अहंकार घटाने का उपाय :--
अपमान सहने की आदत बनाएं, किन्तु इतना नहीं कि दुष्टों का साहस बढे | बड़ो का पाँव अधिकाधिक छूने का प्रयास करें | EMPATHY का अभ्यास करें , SYMPATHY का नहीं |
Sympathy में परायापन है, "दूसरे" के प्रति सहानुभूति है | Empathy में दूसरापन नहीं रहता, दूसरे का दुःख अपना दुःख लगता है | शिशु में यह गुण जन्मजात रहता है, उसे गलत प्रशिक्षण देकर गुमराह हमलोग करते हैं | उसके आत्मज्ञान को दबाकर झूठी अस्मिता (आइडेंटिटी) सिखलाते हैं जो अहंकार बढाती है | इसी गुण (Empathy) को प्राण का आयाम बढ़ाना कहते हैं, ताकि धीरे धीरे पूरा विश्व कुटुम्ब लगे | कलियुग में यह अधिक कठिन है क्योंकि दुष्ट लोग इसका गलत लाभ उठाएंगे | अतः कुत्संग से दूर रहे, फेसबुक पर भी ब्लॉक करने का अभ्यास बढायें | वसुधैव कुटुम्ब उनके लिए है जो कुटुम्ब बनने योग्य हैं, राक्षसों के लिए नहीं | किन्तु राक्षसों से दूर रहने पर भी उनके प्रति भी Empathy का प्रयास करें |
अपने शरीर और मन को, अपने अहंकार और सांसारिक परिचय आदि को अपना अस्तित्व, अपनी अस्मिता, न मानें, बल्कि अपने औजार ("करण", अर्थात तीन अन्तःकरण और दस बाह्य-करण) मानें और साक्षीभाव से अपने मन, बुद्धि आदि सभी करणों के कारोबार देखने और उनकी निष्पक्ष आलोचना करने का अभ्यास बढायें |
अहंकार घटाने से ही आत्मज्ञान जागता है, ईश्वर-प्राप्ति होती है | यम-नियम-आसन-प्राणायाम आदि अष्टांग योग करते हुए ऐसी सोच बनाएं |
EMPATHY ही सर्जनात्मक कल्पना (क्रिएटिव इमेजिनेशन) का स्रोत है, यह I. A. Richards का सौन्दर्यशास्त्रीय सिद्धान्त है जिन्होंने आधुनिक पाश्चात्य साहित्यिक समालोचना में सच्चे साहित्य और कला का आधार सत्यं-शिवं-सुन्दरं को स्थापित किया |
किन्तु I. A. Richards भी विश्वामित्र की सर्जनात्मक कल्पना तक नहीं पँहुच सके जब कल्पना द्वारा नयी सृष्टि या नया कल्प बनाना सम्भव हो जाता है | विश्वामित्र वाली सर्जनात्मक कल्पना हर शिशु में होती है जिसकी भूख में वह शक्ति है कि माँ की छाती में दूध की सर्जना हो जाती है | किन्तु शिशु के आत्मज्ञान और शिशु की कल्पनाशक्ति को हम सही दिशा में विकसित नहीं होने देते, उसपर "शिक्षा" थोप देते हैं | शिशु जैसा है वैसा हमें सहन नहीं, हम उसे तोड़-मरोड़कर कुछ और बनाना चाहते हैं |
अतः आपको चयन करना है कि आपको अपनी आत्मा चाहिए या संसार, दोनों नहीं मिल सकते |
अपमान सहने की आदत बनाएं, किन्तु इतना नहीं कि दुष्टों का साहस बढे | बड़ो का पाँव अधिकाधिक छूने का प्रयास करें | EMPATHY का अभ्यास करें , SYMPATHY का नहीं |
Sympathy में परायापन है, "दूसरे" के प्रति सहानुभूति है | Empathy में दूसरापन नहीं रहता, दूसरे का दुःख अपना दुःख लगता है | शिशु में यह गुण जन्मजात रहता है, उसे गलत प्रशिक्षण देकर गुमराह हमलोग करते हैं | उसके आत्मज्ञान को दबाकर झूठी अस्मिता (आइडेंटिटी) सिखलाते हैं जो अहंकार बढाती है | इसी गुण (Empathy) को प्राण का आयाम बढ़ाना कहते हैं, ताकि धीरे धीरे पूरा विश्व कुटुम्ब लगे | कलियुग में यह अधिक कठिन है क्योंकि दुष्ट लोग इसका गलत लाभ उठाएंगे | अतः कुत्संग से दूर रहे, फेसबुक पर भी ब्लॉक करने का अभ्यास बढायें | वसुधैव कुटुम्ब उनके लिए है जो कुटुम्ब बनने योग्य हैं, राक्षसों के लिए नहीं | किन्तु राक्षसों से दूर रहने पर भी उनके प्रति भी Empathy का प्रयास करें |
अपने शरीर और मन को, अपने अहंकार और सांसारिक परिचय आदि को अपना अस्तित्व, अपनी अस्मिता, न मानें, बल्कि अपने औजार ("करण", अर्थात तीन अन्तःकरण और दस बाह्य-करण) मानें और साक्षीभाव से अपने मन, बुद्धि आदि सभी करणों के कारोबार देखने और उनकी निष्पक्ष आलोचना करने का अभ्यास बढायें |
अहंकार घटाने से ही आत्मज्ञान जागता है, ईश्वर-प्राप्ति होती है | यम-नियम-आसन-प्राणायाम आदि अष्टांग योग करते हुए ऐसी सोच बनाएं |
EMPATHY ही सर्जनात्मक कल्पना (क्रिएटिव इमेजिनेशन) का स्रोत है, यह I. A. Richards का सौन्दर्यशास्त्रीय सिद्धान्त है जिन्होंने आधुनिक पाश्चात्य साहित्यिक समालोचना में सच्चे साहित्य और कला का आधार सत्यं-शिवं-सुन्दरं को स्थापित किया |
किन्तु I. A. Richards भी विश्वामित्र की सर्जनात्मक कल्पना तक नहीं पँहुच सके जब कल्पना द्वारा नयी सृष्टि या नया कल्प बनाना सम्भव हो जाता है | विश्वामित्र वाली सर्जनात्मक कल्पना हर शिशु में होती है जिसकी भूख में वह शक्ति है कि माँ की छाती में दूध की सर्जना हो जाती है | किन्तु शिशु के आत्मज्ञान और शिशु की कल्पनाशक्ति को हम सही दिशा में विकसित नहीं होने देते, उसपर "शिक्षा" थोप देते हैं | शिशु जैसा है वैसा हमें सहन नहीं, हम उसे तोड़-मरोड़कर कुछ और बनाना चाहते हैं |
अतः आपको चयन करना है कि आपको अपनी आत्मा चाहिए या संसार, दोनों नहीं मिल सकते |

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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद