से स्टीफेन हाकिंस ने समय का इतिहास शुरु किया है (A Brief History of Time)।
आकाश के पितर-आकाश में ३ मुख्य धाम हैं-१०० अरब ब्रह्माण्डों का समूह दृश्य जगत् उत्तम धाम, हमारा ब्रह्माण्ड (आकाशगङ्गा) मध्यम धाम, सौर मण्डल (अवम धाम)। रस रूप अव्यक्त स्रोत परम धाम है। हर धाम में १ पृथ्वी (माता) तथा उसका आकाश (पिता) है। विष्णु पुराण (२/७/३-४) के अनुसार इनका विभाजन सूर्य-चन्द्र के प्रकाशित भाग से है। दोनों से प्रकाशित पृथ्वी ग्रह है। सूर्य द्वारा प्रकाशित भाग सौर मण्डल की पृथ्वी है। सूर्य प्रकाश की अन्तिम सीमा (विष्णु का परम पद) जहां वह विन्दु मात्र दीखता है वह तीसरी पृथ्वी ब्रह्माण्ड है। मनुष्य से पृथ्वी जितनी बड़ी है (१ कोटि गुणा), हर पृथ्वी से उसका आकाश उतना ही बड़ा है। अर्थात् अम्नुष्य से आरम्भ कर पृथ्वी, सौर पृथ्वी, ब्रह्माण्ड, दृश्य जगत् क्रमशः १-१ कोटि गुणा बड़े हैं। विश्व का मूल स्रोत आदित्य था जिससे ३ धामों का निर्माण का आदि हुआ। अभी प्रायः वैसा रूप अन्तरिक्ष (हर धाम में भूमि-द्यौ के बीच का स्थान) में दीखता है। उत्तम धाम का आदित्य अर्यमा (ब्रह्माण्डों के बीच का स्थान का पदार्थ) है। ब्रह्माण्ड का आदित्य वरुण (ताराओं के बीच का पदार्थ) है, यह मद्य है, अतः वारुणि का अर्थ मद्य है-ऋक् १/१५४/४)। सौर मण्डल का आदित्य मित्र है जो ग्रहों के बीच का पदार्थ है। आर्यमा, वरुण, मित्र-ये ३ धामों के पितर हुए। अतः सबसे बड़े धाम के पितर अर्यमा को भगवान् ने अपना रूप कहा है (गीता, १०/२९)। पृथ्वी पर इनके अलग अर्थ हैं-मित्र देश ईरान, वरुण देश इराक-अरब है। अर्यमा स्पष्ट नहीं है, पर इसका शाब्दिक अर्थ देश का प्रमुख है (अर्यमा = आजम)। मित्र का अर्थ निकट, वरुण क अर्थ दूर, अर्यमा = पूरा समाज। आकाश में पूर्व क्षितिज मित्र तथा पश्चिमी क्षितिज वरुण है। स्थिर आधार अर्यमा है। यज्ञ में स्थिर यूप दण्ड अर्यमा का प्रतीक है।
तिस्रो भूमीर्धारयन् त्रीरुत द्यून्त्रीणि व्रता विदथे अन्तरेषाम् ।
ऋतेनादित्या महि वो महित्वं तदर्यमन् वरुण मित्र चारु ॥ (ऋग्वेद २/२७/८)
या ते धामानि परमाणि यावमा या मध्यमा विश्वकर्मन्नुतेमा । (ऋग्वेद १०/८१/४)
रवि चन्द्रमसोर्यावन्मयूखैरवभास्यते । स समुद्र सरिच्छैला पृथिवी तावती स्मृता ॥
यावत्प्रमाणा पृथिवी विस्तार परिमण्डलात्। नभस्तावत्प्रमाणं वै व्यास मण्डलतो द्विज ॥ (विष्णु पुराण २/७/३-४)

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