*भारतीय संस्कृति पर षड्यंत्र*
*_क्या महिला सशक्तिकरण के नाम पर सन्नी लियोन जैसी स्त्रियां समाज का आइना होंगी ?_*
वर्तमान की भारतीय राजनीति में एक कौम अपनी पराजय और विफलता को बर्दास्त नहीं कर पा रही है ........ इसीलिए एक मनोवैज्ञानिक वर्चस्व हिंदुओं पर स्थापित करने के षड्यंत्र रचे जा रहे है और यह षड्यंत्र कभी फिल्मों के माध्यम से कभी सरकारी संस्थाओं के माध्यम से और कभी भारत के मीडिया के माध्यम से, यहाँ यह समझने की आवश्यकता है कि......हर षड्यंत्र हिंदुओं की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक अस्मिता को नष्ट करने के लक्ष्य से हो रहा है अब भी चुप रहे तो आने वाले समय एक एक करके हिन्दू धर्म की परम्पराओं, ग्रंथों और सोलह संस्कारों को फिल्मों, टीवी सीरियल और मीडिया के माध्यम से नष्ट किया जाएगा।
तब तक बहुत देर हो चुकी होगी .....!!
विश्व सुंदरी प्रतियोगिता में जीतकर कोई देश का गौरव नहीं बढ़ता और ना ही कोई देशहित होता है।
कुछ लोग गीता-बबीता फोगट और इस प्रतियोगिता की विजेताओं की ड्रेस को एक जैसा बता रहे हैं , ऐसे मानसिक विकलांग कहाँ जाये ......
विश्व सुन्दरी औरत की देह दर्शन का ही वैश्विक प्रोग्राम है। उसकी देह देखकर ही उसे विश्व सुन्दरी बनाया जाता है। इंच और सेन्टीमीटर में जांघें और नितंब नापे जाते हैं। स्तन सुडौल हैं कि नहीं। होंठ मानकों पर खरे उतरते हैं कि नहीं। फिर आखिर में रटी रटाई मानवता की बातें पूछी जाती है और विजेता घोषित होने पर रोने की एक्टिंग सिखाई जाती है।
यही होती है विश्व सुन्दरी जो जल्द ही कॉरपोरेट कंपनियों और फिल्म इंडस्ट्री की माल बनकर माल बेचती है और खुद भी खूब माल कूटती है। विश्व सुन्दरी कोई नारी सशक्तीकरण का प्रोग्राम नहीं है। यह औरत के बाजारू इस्तेमाल का बाजार द्वारा ही विकसित किया गया एक औजार है। देह छिपाने से नारी सशक्त नहीं होती तो देह दिखाने से भी उसका कोई विकास नहीं होता।
*सांस्कृतिक प्रदुषण*
भावनाएँ दो प्रकार की होती है- -रागमयी और द्वेषमयी ।रागमयी भावनाएँ हृदय से हृदय को जोड़ती है । द्वेषमयी भावनाएँ परस्पर ईर्ष्या और घृणा अलगाव पैदा करती है । रागमयी भावनाएँ ही संस्कृति को पुष्ट करती है ।
*दर्शन, धर्म, साहित्य, कला, आचार-विचार :* यह संस्कृति के अंग है I दर्शन जीवन को देखने की दृष्टि के साथ-साथ सृष्टि जीवन के मूल प्रश्नों पर विचार और समधान प्रस्तुत करता है । दर्शन ही बताता है कि एक ही ब्रह्म है जो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। धर्म उन नियमों का समूह है जो व्यष्टि-समष्टि के कल्याण के लिए है । धर्म अंत :अनुशासन है । साहित्य और कला भावना और सौन्दर्य के माध्यम से मानवता का दीप जलाती है । हम सब मोती एक लड़के है ; कहकर विश्व बन्धुत्व की भावना की जोत साहित्य ने जलायी है । आज यह सारी भावनाएँ समाप्त होती जा रही है । भौतिकता की ओर बढ़ते कदमो के कारण जीवन चेतना खत्म हो रही है
*_मूल्यहीनता , निर्वासन और आओ हम अतीत को भूले -- यह ही सोच बनती जा रही है । व्यष्टि - हित प्रमुख है | आचार व्यवहार सब मात्र औपचारिकता है । धर्म दर्शन की मूल भावना भौतिकता में कहीं खो गयी है । यही सांस्कृतिक प्रदूषण है ।_*
आप जो करते है आपकी अगली पीढ़ी उसका अनुसरण करती है यदि आप उन्हें संस्कार देते है तो वह संस्कार सीखता है उसे संस्कार नही देते तो वह कुमार्ग पर चलता है मेरे शब्दो मे बच्चा आपका राम बनेगा या रावण यह आपके हाथ मे है ।।
#आज जब आप tv पे न्यूज़ देख रहे होते है तो एक विज्ञापन आता है axe परफ्यूम का जिसमे माँ बेटी के BF को जिस तरह खुद से इंट्रोड्यूस करवाती है मतलब आप समझ ही जाते है कि उसका क्या इंटेंशन है ।।
आजकल कंडोम के विज्ञापन अश्लीलता की सारी हदें पार करते है यदि आप माँ बाप या बहन के साथ बैठे हो और वो विज्ञापन आ जाए तो आप खुद की असहजता समझ सकते है ।।
अजय कर्मयोगी
*लोग कहते है कि रेप के आकड़ो में वृद्धि हुई है क्या इसपे आपने ध्यान दिया कि क्यों हुई है ? एक लड़का हरिश्चंद्र मूवी देखकर महात्मा बनता है तो क्या रेप सीन देखकर एक लड़का बलात्कारी नही बन सकता , आज की कोई भी मूवी उठा कर देख लीजिए आप पूरी फैमिली के साथ बैठकर देख सकते है यह एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है ..?*
सांस्कृतिक प्रदूषण ही हर बुराई की जड़ है चाहे वह बलात्कार की घटना हो या महिला उत्पीड़न कही न कही उन सबकी वजह यही है ।।
*"जो दिखता है, वह बिकता है”*
तो फिर इस बाज़ार में जिसको बिकना है, उसे कुछ दिखाना भी तो पड़ेगा, तो हर कोई ख़ुद को ग्लोबल दिखाने में लगा हुआ है। आज के दौर में बदन उघाडू कपड़े ग्लोबलाइज़ेशन के प्रतीक हैं और इनको धारण करने वाली औरतें डीवा हो गई हैं। देवी से डीवा तक के इस सफ़र में अगर कुछ खोया है तो वो हैं संस्कार। आज अगर कोई लड़की सलवार कमीज़ या साड़ी में हो तो उसे तंज़ से बहन जी का ख़िताब दे दिया जाता है, गोया बहन का रिश्ता भी अब गाली हो गया है। तो इस ख़िताब से बचने के लिए लड़कियाँ डीवा बनने के लिए जी जान से तैयार हैं।
वैसे ही जैसे देश के कई भागों में भैया का इस्तेमाल गाली के तौर पर किया जाता है। इसी प्रकार अँग्रेजी का इस्तेमाल आज ज़रूरी हो गया है। आधुनिक दिखने के लिए यह ज़रूरी है, चाहे दिल कितना भी आदिम युगीन क्यूँ न हो। और हिन्दी बेचारी तो पहले ही राष्ट्रभाषा होते हुए भी सौतेलापन झेलती आई है। तो यह सोने पर सुहागा हो गया है, आजकल हिन्दी हिन्डी बन गई है और जुबान मोड - मोड कर अंग्रेज़ी में बोली जा रही है।
हमारा युवा अमरीका की अंधी नक़ल कर के ख़ुद पर फ़ख़्र महसूस करता है, जैसे भारतीय होना कोई गुनाह है।
*महिला शसक्तीकरण का सही अर्थ क्या है? क्या हर मन की इच्छा जीके द्वारा सामजिक ,आध्यात्मिक, धार्मिक, नैसर्गिक, स्तर पर स्वीकार्य नहीं किया जा सकता, उन इच्छाओं को महिलाओं का अधिकार घोषित करना महिला शसक्तीकरण नहीं , अपितु जो सीधा संस्कृति को भस्म कर देने वाली पूर्ण आहुति सिद्ध हो वह महिला सशक्तिकरण है ?*
*_क्या महिला सशक्तिकरण के नाम पर सन्नी लियोन जैसी स्त्रियां समाज का आइना होंगी ?_*
वर्तमान की भारतीय राजनीति में एक कौम अपनी पराजय और विफलता को बर्दास्त नहीं कर पा रही है ........ इसीलिए एक मनोवैज्ञानिक वर्चस्व हिंदुओं पर स्थापित करने के षड्यंत्र रचे जा रहे है और यह षड्यंत्र कभी फिल्मों के माध्यम से कभी सरकारी संस्थाओं के माध्यम से और कभी भारत के मीडिया के माध्यम से, यहाँ यह समझने की आवश्यकता है कि......हर षड्यंत्र हिंदुओं की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक अस्मिता को नष्ट करने के लक्ष्य से हो रहा है अब भी चुप रहे तो आने वाले समय एक एक करके हिन्दू धर्म की परम्पराओं, ग्रंथों और सोलह संस्कारों को फिल्मों, टीवी सीरियल और मीडिया के माध्यम से नष्ट किया जाएगा।
तब तक बहुत देर हो चुकी होगी .....!!
विश्व सुंदरी प्रतियोगिता में जीतकर कोई देश का गौरव नहीं बढ़ता और ना ही कोई देशहित होता है।
कुछ लोग गीता-बबीता फोगट और इस प्रतियोगिता की विजेताओं की ड्रेस को एक जैसा बता रहे हैं , ऐसे मानसिक विकलांग कहाँ जाये ......
विश्व सुन्दरी औरत की देह दर्शन का ही वैश्विक प्रोग्राम है। उसकी देह देखकर ही उसे विश्व सुन्दरी बनाया जाता है। इंच और सेन्टीमीटर में जांघें और नितंब नापे जाते हैं। स्तन सुडौल हैं कि नहीं। होंठ मानकों पर खरे उतरते हैं कि नहीं। फिर आखिर में रटी रटाई मानवता की बातें पूछी जाती है और विजेता घोषित होने पर रोने की एक्टिंग सिखाई जाती है।
यही होती है विश्व सुन्दरी जो जल्द ही कॉरपोरेट कंपनियों और फिल्म इंडस्ट्री की माल बनकर माल बेचती है और खुद भी खूब माल कूटती है। विश्व सुन्दरी कोई नारी सशक्तीकरण का प्रोग्राम नहीं है। यह औरत के बाजारू इस्तेमाल का बाजार द्वारा ही विकसित किया गया एक औजार है। देह छिपाने से नारी सशक्त नहीं होती तो देह दिखाने से भी उसका कोई विकास नहीं होता।
*सांस्कृतिक प्रदुषण*
भावनाएँ दो प्रकार की होती है- -रागमयी और द्वेषमयी ।रागमयी भावनाएँ हृदय से हृदय को जोड़ती है । द्वेषमयी भावनाएँ परस्पर ईर्ष्या और घृणा अलगाव पैदा करती है । रागमयी भावनाएँ ही संस्कृति को पुष्ट करती है ।
*दर्शन, धर्म, साहित्य, कला, आचार-विचार :* यह संस्कृति के अंग है I दर्शन जीवन को देखने की दृष्टि के साथ-साथ सृष्टि जीवन के मूल प्रश्नों पर विचार और समधान प्रस्तुत करता है । दर्शन ही बताता है कि एक ही ब्रह्म है जो सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। धर्म उन नियमों का समूह है जो व्यष्टि-समष्टि के कल्याण के लिए है । धर्म अंत :अनुशासन है । साहित्य और कला भावना और सौन्दर्य के माध्यम से मानवता का दीप जलाती है । हम सब मोती एक लड़के है ; कहकर विश्व बन्धुत्व की भावना की जोत साहित्य ने जलायी है । आज यह सारी भावनाएँ समाप्त होती जा रही है । भौतिकता की ओर बढ़ते कदमो के कारण जीवन चेतना खत्म हो रही है
*_मूल्यहीनता , निर्वासन और आओ हम अतीत को भूले -- यह ही सोच बनती जा रही है । व्यष्टि - हित प्रमुख है | आचार व्यवहार सब मात्र औपचारिकता है । धर्म दर्शन की मूल भावना भौतिकता में कहीं खो गयी है । यही सांस्कृतिक प्रदूषण है ।_*
आप जो करते है आपकी अगली पीढ़ी उसका अनुसरण करती है यदि आप उन्हें संस्कार देते है तो वह संस्कार सीखता है उसे संस्कार नही देते तो वह कुमार्ग पर चलता है मेरे शब्दो मे बच्चा आपका राम बनेगा या रावण यह आपके हाथ मे है ।।
#आज जब आप tv पे न्यूज़ देख रहे होते है तो एक विज्ञापन आता है axe परफ्यूम का जिसमे माँ बेटी के BF को जिस तरह खुद से इंट्रोड्यूस करवाती है मतलब आप समझ ही जाते है कि उसका क्या इंटेंशन है ।।
आजकल कंडोम के विज्ञापन अश्लीलता की सारी हदें पार करते है यदि आप माँ बाप या बहन के साथ बैठे हो और वो विज्ञापन आ जाए तो आप खुद की असहजता समझ सकते है ।।
अजय कर्मयोगी
*लोग कहते है कि रेप के आकड़ो में वृद्धि हुई है क्या इसपे आपने ध्यान दिया कि क्यों हुई है ? एक लड़का हरिश्चंद्र मूवी देखकर महात्मा बनता है तो क्या रेप सीन देखकर एक लड़का बलात्कारी नही बन सकता , आज की कोई भी मूवी उठा कर देख लीजिए आप पूरी फैमिली के साथ बैठकर देख सकते है यह एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है ..?*
सांस्कृतिक प्रदूषण ही हर बुराई की जड़ है चाहे वह बलात्कार की घटना हो या महिला उत्पीड़न कही न कही उन सबकी वजह यही है ।।
*"जो दिखता है, वह बिकता है”*
तो फिर इस बाज़ार में जिसको बिकना है, उसे कुछ दिखाना भी तो पड़ेगा, तो हर कोई ख़ुद को ग्लोबल दिखाने में लगा हुआ है। आज के दौर में बदन उघाडू कपड़े ग्लोबलाइज़ेशन के प्रतीक हैं और इनको धारण करने वाली औरतें डीवा हो गई हैं। देवी से डीवा तक के इस सफ़र में अगर कुछ खोया है तो वो हैं संस्कार। आज अगर कोई लड़की सलवार कमीज़ या साड़ी में हो तो उसे तंज़ से बहन जी का ख़िताब दे दिया जाता है, गोया बहन का रिश्ता भी अब गाली हो गया है। तो इस ख़िताब से बचने के लिए लड़कियाँ डीवा बनने के लिए जी जान से तैयार हैं।
वैसे ही जैसे देश के कई भागों में भैया का इस्तेमाल गाली के तौर पर किया जाता है। इसी प्रकार अँग्रेजी का इस्तेमाल आज ज़रूरी हो गया है। आधुनिक दिखने के लिए यह ज़रूरी है, चाहे दिल कितना भी आदिम युगीन क्यूँ न हो। और हिन्दी बेचारी तो पहले ही राष्ट्रभाषा होते हुए भी सौतेलापन झेलती आई है। तो यह सोने पर सुहागा हो गया है, आजकल हिन्दी हिन्डी बन गई है और जुबान मोड - मोड कर अंग्रेज़ी में बोली जा रही है।
हमारा युवा अमरीका की अंधी नक़ल कर के ख़ुद पर फ़ख़्र महसूस करता है, जैसे भारतीय होना कोई गुनाह है।
*महिला शसक्तीकरण का सही अर्थ क्या है? क्या हर मन की इच्छा जीके द्वारा सामजिक ,आध्यात्मिक, धार्मिक, नैसर्गिक, स्तर पर स्वीकार्य नहीं किया जा सकता, उन इच्छाओं को महिलाओं का अधिकार घोषित करना महिला शसक्तीकरण नहीं , अपितु जो सीधा संस्कृति को भस्म कर देने वाली पूर्ण आहुति सिद्ध हो वह महिला सशक्तिकरण है ?*
