*गाय व भारत की दुर्दशा का सच*
गाय व बछड़ों के दो मुख्य दुश्मन है । पहला टैक्टर दूसरा दूध की डेरियाँ ।
डेरियों ने जबसे फैट युक्त दूध लेना शुरू किया तबसे गाय हांसिये पर आ गयी । इन सबके पीछे मुख्य कारण है मनुष्य का लालच और आलस्यपन । सरकार कभी भी आजतक इन सत्तर वर्षों में गरीब व उपेक्षित को देखकर बजट नहीं बनाती है , सरकार हमेशा उद्योगपति , शहरीकरण , और उच्चवर्ग को देखकर ही बजट बनाती है , क्योंकि यही उनके आय का स्रोत हैं । यदि सारी गौचर भूमि भी खाली करा दी जाये तो भी 40 % से अधिक गौ-वंश नहीं बचने वाला है ।
पहले किसान गाय को इसलिए पालता था कि उसे सिर्फ एक समय का ही चारा खिलाना पड़ता था , आज भूसा को टैक्टर के द्वारा खेतों में उड़ा दिया जाता है , फिर 10 -15 रुपये किलो का भूसा कौन खिलाना चाह रहा है , वह भी उन गायों को जो दूध नहीं देती या कम देती हैं या जिनका मूल्य कम है ।
सरकार ने मनरेगा , नरेगा के द्वारा जबसे मजदूरों की मजदूरी देनी शुरू की है जिसमें मजदूर और प्रधान की पूरी सांठ-गांठ होती है इसलिए मजदर मंहगे हो गये, नरेगा या मनरेगा में काम कुछ नहीं होता सिर्फ कागज पर काम होता है , और कमीशन पर मजदूरों व सरपंच की चांदी होती है । वी पी एल और अंत्योदय राशन कार्ड के कारण पूरे परिवार का 500 रुपये में ही गेहूं , चावल , चीनी , नमक मिल जाता है । इसलिए जिनके पास खेती है उन्हें भी मंहगी खेती करने की जरूरत क्या है ? जब परिवार का गुजर - बसर 1000 रुपये में हो रहा है , इसलिए भारत में गाय नहीं पल सकती चाहे पूरे भारत के लोग एकत्र हो जाये। आजकल सभी को फायदा चाहिए ।
आज अनेक राज्यों के किसानों की सिरदर्दी जर्सी सांड हो चुके हैं जो फसलों को वर्वाद कर रहे हैं , जहां नीलगाय , सुअर , का आतंक था , वहीं उससे ज्यादा अब जर्सी सांडो का आतंक हो गया है , जिसे कसाई को ना बेचकर किसान पुण्यवान हो रहे हैं लेकिन उसे खुला छोड़कर फसलों को वर्बाद भी करवा रहे हैं , अतः गौ-रक्षा सिर्फ भावनात्मक नहीं चाहिए , इसका आर्थिक समाधान युक्त तार्किक लक्ष्य भी होना चाहिए । आज कौन किसानी करना चाहता है, किसे किसानी की पढ़ाई करते हुए देखा जा रहा है ? आजकल के बच्चों , बेटियों , बहुओं को गोबर उठाने में बदबू आती है । गल्ती से गोबर छू गया तो तीन बार डिटोल से हाथ धोएंगी और पूरे दिन नाक चढ़ी रहेगी । शहर में अगर आपने गल्ती से कुत्ते की जगह गाय पाल ली तो पूरा मोहल्ला , सेक्टर तुम्हारे खिलाफ पुलिश में चला जायेगा , जैसे आपने उनकी प्रतिष्ठा को नंगा कर दिया हो । ऐसी स्थति में गाय पलेगी कैसे आप बतायें ?
गौ-शालाओ की स्थति देखिये जेल से भी बदतर स्थति है , कैद है गायों का जीवन जबकि गाय का जीवन उन्मुक्त होना चाहिए , इन गौ-शालों में गायों को ना खाने के लिए चारा है ना घूमने के लिए जगह है। जिन गौ-शालाओं में आर्थिक संपन्नता है वहाँ की संस्था ही मालपुए खा रही है बाकी 90 % गौ-शालाएं जेल से भी बदतर हैं । जो लोग गाय नहीं पालते , ना ही उसका दूध पीते हैं वह सिर्फ सोसल मीडिया पर गौ -माता की जय लिखकर गंगा सागर में स्नान का पुण्य प्राप्त करना चाह रहे हैं ।।
अजय कर्मयोगी
गाय व बछड़ों के दो मुख्य दुश्मन है । पहला टैक्टर दूसरा दूध की डेरियाँ ।
डेरियों ने जबसे फैट युक्त दूध लेना शुरू किया तबसे गाय हांसिये पर आ गयी । इन सबके पीछे मुख्य कारण है मनुष्य का लालच और आलस्यपन । सरकार कभी भी आजतक इन सत्तर वर्षों में गरीब व उपेक्षित को देखकर बजट नहीं बनाती है , सरकार हमेशा उद्योगपति , शहरीकरण , और उच्चवर्ग को देखकर ही बजट बनाती है , क्योंकि यही उनके आय का स्रोत हैं । यदि सारी गौचर भूमि भी खाली करा दी जाये तो भी 40 % से अधिक गौ-वंश नहीं बचने वाला है ।
पहले किसान गाय को इसलिए पालता था कि उसे सिर्फ एक समय का ही चारा खिलाना पड़ता था , आज भूसा को टैक्टर के द्वारा खेतों में उड़ा दिया जाता है , फिर 10 -15 रुपये किलो का भूसा कौन खिलाना चाह रहा है , वह भी उन गायों को जो दूध नहीं देती या कम देती हैं या जिनका मूल्य कम है ।
सरकार ने मनरेगा , नरेगा के द्वारा जबसे मजदूरों की मजदूरी देनी शुरू की है जिसमें मजदूर और प्रधान की पूरी सांठ-गांठ होती है इसलिए मजदर मंहगे हो गये, नरेगा या मनरेगा में काम कुछ नहीं होता सिर्फ कागज पर काम होता है , और कमीशन पर मजदूरों व सरपंच की चांदी होती है । वी पी एल और अंत्योदय राशन कार्ड के कारण पूरे परिवार का 500 रुपये में ही गेहूं , चावल , चीनी , नमक मिल जाता है । इसलिए जिनके पास खेती है उन्हें भी मंहगी खेती करने की जरूरत क्या है ? जब परिवार का गुजर - बसर 1000 रुपये में हो रहा है , इसलिए भारत में गाय नहीं पल सकती चाहे पूरे भारत के लोग एकत्र हो जाये। आजकल सभी को फायदा चाहिए ।
आज अनेक राज्यों के किसानों की सिरदर्दी जर्सी सांड हो चुके हैं जो फसलों को वर्वाद कर रहे हैं , जहां नीलगाय , सुअर , का आतंक था , वहीं उससे ज्यादा अब जर्सी सांडो का आतंक हो गया है , जिसे कसाई को ना बेचकर किसान पुण्यवान हो रहे हैं लेकिन उसे खुला छोड़कर फसलों को वर्बाद भी करवा रहे हैं , अतः गौ-रक्षा सिर्फ भावनात्मक नहीं चाहिए , इसका आर्थिक समाधान युक्त तार्किक लक्ष्य भी होना चाहिए । आज कौन किसानी करना चाहता है, किसे किसानी की पढ़ाई करते हुए देखा जा रहा है ? आजकल के बच्चों , बेटियों , बहुओं को गोबर उठाने में बदबू आती है । गल्ती से गोबर छू गया तो तीन बार डिटोल से हाथ धोएंगी और पूरे दिन नाक चढ़ी रहेगी । शहर में अगर आपने गल्ती से कुत्ते की जगह गाय पाल ली तो पूरा मोहल्ला , सेक्टर तुम्हारे खिलाफ पुलिश में चला जायेगा , जैसे आपने उनकी प्रतिष्ठा को नंगा कर दिया हो । ऐसी स्थति में गाय पलेगी कैसे आप बतायें ?
गौ-शालाओ की स्थति देखिये जेल से भी बदतर स्थति है , कैद है गायों का जीवन जबकि गाय का जीवन उन्मुक्त होना चाहिए , इन गौ-शालों में गायों को ना खाने के लिए चारा है ना घूमने के लिए जगह है। जिन गौ-शालाओं में आर्थिक संपन्नता है वहाँ की संस्था ही मालपुए खा रही है बाकी 90 % गौ-शालाएं जेल से भी बदतर हैं । जो लोग गाय नहीं पालते , ना ही उसका दूध पीते हैं वह सिर्फ सोसल मीडिया पर गौ -माता की जय लिखकर गंगा सागर में स्नान का पुण्य प्राप्त करना चाह रहे हैं ।।
अजय कर्मयोगी

